Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

“शांति की तलाश में“, इस विडियो को जरूर देखिये

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 25, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
1
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

“शांति की तलाश में“, इस विडियो को जरूर देखिये

भारत देश के छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग में शांति स्थापना के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों को दखल देना होगा. अन्तराष्ट्रीय संगठनों ने दखल नहीं दिया तो भारत देश की सरकार आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर नामो निशान मिटा देगी. भारत देश में अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर शांति सेना भेजना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र संघ और यूरोपीय देशों के संगठनों को भी हस्तक्षेप करना चाहिए. अंतराष्ट्रीय संगठनों ने भारत देश में हस्तक्षेप नहीं किया तो हो सकता हैं कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो जाये.

बस्तर संभाग के जिलों की अनकही-अनसुनी या सुनाई हुई सच्चाई की कहानी हैं. यह उस देश व उस राज्य की कहानी है जहां आदिवासी कहे जाने वाले आदिमानव अर्थात आदिवासी भारत देश के ( मुलबीज ) जीवन जीते हैं. इस राज्य का नाम हैं छत्तीसगढ़. वैसे भारत के कई राज्यों में मुलनिवासी जीवन जीते हैं. इन आदिवासियों के पास कुछ नहीं होता हैं लेकिन देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के सबसे अमीर आदिवासी ( मुलनिवासी ) हैं.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

आदिवासियों के पास जंगल, जमीन, जल है. यह संसाधन ही आदिवासियों का घर, सम्मान, इज्जत हैं. इन आदिवासियों के पास जल, जंगल, जमीन न रहे तो इन आदिवासियों का दुनिया में कोई वजूद ही नहीं रहेगा. जिस जंगल, जमीन, जल में आदिवासी निवास करते हैं, उस जमीन में कई तरह के मंहगे धातु हैं, शायद यही वजह है कि बस्तर संभाग में आदिवासी किसी न किसी तरह से मारे जा रहे हैं.

बस्तर संभाग में सबसे पहले राज्य सरकार द्वारा सन् 2000 में ‘सलवा जुडूम’ शांति अभियान के नाम पर नक्सल संगठन के खिलाफ अभियान चलाया गया. इस अभियान में कई आदिवासी मारे गए, कई आदिवासी परिवार बस्तर संभाग छोड़कर अलग राज्यों में जीवन जीने चले गये. जो आदिवासी मारे गए हैं और बस्तर संभाग छोड़कर गये हैं, उनका न तो सरकार के पास हिसाब है और न ही कोई दस्तावेज.

बस्तर संभाग में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत थी, सलवा जुडूम अभियान के चलने से आबादी घट कर 26 प्रतिशत हो गयी है. आदिवासियों का नक्सलवाद (माओवादियों) के नाम पर आज भी बस्तर में मरना और आदिवासियों का विस्थापन बरकरार है. सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग में ही आदिवासियों की आबादी कम नहीं हो रही है बल्कि पूरे भारत देश में आदिवासियों की आबादी तेजी से घट रही है.




आदिवासियों के पक्ष में ऐसी कोई राजनैतिक पार्टी नहीं है जो भारत देश में आदिवासियों के संरक्षण की बात करती हो. भारत देश में आदिवासियों का आरक्षण कितना है ? आदिवासियों को आरक्षण हैं तभी तो आदिवासी प्रतिनिधी चुनाव लड़ते हैं. बस्तर संभाग की बात करें तो विधायक, सांसद, आदिवासी हैं लेकिन इन नेताओं को आदिवासियों की आबादी घटने से कोई मतलब नहीं है. ये सोचते हैं कि वे खुद के दम पर नेता बने हैं, लेकिन यह बात भूल गये हैं कि आदिवासियों की आबादी रहेगी तो विधायक, सांसद सीट लड़ पायेंगे. बस्तर संभाग में 12 विधानसभा सीटें हैं, इन सीटों में एक विधानसभा सीट से सामान्य हो गया हैं. बस्तर संभाग में जिस तेजी से आदिवासियों की आबादी घटती जा रही है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बहुत जल्द 11 विधानसभा सीटें भी सामान्य हो जायेगी और आज जो नेता अपने आप को आदिवासी जनप्रतिनिधी होने का दावा करते हैं, किसी किनारे लाईन में सबसे पीछे ताली बजाते दिखेंगे.




आदिवासियों के संरक्षण के लिये भारत देश के राष्ट्रपति, राज्य के राज्यपालों को जनप्रतिनिधि चुना गया हैं, लेकिन आज तक किसी प्रकरण में राष्ट्रपति व राज्यपालों द्वारा कोई पहल नहीं किया गया है. जब स्थानीय आदिवासी जनप्रतिनिधि ही आदिवासियों को अनसुना करते हैं तो राष्ट्रपति और राज्यपालों पर इल्जाम मढ़ना व बोलना उचित नहीं होगा.

यह कोई नहीं जानता कि मरने वाला आदिवासी हैं या नक्सलवादी ? जिला सुरक्षा बल ने आदिवासी को मारा या नक्सलवादी को ? पुलिस का जो बयान होता है, राज्य व केंद्र की गृह मंत्रालय उसी बयान पर विश्वास करता हैं. सच्चाई का पता कोई नहीं लगाता. आदिवासियों को नक्सल के नाम पर मारने वाला पुलिस, जांच करने वाला पुलिस. भारत देश में जितने भी जांच ऐजेंसियां हैं वे सारे किसी न किसी तरीखे से सरकार के अधीन हैं, तो इन जांच एजेंसियों से ये उम्मीद नहीं कि जा सकती कि निष्पक्ष जांच करेंगी.




भारत देश के छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग में शांति स्थापना के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों को दखल देना होगा. अन्तराष्ट्रीय संगठनों ने दखल नहीं दिया तो भारत देश की सरकार आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर नामो निशान मिटा देगी. भारत सरकार की ऐजेंसियां यह कहते नहीं थकती कि भारत के संविधान अनुसार हम देश के नागरिकों के साथ समान न्याय कर रहे हैं. न्याय के नाम पर भारत देश के नागरिकों को युद्ध की ओर अग्रसर किया जा रहा हैं. भारत देश में अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर शांति सेना भेजना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र संघ और यूरोपीय देशों के संगठनों को भी हस्तक्षेप करना चाहिए. अंतराष्ट्रीय संगठनों ने भारत देश में हस्तक्षेप नहीं किया तो हो सकता हैं कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो जाये.

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2018/12/Chhtishgarh.mp4
  • लिंगाराम कोडाप्पी

Read Also –

नागरिकों की हत्या और पूंजीतियों के लूट का साझेदार
छत्तीसगढ़ः आदिवासियों के साथ फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार का सरकारी अभियान
दन्तेवाड़ाः 14 साल की बच्ची के साथ पुलिसिया दरिंदगी
9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस : छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 15 आदिवासियों की हत्या




[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

हम धर्मात्मा दिखना चाहते हैं, होना नहीं

Next Post

फर्जी सरकार के फर्जी आंकड़े

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

फर्जी सरकार के फर्जी आंकड़े

Comments 1

  1. S. Chatterjee says:
    7 years ago

    बस्तर या अन्य आदिवासी इलाक़ों में संसाधनों पर कब्जा करने की जो लडाई चल रही है उसमें सभी सरकारें पूँजीपतियों के साथ हैं । कॉंग्रेस आ जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पडेगा

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

करकरे को किसने मारा ? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा

November 12, 2024

माओ त्से-तुंग की एक कविता : चिङकाङशान पर फिर से चढ़ते हुए[1]

December 28, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

March 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

March 7, 2026

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.