Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सरकार जब कानून का बेजा इस्तेमाल करने लगे

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 15, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

सरकार जब कानून का बेजा इस्तेमाल करने लगे

Ravish Kumarरविश कुमार, मैग्सेस अवार्ड प्राप्त जनपत्रकार

एक सरकार किसी के पीछे पड़ जाए तो वह क्या-क्या कर सकती है, यह जानना हो तो इस वक्त एक कहानी काफी है. डॉ. कफ़ील ख़ान की कहानी. सोमवार को अलीगढ़ के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ज़मानत देते हैं लेकिन उन्हें 72 घंटे तक रिहा नहीं किया जाता है. 72 घंटे बाद यूपी की पुलिस को ख्याल आता है और वह डॉ. कफील ख़ान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा देती है, जिसके तहत 1 साल तक जेल में रखा जा सकता है. 12 दिसंबर, 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में डॉ. कफ़ील ख़ान ने भाषण दिया था. उस दिन कोई हिंसा नहीं हुई थी बल्कि दो दिनों बाद यूनिवर्सिटी के भीतर पुलिस एक्शन होता है. 13 दिसंबर को पुलिस की दर्ज एफआईआर में यही कहा गया था कि डॉ. कफ़ील ख़ान के भाषण ने सांप्रदायिक सद्भाव और यूनिवर्सिटी की शांति को बिगाड़ा है लेकिन गिरफ्तारी नहीं होती है. गिरफ्तारी होती है 29 जनवरी, 2020 को वो भी मुंबई से यूपी स्पेशल टास्क फोर्स अरेस्ट करती है. अब जब सोमवार को ज़मानत मिल गई तो तीन दिनों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा लगा दी गई है. उस वक्त धारा लगी जब मथुरा जेल से डॉ. कफ़ील ख़ान को रिहा किया जा रहा था. एक महीना से ज़्यादा समय बीत जाने पर गिरफ्तारी का ख़्याल आया है और जब ज़मानत मिलने के बाद रिहाई का वक्त आता है तो एनएसए लगा दिया जाता है.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

2017 में गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में 60 बच्चों के मारे जाने की ख़बर आई थी. शुरू में डॉ. ख़ान की भूमिका की काफी सराहना हुई थी, बाद में उन्हें सस्पेंड कर गिरफ्तार कर लिया गया. करीब 8 महीने तक जेल में रहने के बाद डॉ. कफ़ील ख़ान को रिहा किया. अप्रैल 2018 में डॉ. कफ़ील ख़ान को ज़मानत मिल गई. इस बीच यूपी सरकार बी आर डी अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले की जांच करती रही. जांच का काम इतनी तेज़ी से चल रहा था या चल ही नहीं रहा था कि कफील खान को ही हाईकोर्ट में जाना पड़ा कि जांच में तेज़ी लाई जाए. 10 जून 2018 को हाईकोर्ट ने जांच पूरी करने के आदेश दिए. अप्रैल 2019 में रिपोर्ट बन गई. छह महीने बाद यानी 26 सितंबर 2019 को वह रिपोर्ट कफील ख़ान को मिली. रिपोर्ट में डॉ. कफील की तारीफ की गई कि उसने बच्चों की जान बचाने के लिए डाक्टर से बढ़कर काम किया और जान बचाई. जब यह बात मीडिया में आई तब यूपी सरकार ने कहा कि डॉ. कफ़ील ख़ान जांच रिपोर्ट के बारे में ग़लत सूचना दे रहे हैं. उनके ख़िलाफ नए सिरे से विभागीय जांच की जाएगी. पहले से ही चार आरोपों की जांच चल रही थी, अब और तीन नए आरोप लगा कर जांच शुरू कर दी गई. यह जांच चल रही है. काफिल ख़ान पहले ही निलंबित थे लेकिन फिर भी उन्हें निलंबित किया गया. एक आदमी सस्‍पेंड होते हुए भी सस्पेंड होता है. एक सरकार चाहे तो क्या-क्या कर सकती है उसे आप डॉ. कफील खान की कहानी से समझ सकते हैं. जमानत पर रिहा किया जाना है उसी वक्त एनएसए लगाया जाता है, यह टारगेट नहीं है तो क्या है.

13 फरवरी के प्राइम टाइम में हमने दिखाया था कि चौरीचौरा से राजघाट के लिए पैदल निकले सत्याग्रहियों को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. गिरफ्तारी का कारण आप भी ध्यान से सुन लें. अगर ये कारण है कि तो यही नहीं न जाने करोड़ों लोग जेल भेज दिए जाएं. पुलिस ने कारण बताते हुए लिखा है कि कि ये लोग बिना परमिशन पदयात्रा कर रहे थे. और नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बारे में भ्रामक सन्देश देते हुए गुमराह कर भड़का रहे थे. जिससे शान्ति भंग होने की प्रबल संभावना है. इस कृत्य से जनता में वैमनस्य पैदा होगा और संज्ञेय अपराध घटित हो सकता है इसलिए इन्हें गिरफ्तार किया गया है. एसडीएम ने सभी सत्याग्रहियों से ढाई-ढाई लाख का बॉन्‍ड देने के लिए कहा गया है. एक तो गिरफ्तारी और दूसरा इन नौजवानों पर ढाई ढाई लाख का बॉन्ड.

इनमें से हमने आपको प्रदीपिका के बारे में बताया था. प्रदीपिका उभरती हुई पत्रकार हैं जिन्होंने कश्मीर में छह महीना बिता कर वहां के हालात के बारे में रिपोर्टिंग की थी. वे सत्याग्रह डॉट स्क्रोल डॉट इन से जुड़ी रहीं और अब अलग हो कर लिखती हैं. स्वतंत्र पत्रकारिता करती हैं. प्रदीपिका ने उन 9 साथियों की टोली में शामिल होने का फैसला किया. इन सत्याग्रहियों ने 13 फरवरी की शाम से अनशन शुरू कर दिया है. लोकतंत्र में लोकतांत्रिक होना कितना मुश्किल होता जा रहा है. एक बेरोज़गार पत्रकार पर ढाई लाख का बॉन्‍ड की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में आप संसद में सब कुछ कह सकते हैं. संसद के बाहर भी बहुत कुछ कह सकते हैं लेकिन ऐसा क्या है कि इन सत्याग्रहियों को भ्रामक बातें फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.

कर्नाटक के बीदर के एक स्कूल में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक नाटक हुआ था. 21 जनवरी को हुए इस नाटक में 4, 5, 6 क्लास के बच्चों ने भाग लिया था. इस नाटक में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ टिप्पणी के कारण इन पर राजद्रोह का मामला दर्ज हो गया था. स्कूल की प्रिंसिपल और बच्चों की मां को गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें आज बेल मिली है. हमारा लोकतंत्र वाकई समृद्ध हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से डिटेंशन सेंटर के बारे में डिटेल रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है. यह बताने को कहा है कि डिटेंशन सेंटर में मौजूद लोगों की संख्या कितनी है. कोर्ट ने पूछा है कि डिटेंशन सेंटर में तीन साल से ज्यादा समय गुज़ार चुके लोगों को रिहा किया गया है या नहीं. प्रशांत भूषण ने बहस करते हुए कहा कि असम के डिटेंशन सेंटर में 3 हज़ार से ज़्यादा लोग कई साल से कैद में रखे गए हैं. उनकी रिहाई पर सरकार कुछ नहीं कह रही है. होली की छुट्टियों के बाद इस मामले पर अगली सुनवाई होगी. अपने आस-पास के समाज में लोगों की तकलीफों को गौर से देखा कीजिए. तभी आपको पता चलेगा कि मीडिया लोगों से कितनी दूर हो चुका है.

78559 लोग भारत संचार निगम लिमिटेड से वीआरएस पर रिटायर कर दिए गए और किसी को वीआरएस का पैसा तक नहीं दिया गया है. इतने लोग तो अहमदाबाद के स्टेडियम में आ भी नहीं सकेंगे लेकिन टीवी के लिए इस संख्या का अब कोई महत्व नहीं रहा है. इन कर्मचारियों को भय हो गया है कि वीआरएस का पैसा आएगा भी या नहीं क्योंकि जो लोग काम कर रहे हैं उन्हें ही दो महीने से सैलरी नहीं मिली है. कर्मचारियों का कहना है कि 31 जनवरी को रिटायर हो गए हैं लेकिन हाथ में पैसा नहीं है. सरकार का कहना है कि 31 मार्च तक आधा पैसा दिया जाएगा और 30 जून तक पूरा हिसाब कर दिया जाएगा. कई दिनों से बीएसएनएल के कर्मचारी हमें लिख रहे हैं. उनका कहना है कि 23 अक्तूबर 2019 को दूर संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने 69000 करोड़ का पैकेज दिया जा रहा है.

इतने पैकेज के बाद भी सैलरी नहीं आ रही है. वैसे भी बीएसएनएल के कर्मचारियों को सैलरी रुक रुक कर ही मिल रही है. ज़ाहिर है लंबे समय में इनकी आर्थिक स्थिति खस्ता हो गई होगी. पिछले साल नवंबर में केरल के 52 साल के राम कृष्णन ने आत्महत्या कर ली थी. 30 साल से बीएसएनएल में काम कर रहे थे. 10 महीने से उन्हें वेतन नहीं मिल रहा था. अक्तूबर की सैलरी पांच दिसंबर को आई और नवंबर की सैलरी 1 जनवरी को आई.

जबलुपर के रामेश्वर ने भी सैलरी न मिलने के कारण अपना जीवन समाप्त कर लिया. एक बड़े परिवार का बोझ रामेश्वर पर था. दो बेटियां हैं. एक पांचवीं में पढ़ती है और एक तीसरी में. फीस भरने में दिक्कत आ रही थी. अन्य खर्चे के कारण रामेश्वर का तनाव काफी बढ़ गया था. रामेश्वर की पत्नी का कहना है कि तीन महीने से सैलरी नहीं मिल रही है.

अब आपका परिचय ऐसे देशभक्तों से कराते हैं जो हाथ में पत्थर और चेहरे पर गमछा धारण करते हैं. ये नया इंडिया के देशभक्त हैं. गमछाधारी देशभक्त. अगर आपके मन में गुंडा शब्द आया तो अवश्य प्रायश्चित करें. ये देशभक्ति के नए आइटम ब्वाय हैं. ये अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहते हैं. चाहते हैं कि देश सिर्फ इनकी देशभक्ति देखे. हाथ में ईंट के बड़े बड़े टुकड़े देखे जिनसे कन्हैया के काफिले में कुछ लोगों को चोट लगी है. कन्हैया बक्सर में सभा कर आरा की तरफ जा रहे थे तभी ये हमला हुआ. आज कल के नौजवान देशभक्ति के मामले में पहले यही चाहते हैं कि उनका फोटो आ जाए लेकिन गमछाधारी देशभक्त अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहते हैं. शायद नहीं चाहते कि मां बाप टीवी पर देख लें या ससुराल वाले देख लें. जिन देशभक्तों का चेहरा दिख रहा है उनके तेवर से लग रहा है कि आधुनिक भारत के इतिहास का हर चैप्टर रट गए हैं. देशभक्ति की विरासत इनके चेहरे पर टपक रही है.

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने नौजवानों को इस तरह से प्रोग्राम कर दिया है यानी बना दिया है कि जो नारा वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर दिल्ली में लगा रहे थे, वही नारा ये नौजवान आरा के पास लगा रहे थे. पत्थर लेकर आए थे, गोली मारने के नारे लगा रहे थे. राजनीति की जिस फैक्ट्री में ये देशभक्त पैदा किए गए हैं उनके नेता भी खुल कर इनके साथ नहीं आते हैं. बस गमछा देकर भेज देते हैं कि रास्ते में जो ईंट मिले उठा लेना और चला देना. पुलिस भी होती है लेकिन पुलिस भी ऐसे देशभक्तों के साथ कैसे सख्त हो सकती है ? आप पुलिस की दुविधा तो समझिए.

कन्हैया की सभा से लौटने के बाद हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. मनीष कुमार ने बताया है कि दो हफ्ते के भीतर कन्हैया पर आठ बार हमले हो चुके हैं. कन्हैया तीस जनवरी से ही जन गण मन यात्रा पर हैं. इस यात्रा की शुरूआत चंपारण के भितिहरवा से शुरू हुई थी. कन्हैया के साथ जेएनयू के ही पूर्व अध्यक्ष शकील अहमद खान भी हैं. कन्हैया हर दिन दो बार सभा कर रहे हैं. करीब 30 सभाएं कर चुके हैं. कई जगहों पर कन्हैया की सभा में भारी भीड़ देखी गई है. तो क्या इस वजह से कोई विचलित हो रहा है और हमले की योजना बना रहा है. बक्सर की सभा में भी काफी संख्या में लोग आए थे. इसके पहले कटिहार, जमुई, सहरसा, सुपौल, गया, छपरा और सारण में भी कन्हैया के काफिले पर हमला हुआ है. 27 फरवरी को सभाओं का यह सिलसिला में पटना के गांधी मैदान में जाकर समाप्त होने वाला है. कन्हैया इन सभाओं में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बातें कर रहे हैं.

Read Also –

माई नेम इज केजरीवाल एंड आई एम नॉट अ टेररिस्‍ट
छात्रों के खिलाफ मोदी-शाह का ‘न्यू-इंडिया’
‘अगर देश की सुरक्षा यही होती है तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.’
इस सरकार का दिमाग खराब हो गया है
मीडिया के बाद ‘न्यायपालिका’ का ‘शव’ भी आने के लिए तैयार है 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

माई नेम इज केजरीवाल एंड आई एम नॉट अ टेररिस्‍ट

Next Post

न्यायपालिका की अंतरात्मा ???

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

न्यायपालिका की अंतरात्मा ???

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

ऑपरेशन क्लीन : क्या मोदी सरकार अपने और अपने मालिक के खात्मे का जोखिम उठाने के लिए तैयार है ?

April 18, 2021

क्या माओवादियों को हथियार विदेशों या चीन से मिलता है ?

November 12, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.