पिछले आलेख में वर्ग और जाति के अंतर्संबंधों की चर्चा करते हुए हमने यह रेखांकित किया था कि वर्ग और वर्ग संघर्ष की अवधारणा को उसके संकीर्ण आर्थिक अर्थों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता. भारतीय समाज की जटिल संरचना में वर्गीय विश्लेषण के भीतर जाति, संस्कृति, जेंडर और जेनरेशन संबंधों जैसे आयामों को समाहित करना जरूरी है, तभी वर्ग संघर्ष की एक मुकम्मल तस्वीर हमारे सामने उभर सकती है. वर्ग केवल आय, संपत्ति और पेशे से निर्धारित नहीं होता. उसका संबंध सत्ता, श्रम, सम्मान और संसाधनों के वितरण से भी होता है. भारत की ऐतिहासिक सामाजिक संरचना में इन सभी क्षेत्रों को जाति व्यवस्था ने गहराई से प्रभावित किया है. यहां श्रम का विभाजन केवल आर्थिक नहीं रहा, बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन रहा है. यही कारण है कि भूमिहीनता, अशिक्षा, अपमान, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक शोषण का सबसे बड़ा बोझ सदियों तक उन्हीं समुदायों पर पड़ा जिन्हें दलित, शूद्र और पिछड़ा कहा गया.
आज विभिन्न जातियों के भीतर से एक नया आर्थिक और राजनीतिक अभिजन वर्ग भी उभरा है, लेकिन इसके बावजूद भारतीय समाज की विशाल मेहनतकश आबादी अब भी उन्हीं समुदायों से आती है जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक उत्पीड़न का शिकार रहे हैं. तब जाति से जमात की ओर बढ़ना ही वर्ग बनने की प्रक्रिया है.
हमारे समाज सुधारकों—ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियार और डॉ. भीमराव आंबेडकर—ने वंचित समाज को केवल अलग-अलग जातियों के रूप में नहीं देखा. इसलिए उनके दौर के राजनीतिक विमर्श में Depressed Classes और Backward Classes जैसी संज्ञाएँ प्रचलित हुईं. इनका आशय जातियों की केवल पहचान करना नहीं था, बल्कि साझा दमन, साझा हित और साझा संघर्ष के आधार पर उन्हें एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक जमात के रूप में संगठित करना था.
आज इन ऐतिहासिक विमर्शों को फिर से सामने लाने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि सामाजिक न्याय के प्रश्न को उसकी राजनीति करने वाली शक्तियों ने ही आरक्षण और प्रतिनिधित्व तक सीमित कर दिया है, जबकि सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों में व्याप्त हर प्रकार के उत्पीड़न और असमानता का अंत है. दूसरी ओर, भाजपा की राजनीति संविधान की लोकतांत्रिक-समतामूलक भावना को कमजोर कर मनुवादी सामाजिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की दिशा में बढ़ती दिखाई देती है. ऐसे समय में सामाजिक न्याय को उसकी व्यापकता और मूल परिवर्तनकारी अर्थों में पुनर्स्थापित करना भाजपा-विरोधी सभी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील शक्तियों के सामने एक केंद्रीय वैचारिक और राजनीतिक कार्यभार के रूप में उपस्थित होता है. इस चुनौती को हम अब भी समझ पाते हैं या नहीं, या कुछेक अमूर्त किसकी बहसें होती रहेंगी जो आज की चुनौतियों से मुँह चुराना भर है.
यहीं, मार्क्सवादी प्रैक्टिस का एक बहुचर्चित शब्द सामने आता है—डी-क्लास (De-class). यानि किसी दुश्मन वर्ग से भी कोई व्यक्ति अपनी वैचारिकता के आधार पर मेहनतकश समुदाय के खेमे में आ सकता है. हम इस लेख में आगे विस्तार से भारतीय संदर्भ में इसकी चर्चा करेंगे.
जातीय पहचान बनाम जातिवाद
यदि हम भारत में जाति के इतिहास की समीक्षा करें तो इसकी जड़ वस्तुतः समाज के ब्राह्मणवादी ढांचे में है. यदि सबसे पहले समाज के किसी एक हिस्से ने खुद को एक बंद इकाई के रूप में संगठित किया और उसमें बाहरी लोगों के प्रवेश को पूरी तरह निषिद्ध बनाया, तो वह ब्राह्मणों का समुदाय था. और इन्होंने जो तंत्र विकसित किया वह ब्राह्मणवाद है. यह समुदाय आज भी केवल जन्म के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति बनाए हुए है. ब्राह्मणवादी ही असली जातिवादी भी होते हैं लेकिन तोहमत किसी और पे मढ़ते हैं. अन्य सामाजिक समूहों की बंद इकाइयां ब्राह्मणों की किलेबंदी के बहुत बाद अस्तित्व में आईं, हालांकि उनका स्वरूप ब्राह्मण समुदाय की तरह कभी किलाबंद नहीं रहा और न हो सकता था.
यदि यह बंद इकाई कहीं और दिखाई पड़ती है तो वह समाज के सबसे वंचित तबकों के बीच दिखाई पड़ती है. फर्क सिर्फ इतना है कि यह बंदीकरण विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार की देन है. घोर अमानवीय समझे जाने वाले काम आज भी लगभग उन्हीं समुदायों के हिस्से में आते हैं. मैला ढोने जैसी प्रथाएं इसका सबसे भयावह उदाहरण हैं. नए दौर में सफाईकर्मियों की जो नियुक्तियां हुई हैं, उनमें भी अधिकांशतः वही समुदाय दिखाई देते हैं जो पीढ़ियों से ऐसे कार्यों में लगे रहे हैं. मानो साफ-सफाई का पूरा विभाग ही दलित समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया हो. यह स्थिति बताती है कि आधुनिकता, लोकतंत्र और संवैधानिक समानता के दावों के बावजूद श्रम का जातिगत विभाजन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. सामाजिक गतिशीलता के अवसर बढ़े हैं, लेकिन समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े समुदाय को अब भी उन्हीं पेशों और भूमिकाओं में बांधे रखने की प्रवृत्ति बनी हुई है.
सामाजिक वर्चस्व और असमानता की विचारधारा के खिलाफ जातीय पहचान कई बार सम्मान, अधिकार और बराबरी की लड़ाई का माध्यम बनती है. जातिवाद और जातीय पहचान बिल्कुल अलग अलग विचार और प्रक्रिया है. जिस समाज में सदियों तक कुछ समुदायों को अपमानित और बहिष्कृत किया गया हो, वहां उनका संगठित होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है.
कम्युनिस्ट आंदोलन और जाति प्रश्न
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने आर्थिक शोषण और वर्गीय असमानता के प्रश्न को राजनीति के केंद्र में स्थापित किया, लेकिन भारतीय समाज की विशिष्टता यह थी कि यहां आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न अलग-अलग प्रक्रियाएं नहीं थीं. कम्युनिस्ट आंदोलन ने जाति के प्रश्न को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया, लेकिन लंबे समय तक उसके भीतर यह धारणा प्रभावी रही कि वर्गीय क्रांति और सत्ता परिवर्तन के बाद जाति जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी. जाति को मुख्यतः ऊपरी संरचना का प्रश्न माना गया जबकि भारतीय परिस्थितियों में जाति एक साथ आधार और ऊपरी संरचना दोनों का प्रश्न है. परिणामस्वरूप जातिगत उत्पीड़न की विशिष्टता को उतनी गंभीरता से नहीं समझा गया, जितनी आवश्यकता थी.
वर्ग-जाति प्रश्न: एक अनुभव
वर्ग और जाति के संबंधों को समझने के लिए मैं अपने गांव रौनिया के अनुभव को महत्वपूर्ण मानता हूं. गया जिले का यह गांव कभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत गढ़ हुआ करता था. 1990 तक गांव में जमींदार परिवार के खिलाफ एक व्यापक एकता दिखाई देती थी. दलितों-पिछड़ों के साथ इस एकता में भूमिहार सहित ऊंची जातियों के गरीब तबकों की भी भागीदारी हुआ करती थी. वामपंथी राजनीति का असर दिखता था और सीपीआई के लोग इसे गांव के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखते थे. ऐतिहासिक दृष्टि से यह निश्चित रूप से एक प्रगतिशील कदम था.
सीपीआई से जुड़े ऊंची जातियों के अनेक कॉमरेड, जो प्रायः नेतृत्वकारी भूमिका में होते थे, दलितों और गरीबों के भूमि संबंधी अधिकारों तथा कुछ आर्थिक मांगों के प्रति सहमत थे, हालांकि वह सहमति भी एक निश्चित सीमा तक ही थी, लेकिन सामाजिक बराबरी और जातिगत वर्चस्व को चुनौती देने वाले प्रश्नों पर वे बिल्कुल सहज नहीं थे.
भूमि संबंधों का प्रश्न अपने आप में एक अत्यंत जटिल और व्यापक सामाजिक बदलाव का प्रश्न है. इसलिए हम देखते हैं कि भूमि के सवाल पर भी सीपीआई की सहमति प्रायः गैरमजरूआ अथवा मालिक गैरमजरूआ जमीन पर गरीबों को कब्जा दिलाने तक ही सीमित थी. गांव के आहर, पोखर और अन्य सार्वजनिक संसाधनों पर वंचित समुदायों का वास्तविक नियंत्रण स्थापित हो, ऐसी कोई स्पष्ट राजनीतिक सोच दिखाई नहीं देती थी. बटाईदारों को कानूनी और वास्तविक अधिकार मिलें, यह प्रश्न भी आंदोलन के केंद्रीय एजेंडे में नहीं था.
सामाजिक बराबरी का सवाल आते ही अंतर्विरोध उभरने लगते थे. अक्सर इसे भविष्य की किसी दूरस्थ परियोजना का विषय बताकर टाल दिया जाता था, मानो आर्थिक संघर्ष की सफलता के बाद सामाजिक बराबरी अपने आप स्थापित हो जाएगी. इस प्रकार भारतीय समाज की एक ठोस और जीवंत सच्चाई से मुंह मोड़ लिया जाता था. यह संभव है कि नेतृत्व या ऊपरी स्तर पर कुछ हद तक जातीय सीमाएं टूटी हों, लेकिन गांवों की वास्तविक सामाजिक संरचना में जातिगत विभाजन और ऊंच-नीच काफी हद तक जस की तस बनी रही.
मंडल के दौर में यही अंतर्विरोध अधिक स्पष्टता के साथ सामने आया. सीपीआई का एक बड़ा सवर्ण समर्थक आधार रातोंरात आरक्षण विरोधी राजनीति की ओर खिसक गया और बाद के वर्षों में भाजपा के सामाजिक आधार में समाहित होता चला गया. दूसरी ओर दलितों और पिछड़ों के बीच सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रभाव लगातार बढ़ता गया. परिणामतः सीपीआई का वह मॉडल, जो वर्गीय एकता के आधार पर समाज परिवर्तन की कल्पना करता था लेकिन जातिगत अंतर्विरोधों को पर्याप्त महत्व नहीं देता था, धीरे-धीरे बिखरने लगा.
इस स्थिति को सूत्रबद्ध करते हुए कुछ बुद्धिजीवी यह कहते हैं कि मंडल आयोग ने सीपीआई को लील लिया. लेकिन ऐसी व्याख्याएं प्रायः सीपीआई मॉडल के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों और सीमाओं की गंभीर पड़ताल नहीं करतीं. वे यह देखने का प्रयास नहीं करतीं कि आखिर वह सामाजिक आधार, जो आर्थिक सवालों पर वामपंथ के साथ खड़ा था, सामाजिक न्याय और आरक्षण के प्रश्न पर इतनी आसानी से उससे अलग क्यों हो गया?
वस्तुतः मंडल ने उन अंतर्विरोधों को पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उजागर कर दिया. यदि गरीबों के आर्थिक अधिकारों को लेकर सहमति थी, तो आरक्षण के प्रश्न पर इतना तीखा प्रतिरोध क्यों पैदा हुआ? इसका उत्तर सामाजिक विशेषाधिकारों की रक्षा में ही खोजा जाना चाहिए. यही वह बिंदु है जहां वर्ग और जाति के संबंधों को व्यवहार के धरातल पर समझने की आवश्यकता सबसे अधिक महसूस होती है.
भाकपा (माले) के आंदोलन के प्रति भी उनका रवैया काफी हद तक ऐसा ही था. इसका कारण यह था कि माले केवल आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष नहीं कर रही थी. वह शोषित तबकों की सामाजिक और राजनीतिक दावेदारी की भी बात कर रही थी. वह ग्रामीण सत्ता संबंधों, सामाजिक पदानुक्रम और जातिगत वर्चस्व को चुनौती दे रही थी. उसका संघर्ष केवल भूमि और मजदूरी का संघर्ष नहीं था, बल्कि सामाजिक सम्मान और सत्ता-साझेदारी का भी संघर्ष बन गया. इसे परंपरागत कम्युनिस्ट आंदोलन पचा नहीं पाया और कई बार जातीय आंदोलन कहकर उसकी सार्वजनिक निंदा तक की.
सामाजिक बदलाव के एजेंडे के साथ आंदोलन की दूसरी लहर
बिहार के किसान आंदोलन की पहली लहर और उसके नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती का अनुभव इस मामले में विशेष महत्व रखता है. किसान आंदोलन के लंबे अनुभव के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बदलाव की सबसे बड़ी शक्ति समाज के सबसे अधिक शोषित और वंचित तबकों में निहित है. किसान सभा के अपने अनुभवों के आधार पर वे धीरे-धीरे भूमिहीन किसानों और खेत मजदूरों की ओर अधिक उन्मुख होते गए. यह कोई संयोग नहीं था. बिहार की सामाजिक संरचना में भूमिहीनता, गरीबी और जातिगत उत्पीड़न प्रायः एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. इसलिए किसान आंदोलन का अनुभव उन्हें अंततः उन्हीं तबकों की ओर ले गया जो आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर सबसे अधिक उत्पीड़ित थे. आजादी के उपरांत के किसान आंदोलन ने सहजानंद सरस्वती की इस दिशा को शायद ही कहीं लागू किया हो. यह दिशा सबसे अधिक स्पष्ट रूप से भोजपुर आंदोलन में दिखाई पड़ती है.
1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद भोजपुर में जो उभार सामने आया, उसकी अलग-अलग तरीके से व्याख्या की गई है. राजेन्द्र यादव और कल्याण मुखर्जी ने इसे त्रिवेणी संघ की परंपरा में दलित-पिछड़े उभार की अगली कड़ी माना, जबकि अरविंद नारायण दास ने इसे किसान आंदोलन की दूसरी लहर के रूप में देखा. पहली व्याख्या सामाजिक संरचना पर जोर देती है, जबकि दूसरी आर्थिक संरचना पर. लेकिन वास्तव में ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक प्रक्रिया के दो परस्पर जुड़े हुए पहलू हैं.
डॉ. अंबेडकर जयंती के अवसर पर 14 अप्रैल 1969 को आरा के रमना मैदान में जगदीश मास्टर द्वारा आयोजित ऐतिहासिक “हरिजनिस्तान रैली” इसी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अध्याय थी. इस रैली ने सामाजिक मुक्ति के प्रश्न को नई ऊर्जा प्रदान की. उसी समय नक्सलबाड़ी की गूंज बिहार के ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रही थी. आजादी के बाद पैदा हुई उम्मीदों का मोहभंग हो रहा था. वंचित तबकों को न वास्तविक सामाजिक न्याय मिला था, न भूमि सुधारों का लाभ और न ही लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने की परिस्थितियां. भूमि सुधारों के बाद मजबूत हुए नवधनाढ्य तबकों का दबाव भी बढ़ रहा था. ग्रामीण समाज के भीतर दबा हुआ असंतोष लगातार जमा हो रहा था. तत्कालीन मध्य बिहार का बड़ा इलाका इन्हीं अंतर्विरोधों से सुलग रहा था. नक्सलबाड़ी की विचारधारा ने इस असंतोष को एक नई दिशा दी और देखते-देखते पूरा क्षेत्र एक जन उभार की स्थिति में पहुंच गया.
नक्सलवादी आंदोलन की राजनीति ने स्थापित सामाजिक और राजनीतिक संरचनाओं को चुनौती देते हुए सब कुछ नया करने का आह्वान किया. यही वजह थी कि जगदीश मास्टर द्वारा स्थापित भीम सेना आगे चलकर लाल सेना के रूप में विकसित हुई. किसान आंदोलनों के इतिहास में यह पहला ऐसा आंदोलन था जिसने इतने स्पष्ट रूप से सत्ता-दखल के प्रश्न को सामने रखा. यह केवल आर्थिक संघर्ष नहीं था, बल्कि ग्रामीण सत्ता संरचना के खिलाफ बदलाव का संघर्ष था.
लेकिन हर क्रांतिकारी परिस्थिति स्थायी नहीं होती. समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि भारत में सामाजिक बदलाव एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है. सत्ता-दखल का प्रश्न जितना महत्वपूर्ण था, उससे कम महत्वपूर्ण यह नहीं था कि समाज के भीतर लोकतांत्रिक बदलाव की स्थायी प्रक्रियाएं विकसित की जाएं. आज पचास-साठ वर्षों के अनुभव के बाद यह बात और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है.
मध्य बिहार का अनुभव स्पष्ट रूप से बताता है कि बिहार में खेत मजदूरों, गरीब किसानों और वंचित जातियों के संघर्षों को अलग-अलग खानों में रखकर नहीं समझा जा सकता. भूमि का सवाल केवल आर्थिक सवाल नहीं होता. वह सम्मान, सत्ता और सामाजिक संबंधों का भी सवाल होता है. खेत में मजदूरी करने वाला व्यक्ति गांव की सामाजिक संरचना में भी सबसे नीचे धकेला गया व्यक्ति था. इसलिए जब उसने भूमि, मजदूरी और अधिकार की मांग उठाई, तो वह केवल आर्थिक बदलाव की नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी और सम्मान की भी मांग कर रहा था.
क्रांतिकारी किसान आंदोलन ने वर्ग और जाति के संबंध को पहली बार व्यवहार के धरातल पर समझने और परखने का प्रयास किया. उसने इस वास्तविकता को निम्नलिखित शब्दों में सूत्रबद्ध किया था -‘‘बिहार में जातियों और वर्गों के सामाजिक मर्यादा क्रम में काफी मेल है. आमतौर पर ऊंची जातियों के लोग या तो जोतदार हैं अथवा धनी और मध्यम किसान हैं, जबकि अनुसूचित जातियों के लोग खेत मजदूर या अधिक से अधिक गरीब तथा निम्न-मध्यम किसान हैं.’’ यह विश्लेषण आज भी कमोबेश सही प्रतीत होता है. पिछले दशकों में सामाजिक संरचना में कई परिवर्तन हुए हैं, विभिन्न जातियों के भीतर नए अभिजन वर्ग भी विकसित हुए हैं, लेकिन भारतीय ग्रामीण समाज की बुनियादी तस्वीर में यह संबंध आज भी व्यापक रूप से दिखाई देता है.
आंदोलन ने इससे आगे बढ़कर एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला था -निम्न जातियों को गोलबंद करने के लिए जातीय संगठन भी विकसित किए जा सकते हैं अथवा पहले से सक्रिय जातीय संगठनों के साथ संयुक्त कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं. लेकिन ऐसे संगठनों को केवल सामाजिक भेदभाव के प्रश्न तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें हर प्रकार के दमन और शोषण के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए. (बिहार के धधकते खेत-खलिहान की दास्तान)
यह टिप्पणी यह समझने की कोशिश करता है कि सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और उनसे लड़ने के लिए व्यापक एकता कैसे विकसित की जा सकती है. 1980 के दशक के जुझारू किसान आंदोलन ने सभी जातियों और समुदायों के किसानों की व्यापक गोलबंदी पर जोर दिया. लेकिन यह भी ध्यान रखने की बात है कि ऊंची जातियों के बड़े भूस्वामियों के प्रति आंदोलन का जो रवैया था, वही रवैया मध्यवर्ती जातियों के छोटे भूस्वामियों अथवा धनी किसानों के प्रति नहीं था. किसान आंदोलन ने स्पष्ट रूप से यह नीति अपनाई थी कि मध्यवर्ती जातियों के छोटे भूस्वामियों अथवा धनी किसानों के कब्जे में पड़ी गैरमजरूआ जमीन को बलपूर्वक दखल नहीं किया जाना चाहिए. उनके कब्जे से जमीन मुक्त कराने के लिए समझाने-बुझाने, जनमत निर्माण और सामाजिक दबाव जैसे तरीकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
यह दृष्टिकोण बताता है कि भारत जैसे समाज में वर्ग संघर्ष को व्यवहार में लागू करते समय सामाजिक संरचना, जातीय संबंधों और ग्रामीण सत्ता-संतुलन की वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इस आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान यही था कि उसने वर्ग और जाति को परस्पर विरोधी नहीं माना, बल्कि उनके बीच मौजूद जटिल अंतर्संबंधों को संघर्ष की वास्तविक प्रक्रिया में समझने और बदलने का प्रयास किया.
मंडल दौर और सामाजिक न्याय की बहस
इसके बाद भारतीय राजनीति में मंडल का दौर शुरू होता है. मंडल आयोग की सिफारिशों ने भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया. इसने दलितों, पिछड़ों और अन्य वंचित समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. सदियों से वंचित तबकों के भीतर आत्मसम्मान, अधिकार-बोध और राजनीतिक भागीदारी की नई आकांक्षा पैदा हुई.
लेकिन मंडल के दौर में यह धारणा भी व्यापक रूप से स्थापित की जाने लगी कि सत्ता में पिछड़ों की हिस्सेदारी बढ़ जाना ही सामाजिक न्याय की अंतिम अभिव्यक्ति है. इसी संदर्भ में का. विनोद मिश्र ने एक महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप किया. उन्होंने कहा कि सामाजिक बदलाव के बिना सामाजिक न्याय संभव नहीं है. आरक्षण और प्रतिनिधित्व आवश्यक हैं, लेकिन क्या सामाजिक न्याय केवल इन्हीं प्रश्नों तक सीमित है? क्या भूमिहीनों को भूमि मिले बिना, गरीबों को शिक्षा और रोजगार तक समान पहुंच मिले बिना तथा संसाधनों पर वंचित तबकों का अधिकार स्थापित हुए बिना सामाजिक न्याय की परियोजना पूरी हो सकती है? उन्होंने सामाजिक न्याय की उस सीमित अवधारणा का प्रतिवाद किया जो धीरे-धीरे केवल सत्ता-साझेदारी तक सिमटती जा रही थी. उन्होंने जोर देकर कहा कि सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ समाज की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना में व्यापक बदलाव से है.
बदलता भारत और नई चुनौतियां
आज भारत एक नई परिस्थिति से गुजर रहा है. नवउदारवादी पूंजीवाद, कॉरपोरेट प्रभुत्व और हिंदुत्व की राजनीति ने मिलकर सत्ता का एक नया ढांचा निर्मित किया है. मेहनतकश जनता और वंचित तबकों ने लंबे संघर्षों से जो अधिकार हासिल किए थे, वे लगातार कमजोर किए जा रहे हैं.
यह सही है कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के कुछ हिस्से शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और राजनीति के माध्यम से ऊपर उठे हैं, लेकिन उनकी विशाल बहुसंख्यक आबादी आज भी गरीबी, असुरक्षा, भेदभाव और वंचना का सामना कर रही है. रोजगार के अवसर घटे हैं, सार्वजनिक क्षेत्र सिकुड़ा है, शिक्षा और स्वास्थ्य महंगे हुए हैं और सामाजिक सुरक्षा के दायरे कमजोर पड़े हैं. इसका सबसे अधिक असर उन्हीं तबकों पर पड़ा है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित रहे हैं. यहां तक कि जो लोग सत्ता, प्रशासन, न्यायपालिका या विश्वविद्यालयों के उच्च पदों तक पहुंचे हैं, उन्हें भी अनेक बार अपनी जातिगत पहचान के कारण अपमान और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इससे स्पष्ट है कि जातिगत वर्चस्व और सामाजिक असमानता विभिन्न रूपों में आज भी मौजूद हैं. बहुजनों के बड़े हिस्से के जीवन में वास्तविक बदलाव अब भी बहुत दूर है और वही भारत की ठोस परिस्थति में वर्ग का निर्माण करते हैं. ऐसा नहीं है कि ऊपरी जातियों के अंदर गरीबी नहीं है. लेकिन वे अब भी सामाजिक विशेषाधिकार का भोग कर रहे हैं और उनमें कुछ बुद्धिजीवी और सामाजिक बदलाव के एजेंडे की जरूरत समझने वाले चंद लोग ही बहुजनों के संघर्ष के साथ एकाकार हो पा रहे हैं अन्यथा मोटे तौर पर वे दूसरे खेमे में ही खड़े दिखते हैं.
डी-क्लास और डी-कास्ट होने का प्रश्न
इसका अर्थ यह है कि भारत में डी-क्लास होने का मतलब केवल आर्थिक विशेषाधिकारों का त्याग नहीं है. इसका अर्थ जातिगत विशेषाधिकारों का त्याग भी है. यदि कोई व्यक्ति शोषितों के पक्ष में खड़ा होने का दावा करता है लेकिन अपने जातिगत वर्चस्व और उससे मिलने वाले लाभों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, तो उसका डी-क्लास होना अधूरा रहेगा.
भारतीय इतिहास में बौद्ध परंपरा, सहजयान और सिद्ध परंपरा के अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां लोगों ने केवल वैचारिक स्तर पर नहीं, बल्कि अपने जीवन व्यवहार में भी जातिगत सीमाओं को तोड़ने का प्रयास किया। भारतीय संदर्भ में इसे डी-कास्ट होने की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।
रास्ते यहीं से निकलेंगे
ये अनुभव एक महत्वपूर्ण सच्चाई को सामने लाते हैं. भारतीय समाज में जाति और वर्ग के बीच कोई चीनी दीवार नहीं है. सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. इसलिए भारतीय परिस्थितियों में जाति का सवाल कोई अतिरिक्त प्रश्न नहीं, बल्कि वर्ग संघर्ष के एजेंडे का ही एक केंद्रीय प्रश्न है. लोकतांत्रिक परिवर्तन का रास्ता सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की संयुक्त लड़ाई से होकर ही निकलेगा.
- कुमार परवेज