
अनुभव – आलोचनावाद (Empirio-Criticism) और अवसरवादियों के ख़िलाफ़ लेनिन का संघर्ष
20वीं सदी की शुरुआत दर्शनशास्त्र में अवसरवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ हुई. 1908 की शुरुआत में बोल्शेविकों के बीच दार्शनिक सवालों पर गंभीर मतभेद पैदा हो गए. लेनिन 1906 और उससे भी पहले से ए. बोगदानोव के दार्शनिक विचारों का विरोध कर रहे थे. उन्होंने उन बोल्शेविकों—ए. बोगदानोव, ए. लुनाचार्स्की, वी. बाज़ारोव—के प्रति समझौता न करने वाला रुख अपनाया, जो अपने संगोष्ठियों में आदर्शवादी विचारों का प्रचार करते थे.
दर्शनशास्त्र में आदर्शवाद और संशोधनवाद का यह दौर उस गिरावट का एक नतीजा था, जो 1906 की क्रांति की हार के बाद राजनीतिक “समाज” और राजनीतिक दलों में दिखाई देने लगी थी. लेनिन, जो हमेशा मार्क्सवादी विचारधारा की शुद्धता को बहुत महत्व देते थे, ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और मार्क्सवाद के दार्शनिक सिद्धांतों की रक्षा करते हुए एम्पिरियो-क्रिटिक्स (अनुभव-आलोचकों) के ख़िलाफ़ कड़ा संघर्ष किया.
1908 में लेनिन ने एक महत्वपूर्ण दार्शनिक किताब पूरी की: ‘मटेरियलिज़्म एंड एम्पिरियो-क्रिटिसिज़्म: क्रिटिकल नोट्स कंसर्निंग ए रिएक्शनरी फिलॉसफी’ (भौतिकवाद और अनुभव-आलोचना: एक प्रतिक्रियावादी दर्शन के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां). कॉमरेड एंगेल्स की किताब ‘एंटी-ड्यूरिंग’ के बाद यह दूसरी ऐसी किताब बनी जो अवसरवाद और ख़ासकर विघटनवाद के ख़िलाफ़ आगे के संघर्ष में एक हथियार साबित हुई.
एम्पिरियो-क्रिटिसिज़्म (अनुभव-आलोचना) के दर्शन का प्रतिपादन 1890-1910 के बीच हुआ था—यह वह समय था जब दुनिया भर में वित्तीय पूंजी स्थापित हो रही थी और पूंजीवाद साम्राज्यवाद में बदल रहा था. राजनीतिक परिदृश्य में वित्तीय पूंजी की प्रतिक्रियावादी प्रकृति स्थापित हो गई, जिससे मॉस्को और अन्य जगहों पर मज़दूरों में असंतोष फैला और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए; इसके बाद क्रांतिकारी आंदोलन, पार्टी और लोगों का ज़बरदस्त दमन किया गया. इस वजह से कई निम्न-बुर्जुआ बुद्धिजीवियों ने पार्टी छोड़ दी. दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में, पार्टी छोड़ने की इस प्रवृत्ति की पहचान (अनुभव – आलोचनवाद) प्रतिक्रियावादी के रूप में की गई.
उस समय कॉमरेड लेनिन ने दो मोर्चों पर काम शुरू किया. एक था राजनीतिक मोर्चा, जिसमें 1908 से 1917 के दौरान कॉमरेड लेनिन ने कई लेख लिखकर उन विघटनवादियों और अवसरवादियों की पोल खोली, जो पार्टी को एक खुली और कानूनी, बिना किसी ठोस ढांचे वाली इकाई बनाना चाहते थे. वहीं, दूसरा मोर्चा दर्शन (फिलॉसफी) के क्षेत्र में था, जो बहुत ज़रूरी था; यहां उन्हें ‘एम्पिरियो-क्रिटिकल’ (अनुभव – आलोचना) विचारधारा को हराना था. ‘एम्पिरियो-क्रिटिकल’ विचारधारा का तर्क ही अवसरवाद का मूल आधार था. इस बात को समझते हुए कॉमरेड लेनिन ने अपनी किताब में इसे लगभग खत्म ही कर दिया. नीचे हम अवसरवाद और ‘एम्पिरियो-क्रिटिसिज्म’ के बीच तुलना पेश कर रहे हैं. इससे हमें उस समय के अवसरवादियों द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवालों के पीछे की दार्शनिक सोच को समझने में मदद मिलेगी. इनमें से कई बातें आज के उन अवसरवादियों से भी मिलती-जुलती हैं, जिनके खिलाफ हमारी पार्टी संघर्ष कर रही है.
एम्पिरियो-क्रिटिसिज्म और अवसरवाद अनुभव पर आधारित-
व्यक्तिपरक आदर्शवादी : व्यक्ति की संवेदना ही मुख्य है.
व्यक्तिपरक आदर्शवाद : इसके कारण वे आंदोलन में अपने खुद के अनुभव को महत्व देते हैं और सिद्धांत को मार्गदर्शक के रूप में महत्व नहीं देते. वे राजनीति के केंद्र में व्यक्ति की भूमिका और भावनाओं को रखते हैं.
वस्तुनिष्ठ सत्य : इस पर उनका विचार था कि कोई वस्तुनिष्ठ सत्य नहीं होता. सत्य मानवीय अनुभव को व्यवस्थित करने का एक रूप है. सत्य हमेशा सापेक्ष होता है, इसलिए यह सशर्त होता है. कोई परम सत्य नहीं हो सकता.
निष्पक्षता का दिखावा :
खुद को तटस्थ दिखाने की कोशिश करना. यानी न तो आदर्शवादी और न ही भौतिकवादी, जबकि असल में व्यक्तिपरक आदर्शवादी होना. कभी भी अपनी राजनीतिक लाइन स्पष्ट रूप से घोषित नहीं करना. हमेशा रीढ़विहीन सरीसृप की तरह इधर-उधर झुकते रहना. ‘दो नावों की सवारी’ वाली नीति.
कारण और प्रभाव पर :
प्रकृति में कोई कारण और क्रम नहीं होता; यह सब हमारा व्यक्तिपरक अनुभव है जो हमारी भाषा में झलकता है. किसी प्रभाव के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं, इसलिए किसी एक कारक में कारण खोजना गलत होगा.
अवसरवादी और अनुभव-आलोचक (एम्पिरियो-क्रिटिसिज्म) दोनों ही परम सत्य के अस्तित्व को नकारते हैं. क्योंकि सत्य को अस्पष्ट और अपरिभाषित रखना उनके वर्गीय हित में है ताकि वे उस सिद्धांत का पालन कर सकें जो उन्हें सबसे अधिक सूट करता है; यह अवसरवाद की मूल विशेषता है, वे दो नावों की सवारी करते हैं, इस सापेक्षता को अनुभव-आलोचना में समझाया गया है.
कॉमरेड लेनिन बताते हैं कि एक कम्युनिस्ट को इस सवाल को कैसे देखना चाहिए. वे कहते हैं, ‘संक्षेप में, हर विचारधारा ऐतिहासिक रूप से निर्धारित होती है, लेकिन यह बिना किसी शर्त के सच है कि हर वैज्ञानिक विचारधारा (उदाहरण के लिए, धार्मिक विचारधारा से अलग) के अनुरूप एक वस्तुनिष्ठ सत्य, एक परम प्रकृति होती है. आप कहेंगे कि सापेक्ष और परम सत्य के बीच का यह अंतर अनिश्चित है. और मैं जवाब दूंगा: हां, यह इतना ‘अनिश्चित’ है कि विज्ञान को बुरे अर्थों में एक हठधर्मिता (डोग्मा) बनने से, या मृत, जमे हुए, जड़वत होने से रोका जा सके; लेकिन साथ ही यह इतना ‘निश्चित’ भी है कि हम खुद को पूरी दृढ़ता और अपरिवर्तनीय तरीके से आस्थावाद (फिडिज्म) और अज्ञेयवाद (एग्नोस्टिसिज्म), दार्शनिक आदर्शवाद और ह्यूम और कांट के अनुयायियों की कुतर्कपूर्ण बातों (सोफिस्ट्री) से अलग कर सकें.’ परम सत्य को नकारना आज भी अवसरवादियों की विशेषता बनी हुई है. जब हर सवाल या मुद्दे को सापेक्षता के दायरे में रखा जाता है, तो अवसरवाद को बचने और चुनिंदा रूप से अपनाने का सबसे अच्छा तरीका मिल जाता है. उनके लिए ‘बंद’ या ‘खुला’ होना एक सापेक्ष अवधारणा है, एक अनुशासित पार्टी बनाना भी एक सापेक्ष अवधारणा है. सापेक्षता के साथ, जो उम्मीद की गई थी उसे न करने का बहाना मिल जाता है; इसके अलावा, जब कोई चीज़ सापेक्ष होती है, तो कोई भी आप पर पार्टी लाइन से भटकने का आरोप नहीं लगा सकता. मौकापरस्त लोगों के लिए ‘परम सत्य’ को नकारने का विचार बहुत प्रिय था. ऐसा लगता था जैसे ‘एम्पिरियो-क्रिटिकल स्कूल’ ने बोल्शेविकों के महामारी जैसे हमले के समय मौकापरस्त लोगों को ऑक्सीजन सिलेंडर मुहैया कराया हो.
एम्पिरियो-क्रिटिसिज़्म (अनुभव-आलोचना) दर्शन की एक और परेशान करने वाली बात यह है कि यह व्यक्ति को ही विश्लेषण का विषय और वस्तु, दोनों बना देता है; इस तरह की अति-व्यक्तिवादी सोच असल में व्यक्तिपरक और अवैज्ञानिक भावनाओं और अटकलबाज़ियों को जन्म देती है. मज़दूर वर्ग के असफल विद्रोह से डरा हुआ निम्न-बुर्जुआ वर्ग, उस विचारधारा को अपनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया जिसके लिए धैर्य और साहस की ज़रूरत होती है; इसके बजाय, उसे ऐसे दर्शन में सुकून मिला जो किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने की ज़रूरत को नकारता है और टालमटोल करने या बचने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है. यह इस दावे के साथ व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है कि तर्क की तुलना में व्यक्तिगत भावना सच्चाई का ज़्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है. तर्क के ज़रिए कोई व्यक्ति आज़ादी के लिए मज़दूर वर्ग से जुड़ता है, लेकिन जब कोई भावना को ज़्यादा महत्व देता है, तो वह अपनी ही ज़रूरतों और आवश्यकताओं तक सीमित रहने के तरीके खोजने लगता है. यह एम्पिरियो-क्रिटिकल स्कूल की बुर्जुआ नैतिकता है. एम्पिरियो-क्रिटिकल विचारों ने कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर अवसरवाद को पैदा किया और मज़बूत किया. लेकिन रूस में हुई ज़बरदस्त अक्टूबर क्रांति ने एम्पिरियो-क्रिटिसिज़्म की सभी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया और लेनिनवाद की स्थापना की. रूस में क्रांति के बाद, चीन ने भी मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रास्ते को अपनाया और कॉमरेड माओ के नेतृत्व में 1949 में चीन में क्रांति सफल हुई; साथ ही, मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के रूप में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का एक नया और उन्नत रूप भी स्थापित हुआ. इस तरह दुनिया का आधा हिस्सा ‘लाल’ (साम्यवादी) हो गया. यह साम्राज्यवादी ताक़तों के लिए एक ज़बरदस्त झटका था. खुद को फिर से खड़ा करने के लिए उन्हें दो मोर्चों पर बदलाव करने की ज़रूरत थी: एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर और दूसरा वैचारिक मोर्चे पर.
पॉलिटिकल इकोनॉमी में बदलाव ‘रीगन-थैचर प्लान’ के रूप में आया, जिसे ‘नियो-लिबरल पॉलिसी’ (नव-उदारवादी नीति) के नाम से जाना गया. वैचारिक स्तर पर ‘पोस्ट-मॉडर्निज्म’ (उत्तर-आधुनिकतावाद) एक नया हथियार बना; यह भी ‘नियो’ था – ‘नियो-एम्पिरियो-क्रिटिसिज्म’. उन्होंने विश्वविद्यालयों में कम्युनिस्ट प्रभाव को रोकने के लिए ‘नॉन-कम्युनिस्ट लेफ्ट’ (गैर-कम्युनिस्ट वामपंथ) को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई. असल में, ये लोग उस समय के ‘एम्पिरियो-क्रिटिसिस्ट’ थे—यानी मार्क्सवाद के दायरे में ही तैयार हुए उत्तर-आधुनिक विद्वान. वे खुद को कभी ‘न्यू लेफ्ट’ (नया वामपंथ), कभी ‘रेडिकल लेफ्ट’ (कट्टरपंथी वामपंथ) या ‘नियो-मार्क्सिस्ट’ (नव-मार्क्सवादी) कहते थे. यूरोपीय परिसरों में मार्क्सवाद-लेनिनवाद के भारी प्रभाव को देखते हुए, अमेरिकी साम्राज्यवादी ताकतों ने CIA को यह काम सौंपा कि वह सुनिश्चित करे कि कम्युनिस्ट प्रचार यूरोपीय विश्वविद्यालयों तक न पहुंचे. इसके लिए, अलग-अलग देशों और शैक्षणिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों को मिलाकर CIA की एक विशेष टीम बनाई गई. उन्होंने एक रणनीति बनाई जिसका मकसद सभी गैर-कम्युनिस्ट वामपंथी बुद्धिजीवियों को एकजुट करना था, ताकि वे कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों की जगह ले सकें. इन गैर-कम्युनिस्ट वामपंथी बुद्धिजीवियों को CIA से फंड मिलता था और उन्हें कम्युनिज़्म और मार्क्सवाद—खासकर USSR और चीन में चल रही प्रथाओं—के खिलाफ अपमानजनक लेख और थीसिस लिखने और फैलाने की जिम्मेदारी दी गई थी. गैर-कम्युनिस्ट वामपंथ की इस लामबंदी के पीछे जो सोच थी, उसका चिप बोहलेन, इसायाह बर्लिन, निकोलस नाबोकोव, एवरेल हैरीमन और जॉर्ज केनन जैसे लोगों ने ज़ोरदार समर्थन किया. इस टीम को तानाशाही (टोटैलिटेरियनवाद) के ख़िलाफ़ लड़ने का काम सौंपा गया था. यह टीम गुप्त थी और इसके सदस्यों को अलग-अलग और सामूहिक काम दिए गए थे. राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर साम्राज्यवादी ताक़तें फिर से संकट में फंस गईं. वित्तीय पूंजी कुछ ही हाथों में सिमटकर और मज़बूत हो गई. बैंक और ज़्यादा ताक़तवर हो गए, जबकि आम उपभोक्ता के पास लोन चुकाने के लिए भी मुश्किल से पैसे बचते थे. जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में संकट गहराता गया, दुनिया भर में राजनीतिक उथल-पुथल और जन-आंदोलन शुरू हो गए; 1960 का दशक दुनिया भर में क्रांति का दशक बन गया. उस समय विश्व समाजवादी क्रांति का दौर नज़दीक लग रहा था. लेकिन रूस में कॉमरेड स्टालिन के बाद ख्रुश्चेव और चीन में कॉमरेड माओ के बाद देंग जैसे संशोधनवादी नेतृत्व द्वारा किए गए लगातार धोखों की वजह से दुनिया का मज़दूर वर्ग गहरे दुख में डूब गया. निम्न बुर्जुआ वर्ग (पेट्टी बुर्जुआ) ने भी अपनी उम्मीद खो दी. ऐसे समय में जब मज़दूर वर्ग के पास कोई राज्य सत्ता नहीं थी, साम्राज्यवादी बुर्जुआ वर्ग ने तथाकथित गैर-कम्युनिस्ट वामपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा दिया, जो असल में ‘नियो-एम्पिरियो-क्रिटिसिज़्म’ (नव-अनुभव-आलोचना) थीं; यही विचारधारा बाद में ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ (पोस्ट-मॉडर्निज्म) के नाम से जानी गई. दुख से भरे निम्न बुर्जुआ वर्ग का झुकाव शासक वर्ग की विचारधारा ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ की ओर हो गया. उत्तर-आधुनिकतावाद हर जगह दिखाई देता है—कला, साहित्य, वास्तुकला से लेकर सेक्स और खान-पान तक, हमारे आस-पास की हर चीज़ पर इसकी छाप है. कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ साम्राज्यवादी ताक़तों का प्रोपेगैंडा तंत्र इतना मज़बूत था. कम्युनिज़्म-विरोधी वामपंथी बुद्धिजीवियों की टीम ने अपने बॉस CIA के साथ मिलकर बहुत अच्छा काम किया और कैंपसों में उत्तर-आधुनिकतावाद की मज़बूत पकड़ बनाकर नतीजे हासिल किए.
क्रमशः ….
- जून, 2026
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