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एक मूर्ख दंगाबाज हमें नोटबंदी, जीएसटी और तालबंदी के दौर में ले आया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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एक मूर्ख दंगाबाज हमें नोटबंदी, जीएसटी और तालबंदी के दौर में ले आया

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Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

आज देश एक अनपढ़ नरपिशाच को सर पर बैठाने का दंश झेलने को अभिशप्त है. मज़े की बात यह है कि जिस गोबरपट्टी के लोगों की कुंठित सांप्रदायिक मानसिकता ने इन असामाजिक क्रिमिनल लोगों को सत्ता के शीर्ष पर पहुंंचाया, वे ही आज इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.
शायद आपको मेरी बातों में तल्ख़ी दिखे, आप इसे मेरी चिढ़ भी कह सकते हैं, लेकिन सच यही है कि संसदीय लोकतंत्र गिनती का खेल है और जब फ़ासिस्ट सत्ता में आते हैं तो बहुसंख्यकवाद एक विकृत रूप में सामने आता है.

कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस बहुसंख्यकवाद की जड़ें मनुष्य के पाशविक पक्ष में निहित है, जो समय-समय पर, विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में उभर कर आता है.
ऐसा ही कुछ देश के विभाजन के समय हुआ था. वैसे मेरा मानना है कि भारत का विभाजन कभी हुआ ही नहीं था; विभाजन तो पंजाब और बंगाल के सूबे का हुआ था. उस दौर में हमने इन इलाक़ों में बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच सांप्रदायिक दंगों के रूप में देखा, जिसके पीछे मुस्लिम लीग और संघ व हिंदू महासभा जैसी सांप्रदायिक ताक़तों का स्पष्ट हाथ था.

इस भीषण त्रासदी के बाद पंजाब और बंगाल के लोग समझ गए कि बहुसंख्यकवाद एक आत्मघाती दर्शन के सिवा कुछ भी नहीं है और धीरे-धीरे वे समावेशी और सहिष्णु होते गए. आज़ादी के बाद इन दो इलाक़ों में सबसे कम सांप्रदायिक दंगे हुए. लेकिन, शेष उत्तर और पश्चिम भारत की कहानी अलग थी. इन्होंने विभाजन का दंश नहीं झेला था, हालांंकि उत्तर प्रदेश विभाजनकारी षड्यंत्र का गढ़ रहा था.

आज़ादी के बाद संघी और मुसंघी गोबरपट्टी से गुजरात तक अपनी सांप्रदायिक घृणा की प्रयोगशाला चलाते रहे और जनता के मन में विष रोपण करते रहे. शुरुआती दौर के बाद कांग्रेस, ख़ासकर शाहबानो प्रकरण के बाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए दिखी, जिसका नतीज़ा ये हुआ कि तथाकथित हिंदुत्ववादियों को मौक़ा मिला बहुसंख्यकवादियों को एकजुट करने का और नतीजा आपके सामने है.

ख़ैर, यह सब कॉमन ज्ञान है. असल खेल इसके बाद शुरू हुआ. नब्बे के दशक में नरसिंह राव की सरकार ने जिस मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाया था, उसके फलस्वरूप देश को आर्थिक गति तो मिली लेकिन साथ-साथ देश की राजनीति में धन्ना सेठों का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी बढ़ गया. मनमोहन सिंह के समय तक यह लॉबी इतनी सशक्त हो गई थी कि बजट से लेकर अन्य सरकारी नीतियों पर इनका प्रभाव दिखने लगा. इसके वावजूद कांग्रेस अपने अतीत से बंधी हुई थी और चाहकर भी पूरी तरह से जनविरोधी नहीं बन सकी, जो पूंंजीपतियों की मंशा थी. यहांं तक की मोदी सरकार को भी खाद्य सुरक्षा क़ानून को पास करने में मजबूर कर दिया.

दुखद सत्य ये है कि इन सबके वावजूद मनमोहन सिंह के दस सालों के कार्यकाल के दौरान ही बहुसंख्यकवादी राजनीति या सांप्रदायिक राजनीति सबसे ज़्यादा फली फूली. आर्थिक मोर्चे पर बहुत उम्दा काम करने के वावजूद मनमोहन सरकार राजनीतिक मोर्चे पर पिछड़ गई. देश का नया पूंजीवाद अब एक ऐसी राजनीतिक पार्टी चाहती थी जिसका कोई स्वर्णिम अतीत न हो, जिसे जनता के लड़ने का कोई हैंग ओवर नहीं हो, जिसका अतीत इतना शर्मनाक हो कि उसे नंगा होकर जनसंहार करने पर भी लेशमात्र शर्म नहीं आए.

ऐसी पार्टी और ऐसा व्यक्ति सिर्फ़ भाजपा और मोदी ही हो सकता था. उसे गुजरात में नरसंहार का अनुभव था. उद्योगपतियों के तलवे चाटने का भी था. सबसे बड़ी बात ये थी कि वे अपनी नकारात्मक उपलब्धियों के लिए गोबरपट्टी के कुंठित बहुसंख्यक लोगों से कनेक्ट भी करते थे. ऐसे में बस धुंंआधार प्रचार और अनर्गल झूठ की ज़रूरत थी, जिसे मीडिया से लेकर विभिन्न मंचों से फैलाया गया और एक मूर्ख दंगाबाज की जीत निश्चित हुई.

2019 में चुनौतियांं कम थी. राष्ट्रवाद की थोथी दलील ने बहुसंख्यकवादी हिजड़ों को अनूठे वीर रस से ओत-प्रोत कर अंधा बना दिया था और साथ ही इवीएम भी था. अब हम नोटबंदी, जीएसटी के दौर से निकलकर तालबंदी के दौर में आ गए हैं.

130 करोड़ के देश में सैंकड़े की संख्या में संक्रमण और दहाई की संख्या में मौत को महामारी कहा जाता है और हम दुबक कर घरों में बैठ जाते हैं. हमारे भाई-बहन सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए सड़कों पर मरने को मजबूर हैं, और हम घरों में दुबके हैं.

हम सड़क पर आकर सरकार से सवाल नहीं पूछते कि इस संक्रमण को जब रोका जा सकता था, तब आप क्या कर रहे थे ? हम इस बात पर खुश हैं कि सरकार ने ग़रीबों के लिए 1 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये का अनुदान दिया, जबकि हम सब जानते हैं कि यह एक फ्रॉड है और आंंकड़ों की बाज़ीगरी के सिवा कुछ भी नहीं.

देश तब नहीं मरता जब बंटता है, देश तब मरता है जब हम जनविरोधी सरकार और व्यवस्था में अपनी कुंठा का समाधान ढूंंढ़ते हैं. हम एक मरे हुए देश के मरे हुए नागरिक हैं.

शहर शहर शह्रे खामोशां है
ये कहीं मेरा मुल्क तो नहीं.

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