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Home गेस्ट ब्लॉग

जम्मू कश्मीर में नौकरी पाने के नियम में संशोधन एक दिन में वापिस लिया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 7, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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जम्मू कश्मीर में नौकरी पाने के नियम में संशोधन एक दिन में वापिस लिया

Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

जूते खाकर मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में नौकरी पाने के नियम में संशोधन एक दिन में वापिस लिया. यह छोटी-सी ख़बर दरअसल बहुत बड़ी खबर है. जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने की दिशा में धारा 370 के अनुच्छेद 1 को हटाने के बाद फ़ासिस्ट सरकार ने जम्मू कश्मीर में नौकरी पाने की योग्यता के नियमों में बदलाव किया.

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पहले के नियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो जम्मू कश्मीर में पिछले पंद्रह सालों या उससे ज़्यादा रहता आया है, वहांं नौकरी पाने के योग्य माना जाता था. नये नियम के अनुसार यह अवधि घटाकर छ: महीनों की कर दी गई थी.

इसके विरोध में जम्मू कश्मीर की सारी राजनीतिक पार्टियों, जिसमें भाजपा की जम्मू कश्मीर यूनिट भी शामिल है, ने ज़बरदस्त विरोध किया. इस जनविरोध के मद्देनज़र बीते कल केंद्र सरकार को नया नियम वापस लेना पड़ा.

यह ख़बर दो कारणों से महत्वपूर्ण है. पहला यह कि इस क़ानून को बनाने के पीछे क्या मंशा थी यह समझने की ज़रूरत है. फ़ासिस्ट हमेशा एक विशेष समुदाय या क्षेत्र के लोगों के विरुद्ध घृणा की राजनीति पर जीते हैं. Ethnic cleansing, यानि एक विशेष वर्ग या समुदाय के लोगों से देश व समाज को परिष्कृत करना इनका एजेंडा होता है, जिसे वे चरणबद्ध तरीक़े से लागू करते हैं.

हिटलर की जर्मनी में यही काम यहूदियों के विरुद्ध हुआ और भारत में आज मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध हो रहा है. अब चूंंकि जम्मू-कश्मीर देश का अकेला मुस्लिम बहुल राज्य है तो उसे टार्गेट में लिया गया. दुनिया 1931 से आगे बढ़ गई है और होलोकास्ट खुले तौर पर संभव नहीं है.

असम के डिटेंशन कैंप पर किरकिरी हुई और वहांं सीएए और एनआरसी के माध्यम से इस एजेंडा को आगे बढ़ाने के प्रयासों को तब धक्का लगा, जब उन्नीस लाख चिन्हित घुसपैठियों में पंद्रह लाख हिंदू निकले।

इस विफलता के बाद शुद्धीकरण की कोशिश को दूसरी जगह आज़माना ज़रूरी था और जम्मू-कश्मीर इसके लिए सबसे मुफ़ीद जगह थी. वहांं नौकरी के नियमों को बदलकर संघी गुंडों को सरकारी नौकरियों के ज़रिए घुसाने की फ़िराक़ में फ़ासिस्ट लग गए. जनता की जागरूकता और विरोध में इस प्रयास को असफल कर दिया. अभी ऐसी कोशिशें और भी होंगी.

दूसरा कारण, जो इस ख़बर को महत्वपूर्ण बनाता है वह ये है कि, कोई भी क़ानून तब तक सफल नहीं होगा जब तक न वह सर्वग्राह्य हो. हमने बहुत सारे तानाशाही में देखा है जनविरोधी क़ानूनों को बनते हुए और जनविरोध के सामने ढहते हुए. इस प्रतिकार की शक्ति ही किसी देश और समाज को आज़ाद रखता है और इसलिए कहा गया है ‘Eternal vigilance is the price of Liberty.’

भेड़ बकरी मत बनिये, सरकार कोई भी हो सवाल कीजिए. अपने हक़ के लिए लड़िये। एक देश की आयु किसी भी सरकार से लंबी होती है और जनता ही जनार्दन है, कोई शासक नहीं, चाहे वह कोई मूर्ख दंगाबाज ही क्यों न हो !!

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