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कोरोनावायरस आईसोलेशन कैप : नारकीय मौत से साक्षात्कार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 18, 2020
in ब्लॉग
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कोरोनावायरस आईसोलेशन कैप : नारकीय मौत से साक्षात्कार

उड़ीसा में स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करते लोग

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मोदी सरकार के पास कोरोना से लड़ने के लिए थाली-दिया-बाती के अलावा और कोई उपाय है तो वह है लॉकडाऊन और कोरोनावायरस आईसोलेशन कैंप. लॉकडाऊन की हकीकत से हम सभी वाकिफ हैं, और अब देखते हैं कोरोनावायरस आईसोलेशन कैंप की हकीकत.

कोरोनावायरस आईसोलेशन कैंप, जिसे क्वारंटाईन होना कहा जाता है, की हकीकत मौत से साक्षात्कार के समान है, जिसे लोग काफी भयभीत है. यही कारण है कि कोराना वायरस की जांच टीम पर आये दिन हमले की खबरें आ रही है, जिसे मोदी सरकार और आईटी सेेेल के गुंडे तरह तरह की संज्ञा और विशेषणों से नवाज रहे हैं.

कोरोनावायरस आईसोलेशन कैंप या क्वारंटाईन की वास्तविक हालात को जानने के लिए हम उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी के ‘क्वारनटीन’ नाम की कहानी से शुरू करते हैं जो अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखा गया है. आईये, इस कहानी को जानते हैं.

हिमालय के पांव में लेटे हुए मैदानों पर फैल कर हर चीज को धुंधला बना देने वाले कोहरे की तरह प्लेग के खौफ ने चारों तरफ अपना तसल्लुत जमा लिया था. शहर का बच्चा-बच्चा उसका नाम सुनकर कांप जाता था.

प्लेग तो खतरनाक थी ही, मगर क्वारनटीन उससे भी ज्यादा खौफनाक थी. लोग प्लेग से उतने परेशान नहीं थे जितने क्वारनटीन से, और यही वजह थी कि स्वास्थ्य सुरक्षा विभाग ने नागरिकों को चूहों से बचने की हिदायत करने के लिए जो आदम-कद विज्ञापन छपवाकर दरवाजों, सड़कों और मार्गों पर लगाया था, उस पर ‘न चूहा, न प्लेग’ के शीर्षक में इजाफा करते हुए ‘न प्लेग, न चूहा, न क्वारनटीन’ लिखा था.

क्वारनटीन से संबंधित लोगों का खौफ बजा था. एक डॉक्टर की हैसियत से मेरी राय निहायत मुसतनद है और मैं दावे से कहता हूं कि जितनी मौतें शहर में क्वारनटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं. हालांकि क्वारनटीन कोई बीमारी नहीं, बल्कि वह उस बड़े क्षेत्र का नाम है, जिसमें हवा में फैली हुई महामारी के दिनों में बीमार लोगों को तंदुरुस्त इंसानों से कानूनन अलहदा करके ला डालते हैं ताकि बीमारी बढ़ने न पाए.

अगरचे क्वारनटीन में डॉक्टरों और नर्सों का काफी इंतजाम था, फिर भी मरीजों की बड़ी संख्या में वहां आ जाने से हर मरीज को अलग-अलग खास तवज्जो न दी जा सकती थी. उनके अपने संबंधियों के आसपास न होने से मैं ने बहुत से मरीजों को बे-हौसला होते देखा. कई तो अपने इर्द-गिर्द लोगों को पे दर पे मरते देखकर मरने से पहले ही मर गए.

कई बार तो ऐसा हुआ कि कोई मामूली तौर पर बीमार आदमी वहां के वातावरण में ही फैले जरासीम से हलाक हो गया और मृतकों की बड़ी तादाद की वजह से उनके आखिरी क्रिया-क्रम भी क्वारनटीन के खास तरीके पर अदा होतीं, यानी सैकड़ों लाशों को मुर्दा कुत्तों की लाशों की तरह घसीट कर एक बड़े ढेर की सूरत में जमा किया जाता और बगैर किसी के धार्मिक रस्मों का आदर किए, पेट्रोल डालकर जला दिया जाता. शाम के वक्त उससे धधकते हुए आग के शोलों को देखकर दूसरे मरीज यही समझते कि तमाम दुनिया जल रही है.

क्वारनटीन इसलिए भी ज्यादा मौतों का कारण बनी कि बीमारी के आसार जाहिर होते ही बीमार के संबंधी उसे छुपाने लगते, ताकि कहीं मरीज को जबरदस्ती क्वारनटीन में न ले जाएं. चूंकि हर एक डॉक्टर को तंबीह की गई थी कि मरीज की खबर पाते ही फौरन सूचित करें, इसलिए लोग डॉक्टरों से इलाज भी न कराते और किसी घर के महामारी के चपेट में होने का सिर्फ उसी वक्त पता चलता, जब दिल को दहला देनी वाली आह और पुकार के बीच एक लाश उस घर से निकलती.

उन दिनों मैं क्वारनटीन में बतौर एक डॉक्टर के काम कर रहा था. प्लेग का खौफ मेरे दिल और दिमाग पर भी मुसल्लत था. शाम को घर आने पर मैं एक अरसा तक कारबोलिक साबुन से हाथ धोता रहता और जरासीम-नाशक घोल से गलाला करता, या पेट को जला देने वाली गर्म कॉफी या बरांडी पी लेता. अगरचे उससे मुझे नींद उड़ने और आंखों के चुंधियाने की शिकायत पैदा हो गई. कई बार बीमारी के खौफ से मैं ने मतली करवाने वाली दवाइयां खाकर अपनी तबियत को साफ किया.

जब निहायत गर्म कॉफी या बरांडी पीने से पेट में उबाल पैदा होता और भाप के गोले उठ-उठकर दिमाग को जाते, तो मैं अक्सर किसी होश उड़े हुए शख्स के मानिंद तरह-तरह के वहम का शिकार हो जाता. गले में जरा भी खराश महसूस होती तो मैं समझता कि प्लेग के निशानात जाहिर होने वाले हैं….उफ! मैं भी इस जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाऊंगा….प्लेग! और फिर….क्वारनटीन ! ….खुद मैं मरीजों से दूर-दूर ही रहता, इसलिए कि मैं मौत से बहुत डरता था और उससे भी ज्यादा क्वारनटीन से.

… उसी दिन शाम के करीब भागव मेरे पास दौड़ा-दौड़ा आया. सांस फूली हुई थी और वह एक दर्दनाक आवाज से कराह रहा था. बोला : ‘बाबू जी….यह कोनटीन तो नरक है. नरक. पादरी लाबे इसी तरह के नरक का नक्शा खींचा करता था….’

मैं ने कहा : ‘हां भाई, यह नर्क से भी बढ़कर है….मैं तो यहां से भाग निकलने की तरकीब सोच रहा हूं….मेरी तबियत आज बहुत खराब है.’

‘बाबू जी इससे ज्यादा और क्या बात हो सकती है…आज एक मरीज जो बीमारी के डर से बेहोश हो गया था, उसे मुर्दा समझकर किसी ने लाशों के ढेर में जा डाला. जब पेट्रोल छिड़का गया और आग ने सबको अपनी लपेट में ले लिया, तो मैं ने उसे शोलों में हाथ पांव मरते देखा. मैं ने कूद कर उसे उठा लिया. बाबू जी! वह बहुत बुरी तरह झुलसा गया था….उसे बचाते हुए मेरा दायां बाजू बिलकुल जल गया है.’

राजिंदर सिंह बेदी की यह कहानी अंग्रेजी हुकूमत के दौर को केन्द्र कर लिखी गई थी, परन्तु, अब जब हम ‘आजाद’ भारत में रहने का ‘लुफ्त’ उठा रहे हैं, तब भी क्या राई रत्ती भर भी बदलाव आया है ? हम देश की राजधानी से सटे उत्तर-प्रदेश के नोएडा में रहने वाले मृत्युंजय शर्मा की आपबीती सुनते हैैंं, जो अपनी पत्नी के साथ कोरोनावायरस आईसोलेशन कैंप में एक हफ्ता बिता कर लौटे हैं. मृत्युंजय कहते हैं –

सबसे पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि ये कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है, आप मेरे ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर देख सकते हैं कि मैं मोदी सरकार का समर्थक रहा हूं लेकिन अब मुझे लगता है कि मोदी सरकार केवल मेकओवर कर रही है और केवल मीडिया हाउस को खरीद कर, टीवी और सोशल मीडिया पर अपना ब्रांड बना कर कैंपेन कर लोगों को मिसलीड कर रही है.

इसकी कहानी शुरू होती है, पिछले सोमवार से. पिछले सोमवार से पहले मेरी वाइफ को पिछले एक हफ्ते से फीवर आ रहा था. शायद किसी दवाई की एलर्जी हो गई थी, मेरे घर के पास के ही अस्पताल में ही उसका ट्रीटमेंट चल रहा था. अचानक से उसे कफ की प्रोबलम भी होने लगी. फिजीशियन ने सलाह की कि आप सेफ साइड के लिए कोरोना का टेस्ट करा लो.

टीवी पर देख कर हमें लगता था कि कोरोना का टेस्ट बहुत आसान है और अमेरिका और इटली जैसे देशों से हमारे देश की हालत बहुत अच्छी है. सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है. इसी इंप्रेशन में हमने कोरोना का टेस्ट कराने की बात मान ली.

मुझे पता था कि सरकारी अस्पताल में इतनी अच्छी फेसिलिटी मिलती नहीं है, हमने कोशिश की कि कहीं प्राइवेट में हमारा टेस्ट हो जाए. हालांकि सभी न्यूज़ चैनल यह दिखा रहे थे कि सरकारी अस्पताल में बहुत अच्छी सुविधाएं हैं, लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि प्राइवेट लैब में अटेंम्ट करता हूं. कोरोना के टेस्ट के लिए जितने भी प्राइवेट लैब की लिस्ट थी, मैंने वहां कॉन्टेक्ट करने की कोशिश की लेकिन वहां कांटेक्ट नहीं हो पाया. जहां कॉन्टेक्ट हो पाया, उन्होंने मना कर दिया कि वो कोरोना का टेस्ट नहीं कर रहे हैं.

अब मेरे पास आखिरी ऑप्शन बचा था कि गवर्नमेंट की हैल्पलाइन से मदद लेते हैं. मैंने वहां कॉल किया. गवर्नमेंट का सेंट्रल हैल्पलाइन, स्टेट हैल्पलाइन और टोल फ्री नम्बर तीनों पर हमारी फैमली के तीनों व्यस्क लोग, मैं, मेरा भाई और मेरी वाइफ, हम तीनों इन हैल्पलाइन पर फोन लगातार मिलाते रहे.

तकरीबन एक घंटे बाद मेरे भाई के फोन से स्टेट हैल्पलाइन का नंबर मिला. उस हैल्पलाइन से किसी सामान्य कॉल सेंटर की तरह रटा रटाया जवाब देकर कि आपको कल शाम तक आपको फोन आ जाएगा, वगैहरा कह कर फोन डिस्कनेक्ट करने की कोशिश की, लेकिन मैंने बोला कि सिचुएशन क्रिटिकल है, अगर किसी पेशेंट को कोरोना है तो उसे जल्द से जल्द ट्रीटमेंट देना चाहिए, ऐसी सिचुएशन में हम आपकी कॉल का कब तक कॉल करेंगे. हमने उनसे पूछा कि टेस्ट का क्या प्रोसीजर होता है, कॉल के बाद क्या होता है, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था. मैं निराश हो चुका था.

मेरे पास डीएम गौतमबुद्ध नगर का फोन था. सुहास साहब, उनकी भी बहुत अच्छी ब्रांड है. उनको कॉल किया तो उनके पीए से बात हुई. मैंने उनको बताया कि मेरे घर में एक कोरोना सस्पेक्ट है और कोई भी नम्बर नहीं मिल रहा है, ये क्या सिस्टम बना रखा है, तो उनका कहना था कि इसमें हम क्या करें, ये तो हैल्थ डिपार्टमेंट का काम है तो आप सीएमओ से बात कर लो.

मैंने उनसे कहा कि आप मुझे सीएमओ का नम्बर दे दो. उन्होंने कहा, मेरे पास सीएमओ का नंबर नहीं है. यह अपने आप में बड़ा ही फ्रस्टेटिंग था कि डीएम के ऑफिस के पास सीएमओ का नम्बर नहीं है, या डीएम के पीए को इस तरह से ट्रेन किया गया है कि कोई फोन करे तो उसे सीएमओ से बात करने को कहा जाए.

बहुत आर्ग्युमेंट करने के बाद उन्होंने मुझे डीएम के कंट्रोल रूम का नंबर दे दिया कि आप वहां से ले लो. फिर मैं इतना परेशान हो चुका था कि डीएम के कंट्रोल रूम को फोन करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. फिर मैंने खुद ही इंटरनेट पर नंबर ढूंढ कर निकाला. इसके बाद मैंने सीएमओ को कॉल किया.

सीएममो को कॉल करने के बाद वहां से भी कोई सही जवाब नहीं मिला. उन्होंने कहा, इसमें हम क्या कर सकते हैं. आप 108 पर एंबुलेंस को कॉल कर लो. और एंबुलेंस को ये बोलना कि हमें कासना ले चलो. वहीं हमने कोरोनावायरस का आइसोलेशन वार्ड बनाया हुआ है. जबकि मीडिया में दिन रात यह देखने को मिलता है कि नोएडा में कोरोना के इतने बड़े-बड़े अस्पताल हैं, फाइव स्टार आइसोलेशन वार्ड हैं वगैहर लेकिन फिर भी उन्होंने हमें ग्रेटर नोएडा में कासना जाने को कहा.

फिर बहुत मुश्किल से 108 पर कॉल मिला और फिर घंटे भर की जद्दोजहद के बाद 108 के कॉलसेंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक एंबुलेंस फाइनल करवाया. जब मेरे पास एंबुलेंस आई उस समय रात के 10 बज चुके थे. मैं शाम के सात बजे से इस पूरी प्रक्रिया में लगा था. यूपी का लॉ एंड ऑर्डर देखते हुए रात के दस बजे मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दे सकता था.

मेरे घर में 15 महीने की एक छोटी बेटी भी है और घर में केवल एक मेरा एक भाई ही था जिसे बच्चों की केयर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, फिर भी मैं अपनी बच्ची को उसके पास छोड़कर वाइफ के साथ एंबुलेंस में बैठ गया और वहां से आगे निकले.

आगे बढ़ने के बाद ड्राइवर ने बोला कि हम ग्रेटर नोएडा नहीं जा सकते, मुझे खाना भी है. मैंने चार दिन से खाना नहीं खाया और वो बहुत अजीब व्यवहार करने लगा.

फिर वो हमें किसी गांव में ले गया. वहां से उसने अपना खाना और कपड़ा लिया और फिर वहां से दूसरा रूट लेते हुए हमें वो ग्रेटर नोएडा लेकर गया.

हमें गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में हमें ले जाया गया. वहां एक महिला डॉक्टर मिलीं जो ट्रेनी ही लग रहीं थीं, उन्होंने दूर से ही वाइफ से पूछा कि आपको क्या सिमटम हैं ? वाइफ ने अपने सिमटम बताए, तो उन्होंने कहा कि आप दोनों को कोरोना का टेस्ट करना पड़ेगा. रिपोर्ट 48 घंटे में आ जाएगी. और अगर आप कोरोना का टेस्ट करवाते हैं तो आपको आईसोलेट होना पड़ेगा.

मैंने कहा कि मेरे लिए यह संभव नहीं है. मेरी 15 महीने की बच्ची है, मुझे वापस जाना पड़ेगा. आप बस मुझे वापस भिजवा दो. उन्होंने कहा कि हम वापस नहीं भिजवा सकते हैं और अगर आप आइसोलेट नहीं होना चाहते हैं तो आप यहीं कहीं बाहर रात गुजार लो सुबह देख लेना आप, कैसे वापस जाओगे ? यह लॉकडाउन की सिचुएशन की बात है जिसमें कोई भी आने जाने का साधन सड़क पर नहीं मिलता है.

अचानक से उन्होंने किसी को कॉल किया और उधर से किसी मैडम से उनकी बात हुई और उन्होंने फोन पर कहा कि नहीं हम हस्बैंड को नहीं जाने दे सकते क्योंकि वो भी एंबुलेंस में साथ में आए हैं.

मैंने उनसे कहा कि 48 घंटे तो मेरा भाई मैनेज कर लेगा लेकिन आप पक्का बताइए कि 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी ? इस पर उन्होंने कहा कि ‘हां 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी, आप अपना सैंपल दे दो.’ रात को ही हमारी सैंपलिंग हो गई और फिर से हमें एंबुलेंस में बिठाया गया.

एंबुलेंस में हमें तीन और सस्पेक्ट्स के साथ बिठाया गया और इसके पूरे चांस थे कि अगर मुझे कोरोना नहीं भी होता और उन तीनों में से किसी को होता, तो मुझे और मेरी बीवी को भी कोरोना हो जाता.

एक एबुंलेंस में पांच लोगों को पास-पास बिठाया गया. उनकी सैंपलिंग भी हमारे आस-पास ही हुई थी. इसके बाद हमें वहां से दो तीन किलोमीटर दूर एससीएसटी हॉस्टल में आइसोलेशन में ले जाया गया.

मेरी सैंपलिंग होने के बाद भी ना मुझे कोई ट्रैकिंग नंबर दिया गया, ना मेरा कोई रिकॉर्ड मुझे दिया गया कि मैं कहां हूं. मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी. इसके बाद मेरी वाइफ को लेडीज वार्ड भेज दिया गया और मुझे जेंट्स वार्ड.

जेंट्स और लेडीज़ दोनों का वॉशरूम कॉमन था. जब मुझे मेरा रूम दिया गया तो वहां चारपाई पर बेडशीट के नाम पर एक पतला-सा कपड़ा पड़ा हुआ था और दूसरा कपड़ा मुझे दिया गया और बोला गया कि आप पुराना बेडशीट हटा कर ये बिछा लेना.

रात के एक बज रहे थे, जो खाना मुझे दिया गया वो खराब हो चुका था, लेकिन मैंने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया. मैं बिना खाए वैसे ही सो गया.

उसके बाद मैं सुबह उठा. मुझे फ्रेश होना था. मैं नीचे गया और हाथ धोने के लिए साबुन मांगा. मुझे जवाब मिला कि पानी से ही हाथ धो लेना. सैनिटाइजेशन के नाम पर जीरो था वो आइसोलेशन सेंटर. चारों तरफ कूड़ा फैला पड़ा था.

मुझे एक-दो घंटे कह कर पूरे दिन साबुन का इंतजार करवाया गया लेकिन मुझे साबुन नहीं मिला. इस चक्कर में ना मैंने खाना खाया औ ना मैं फ्रेश हो पाया. मैंने सोचा कि केवल 48 घंटे की बात है, काट लेंगे.

अगले दिन जब मैं फिर गया साबुन मांगने तो फिर मुझे आधे घंटे में साबुन आ रहा है कह कर टाल दिया गया. करीब 12 बजे मेरी उनसे बहस हो गई तो उन्होंने अपने लिक्विड सोप में से थोड़ा-सा मुझे एक कप में दिया. तब जाकर मैं फ्रेश हो पाया और मैंने खाना खाया.

वहां बिना कपड़ों और सफाई के हालत खराब हो रही थी. 48 घंटे के बाद मैं पूछने गया तो मुझे बताया कि इतनी जल्दी नहीं आती है रिपोर्ट, 3-4 दिन इंतजार करना होगा. वहां उन्होंने बाउंसर टाइप कुछ लोग भी बिठा रखे हैं ताकि कोई ज्यादा सवाल-जवाब ना करे. वहां मैंने देखा कि वहां चाहें आप नेगेटिव हो या पॉजिटिव हो किसी की भी 7-8 दिन से पहले रिपोर्ट नहीं आती है.

हर हाल में मरना है, सरकार आपके लिए वहां कुछ नहीं कर रही है. केवल आपको आइसोलेशन वार्ड में डाल दिया जाता है कि केवल सरकार की नाकामी छिप जाए. देट्स इट.

वहां पर 80% लोग जमात और मरकज वाले और उनके संपर्क वाले लोग थे. उनका भी यही हाल था. उनकी भी रिपोर्ट नहीं बताई जा रही थी.

करीब 72 घंटे बाद जब मैंने दोबारा पूछा कि मेरी रिपोर्ट नहीं आ रही है तो वहां पर मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि हमें नहीं पता होता है कि आपकी रिपोर्ट कब आएगी. हमें केवल इतना पता है कि आपको यहां से जाने नहीं देना है, जब तक आपकी रिपोर्ट नहीं आ जाती है.

मुझे लग रहा था कि उनके पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी, कोई ट्रैकिंग की व्यवस्था नहीं थी. जो पहले आ रहा था वो बाद में जा रहा था, जो बाद आ रहा था वो पहले जा रहा था.

मैंने दोबारा डीएम के नंबर पर कॉल करना शुरू किया, फिर वो स्विच ऑफ हो गया और फिर वो आज तक वो नंबर बंद है, शायद नंबर बदल लिया है. फिर मैंने नोएडा के सीएमओ को कॉल करना शुरू किया, उन्होंने कॉल नहीं उठाया.

मैंने मैसेज किया कि मेरी 15 महीने की बेटी है जो मदर फीड पर है और फिलहाल मेरे भाई के साथ अकेली है, मुझे आपसे मदद चाहिए. लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं आया. मुझे समझ नहीं आता कि कोरोनावायरस के इतने क्रूशियल समय में आप कैसे 5-6 दिन में रिपोर्ट दे सकते हैं !

सीएमओ ने मेरा मैसेज पढ़ा और फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया. फिर मैंने डिप्टी सीएमओ को भी कॉल किया लेकिन फोन नहीं उठा. मैंने काफी हाथ-पैर मारे, मेरा फ्रस्ट्रेशन बहुत बढ गया था. एक डॉक्टर आते हैं वहां नाइट ड्यूटी पर, उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं हैं यहां पर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, आप मुझसे कल सुबह बात करना.

मेरे साथ ही एक और लड़का आइसोलेट हुआ था, गंदगी और गर्मी के कारण वो कल मेरे सामने बेहोश हो गया. कोई उसे उठाने, उसे छूने के लिए, उसके पास जाने को राजी नहीं था.

वहां किसी भी पेशेंट की तबियत खराब हो रही थी तो कोई उसके पास नहीं जा रहा था. अगर किसी को फीवर है तो पैरासिटामोट देकर वार्ड के अंदर चुपचाप सोने को कहा जा रहा था. सीढियों के पास इतना कूड़ा इकठ्ठा हो रहा था कि बदबू के मारे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था.

सब केवल अपनी औपचारिकता कर रहे थे वहां. बड़े अधिकारी जो वहां विजिट कर रहे थे, वो बाहर से ही बाहर निकल जा रहे थे. अंदर आकर हालात जानने की कोशिश किसी ने नहीं की.

आखिरकार कल शाम तक जब मेरी रिपोर्ट नहीं आई और मेरे साथ वालों की आ गई तो मैंने उनसे फिर पूछा कि मेरी रिपोर्ट क्यों नहीं आई अभी तक. क्यों कोई ट्रेकिंग सिस्टम नहीं है, क्यों किसी को कुछ पता नहीं है. तो उनका वही रटा रटाया जवाब मिला कि हम केवल आइसोलेट करके रखते हैं, हमें इसके अलावा और कोई जानकारी नहीं है. जब रिपोर्ट आएगी आप तभी यहां से जाओगे.

कोरोना आईसोलेशन वार्ड की यूज किया हुआ बिस्तर

इसके बाद मेरी वाइफ का फोन आया कि उन्होंने सुना है कि लेडीज को कहीं और शिफ्ट कर रहे हैं, किसी और जगह ले जाएंगे. मैं अपनी वाइफ के साथ नीचे गया और पता चला कि लेडीज को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं.

मैंने उनसे कहा कि मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दूंगा. वरना अगर इन्हें कुछ भी होता है तो आप रेस्पोंसिबल होगे. फिर उन्होंने मेरी बात मानी और कहा कि आपको भी इनके साथ भेज देंगे और फिर उन्होंने मुझे बाहर बुला लिया.

बाहर बुलाने के बाद में उन्होंने मेरे हाथ में पर्ची पकड़ाई कि ये इस वार्ड से उस वार्ड में आपका ट्रांसफर स्लिप है. मैंने पर्ची को देखा तो उसमें पहली लाइन में मुझे लिखा दिखा कि “मृत्युंजय कोविड -19 नेगेटिव”.

इस पर मैंने उनसे कहा कि अरे जब मेरी रिपोर्ट आई हुई है तो आप मुझे दूसरे वॉर्ड में क्यों भेज रहे हो ? इस पर उन्होंने मेरे हाथ से पर्ची ले ली और कहा कि शायद कोई गलती हो गई है. इतने गैर-जिम्मेदार लोग हैं वहां पर.

फिर उन्होंने क्रॉसवेरिफाई किया और बाहर आकर कहा कि हां आपकी रिपोर्ट आ गई है. आपकी रिपोर्ट नेगेटिव है. आपकी वाइफ की रिपोर्ट नहीं आई है. इन्हें जाना पड़ेगा. आप इस एंबुलेंस में बैठो, आपकी वाइफ दूसरी एंबुलेंस में बैठेंगी.

मैंने उनसे सवाल किया कि मेरी वाइफ की सैंपलिंग मेरे से पहले हुई थी तो ऐसा कैसे पॉसिबल है कि मेरी रिपोर्ट आ गई लेकिन मेरी वाइफ की नहीं आई ? मैंने सोचा ज़रूर कुछ गलती है.

मैंने एंबुलेंस रुकवा दी कि मैं बिना जानकारी के नहीं जाने दूंगा. फिर वो दो स्टाफ के साथ अंदर गए और फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बताया कि ‘हां आपकी वाइफ का भी नेगेटिव आया है.’

वहां कोई प्रोसेस, कोई सिस्टम नहीं है, जिसके जो मन आ रहा है वो किए जा रहा है. किसी को नहीं पता कि चल क्या रहा है. फिर उन्होंने कहा कि आप दोनों अब घर जा सकते हो. वापस आते हुए भी एंबुलेंस में पांच और लोग साथ में थे.

वहां हाइजीन की खराब स्थिति के कारण पूरे चांस हैं कि अगर आपको कोरोना नहीं भी है आइसोलेशन वार्ड या एंबुलेंस में आपको कोरोना हो जाए. अगर आपको कोरोना नहीं भी है तो आप वहां से नहीं बच सकते हो.

पहले एंबुलेंस ड्राइवर ने हमें कहा कि वो नोएडा सेक्टर 122 हमें छोड़ देगा लेकिन हमें निठारी छोड़ दिया गया. हमसे कहा गया कि आप यहां पर वेट करो, मैं दूसरी सवारी को छोड़ने जा रहा हूं. 102 नंबर की गाड़ी आएगी वो आपको लेकर जाएगी.

वहां आधा घंटा इंतजार करने के बाद जब मैंने वापस कॉल की और पूछा कि ‘कब आएगी गाड़ी’ तो उन्होंने कहा कि ‘हमारी जिम्मेदारी यहीं तक की थी. आगे आप देखो.’

फिर हम वहां और खड़े रहे. लगभग आधा घंटा और बीता और बीता और जो एंबुलेंस का ड्राइवर हमें छोड़ कर गया था वो वापस लौटा.

हमें वहीं खड़ा देख कर रुक गया. कहने लगा कि अरे बाबूजी मैं क्या करुं, मैं तो खुद परेशान हूं. चार दिन से खाना नहीं खाया है, हालत खराब है. मेरे सामने ही उसने वीड मारी और कहने लगा कि 12 से ऊपर हो रहे हैं. आप काफी परेशान हो, मैं आपको छोड़ देता हूं.

एंबुलेंस ड्राइवर अपने दो-तीन साथियों के साथ एंबुलेंस में बैठा और फिर वो रात के 1 बजे मेरी सोसाएटी से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर ही वो मुझे छोड़ कर चला गया.

यह कहानी बहुत कम करके मैंने बताई है कि क्या सिस्टम जमीन पर है और क्या मीडिया में दिखता है. जब आप ग्राउंड लेवल पर आते हो तो कोई रेस्पोंसिबल नहीं है आपकी हैल्थ के लिए, आपकी सिक्योरिटी के लिए, आपके कंसर्न के लिए और आपकी जान के लिए.

ऐसी भयानक और नर्क से साक्षात्कार कराती इस कोरोना वायरस आइसोलेशन कैंप या क्वारंटाईन की हृदयविदारक जगह कोई क्यों जाना चाहेगा ? शायद इसीलिए लोग स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला कर रहे हैं, कि क्वारंटाईन में जाकर भी मरना ही है तो उससे बेहतर है अपने परिजनों के बीच शांति से मर जाना.

लोग कोरोना से ज्यादा कोरोना के नाम पर बनाये जा रहे इस नर्क क्वारंटाईन से खौफ खाते हैं. अगर मोदी सरकार जिसकी विश्वसनीयता आम मेहनतकश के बीच लगभग शून्य हो चुकी है, अगर वह सचमुच कोराना से लड़ना चाहती है तो उसे क्वारंटाईन या कोरोना वायरस आईसोलेशन कैंपों को मानवीय बनाना होगा, इन कैंपों को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बांटना बंद करना होगा, वरना उसे कोराना से लड़ने के नाम पर लोगों को तंगोतबाह करने की नौटंकी छोड़ देनी चाहिए.

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लड़ते और लड़ते दिखने का फर्क

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