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कोराना संकट : विश्व बाजार व्यवस्था पर विमर्श की खुलती खिड़कियां

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोराना संकट : विश्व बाजार व्यवस्था पर विमर्श की खुलती खिड़कियां

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

यह कैसा मंज़र है कि वैश्वीकरण के आदर्श ज़मीन पर लोटते नज़र आ रहे हैं जबकि मुक्त आर्थिकी के सिद्धांत घुटनों के बल आ गिरे हैं. संरक्षणवाद, जिसे मुक्त व्यापार के पैरोकार संदेह की नज़रों से देखते थे, आज अचानक से प्रासंगिक हो गया है.

एक विश्वव्यापी संकट ने दुनिया को न सिर्फ भयाक्रांत कर दिया है, बल्कि आत्मनिरीक्षण को भी विवश कर दिया है. हर वह सैद्धांतिकी, जो बाज़ार को ताकतवर और शासन को प्रेक्षक भर रह जाने की सीख देती थी, आज सवालों के घेरे में है.

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2008 की मंदी के दौरान जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो उन्होंने अपने पहले संबोधन में कहा था कि ‘बाजार को सिर्फ और सिर्फ उसके भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.’ यह वह दौर था जब दुनिया ने देखा था कि एक बड़ी कंपनी लेहमैन ब्रदर्स के धराशायी होते ही धरती कितनी जोर से कांंपी थी, और इस कंपन ने न जाने कितने देशों के बाजारों की अट्टालिकाओं को ज़मींदोज़ कर दिया था.

फिर तो एक के बाद एक, आर्थिक त्रासदियों का सिलसिला चल पड़ा. माना गया कि 2008 का संकट बाज़ार के अंतर्विरोधों से उपजा है और ओबामा ने अपने पहले संबोधन में इन्हीं अंतर्विरोधों से जूझने की बात कही थी.

हालांकि, बाजार की सर्वग्रासी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने की बातें बातों से बहुत आगे नहीं बढ़ सकीं, लेकिन इसने विमर्श की एक नई खिड़की तो खोल ही दी थी. विमर्श की खुलती खिड़कियां नई संभावनाओं के द्वार भी खोलती हैं.

2008 के संकट ने बाज़ार बनाम शासन के विमर्श को नई धार दी थी जबकि अब 2020 के कोरोना संकट ने बाज़ार बनाम शासन ही नहीं, बाज़ार बनाम मनुष्य के मुद्दे को भी विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है.

बेलगाम फैलती महामारी ने दुनिया भर में इस सोच को तो बल दिया ही है कि मजबूत सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का कोई विकल्प नहीं, इससे भी अधिक, धराशायी होती अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में इस तथ्य को भी अब स्वीकार किया जा रहा है कि संरक्षणवाद की भी अपनी प्रासंगिकता है.

अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, तुर्की, ब्रिटेन से लेकर भारत तक के शेयर बाज़ार इस कोविड त्रासदी के दौर में जब औंधे मुंह गिरने लगे तो जाहिर है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के भाव भी ज़मीन पर आ गिरे।

वैश्वीकरण के आदर्श, मुक्त आर्थिकी के सिद्धांत और विश्व व्यापार संगठन की छतरी तले हुए अनेक वैश्विक समझौते इसका लाइसेंस देते हैं कि कमजोर होती अर्थव्यवस्थाओं की ज़मीन सूंघती कंपनियों की हिस्सेदारी किसी भी दूसरे देश की कोई भी कंपनी खरीद सकती है. चीन और कुछ अन्य देशों ने यही तो करने की कोशिश की.

इस संकट काल में भी जो अर्थव्यवस्थाएं आज भी मजबूत हैं, वे कमजोर पड़ती जा रही अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी खरीद कर अपने आर्थिक आधिपत्य को बढ़ाना चाहती हैं.

चीन और यूरोप के कुछ देशों ने भारत और यूरोप के ही कुछ अन्य महामारी प्रभावित देशों के कम्पनियों की हिस्सेदारी खरीदने की कोशिश की. इन देशों ने जो करना चाहा उसकी इज़ाज़त तो विश्व व्यापार संगठन के वे समझौते देते ही हैं, जिन पर दस्तखत करने के लिये अमेरिका और यूरोपीय देश भारत सहित तमाम कमजोर देशों पर दबाव डालते रहे.

लेकिन नहीं, 2020 के अब इस बदलते दौर में वही यूरोपीय देश उन खरीदारों के कदम रोकने को आतुर हो गए. वही संरक्षणवाद, जिसे तमाम आर्थिक मंचों पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि धनी देशों के राष्ट्राध्यक्ष पानी पी-पी कर कोसते रहे, आज उनकी आर्थिक संप्रभुता को बचाने का रास्ता नजर आ रहा है.

भारत ने आनन-फानन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की संहिताओं में परिवर्त्तन किया और चीन के बढ़ते कदमों को रोकने की कोशिश की. जापान के साथ ही यूरोप के भी अनेक देश विदेशी निवेश के सुगम रास्तों को दुर्गम बनाने में जुट गए हैं.

राष्ट्रों की आर्थिक संप्रभुता नए सिरे से परिभाषित होने लगी है और संरक्षणवाद एक बेहतर विकल्प के रूप में उन व्यवस्थाओं का हित रक्षक बन कर खड़ा हो रहा है, जो कभी इसे अप्रासंगिक ठहराते थकते नहीं थे.

कमजोरों को ग्रास बना लेने वाली विश्व बाजार व्यवस्था आज अपनी नग्नताओं के साथ उनके सामने ही चुनौती बन कर आ खड़ी हुई है जो इसके सर्वाधिक मुखर प्रवक्ता थे.

कोविड संकट ने बाजार बनाम शासन के विमर्श को फिर से एक नई धार दे दी है और इस विमर्श से ही बाजार बनाम मनुष्य के विमर्श की खिड़की भी खुलती है.

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