Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

कोरोना ने राजनीति और उससे उपजी सत्ता के चरित्र का पर्दाफाश किया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 28, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

कोरोना ने राजनीति और उससे उपजी सत्ता के चरित्र का पर्दाफाश किया

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

पिछले दिनों ब्रिटिश अखबार ‘द गार्डियन’ में कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड रोंचमैन का एक लेख प्रकाशित हुआ था, ‘कोरोना वायरस ने राजनीति को स्थगित नहीं किया, बल्कि इसकी प्रकृति को उजागर किया.’

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

उक्त लेख में कोरोना संकट के दौरान राजनीति के उन अंधेरों पर चर्चा की गई है जिनमें निर्णय प्रक्रियाएं कुछ मुट्ठी भर ताकतवर लोगों के हाथों में सिमटी नजर आईं. निर्णय की शक्तियों के केंद्रीकरण ने आपदा के इस काल में विराट जन समुदाय के व्यापक हितों की अनदेखी की और लोकतांत्रिक राजनीति के जन विरोधी बनते स्वरूप को उजागर किया.

यद्यपि, लेख में किसी खास देश की चर्चा न कर वैश्विक परिदृश्य को सामने रखा गया है, किन्तु इस आलोक में अगर हम अपने देश को सामने रख कर विचार करें तो कोई उत्साह बढ़ाने वाले संकेत नहीं मिलते.

संकट के इतना गहराने के बाद फिलहाल इस बात की चर्चा का अधिक मतलब नहीं है कि समय रहते बचाव के उचित कदम उठाने में देर हुई. यह ऐसी बहस है जिसने अनेक देशों के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया है और अब इतिहास ही इसका विश्लेषण करेगा.

किन्तु, इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि संकट से निपटने के लिये जब निर्णय लिए जा रहे थे तो आबादी के किन हिस्सों को ध्यान में रखा गया और किनके बारे में सोचा ही नहीं गया.

भारत में लॉक डाउन लागू करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई उसमें, जैसा कि बाद में प्रतीत हुआ, आबादी के ऊपरी 30-35 प्रतिशत को ही ध्यान में रखा गया. बाकी 65-70 प्रतिशत हिस्से को, जिनमें बड़ी संख्या उनकी है जो दैनिक या ठेके के हिसाब से मजदूरी पर जीते हैं, निर्णय प्रक्रिया में कितना संज्ञान में लिया गया, यह बाद के घटनाक्रमों से स्पष्ट होने लगा.

राजमार्गों पर बदहवास जमा होती भीड़ और महानगरों से हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर पैदल चल पड़ने की उनकी आत्मघाती उत्कंठा के पीछे कौन-सी विवशताएं रहीं, इन्हें समझना कहीं से भी कठिन नहीं.

मुद्दा यह है कि निर्णय प्रक्रिया में शामिल लोगों ने 8 बाई 8 के सीलन भरे अंधेरे कमरों में रहने वाले उन लाखों-करोड़ों श्रमिकों के बारे में क्या सोचा, जो भी इसी देश के नागरिक हैं. तय था कि लॉक डाउन होते ही उनके रोजगार छिन जाएंगे, उनकी आमदनी मारी जाएगी और दो-चार दिन बीतते न बीतते वे दाने-दाने को मुंहताज हो जाएंगे.

राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री एक पंक्ति में इन प्रवासी श्रमिकों को कह सकते थे कि वे जहां हैं वहीं रहें और सरकार हर हाल में उनकी चिन्ता करेगी लेकिन वे सिर्फ उनके बलिदान का उल्लेख करते रहे.

अफरातफरी मचनी ही थी, जिसने लॉक डाउन को तो बेमानी किया ही, लाखों बच्चों, बीमारों, महिलाओं, बूढ़ों और अपाहिजों को सड़कों पर भटकने को विवश कर दिया.

यहां इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि हाशिये पर के इन लोगों की आस्था सरकारी आश्वासनों में नहीं बची है. उन्हें लगता है कि निरंकुश, निर्मम और जन विरोधी प्रशासनिक तंत्र के आश्वासनों पर भरोसे का कोई मतलब नहीं है और उन्हें अपनी चिन्ता स्वयं करनी होगी.

इतिहास का यह निर्मम अध्याय, जिसमें लाखों लोग पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़े, हमारी राजनीति और सत्ता के चरित्र पर स्पष्ट टिप्पणी करता है और इसकी जन विरोधी प्रकृति को उजागर करता है.

देश व्यापी लॉक डाउन में सड़कों पर पुलिसिया राज और दमन का जो चित्र सामने आया, उसने सत्ता के उस चरित्र को सामने रखा जो संक्रमणों की जांच, आवश्यक स्क्रीनिंग और आधारभूत व्यवस्थाओं में तो पीछे रही लेकिन सड़कों पर निकले लोगों को मुर्गा बनाने में, कान पकड़ कर उठक-बैठक कराने में और उन पर डंडों की बरसात करने में आगे रही.

महामारी एक्ट सत्ता को जन समूहों पर सिर्फ नियंत्रण और दमन का अधिकार ही नहीं देता, बल्कि इसके साथ उसके कर्त्तव्यों की लंबी फेहरिस्त भी जुड़ी हुई है.

लगातार सरकारी दावों के बावजूद राहत वितरण की नाकामियां भी हमारे सामने है, जिन्होंने विवश इंसानों और जनवरों का फर्क मिटा दिया है. दिल्ली में यमुना पुल के नीचे आश्रय लिए हजारों लोगों के वीडियो क्लिप्स हों या राज मार्गों पर भूखे, प्यासे अनवरत चलते जन समूहों के फोटोग्राफ्स हों, ये हमारे प्रशासनिक तंत्र की विफलताओं के दस्तावेज हैं.

कितने लोग भूख और बीमारी से रास्ते में ही दम तोड़ गए, इसका आकलन स्वयं सरकार के पास भी नहीं. एक से एक हृदयद्रावक कहानियां सामने आती रहीं जो सरकारी घोषणाओं और तल्ख हकीकतों के बीच के फर्क को उजागर करती रही.

एक तरफ हवाई जहाज उड़ते रहे, एसयूवी गाड़ियां फर्राटे भरती रहीं, रसूखदार लोग इस शहर से उस शहर पहुंचते रहे और दूसरी तरफ कोई बीमार पथिक रास्ते में भूख और दवा के बिना मरता रहा, कोई बारह वर्ष की मासूम बालिका सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के बाद अपने गांव की दहलीज पर पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ती रही.

महामारी के इस संकट काल ने हमारी राजनीति को, हमारी सत्ता को हमारी नजरों में एक बार फिर से पूरी तरह से एक्सपोज कर दिया है. हम नहीं जानते, संकट के इन अंधेरों के पार उजाले की किरणें कितनी दूर हैं, लेकिन, हम विवश भाव से सिर्फ प्रतीक्षा कर सकते हैं कि कभी तो उजाले की किरणें हमारे गांव तक भी आएंगी.

तब तक जो मर जाएंगे वे अपनी नियति का साक्षात्कार करेंगे और जो बच जाएंगे वे अपने जीने की ज़द्दोज़हद में फिर से जुट जाएंगे. राजनीति फिर से उन्हें छलने की नई जुगत की तलाश करेगी और हम छले जाने को अभिशप्त होंगे.

फिलहाल तो हम एक तरफ फैलती महामारी से आतंकित हैं, दूसरी तरफ सरकारी बदइन्तज़ामियों और दमन से त्रस्त हैं. हमारे बेगूसराय जिला के हाकिमों ने पिछले सप्ताह घोषणा की कि पूरे जिले की ‘डोर टू डोर’ स्क्रीनिंग की जाएगी. कल किसी न्यूज में देखा कि स्क्रीनिग पूरी भी हो गई और अब बचे-खुचे लोगों तक टीमें पहुंचेंगी.

हालांकि, हमने अपने बड़े और सघन मुहल्ले में किसी स्क्रीनिंग टीम को नहीं देखा अब तक. जहां ये टीमें पहुंची भी, वहां खानापूरी ही हुई जिसे ‘डोर टू डोर स्क्रीनिंग’ तो नहीं ही कहा जा सकता, जिनके दरवाजों पर ये खानापूरी हुई वे बेहतर बता सकते हैं.

इधर, ये खबर भी सामने है कि हमारे गांव के एक व्यक्ति का सिर पुलिसिया डंडे से फट गया, जो बैंक से अपने पैसे निकाल कर अपने घर लौट रहा था. वीडियो में उसका बिलखता, लहूलुहान चेहरा देख रहे हैं हम.

यही हैं हम, यही है हमारी राजनीति और उससे उपजी सत्ता का चरित्र. कोरोना ने इसे फिर से एक्सपोज कर दिया है. एक्सपोज तो हम भी हुए हैं, क्योंकि हम भारत के लोग, इस देश के नियंता हैं आखिर.

Read Also –

सत्ता पर बैठे जोकरों के ज्ञान से ‘अभिभूत’ देशवासी
वेतनभोगी मध्यवर्ग की राजनीतिक मूढ़ता
कोराना पूंजीवादी मुनाफाखोर सरकारों द्वारा प्रायोजित तो नहीं
कोरोना संकट : लॉकडाउन और इंतजार के अलावा कोई ठोस नीति नहीं है सरकार के पास
कोरोनावायरस आईसोलेशन कैप : नारकीय मौत से साक्षात्कार 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

सत्ता पर बैठे जोकरों के ज्ञान से ‘अभिभूत’ देशवासी

Next Post

कोराना के नाम पर जांच किट में लूटखसोट

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

कोराना के नाम पर जांच किट में लूटखसोट

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

वैलेण्टाइन डे पर खास : प्रेम में स्टैंड लेना जरूरी है !

February 14, 2024

प्रोफेसर डी. एन. झा के देहवसान पर राम पुनियानी

February 12, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.