हाल के दिनों में माओवादी आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं के आत्मसमर्पण के बीच वर्ष 2019 में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति द्वारा जारी एक दस्तावेज फिर चर्चा के योग्य हो उठा है. पार्टी ने तब अपने दो वरिष्ठ नेताओं के आत्मसमर्पण के कारणों की जांच करते हुए वैचारिक कमजोरी, संगठनात्मक कमियों और नेतृत्व की जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की थी.

पिछले कुछ महीनों में माओवादी आंदोलन के कुछ नेताओं ने भारतीय राज्य के समक्ष आत्मसमर्पण किया है. सवाल उठता है कि लंबे समय तक भूमिगत और क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे नेता आखिर किन परिस्थितियों में अपना रास्ता बदल देते हैं ?
इस सवाल को समझने के लिए सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति द्वारा वर्ष 2019 में जारी एक आत्म-जांच और निंदा संबंधी दस्तावेज महत्वपूर्ण है. यह दस्तावेज पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य ओगु सतवाजी उर्फ सुधाकर और बिहार-झारखंड विशेष क्षेत्र समिति की सदस्य माधवी उर्फ नीलमा के आत्मसमर्पण के बाद तैयार किया गया था.
‘लाल पताका’ के अंक संख्या 15 और अन्य स्रोतों में उपलब्ध इस दस्तावेज में पार्टी ने केवल दोनों नेताओं के आत्मसमर्पण की आलोचना नहीं की, बल्कि अपने संगठन, नेतृत्व और वैचारिक कार्यप्रणाली की कमजोरियों पर भी सवाल उठाए. वर्तमान घटनाक्रम के संदर्भ में इस दस्तावेज के कुछ प्रमुख अंश और निष्कर्ष यहां प्रस्तुत हैं – सम्पादक
दो वरिष्ठ नेताओं का आत्मसमर्पण और पार्टी की प्रतिक्रिया
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय समिति के सदस्य ओगु सतवाजी उर्फ सुधाकर या शरत और बिहार-झारखंड विशेष क्षेत्र समिति की सदस्य माधवी उर्फ नीलमा ने 14 फरवरी 2019 को तेलंगाना के डीजीपी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था.
दोनों लंबे समय तक क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे और विभिन्न जिम्मेदारियों को निभाते हुए पार्टी के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे थे. उनके आत्मसमर्पण के बाद केंद्रीय समिति ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया और इस घटना के राजनीतिक तथा वैचारिक कारणों की जांच के लिए एक विस्तृत दस्तावेज तैयार किया.
पार्टी के अनुसार, कठिन परिस्थितियों में वैचारिक दृढ़ता बनाए रखने में विफलता, परिस्थितियों का सही विश्लेषण न कर पाना और व्यक्तिगत कमजोरियों से उबरने में असमर्थता उनके राजनीतिक पतन के प्रमुख कारण थे.
लेकिन दस्तावेज यहीं नहीं रुकता. इसमें पार्टी नेतृत्व की भूमिका और कैडरों के मूल्यांकन की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं.
परिस्थितियों को समझना और सिद्धांत को व्यवहार से जोड़ना
दस्तावेज का एक केंद्रीय विचार यह है कि किसी भी क्रांतिकारी पार्टी के लिए केवल सिद्धांत को जानना पर्याप्त नहीं है. वास्तविक परिस्थितियों का गहन अध्ययन और उस सिद्धांत को व्यवहार में लागू करना भी उतना ही आवश्यक है.
पार्टी के अनुसार, विश्व, देश, राज्य और स्थानीय क्षेत्रों की ठोस परिस्थितियों को समझे बिना सही राजनीतिक दिशा निर्धारित नहीं की जा सकती. कार्यकर्ताओं और समितियों को अपने कार्यक्षेत्र की वास्तविक स्थिति का निरंतर अध्ययन और जांच-पड़ताल करनी चाहिए.
इसलिए पूरे संगठन में अध्ययन और जांच की एक व्यवस्थित कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया गया है.
दस्तावेज यह भी स्वीकार करता है कि संगठनात्मक रूप से मजबूत होने के बावजूद पार्टी देश के सभी क्षेत्रों और सामाजिक तबकों तक अपना विस्तार करने तथा अपने सभी उद्देश्यों को हासिल करने में सफल नहीं हो पाई है.
संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व की कसौटी
दस्तावेज संगठनात्मक कार्य को राजनीतिक कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है. पार्टी को जनता के बीच अपनी विचारधारा पहुंचाने, संगठन का विस्तार करने और जनकार्य को मजबूत करने के लिए सक्रिय और सक्षम कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है.
कैडरों और नेतृत्व के मूल्यांकन के लिए चार महत्वपूर्ण गुणों पर जोर दिया गया है:
पहला, कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण.
दूसरा, जनता के साथ अटूट संबंध.
तीसरा, स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता.
चौथा, अनुशासन का पालन.
पार्टी का मानना है कि नेतृत्व केवल ऊपर से निर्देश देने का नाम नहीं है. नेतृत्व को जनता के अनुभवों और वास्तविक परिस्थितियों के साथ जुड़ना होगा. सामान्य राजनीतिक दिशा और ठोस मार्गदर्शन के बीच सही संतुलन बनाना भी आवश्यक है.
असफलता से सीखने और आत्म-आलोचना की जरूरत
दस्तावेज में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से विचार और व्यवहार के संबंध पर विशेष जोर दिया गया है. इसके अनुसार, वास्तविक दुनिया को समझने और बदलने की प्रक्रिया में गलतियां और असफलताएं हो सकती हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि उनसे क्या सीखा जाता है.
असफलता से सबक लेकर अपने विचारों और कार्यपद्धति में सुधार किया जाए, तो असफलता भी आगे की सफलता का आधार बन सकती है.
इसी कारण आत्म-आलोचना को पार्टी और नेतृत्व के लिए आवश्यक गुण बताया गया है. एक सक्षम नेता को अपनी कमियों और कमजोरियों के प्रति ईमानदार होना चाहिए तथा पार्टी सदस्यों और जनता की आलोचनाओं को सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए.
गलतियों को छिपाने के बजाय उन्हें पहचानना और सामूहिक सहयोग से सुधारना ही संगठन को मजबूत बनाता है.
सुधाकर और माधवी: केवल व्यक्तिगत विफलता या संगठन के लिए सबक?
केंद्रीय समिति ने सुधाकर और माधवी के आत्मसमर्पण को केवल दो व्यक्तियों की व्यक्तिगत विफलता के रूप में नहीं देखा. उन्हें पार्टी के लिए एक नकारात्मक उदाहरण और व्यापक आत्म-परीक्षण का अवसर माना गया.
दस्तावेज के अनुसार, पार्टी में जिम्मेदारियों को केवल पद या प्रतिष्ठा के रूप में देखना एक गंभीर गलती है. प्रत्येक जिम्मेदारी के साथ निरंतर अध्ययन, व्यवहार, आत्म-परीक्षण और जनता के प्रति जवाबदेही जुड़ी होती है.
सुधाकर और माधवी के संबंध में कहा गया कि वे अपने अनुभवों को पर्याप्त मानने और आत्मसंतुष्टि की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो सके. कठिन राजनीतिक और संगठनात्मक परिस्थितियों का सामना करने के लिए आवश्यक वैचारिक तैयारी और निरंतर आत्म-सुधार की प्रक्रिया कमजोर पड़ती गई.
परिणामस्वरूप, उनकी उपलब्धियों और कमियों के बीच सही अंतर करने की क्षमता भी प्रभावित हुई.
केंद्रीय समिति ने अपनी जिम्मेदारी भी स्वीकार की
इस दस्तावेज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें पार्टी की केंद्रीय समिति ने कैडरों के मूल्यांकन में अपनी कमियों को भी स्वीकार किया.
सुधाकर को उच्च जिम्मेदारियां सौंपते समय केंद्रीय समिति उनकी कमजोरियों और उन जिम्मेदारियों को निभाने की वास्तविक क्षमता का सही आकलन नहीं कर सकी. दस्तावेज में दृढ़ संकल्प की कमी, अस्थिरता, पारिवारिक संबंधों को राजनीतिक संघर्ष से ऊपर रखने की प्रवृत्ति और गैर-जिम्मेदारी जैसी कमजोरियों की चर्चा की गई है.
इस प्रकार दस्तावेज केवल व्यक्तियों की आलोचना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी नेतृत्व और संगठन के सामने भी आत्म-परीक्षण की आवश्यकता रखता है.
पार्टी के भीतर भी होते हैं विरोधाभास
कम्युनिस्ट पार्टी को पूरी तरह विरोधाभास-मुक्त और शुद्ध मानने की धारणा को दस्तावेज मार्क्सवादी दृष्टिकोण के विपरीत बताता है.
किसी भी संगठन की तरह पार्टी भी वास्तविक समाज और वर्ग संघर्ष की परिस्थितियों में काम करती है. इसलिए उसके भीतर भी विभिन्न विचारों और प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष मौजूद रहता है.
सही और गलत, सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष को पहचानना और सही दिशा को मजबूत करना संगठनात्मक विकास की प्रक्रिया का हिस्सा है.
दस्तावेज के अनुसार, यदि पार्टी वैचारिक और संगठनात्मक शिक्षा की उपेक्षा करती है, तो उसके भीतर गैर-सर्वहारा प्रवृत्तियां मजबूत हो सकती हैं. इसलिए निरंतर राजनीतिक शिक्षा, आत्म-परीक्षण और संगठनात्मक सुधार को आवश्यक बताया गया है.
कठिन परिस्थितियों में वैचारिक प्रतिबद्धता की परीक्षा
दस्तावेज का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कठिन परिस्थितियों में क्रांतिकारी प्रतिबद्धता की परीक्षा से जुड़ा है.
केंद्रीय समिति का कहना है कि संघर्ष के कठिन दौर में ही किसी आंदोलन और उसके कार्यकर्ताओं की वास्तविक परीक्षा होती है. चुनौतियां यह स्पष्ट करती हैं कि कौन अपने राजनीतिक विश्वासों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के प्रति दृढ़ रहता है और कौन पीछे हट जाता है.
दस्तावेज में कहा गया है कि कम्युनिस्ट अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर समाजवादी उद्देश्य और जनता की मुक्ति को महत्व देते हैं. इसी संदर्भ में केंद्रीय समिति ने अपनी वैचारिक समझ को इस वाक्य में व्यक्त किया:
“कम्युनिस्ट आत्मसमर्पण करने की बजाय मरते दम तक लड़ने को महत्व देते हैं.”
पार्टी के अनुसार, किसी भी राजनीतिक आंदोलन की शक्ति केवल उसके नारों में नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक विचारधारा, संगठनात्मक क्षमता, जनता के साथ संबंध और कठिन परिस्थितियों में आत्म-सुधार की क्षमता में निहित होती है.
वर्तमान संदर्भ में दस्तावेज का महत्व
वर्ष 2019 में तैयार किया गया यह दस्तावेज आज भी आत्मसमर्पण, राजनीतिक प्रतिबद्धता, संगठनात्मक कमजोरियों और नेतृत्व की जिम्मेदारी जैसे सवालों पर बहस के लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करता है.
यह दस्तावेज अपने वैचारिक निष्कर्षों के माध्यम से एक ओर आत्मसमर्पण करने वाले नेताओं की आलोचना करता है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर अध्ययन, आत्म-आलोचना, कैडरों के सही मूल्यांकन और संगठनात्मक सुधार की आवश्यकता को भी स्वीकार करता है.
यही कारण है कि हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बीच इस दस्तावेज को केवल अतीत की एक संगठनात्मक टिप्पणी के रूप में नहीं, बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन के सामने मौजूद वैचारिक और संगठनात्मक प्रश्नों को समझने के एक दस्तावेज के रूप में भी पढ़ा जा सकता है.
क्रांतिकारी शुभकामनाओं सहित,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय समिति
30 मार्च 2019
स्रोत: ‘लाल पताका’ के अंक संख्या 15 तथा उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर संपादित और व्यवस्थित प्रस्तुति. रेड लाइन, अप्रैल-जून 2026 में संदर्भित सामग्री के आधार पर.
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