
जब 12 नवंबर, 2021 को माओवादी नेता किशन दा को उनकी जीवन साथी के साथ गिरफ्तार किया गया था, तब हिंदुस्तान टाइम्स सहित कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और ब्लॉगों ने इस बारे में जानकारी प्रकाशित की थी. नीचे पाठकों के लिए उस समय हिंदी में ऑनलाइन प्रकाशित ब्लॉग ‘नक्सलबाड़ी स्क्रीन’ में प्रकाशित जानकारी को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. – सम्पादक
गिरफ्तारी की खबर
रांची से उस समय बड़ी खबर आई थी कि नक्सली अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई करते हुए शीर्ष माओवादी नेता प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ को उनकी पत्नी समेत गिरफ्तार कर लिया है. उनके दो अन्य साथियों को भी गिरफ्तार किया गया था. इस तरह कुल चार लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई थी.
प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ के कई अन्य नाम भी थे. पिछले चार दशकों से उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय प्रयास जारी थे और कई राज्यों की पुलिस उनकी तलाश में जुटी हुई थी.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सर्वोच्च निकाय पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रशांत बोस उर्फ किशन दा को उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ झारखंड पुलिस ने गिरफ्तार किया था. प्रशांत बोस माओवादियों के पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो के सचिव बताए जाते थे, जबकि उनकी पत्नी शीला मरांडी भी माओवादी संगठन की केंद्रीय समिति की सदस्य थीं. वह माओवादियों के सहयोगी संगठन नारी मुक्ति संघ से भी जुड़ी हुई थीं.
कई स्थानों पर संगठन की स्थापना और विस्तार में प्रशांत बोस की भूमिका उल्लेखनीय बताई जाती रही है. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, झारखंड में प्रशांत बोस के खिलाफ 70 से अधिक माओवादी मामलों का उल्लेख किया गया था.
गिरफ्तारी की परिस्थितियां
झारखंड पुलिस के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी को प्रशांत बोस और अन्य लोगों के गिरिडीह के पारसनाथ से सेराइकेला लौटने की सूचना मिली थी. इसके बाद सेराइकेला पुलिस ने मुंद्री टोल नाका से प्रशांत बोस, उनके सुरक्षा दस्ते की सदस्य शीला मरांडी तथा स्कॉर्पियो गाड़ी में कूरियर का काम करने वाले एक युवक को गिरफ्तार किया.
गिरफ्तारी के बाद उनसे गुप्त स्थान पर पूछताछ किए जाने की बात कही गई. झारखंड पुलिस ने प्रशांत बोस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था. इतने बड़े इनाम से यह अनुमान लगाया जाता था कि उन्हें गिरफ्तार करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती रहा होगा.
स्वास्थ्य और संगठनात्मक सक्रियता
जांच और विभिन्न रिपोर्टों में यह बात सामने आई कि प्रशांत बोस का स्वास्थ्य पिछले कई वर्षों से बिगड़ रहा था. इसके बावजूद वे अपने संगठन में सक्रिय रहे और संगठन के प्रति समर्पित बने रहे.
जानकारी के अनुसार, प्रशांत बोस कोल्हान से पारसनाथ के बीच के क्षेत्रों में रह रहे थे. हाल ही में उनके कोलकाता से लौटने की भी चर्चा थी. इलाज के लिए आने-जाने के दौरान अपनाई गई यात्रा व्यवस्था में विशेष सावधानी और सतर्कता बरती जाती थी. माओवादी संगठन में उनके उच्च पद और महत्व को देखते हुए उनके लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाती थी.
एमसीसीआई और माओवादी आंदोलन में भूमिका
2004 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) और पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) के विलय से पहले प्रशांत बोस को एमसीसीआई के प्रमुख नेताओं में माना जाता था.
क्षेत्रीय ब्यूरो के सचिव के रूप में उनकी जिम्मेदारियां व्यापक थीं. बिहार, पूर्वी झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ और उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों से उनका नाम जुड़ा रहा.
रिपोर्टों के अनुसार, प्रशांत बोस ने पारसनाथ, सारंडा और झारखंड-ओडिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वे पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के यादवपुर के निवासी बताए जाते हैं.
अनुभवों का विशाल भंडार
नक्सलवाद और माओवाद के मार्ग पर चलते हुए प्रशांत बोस की उम्र के साथ उनके अनुभव भी बढ़ते गए. सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ उन्हें व्यवहारिक जीवन में अनेक अनुभव प्राप्त हुए. इन अनुभवों ने संगठन, स्थानीय राजनीति, स्थानीय समस्याओं और परिस्थितियों को समझने में उनकी भूमिका को मजबूत किया.
उनके अनुभवों के आधार पर संगठन की नई इकाइयों के गठन और मौजूदा इकाइयों को मजबूत करने में योगदान का उल्लेख मिलता है. स्थानीय परिस्थितियों और सामाजिक वातावरण की समझ को माओवादी संगठनों की कार्ययोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है.
गुप्त जीवन जीने में निपुण
प्रशांत बोस उर्फ किशन दा लंबे समय तक गुप्त जीवन जीने में अत्यंत निपुण माने जाते थे. एक समय ऐसी स्थिति भी बताई गई जब सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को उनके जीवित होने को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं थी. उनके बारे में मृत्यु की खबरें फैलने के बाद उनके कुछ करीबी साथियों को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि किशन दा जीवित हैं.
विभिन्न राज्यों की सरकारों ने समय-समय पर उन पर इनाम घोषित किया था. बताया जाता है कि उन्होंने कोल्हान, पश्चिम बंगाल और ओडिशा सहित विभिन्न क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारियां संभालीं. इस दौरान वे सारंडा समेत कई स्थानों पर गुप्त रूप से रहे.
सारंडा का जंगल
सारंडा झारखंड का एक घना और विशाल वन क्षेत्र है, जो झारखंड-ओडिशा सीमा के आसपास फैला हुआ है. यहां अनेक प्रकार के जानवर, पक्षी और अन्य जीव-जंतु पाए जाते हैं. सारंडा क्षेत्र लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों और सुरक्षा बलों के अभियानों के कारण भी चर्चा में रहा है.
जंगल और पहाड़ों को फिर से देखो…
देखो, जंगल और पहाड़ फिर से गाएंगे,
पहाड़ों में झरने शोर मचाएंगे.
देखो, घाटियों और गुफाओं में फिर आवाजें गूंजेंगी,
पक्षी और चिड़ियां जोर से गाएंगी.
आधी रात में खिलने वाले गुलाब फिर खिलेंगे.
बूढ़ी माताओं ने क्रूर तूफानों को रोकने का साहस किया है.
पक्षियों और चिड़ियों ने अत्याचारियों के पंखों को नाचते देखा है.
सत्ता के गलियारे भी आंसुओं से भर जाएंगे.
जंगल और पहाड़ फिर गीत गाएंगे.
मधुमक्खी की तरह बूढ़ा भी नाच सकेगा.
हर अपंग और लाचार व्यक्ति फिर उठ खड़ा होगा.
बसंत आएगा.
टूटी हुई शाखाओं पर बैठी कोयल फिर गीत गाएगी.
फिर सत्ता के गलियारे केवल विलाप करेंगे.
देखो, जंगल और पहाड़ फिर से गीत गाएंगे,
और पहाड़ों में झरने फिर शोर मचाएंगे.
— बलवंत सिंह मखू
- स्रोत: सुर्ख रेखा, अप्रैल-जून 2026 (पंजाबी से अनुवाद)
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