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मिडिल क्लास चुप है क्योंकि वह सोचने के लायक़ ही नहीं रहा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 29, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कल रात मेरे एक पुराने मित्र ने फोन किया था कि उनकी नौकरी चली गई. मैंने कहा आप ही तो ‘मोदी-मोदी’ करते थे. छूटते ही उन्होंने कहा, ‘मोदी थोड़े किये हैं. मोदी महान है. यह तो मैनेजमेंट ने किया है. मोदी ने राम मंदिर बनवाया, धारा 370 हटाया और इसीलिए मुझे मोदी पसंद है.’

मेरे ये मित्र खुद को भक्त कहलाना पसंद करते हैं और पिछले 17 वर्षों से प्रसिद्ध राष्ट्रीय पत्र दैनिक में काम करते आ रहे थे. उनको संतोष था कि उनके साथ-साथ अन्य ग्यारह कर्मियों की भी नौकरी गई है और अब वे अपने भविष्य के लिए चिंतित थे, जो एक ही झटके में बेरोजगार हो गये थे, पर उनको सरकार से कोई शिकायत नहीं है.

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भारत में बेरोजगारी के आंकड़ों का प्रकाशन वर्ष 2016 के बाद से प्रकाशित होना बंद हो गया है. यह ठीक वैसी ही चीज है कि देखना बंद कर दो, दिन नहीं दिखेगा. बेरोजगारी के सवाल पर अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार व मैग्सेसे अवार्ड प्राप्त पत्रकार रविश कुमार ने बेहतरीन विश्लेषण किया है, जिसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.

मिडिल क्लास चुप है क्योंकि वह सोचने के लायक़ ही नहीं रहा

अमरीका का श्रम विभाग है. वह बताता है कि इस हफ्ते कितने लोगों को नौकरी मिली है. कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं. 10 हफ्तों में अमरीका में 4 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं. इस हफ्ते के अंत में 21 लाख लोग बेरोज़गारों की संख्या में जुड़े हैं.

भारत में भी श्रम विभाग है. खुद से यह नहीं बताता है कि कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं. भारत का युवा को फर्क भी नहीं पड़ता है कि बेरोज़गारी का डेटा क्यों नहीं आता है ?

सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकानमी (CMIE) के ताज़ा सर्वे के अनुसार अप्रैल के महीने में 12 करोड़ 20 लाख लोग बेरोज़गार हुए हैं. उनकी नौकरी गई है. उनका काम छिन गया है. तालाबंदी में ढील मिलने से 2 करोड़ लोगों को काम वापस मिला है, तब भी 24 मई तक 10 करोड़ 20 लाख लोग रोज़गार ही हैं.

जिस मुल्क में 12 करोड़ से अधिक लोग बेरोज़गार हुए हों वहां मीडिया क्या करता है, यह सवाल भी नहीं रहा. इन घरों में कितनी मायूसी होगी ! घर परिवार पर कितना बुरा मानसिक दबाव पड़ रहा होगा ! समस्या यह है कि लंबे समय तक दूसरे क्षेत्रों में भी काम मिलने की संभावना कम है. ऐसा नहीं है कि यहां नौकरी गई तो वहां मिल जाएगी.

मीडिया में भी बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं. जो अखबार साधन संपन्न हैं, जिनसे पास अकूत संपत्ति हैं, वे सबसे पहले नौकरियां कम करने लगें. सैंकड़ों की संख्या में पत्रकार निकाल दिए गए हैं. न जाने कितनों की सैलरी कम कर दी गई. इतनी कि वे सैलरी के हिसाब से पांच से दस साल पीछे चले गए हैं. प्रिंट के अपने काबिल साथियों की नौकरी जाने की खबरें उदास कर रही हैं.

कंपनियां निकालती हैं तो नहीं देखती हैं कि कौन सरकार की सेवा करता था, कौन पत्रकारिता करता था. सबकी नौकरी जाती है. इनमें से बहुत से लोग अब वापस काम पर नहीं रखे जा सकेंगे. पता नहीं उनकी ज़िंदगी कहां लेकर जाएगी. युवा पत्रकारों को लेकर भी चिन्ता हो रही है. पत्रकारिता की महंगी पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं मिलेगी. इंटर्नशिप के नाम पर मुफ्त में खटाए जाएंगे.

यह वक्त मज़ाक का नहीं है. मौज नेताओं की रहेगी. वे मुद्दों का चारा फेकेंगे और जनता गुस्से में कभी इधर तो कभी उधर होती रहेगी. क्रोध और बेचैनी में कभी स्वस्थ्य जनमत का निर्माण नहीं होता है. इस वक्त भी देख लीजिए स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कहां बहस हो रही है ? सरकारों पर कहां दबाव बन रहा है ?

प्राइवेट अस्पताल तो किसी काम नहीं आ रहे. जब उम्मीद सरकारी अस्पतालों से है, वहीं के डाक्टर इससे लड़ रहे हैं तो क्यों न उनकी सैलरी बढ़ाई जाए ? उनके काम करने की स्थिति बेहतर हो ? बहुत सारे नर्सिंग स्टाफ पढ़ाई के बाद नौकरी का इंतज़ार कर रहे हैं. फार्मेसी के छात्र बेरोज़गार घूम रहे हैं. इन सबके लिए रोज़गार का सृजन करना होगा.

 

मीम क्लास को तोहफ़ा :

तेलंगाना में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 60 प्रतिशत तक की कटौती करेगी. यह तीसरा महीना है जब तेलंगाना सरकार अपने कर्मचारियों का वेतन काटेगी. अखिल भारतीय सेवाओं यानि IAS, IPS की सैलरी में 60 प्रतिशत की कटौती की गई है. राज्य सरकार के कर्मचारियों की सैलरी में 50 प्रतिशत की कटौती की गई है. पेंशनधारियों की पेंशन में 25 प्रतिशत की और निर्वाचित प्रतिनिधियों की सैलरी में 75 प्रतिशत.

कोविड-19 और बिना किसी तैयारी के तालाबंदी के फ़ैसले ने एक राज्य को यहांं तक पहुंंचा दिया. दूसरे राज्यों में स्थिति कोई बेहतर नहीं है लेकिन ग़नीमत है कि वहांं इस तरह से सैलरी काटने की नौबत नहीं आई है. सरकारी नौकरी वाले भी मिडिल क्लास बनाते हैं.

लोकतंत्र को चुप्पीतंत्र में बदलने में इस तबके का भी सहयोग और समर्थन रहा है. आज प्राइवेट नौकरियों में काम करने की स्थिति पहले से ख़राब ही हुई है. अनगिनत लोगों की नौकरी गई और सैलरी में कटौती की गई है. वैसे जश्न मनाना शुरू कर दें. जिस रेल मंत्री की रेल नब्बे घंटे में यात्रा पूरी कर रही है, उस रेल मंत्री ने वाणिज्य मंत्री के तौर पर कहा है कि बुरा ख़त्म हो गया है. चीज़ें बदल रही हैं. हवा में बदलाव है. देख लीजिएगा कहीं ये बदलाव उनकी ट्रेन की तरह नब्बे साल बाद न आए !

वक्त बड़ा जानलेवा है. इस वक्त में लोगों को अवसाद से एक ही चीज़ बचा सकती है बल्कि बचा रही है, वो है ‘मीम’. अफ़ीम का डिजिटल रूप. व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी का मीम लोगों को उम्मीद और विश्वास का टॉनिक दे रहा है. तरक़्क़ी के फ़र्ज़ी दावों और सांप्रदायिक चासनी में लपेट कर पेश किए गए मीम ने वाक़ई देश सेवा की है. लोगों का बड़ा तबका मदमस्त है. व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के सभी सिलेबस इस वक्त कामयाब साबित हो रहे हैं. इनके ज़रिए मिडिल क्लास की नागरिक चेतना शून्य हो चुकी है. एनिस्थिसिया का असर पैदा कर रहा है. शरीर में कई जगह पर ऑपरेशन हो चुका है, मगर मिडिल क्लास मीठे दर्द की कराह में मीम देखकर ख़ुश हो जाता है.

राजनीतिक चेतना में आर्थिक संकट की भूमिका शून्य होती है, नोटबंदी के बाद तालाबंदी के दौर में मिडिल क्लास ने साबित किया है. तीन महीने की उसकी चुप्पी बता रही है कि उसकी निष्ठा कहांं है. किसके प्रति है. वह चुपके से काम वाली बाई की सैलरी काट लेता है, फिर अपनी सैलरी कटने पर ख़ुश हो जाता है. जो उसके साथ हुआ वो दूसरों के साथ भी कर सकता है. इस वक्त वो गरीब मज़दूरों से नफ़रत कर आश्वस्त है कि जो भी संकट है, वो मज़दूरों के कारण है. बाक़ी ठीक है.

यह वो क्लास है जिसने अपने बच्चों का भी साथ नहीं दिया. जिनके पढ़ने की जगह यूनिवर्सिटियांं कबाड़ में बदल दी गईं. जिनके सरकारी भर्तियों में शामिल होकर जीवन बनाने की हर संभावना समाप्त हो गई. इसके बाद भी मिडिल क्लास चुप रहा. जब वह अपने बच्चों का नहीं हुआ तो मज़दूरों और किसानों का कैसे हो जाएगा ? उनके बच्चे भी उसी राजनीति के प्रति निष्ठावान है जहां मामूली प्रश्न करना नौकरी और जान गंवाने की शर्त बन जाती है.

नौजवान छात्र मुक़दमे में फंसाए जा रहे हैं. मिडिल क्लास चुप है, जबकि वे उन्हीं के घरों के बच्चे हैं. सरकारी भर्ती के सताए नौजवान भी अपने हिस्से के नौजवानों के साथ हो रहे इस अन्याय के प्रति चुप हैं. इसलिए नौकरी खोज रहे करोड़ों युवाओं से कहता हूंं, वे जो मैसेज हज़ारों की संख्या में मुझे भेजते हैं, हर दिन अपने माता पिता और रिश्तेदारों को भेजा करें. अपने दोस्तों को भेजा करें.

प्रेस के ख़त्म कर दिए जाने की आम सहमति मिडिल क्लास ने बनाई. पत्रकारों को गाली देने के वातावरण के निर्माण में मिडिल क्लास खूब सक्रिय रहा. अब उसके सामने जो प्रेस है वह सिर्फ़ प्रेस की लाश है. सरकार से किए गए प्रश्नों से वह किनारा कर लेता है. धूल की तरह झाड़ देता है.

मिडिल क्लास के लिए विपक्ष पाप है. सत्ता पुण्य है इसलिए प्रश्नों की गूंज सुनाई देनी बंद हो गई है. मिडिल क्लास इस सच्चाई को जानता है. वह चुप है इसलिए नहीं कि कुछ सोच रहा है. वह चुप है इसलिए कि वह सोचने के लायक़ ही नहीं रहा. वह अपने अधर्म को धर्म समझने लगा है. धर्म के मूल उद्देश्यों से भागने लगा है.

मिडिल क्लास के लिए मीम उपलब्ध रहना चाहिए. मीम की कभी कमी न हो. मीम में जो भी लिखा आएगा मिडिल क्लास मान जाएगा. इसे सिर्फ़ मीम चाहिए. न अस्पताल, न कालेज, न नौकरी, न सैलरी, न निष्पक्ष न्यायपालिका, न पुलिस.

मैं सरकार से मांंग करता हूंं कि मिडिल क्लास को कुछ नहीं तो कम से कम गुडमार्निंग मैसेज भेज दिया करे. आगे वह जानता है कि दिन भर में किस-किस को फार्वर्ड करना है. मैं मिडिल क्लास को मीम क्लास की उपाधि देता हूं.

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