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गोलवलकर के हिन्दुत्व की घातक राह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2020
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गोलवलकर के हिन्दुत्व की घातक राह

गोलवलकर ऐसे पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने हिंदू राष्ट्र या हिंदुत्व की पैरवी की हो लेकिन उनके विचारों में कई ऐसी बातें ज़रूर थी जिनसे हिंदुत्व की एक नयी परिभाषा गढ़ी गयी. यही कारण है कि रामचंद्र गुहा ने भी गोलवलकर को आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक माना है. उन्होंने अपनी मशहूर किताब ‘मेकर्स ऑफ़ माडर्न इंडिया’ में जिन 19 लोगों का ज़िक्र किया है, उनमें से एक गोलवलकर भी हैं. आज वैसा भारत बनता दिखने भी लगा है जिसका सपना गोलवलकर ने देखा था.

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‘मेकर्स ऑफ़ माडर्न इंडिया’ में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि आज़ादी के बाद जब देश अपना वर्तमान स्वरूप ले रहा था, शरणार्थियों को बसाया जा रहा था, अलग-अलग रियासतों का विलय हो रहा था और जब देश का संविधान बन रहा था तो नेहरू और पटेल कंधे-से-कंधा मिलाकर इस कार्य में लगे हुए थे. लेकिन 1950 के अंत में ही जब सरदार पटेल का निधन हो गया तो नेहरू की बराबरी का कोई भी नेता न तो सरकार में रह गया था और न ही कांग्रेस पार्टी में. नेहरू का क़द बाक़ी नेताओं से इतना बड़ा था कि कोई भी उनके फ़ैसलों या विचारों को चुनौती देने की स्थिति में नहीं था. ऐसे में सरकार से बाहर ज़रूर नेहरू के कई आलोचक थे और इन्हीं में से एक थे माधव सदाशिव गोलवलकर.

फ़रवरी, 1906 में जन्में गोलवलकर ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से विज्ञान में पोस्ट ग्रैजूएशन किया था और फिर नागपुर से वकालत की पढ़ाई पूरी की थी. विज्ञान की पढ़ाई के साथ ही गोलवलकर को हिंदू ग्रंथों का भी अच्छा ज्ञान था और कई भाषाओं पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी जैसे कि संस्कृत, बंगाली, मराठी, हिंदी और इंग्लिश. 1931 में गोलवलकर की मुलाक़ात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक केबी हेडगेवार से हुई (ये वही साल था जब भगत सिंह और उनके साथियों को फ़ांसी की सज़ा हुई थी). आरएसएस एक उग्र हिंदुवादी संगठन था जिसमें एक ऐसे ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए समर्पित युवाओं को शामिल किया जाता था, जो राष्ट्र हिंदुओं के द्वारा, हिंदुओं के लिए चलाया जाये.

गोलवलकर की ऊर्जा और बुद्धिमत्ता से हेडगेवार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने आरएसएस की कमान गोलवलकर को सौंप दी. 1940 में जब हेडगेवार की मृत्यु हुई तो गोलवलकर ही आरएसएस के सरसंघचालक बने. स्वामी विवेकानंद के मातृभूमि को पूजने के विचारों से गोलवलकर काफ़ी प्रभावित थे. उन्हें बाल गंगाधर तिलक के यह विचार भी काफ़ी भाते थे कि राष्ट्रीय एकता के लिए सांस्कृतिक एकता ज़रूरी है. लेकिन गोलवलकर इस मायने में बाक़ियों से अलग हो जाते थे कि वे अपने देश और हिंदू संस्कृति के मोहब्बत की बात करने के साथ ही पश्चिम से नफ़रत की बात भी उतनी ही मज़बूती से करते थे.

‘अनेकता में एकता’ जैसे सिद्धांतों पर गोलवलकर का विश्वास नहीं था. उनका ज़ोर हमेशा उन कथित दुश्मनों को चिह्नित करने पर होता जिन्हें वो ‘भीतरी दुश्मन’ कहते थे. हिंदू राष्ट्र के निर्माण में गोलवलकर को मुख्यतः तीन ख़तरे नज़र आते थे: मुस्लिम, ईसाई और वामपंथी. गोलवलकर इन तीनों को ‘राक्षस’ कहते थे और उनका मानना था कि हिंदू इन तीनों का ही नाश करके मातृभूमि की सेवा करेंगे.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर को गिरफ़्तार कर लिया गया था और आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि नाथूराम गोडसे एक समय में आरएसएस से जुड़ा रहा था और गांधी की हत्या से पहले ख़ुद गोलवलकर ने उनके और कांग्रेस के ख़िलाफ़ कई भड़काऊ भाषण दिये थे. जुलाई 1949 में गोलवलकर की रिहाई के साथ ही आरएसएस का प्रतिबंध इस शर्त के साथ हटा लिया गया कि यह संगठन कभी हिंसा का सहारा नहीं लेगा और उस संविधान के गणतांत्रिक सिद्धांतों का अनुपालन करेगा जो संविधान में तब लिखा जा रहा था.

1952 में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हिंदुओं को वरीयता देने वाले जन संघ की शुरुआत की तो आरएसएस ने इसके साथ काम करना शुरू कर दिया और स्वयंसेवक जन संघ को मज़बूत करने में जुट गये. जबकि आरएसएस विशुद्ध रूप से सिर्फ़ एक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता था. जन संघ ने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का रूप ले लिया और आरएसएस से उसका जुड़ाव आज भी वैसा ही बना हुआ है.

आज़ादी के तुरंत बाद जब जगह-जगह सांप्रदायिक दंगे भड़के, ध्रुवीकरण बढ़ा और कश्मीर में पाकिस्तान ने हमला कर दिया तो इस दौरान आरएसएस ने तेज़ी से अपनी पकड़ मज़बूत की. गोलवलकर के नेतृत्व में आरएसएस ने ‘भीतरी दुश्मनों’ को चिह्नित करने की बातें शुरू की और ध्रुवीकरण के उस दौर में इन बातों को लोगों ने हाथों-हाथ स्वीकार भी किया.

गोलवलकर के आने से आरएसएस उसी दिशा में बढ़ा जिस दिशा में कभी हिटलर के नेतृत्व में नाज़ी बढ़ रहे थे. नाज़ियों की तर्ज़ पे ही आरएसएस मातृभूमि से प्रेम और ‘सांस्कृतिक तौर पर अशुद्ध’ (जर्मनी में यहूदी और भारत में मुस्लिम) लोगों से नफ़रत की बातें करता था. गोलवलकर ये लगातार दोहराते थे कि ‘सिर्फ़ हिंदू ही इस राष्ट्र से सच्चा प्रेम कर सकते हैं और इसके दुश्मनों को पहचाना जाना बेहद ज़रूरी है.’ उनके इन दुश्मनों में मुसलमान सबसे पहले आते थे.

गोलवलकर के विचारों को ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ नाम की एक किताब में प्रकाशित किया गया है. इसी किताब में एक लेख है जिसका शीर्षक है ‘हिंदू राष्ट्र और इसके दुश्मन.’ इस लेख में गोलवलकर कहते हैं, ‘जब हम कहते हैं कि ये एक हिंदू राष्ट्र है तो कई लोग तुरंत ये सवाल करने लगते हैं कि ‘इस देश में रह रहे मुसलमानों और ईसाई का क्या ? क्या वे इसी देश में पैदा नहीं हुए, क्या वे यहीं पले-बढ़े नहीं हैं ? क्या सिर्फ़ अपना मजहब बदल देने के कारण वे विदेशी या बाहरी हो गये ?’

‘लेकिन सबसे अहम मुद्दा तो ये है कि क्या उन लोगों (मुसलमान और ईसाई) को याद भी है कि वे इसी मिट्टी की संतानें हैं. सिर्फ़ हमारे याद रखने से क्या होता है ? इस मिट्टी से जुड़ाव का भाव उनमें होना चाहिए, इसकी क़द्र उन्हें होनी चाहिए. हमारे सामने तो आज ये सवाल है कि उन लोगों का आज रवैया कैसा है जो इस्लाम या ईसाई धर्म अपना चुके हैं ? इसमें कोई संदेह नहीं कि वे लोग यहीं पैदा हुए. लेकिन क्या आज वो इस देश की मिट्टी के लिए वफ़ादार हैं ? क्या वो इस धरती के शुक्रगुज़ार हैं जिसने उन्हें पाला-पोसा ? क्या वो महसूस करते हैं कि इस धरती की सेवा करना उनका कर्तव्य है ? नहीं. धर्म और आस्था बदलने के साथ ही उनका इस धरती के प्रति प्यार और समर्पण भी ख़त्म हो चुका है.’

इसी लेख में गोलवलकर आगे कहते हैं, ‘इतना ही नहीं. ये लोग दुश्मनों की सरज़मीं से ख़ुद को जोड़ कर देखते हैं, विदेशी भूमि को अपना पवित्र और पूजनीय स्थल मानते हैं. ख़ुद को शेख़ और सैयद कहते हैं. शेख़ और सैयद तो अरबों के वंशज हैं. ये लोग ख़ुद को अरबों का वंशज इसीलिए मानते हैं क्योंकि इस धरती से जुड़े होने का भाव इनमें नहीं है. ये ख़ुद को आक्रांताओं से जोड़कर देखते हैं और आज भी ये लोग मानते हैं कि इनका उद्देश्य इस धरती पर क़ब्ज़ा करके अपना साम्राज्य स्थापित करना है.’

‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ में ही एक अन्य लेख है जिसमें गोलवलकर मुसलमानों को असल ख़तरा बताते हुए कहते हैं, ‘आज भी कई लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि मुसलमानों से इस देश को कोई ख़तरा नहीं है. क्योंकि जो दंगाई मुसलमान पाकिस्तान की मांग करते थे वो हमेशा के लिए वहां जा चुके हैं और बाक़ी के मुसलमान इस धरती के प्रति समर्पित हैं. लेकिन मैं पूछता हूं कि जो मुसलमान यहीं रह गये वो आज़ादी के बाद बदल गये क्या ? क्या उनकी हत्यारी प्रवृत्ति जिसके चलते 1946-47 में कई दंगे, लूट, हत्याएं, बलात्कार हुए वह अब थम गयी है ? ये मानना आत्मघाती होगा कि पाकिस्तान बनने के साथ ही यहां बचे मुसलमान रातों-रात देशभक्त बन गये हैं. जबकि हक़ीक़त ये है पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही मुसलमानों से ख़तरा सौ गुना बढ़ गया है.’

इस लेख में गोलवलकर आगे कहते हैं कि मुसलमानों की आक्रामक रणनीति हमेशा द्विस्तरीय रही है. एक सीधे हमले की जिसे जिन्ना ने ‘डाइरेक्ट ऐक्शन’ कहा था और जिसके चलते उन्हें एक ही झटके में पाकिस्तान मिल गया. हमारी ही मातृभूमि से एक मुस्लिम राष्ट्र अलग काट लिया गया. इनकी दूसरी रणनीति अपनी जनसंख्या बढ़ाने की है. कश्मीर के बाद इनका निशाना असम, त्रिपुरा और बंगाल है. पूरे देश में जहां भी इनकी मस्जिद या मोहल्ले हैं, ये उसे अपनी अलग रियासत मानते हैं.’

गोलवलकर के पहले भी हिंदू दक्षिणपंथी विचारों की पैरवी करने वाले सावरकर और मदन मोहन मालवीय जैसे नेता रहे थे. लेकिन गोलवलकर के विचार इनसे कहीं ज़्यादा उग्र थे और उनका प्रभाव भी ज़बरदस्त रहा. जिन तीन दशकों में गोलवलकर ने आरएसएस की कमान थामें रखी उस दौरान इस संगठन ने भारतीय समाज में अपनी जड़ें सबसे ज़्यादा मज़बूत की. ताउम्र ब्रह्मचारी रहने वाले और हिंदू धर्मगुरु की छवि स्थापित कर गोलवलकर ने हिंदू धर्म की बात करने के साथ ही अन्य धर्मों को देश का दुश्मन बताया.

गोलवलकर की मृत्यु 1973 में हुई, लेकिन हिंदू धर्म की व्याख्या के जो बीज उन्होंने 1950 और 60 के दशक में आरएसएस के माध्यम से बोए, उसकी फ़सल आगे के दशकों में ख़ूब जमकर लहलहायी. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी देश के प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री बने जो उन्हें अपना गुरु मानते थे. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लंबे समय तक आरएसएस से जुड़े रहे हैं और वैचारिक तौर उन्हें आडवाणी या वाजपेयी की तुलना में गोलवलकर के ज़्यादा क़रीब माना जाता है. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद हिंदुत्व का विमर्श भी बेहद तेज़ी से बढ़ा है और इसका विरोध करने वालों को ‘पाकिस्तान चले जाओ’ की नसीहतें देने का चलन भी. इसके साथ ही योगी आदित्यनाथ और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसे नेताओं का भारतीय राजनीति में मज़बूत हस्तक्षेप, अल्पसंख्यकों पर हमले, धर्म का राजनीति में ज़बरदस्त प्रभाव और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिस तेज़ी से बीते पांच सालों में बढ़ा है, वह यही इशारा देता है कि गोलवलकर ने जिस भारत का सपना देखा था, वह अब आकार लेने लगा है.

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि भारतीय राजनीति अब जिस दिशा में बढ़ रही है, उसे रोकने-टोकने वाला आज कोई नहीं है. विपक्ष पूरी तरह से ग़ायब है और विकल्पहीनता की स्थिति भारतीय जनमानस के दिल-दिमाग़ में घर कर चुकी है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शोर इतना तेज़ है कि उसने विरोध की सभी आवाज़ों को दबा दिया है. अब सिर्फ़ एक हिंदू-हृदय सम्राट है और बाक़ी सारा देश या तो उस सम्राट के पीछे खड़ा है या गैर-ज़रूरी क़रार दे दिया गया है.

संवैधानिक मूल्यों को ‘बहुमत के फ़ैसले’ के आगे गौण कर दिया गया है और गांधी के हत्यारों की पूजा करने वालों को बहुमत से क्लीन चिट मिल रही है. ये बहुमत गोलवलकर के विचारों पर मुहर भी लगा रहा है और देश को उसी राह पर बढ़ने की हिम्मत भी दे रहा है. हालांकि दुनिया भर में इस राह की सफलता का एक भी उदाहरण नहीं है, जबकि इसके उलट ऐसे कई उदाहरण हैं जहां लोग इस घातक राह के परिणाम आज भी भोग रहे हैं.

  • राहुल कोटियाल

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