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लॉकडाउन के शिकार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 22, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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लॉकडाउन के शिकार

राम चन्द्र शुक्ल

उपर्युक्त चित्र दिनांक- 21-07-2020 को लखनऊ के वर्तमान समय में सत्ता की करामात के कारण, पिछले लगभग चार महीने से जनहीन हुए चारबाग रेलवे स्टेशन के सामने का है. कभी ऐसे ही दृश्य को देख आक्रोशित होकर कविवर रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था :

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लपक चाटते
जूठे पत्ते
जिस दिन देखा
मैंने नर को,
उस दिन सोचा
क्यों न लगा दूं
आग आज इस
दुनिया भर को.

पर आज का समय तो आग लगाने का नहीं है. आग तो मेहनतकशों, किसानों, गरीबों, भूखों, नंगों, शोषितों व पीड़तों के पेटों व दिलो दिमाग में पहले से ही लगी हुई है.

महाकवि निराला की ‘भिक्षुक’ शीर्षक कविता ऐसे ही भाव बोध के वशीभूत होकर लिखी गयी है :

वह आता,
दो टूक कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता,
मुट्ठी भर दाने को
भूख मिटाने को
मुंह फटी पुरानी
झोली का फैलाता.

महाकवि निराला की दूसरी कविता भी कुछ इसी भावभूमि की है, पर उसमें करुणा के साथ आक्रोश व प्रतिकार का भाव भी समाहित है :

वह तोड़ती पत्थर,
देखा उसे मैंने
इलाहाबाद के पथ पर.
सामने तरुमालिका अट्टालिका,
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार बार प्रहार.
वह तोड़ती पत्थर.

इस कविता में महाकवि साफ साफ यह कह रहे हैं कि जो हाथ पत्थर तोड़ने में सक्षम हैं, वे हाथ अवसर आने पर सामने मौजूद अट्टालिका को भी तोड़कर धराशायी कर सकते हैं. कवि दिनकर की कविता जहांं समाज में मौजूद सामाजिक व आर्थिक असमानता के प्रति मन में सात्विक क्रोध जगाती है तथा इस स्थिति को बदलने की व प्रतिकार की भावना मन में पैदा करती है वहीं महाकवि निराला की कविता मन में करुणा के भाव जगाती है. करुण भाव क्रोध से ज्यादा प्रभावपूर्ण व शक्तिशाली भाव है.

वर्तमान समय में कोरोना के नाम पर लोगों को इस कदर भयभीत बना दिया गया है कि सबके मन में अपनी ही जान की चिंता व्यापी हुई है, पर समाज की सच्चाई यही है के सबके कल्याण में ही हमारा व आपका भी कल्याण है. अकेला चना भाड़ फोडने की बात कौन कहे, वह तो खुद ही फूट कर दो भागों में बंट जाता है.

जनता की एकता उसकी संगठित शक्ति को तोड़ने तथा अन्याय पर आधारित काले कानूनों के विरुद्ध देश भर जनता द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों को खत्म/नष्ट करने ही लिए दुनिया भर में तथा विशेष रूप से भारत में कोरोना को प्रायोजित किया गया है और पिछले लगभग चार महीनों से जनता अपने दडबों में कैद होकर रह गयी है.

भय का प्रतिकार सामूहिकता से ही किया जा सकता है, पर पिछले तीन-चार महीनों से यह देख रहा हूंं कि बहुत सारे मित्र ज्ञान दे रहे हैं कि ज्यादातर घर में रहिए, मास्क लगाए रहिये भले ही फेफडों को ऑक्सीजन की पूरी सप्लाई न पहुंंचे तथा दिन भर साबुन से हाथ धो-धो कर सेनेटाइजर पोतते रहिये तथा शराब कंपनियों की तिजोरी भरते रहिए.

आखिर यह सब कब तक ? कभी तो सच जनता के सामने आ ही जाएगा. पर जनता को जागरूक करने वाले जन कहां छिपे हुए हैं ? कहांं हैं वे कवि व लेखक जो इस षडयंत्र का जनता के बीच पर्दाफाश करें ? कहांं हैं वे नाटककार व फिल्मकार जो अपनी कला के माध्यम से जनता को सच्चाई से वाकिफ करा सकें ? ये सवाल आपका पीछा छोड़ने वाले नही हैं. ये आपकी चेतना पर तब तक निरंतर दस्तक देते रहेंगे, जब तक कि आप उठ खड़े नही होते.

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