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मूर्खता की पहचान है झूठी आस्था के नाम पर एक ऐतिहासिक निर्माण को मिटा देना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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मूर्खता की पहचान है झूठी आस्था के नाम पर एक ऐतिहासिक निर्माण को मिटा देना

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

जिस तरह से मोदी के नेतृत्व में इन हिंदुत्ववादी लोगों ने कल एक जैन मंदिर के अवशेषों पर बनी मस्जिद पर कब्ज़ा कर राम मंदिर बनाने का शिलान्यास किया है, वैसे ही पहले भी ऐसे हजारो स्थानों पर कब्ज़ा कर चुके हैं, जिनमे सबसे ज्यादा जैन मंदिर ही शामिल है. चाहे फिर वो साउथ का तिरुमला के पहाड़ का मंदिर हो या उत्तराखंड का बद्रीनाथ, चाहे वो गुजरात का गिरनार हो या महाराष्ट्र का महालक्ष्मी मंदिर.

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ऐसे सैकड़ों-हज़ारों जैन मंदिरों पर कब्ज़ा कर ये हिन्दुत्वववादी हमेशा अपने वैदिक मंदिरों के रूप में परिवर्तित करते रहे हैं जबकि मंदिर के शिलान्यास पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेते हुए शिलान्यास और मंदिर निर्माण के संबंध में स्टे जारी करना चाहिये था, क्योंकि खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि – मस्जिद के नीचे जो अवशेष मिले है वो नॉन इस्लामिक है, अर्थात सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष रूप से ये भी माना कि ये जगह हिन्दू धर्म की तो कत्तई नहीं थी. क्योंकि ऐसा होता तो अपने फैसले में नॉन- इस्लामिक की जगह राम मंदिर या हिन्दू धर्म का स्थान लिखती लेकिन नॉन इस्लामिक का अर्थ ये है कि मस्जिद किसी अन्य धर्म के अवशेषों पर जरूर खड़ी की गयी थी, मगर वो हिन्दू धर्म नहीं था.

हालांंकि अभी भी मंदिर निर्माण के लिये खुदाई का कार्य चालू है और उसमें प्राचीन अवशेष भी मिल रहे हैं, जिनका निरपेक्ष आंकलन होना चाहिये ताकि सत्य क्या है, वो सबके सामने आये. अगर मस्जिद हिन्दू धर्म के अवशेषों पर नहीं बनी थी तो फिर किस धर्म के अवशेषों पर बनी थी ? इस प्रश्न का स्पष्टीकरण भी सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले में लिखना चाहिये था, लेकिन नहीं लिखा क्योंकि एक तो गोगोई साहब रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनने का ख्याब पाले हुए थे और दूसरा उन्हें ब्लैकमेल करके उनका बुढ़ापा ख़राब करने के लिये यौन शोषण का केस भी हाई-लाइट करवा दिया गया था … और इसीलिये झूठी गवाहियों के आधार पर फैसला भी करवा लिया गया. मगर तब भी अपने दायित्व का निर्वाह तो गोगोई साहब ने अपने लिखित फैसले में ‘नॉन-इस्लामिक’ शब्द लिखकर कर ही दिया ताकि जब भी ये मामला दुबारा कभी खुले इस शब्द की सही समीक्षा हो और हिन्दुत्ववादियों को मुंह की खानी पड़े.

सोच रहा हूंं कि अदालत ने तो सिर्फ जमीन विवाद का फैसला सुनाया था और मुस्लिमों को राजी करने के लिये 5 एकड़ जमीन दिलवा दी, मगर जिस तरह ये हिंदुत्ववादी सरेआम हज़ारों कत्लों (बाबरी कांड के समय) को जिस तरह से सेलिब्रेट कर रहे थे, उससे तो लगता है एक दिन महात्मा गांंधी की जगह उनके हत्यारे गोडसे को भी ऐसे ही सेलिब्रेट करेंगे … !

इस फैसले से सिर्फ एक पॉइंट तय हुआ था और वो था मुस्लिम या मस्जिद संबंधी पॉइंट … लेकिन इसके बाकी के पॉइंट जो अभी तक स्पष्ट नहीं है उन्हें क्यों छोड़ दिया गया ? क्योंकि जैनी तो पहले से ही सोये हैं और जो नहीं सोये हैं वे हिंदुत्व के रंग में खोये हैं. बस मेरे जैसे कुछ लोग हैं जो जाग रहे हैं और इसलिये ये अलख भी जगाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो जगह राम मंदिर की नहीं बल्कि जैन मंदिर की थी.

सबसे पहले की खुदाई में अवशेष जैन मंदिर के ही बताये गये थे और उस समय अख़बार में भी खबर छपी थी. बाद में जब मंदिर मस्जिद का विवाद हिन्दुत्ववादियों ने उत्पन्न किया तब बौद्धों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने के लिये उस पर दावा ठोक दिया.

हिन्दुत्ववादियों ने तो सिर्फ मंदिरों और मूर्तियों पर कब्ज़ा किया था लेकिन इन बौद्धों ने तो न सिर्फ मूर्तियों और मंदिरों को बल्कि पूरा का पूरा जैन साहित्य ही हैक किया हुआ है (कभी समय मिले तो इनके पिटक पढ़कर देखिये और साथ में जैनागम साथ में रखिये, आपको सारा खेल समझ आ जायेगा).

उपरोक्त तीनों ही पॉइंट गौण करके अदालत ने नान- इस्लामिक कहते हुए सिर्फ मुस्लिमों को दूसरी जगह देने संबंधी फैसला सुना दिया, क्यों ? क्या बाकी के तीनों पॉइंट स्पष्ट नहीं होने चाहिये कि असल में ये अवशेष किस धर्म से संबंधित थे ?

ऐसे में इसमें फिर कभी ऐसा विवाद फंसा और फिर कभी इसका विवाद अदालत में पहुंचा जिसमें जैन और हिंदुत्ववादी आमने-सामने हो और अदालत पुरानी सभी फाइलें खोलकर इसकी निरपेक्ष जांंच करे और उसमें ये खुलासा हो कि वास्तव में ये जगह जैन धर्म के मंदिर की थी और जो अवशेष मिले वो जैन धर्म के थे तो क्या इन पॉइंट्स को छोड़कर फैसला देने वाले जजों और झूठी गवाही देने वाले उन इतिहासकारों और पुरातत्विद्यों को सजा दी जायेगी, जिन्होंने हिन्दुत्ववादियों के कहने से हिन्दू धर्म के झूठे अवशेष निकाले … ऐतिहासिक व्याख्या की और एक तरफ़ा फैसला सुनाया ?

जैन धर्म से बौद्ध धर्म और ब्राह्मणों (हिन्दुत्ववादियों) का द्वन्द बहुत पुराना है. उसमें भी ब्राह्मणों का द्वन्द लगभग 3000 साल पुराना है और तब से ही वे जैन धर्म और उसकी स्मृतियों को मिटाने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसे ही प्रयासों में वे जैन धर्म के मंदिरों और स्थानों पर कब्ज़ा करके उनकी मूर्तियों को ध्वस्त करना या रूप परिवर्तन कर देना भी शामिल है.

1992 में तत्कालीन महामहिम डॉ शंकर दयाल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से लिखित में पूछा था कि बाबरी मस्जिद विवाद का मूल बिंदु क्या है ? क्या उस जगह वास्तव में कभी राम मंदिर था ?

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देने से ये कहकर इंकार कर दिया था कि मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और प्रेजिडेंट ऑफ़ इंडिया ने जिस संदर्भ में ये प्रश्न किया है वो इस केस से ताल्लुक नहीं रखता. जिस केस में ये प्रश्न पूछा गया था वो इस्माइल फारूकी केस के नाम से जाना जाता है.

बाद में गोगोई महाशय ने भी नवंबर, 2019 के निर्णय लिखवाते समय फैसले में ‘नॉन इस्लामिक’ शब्द (बोल्ड अक्षरों में हाई लाइट करके) लिखवा दिया था, जिससे ये तो समझा ही जा सकता है कि कालांतर में जब किसी निरपेक्ष सरकार द्वारा ये मामला फिर से खोला जायेगा अथवा किसी याचिका की सुनवाई मंजूर होने पर फिर से अदालत सारे मामले की छानबीन करेगी तो फिर से इसकी समीक्षा होगी और राम मंदिर अदालती आदेश से गिराया जायेगा और बीजेपी फिर से विपक्ष में बैठकर राममंदिर के मुद्दे पर वोट बटोरेगी. शायद इसीलिये मोदीजी ने बिना मुहूर्त के शिलान्यास किया है क्योंकि पता है विवाद तो पड़ना ही है.

आश्चर्यचकित मत होइए. अंग्रेजों से लेकर अब तक इसके विषय में अनेक बार फाइनल फैसले हो चुके हैं और उन फ़ाइनल फैसलों के बावजूद अनेक बार फिर से ये मामला अदालत में कानूनी पेंचों में फंसा है और पुराना फैसला निरस्त हुआ है. जबकि अंग्रेजों के समय में तो ज्यूरी अदालत होती थी और किसी भी कानून में इतने खिड़की दरवाज़े भी नहीं होते थे. तब ये हाल था तो अब तो कानून बनाने से पहले ही उसे हवादार रखने के लिये बड़े-बड़े खिड़की दरवाज़े रखे जाते हैं तो आगे क्या होगा इसका अंदाज तो आप स्वतः ही लगा लीजिये.

किसी झूठी आस्था के नाम पर एक ऐतिहासिक निर्माण को मिटा देना मैं बिल्कुल उचित नहीं समझता, चाहे फिर वे अवशेष जैन मंदिर के ही क्यों न निकले क्योंकि जो हो चूका सो हो चूका लेकिन अब हम न तो तानाशाही राजकाल में हैं और न ही पुरातन सदी में. आज हम 21वीं सदी के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक पैरोकार देश है.

जो निर्माण 500 वर्ष प्राचीन मस्जिद के रूप में है, उससे हमें 500 वर्ष पहले की तत्कालीन परिस्थितियों, शिल्प कलाओं और ऐतिहासिक वृतियों से परिचित होते हैं. इस तरह करके हम उन सब चीज़ों को फिर नहीं पा सकते जो उस काल में उससे पूर्व के निर्माण को तोड़कर मस्जिद बनाते समय हमने खो दी थी और अब ऐसा करके हम 500 साल की एक धरोहर और खो देंगे.

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Tags: बाबरी मस्जिद
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