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Home कविताएं

विश्व हिंदी सम्मेलन

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 21, 2020
in कविताएं
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विश्व हिंदी सम्मेलन

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्तुंग आसमानों में

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एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाये त्यागियों में
एक कहता है
मैं चला गया
मुझे गिना जाये भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिंदी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिंदी के एक नये शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्ट हो रहा था
दूसरा ब्याज में और तीसरा लिहाज़ में

एक चिल्लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाये सम्मानित.

एक कहता था
मुझे दे दिया जाये सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करूंगा.
एक कहता था नहीं
सिर्फ़ मैं ही बजा सकता हूंं
यह असाध्य वीणा.

एक साम्राज्यवादी,
एक सम्प्रदायवादी के गले में
फूलमालाएं डाल रहा था
एक स्त्री किसी निर्दोष के रक्त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्ताक्षर.

यह एक अजीब शामिल बाजा था
जिसमें एक बाज़ारू गायक
अश्लील भजन गा रहा था.

एक सम्पादक
विदेश राज्य मंत्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था.
एक पत्रकार का
शास्त्री भवन की एक दराज़ में
स्थायी निवास था.

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा.
एक स्पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था.
एक किसी लुप्त प्रायः भाषा के पीछे
छिपता फिरता था.

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
में कराह रहा था.
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्याख्यान दे रहा था.

एक मृतक
ब्रिटिश एयरवेज के पंखों से लिपटा हुआ था
दूसरा मृतक
भविष्य में होने वाली
सभी गोष्ठियों की अध्यक्षता कर चुका था.
एक आत्मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनिधि मंडलों में घुसी हुई थी.

यह भूमंडलीकरण का अजब नज़ारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वैश्यालय में
हिंदी का लंगोट लटक रहा था.

और दूर पूरब में
और धुर रेगिस्तान के किसी गांव में
जन्म लेता हुआ बच्चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिंदी कहा जाता था.

कहां खो गया प्रतिरोध
क्या भविष्य में सिर्फ़
भिखारियों के काम आयेगी
यह महान भाषा.

इसी भाषा में एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था !

  • कृष्ण कल्पित

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