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राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस पर बेरोजगारों के नाम रविश का पत्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 18, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस पर बेरोजगारों के नाम रविश का पत्र

आज राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस था. ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों ने कवर किया है या नहीं, अब इस सवाल का मतलब नहीं है. यह सवाल होना चाहिए कि सरकार ने संज्ञान लिया या नहीं ? बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर यह आंदोलन हुआ लेकिन इसमें कांग्रेस और कांग्रेस समर्थित सरकारों से त्रस्त युवा भी ट्विट कर रहे थे. बंगाल और असम से भी लोग बोल रहे थे.

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कई लोगों को यह शिकायत रहती है कि उनकी परीक्षा का ज़िक्र क्यों नहीं हुआ ? वे बार-बार मैसेज करते हैं. सिर्फ़ ज़िक्र के लिए कातर हो जाते हैं जबकि जिनका होता है उन्हीं का कुछ नहीं होता. ज़िक्र आते ही बधाई देने लगते हैं. अजीब हाल है. क्या आप सिर्फ़ ज़िक्र के लिए तरस रहे हैं ? मैं सबका न ज़िक्र करूंंगा और न संभव है.

दो साल से एक ही बात कह रहा हूंं, फिर भी लोग अपनी परीक्षा को लेकर ही मैसेज करते रहते हैं. बड़ा सवाल है परीक्षा व्यवस्था ठीक हो. भर्ती निकले और रोज़गार की शर्तें बेहतर हो. मैं हमेशा उसे ही सामने रखकर कवर करता हूंं तो मुझे अलग से अपनी परीक्षा के लिए मैसेज न करें.आज एक बार और आप लोगों की सामूहिक हार हुई है। व्यक्तिगत स्वार्थ और मेरी परीक्षा सवाल छोड़ कर उन प्रश्नों पर विचार करें.

पहले आस-पास पता करें कि लोग क्या देख रहे थे, अगर ये पता चले कि आपके घर में, यार, दोस्त, रिश्तेदार बेरोज़गारी के सवाल को छोड़ कर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के नाम पर मीडिया का अश्लील कवरेज देख रहे थे तो ये कार्यक्रम भी न देखें. आप भी वही देखें. पर आप लोगों ने कोशिश तो अच्छी की. शांति और धीरज का प्रदर्शन किया. यह सबक़ जीवन भर काम आएगा.

मेरे प्यारे बेरोज़गार मित्रों,

छोटा पत्र लिख रहा हूंं. मैं आपके आंदोलन से प्रभावित नहीं हूंं. आप में जनता होने का बौद्धिक संघर्ष शुरू नहीं हुआ है. आपकी राजनीतिक समझ चार ख़ानों तक ही सीमित है इसलिए आप लोगों से कोई उम्मीद नहीं रखता. जो युवा मीडिया और मीम से भीड़ में बदले जा सकते हैं, वे आगे भी बदले जाएंंगे. आप मुझे सही साबित करेंगे. जनता बनने की लड़ाई सबसे मुश्किल लड़ाई होती है. आप जनता नहीं बन सके. अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और वो भी छोटी लड़ाई. आप असफलता के लिए अभिशप्त हैं.

लेकिन बार-बार नए-नए तरीक़े से संघर्ष करने की कोशिश से मैं साढ़े तीन प्रतिशत प्रभावित हुआ हूंं. मैं जातिवादी और सांप्रदायिक हो चुके नौजवानों से इतनी ही उम्मीद रखता हूंं. प्यारे मुल्क के लोकतांत्रिक वातावरण को बर्बाद करने में आप सभी का भी योगदान रहा है. मैं नेता नहीं हूंं, जो आपका वोट चाहता हूंं. मुझे सांप्रदायिक हो चुके नौजवानों का हीरो नहीं बनना है. जो युवा व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी की मीम के गुलाम हैं, मुझे उनसे उम्मीद नहीं है.

आप बेरोज़गारों ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन को अपनी बात कहने का मौक़ा चुना है. अच्छी बात है कि लगातार फेल होने के बाद भी आप नौजवान कोशिश कर रहे हैं लेकिन यह कोशिश यूपी या बिहार तक सीमित न रहे. बंगाल तक भी जाए और पंजाब तक भी. बिहार तक भी जाए और मध्य प्रदेश तक भी. रोज़गार के स्वरूप के व्यापक प्रश्नों को भी शामिल करें.

अपनी परीक्षा, अपना रिज़ल्ट की भावना आपके आंदोलन को कहीं नहीं पहुंंचने देगी. कालेजों की फ़ीस का भी हाल देख लें. कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता और उनकी नौकरी का हाल देख लें. ठेके पर पढ़ाने वाले शिक्षक आपका भविष्य नहीं बना सकते.

अपनी लड़ाई का दायरा बड़ा करें. लड़ाई से मेरा मतलब आरती से है. दिल्ली पुलिस ने दंगों की चार्जशीट में लिखा है कि चक्काजाम लोकतांत्रिक नहीं है. क्या पता लड़ाई लिखने पर कोई धारा लग जाए इसलिए आप आरती करें. अब वही करने को बचा है.

बेरोज़गार यह भी समझ लें कि उन्हें मीडिया में बाहर कर दिया है इसलिए बग़ैर मीडिया कवरेज के शांतिपूर्ण और शालीन संघर्ष की कामना करें. स्वाभिमान पैदा करें कि बिना मीडिया के भी वर्षों संघर्ष करेंगे. मोमबत्ती जलाने के बाद न्यूज़ चैनल न खोलें कि वहांं दिखाया जा रहा है या नहीं. न्यूज़ चैनलों ने जनता का ब्रेन वॉश कर दिया है. मानसिक रूप से बेरोज़गार कर दिया है. न्यूज़ चैनलों को बेरोज़गार कीजिए. देखना बंद करें. लोगों को समझाएंं.

आप मुख्यधारा के अख़बारों और चैनलों पर एक रुपया खर्च न करें. ख़ुद देखें कि आप क्यों पढ़ते हैं इन्हें ? इनमें ख़बर नहीं होती है. होती है तो असर नहीं होता है क्योंकि दिन रात प्रोपेगैंडा छाप कर जनता को चेतना शून्य कर दिया है इसलिए सिर्फ़ रोज़गार की लड़ाई न लड़ें. एक पाठक और दर्शक की भी लड़ाई लड़ें. कुछ वेबसाइट है जिन्हें सपोर्ट करें. पढ़ें. article14, scroll, the wire, the ken, Quint, Newslaundry, Alt News, The News Minute, Gorakhpur Times, Live Law, People’s Archive of Rural India (PARI), India Spend, media vigil, janchowk, इन सबको पढ़ें.

आपने ही प्रधानमंत्री को चुना है लेकिन मुझे बुरा लगा कि आपने उन्हें जन्मदिन की बधाई नहीं दी. छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता. अटल जी की पंक्ति है. उन्हें भी खुले मन से जन्मदिन की शुभकामनाएंं दीजिए. ट्विटर पर मैंने आपके सारे पोस्टर देखे, अगर एक पंक्ति शुभकामनाओं के लिख ही देंगे तो आपका आंदोलन छोटा नहीं होगा. उन पोस्टरों को देख कर लगा कि आपके आंदोलन में विचार की कमी है. बहुत बोरिंग है आपका आंदोलन. तभी लगा कि मुझे पत्र के ज़रिए आपसे संवाद करना चाहिए.

ख़ुद को बदलना ही पहला आंदोलन होता है, जो लिखा है उसे ध्यान से पढ़ें. आप सफल हों.

रवीश कुमार

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