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Home गेस्ट ब्लॉग

निजीकरण की तीव्रता और उसके विरोध का अन्तरविरोध

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 18, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

अभी पिछले साल ही तो हमने देखा था कि कभी हल्की, कभी तेज होती बूंदाबांदी में भी पटना एयरपोर्ट के कर्मी भींगते हुए प्रदर्शन कर रहे थे, नारे लगा रहे थे – ‘निजीकरण मुर्दाबाद, इंकलाब जिंदाबाद.’ कितने तो नारे लगाते भींगे कपड़ों में भींगती धरती पर ही लोट जा रहे थे. आते-जाते लोग उन्हें देख रहे थे और बिना किसी खास प्रतिक्रिया के अपने रास्ते आगे बढ़ जा रहे थे. ज़ाहिर है, ऐसे प्रदर्शन सिर्फ पटना में ही नहीं हो रहे थे. देश के अन्य कई एयरपोर्ट भी कर्मचारियों के आंदोलनों की ज़द में थे.

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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

पिछले साल ही हमने खबरों में देखा कि कई रेलवे स्टेशनों पर रेलवे कर्मचारियों के समूह ‘रेलवे का निजीकरण, नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे, निजीकरण मुर्दाबाद, इंकलाब जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारे लगा रहे थे. कितने कर्मचारी तो प्लेटफार्म से उतर कर रेलवे ट्रैक पर आ गए थे और चिल्ला रहे थे, ‘हम कट जाने के लिये तैयार हैं…’.

सार्वजनिक क्षेत्र के आयुध निर्माण, बैंकिंग, बीमा आदि संस्थानों के कर्मियों को भी हम बीते वर्षों में इसी तरह निजीकरण विरोधी आंदोलन करते देखते रहे हैं.

भले ही मीडिया इन खबरों को अधिक कवरेज नहीं देता हो, लेकिन लोगों की नजरों से ऐसे आंदोलन निरंतर गुजरते रहे. हालांकि, इन्हें जन चर्चा भी नहीं मिली. लगा ही नहीं कि आमलोगों का इन मामलों से कोई प्रत्यक्ष वास्ता भी है ? सरकार ने तो इन प्रदर्शनों और आंदोलनों को कोई भाव ही नहीं दिया. वो एक मुहावरा है न, ‘कानों पर जूं नहीं रेंगना.’

हमने देखा कि इस दौरान सरकार विनिवेशीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया को और अधिक तीव्रता देती गई. एक के बाद एक एयरपोर्ट बिकते गए, एक के बाद एक रेलवे स्टेशन बिकते गए, एक से एक महत्वपूर्ण और कमाऊ संस्थानों के विनिवेश की प्रक्रिया आगे बढ़ती गई. बातें कई बीमा संस्थानों के विनिवेशीकरण और बैंकों के निजीकरण की भी हो रही हैं.

सवाल उठता है कि ऐसे हालात में वे कर्मचारी संगठन क्या करें जिनके प्रतिरोधी नारों की आवाजें…’नक्कारखाने में तूती की आवाज’…बन कर रह जा रही हैं. आखिर, निजीकरण विरोधी आंदोलनों की धार इतनी भोथरी कैसे है कि सरकारें इन्हें कोई तवज्जो देने को तैयार नहीं, आमलोग इस पर चर्चा तक करने को तैयार नहीं, बहस की तो बात ही क्या ?

बौद्धिकों और एक्टिविस्ट्स का एक वर्ग अगर इन मुद्दों पर अपनी बातें रखता है, अंध निजीकरण के विरोध में अपना वैचारिक पक्ष रखता है, आंकड़े और उदाहरण प्रस्तुत कर इन प्रतिरोधी विचारों को तार्किकता का आधार भी देता है, तब भी उन्हें सुनने, पढ़ने वालों की अधिक संख्या नहीं. जब सुनेंगे ही नहीं, पढ़ेंगे ही नहीं, तो सोचने की ज़हमत उठाने की बात ही नहीं है.

यह एक अलग विमर्श का विषय है कि ये जो एक के बाद एक एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, ट्रेन सहित अन्य संस्थान बिकते जा रहे हैं ? उन्हें खरीद कौन रहा है ? उनकी बिक्री की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है ? उनकी शर्त्तें और उनके मूल्य कितने तार्किक हैं ?

इसी तरह, यह भी एक अलग विमर्श का विषय है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले वर्षों में जन जीवन में कितने बदलाव आएंगे, समाज के किस वर्ग पर इन व्यापक निजीकरणों के कितने और कैसे नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे ?

जाहिर है, ऐसे विमर्शों को मीडिया तो नेपथ्य में धकेलने की प्रायोजित कोशिशें कर ही रहा है, जन चर्चाओं में भी इन्हें कुछ खास जगह नहीं मिल रही. लगता ही नहीं कि किसी को इस सवाल में भी दिलचस्पी है कि आखिर क्यों और कैसे कुछ खास बड़े औद्योगिक घराने ही बड़े-बड़े सरकारी संस्थान खरीदते जा रहे हैं. यह तो बाजार के वाजिब नियमों का भी उल्लंघन है और सीधे-सीधे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का उदाहरण है.

तो, क्या हम मान लें कि हमारे देश में आर्थिक उदारवाद की नीति-राजनीति, जो पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में बहुस्वीकृत और बहुप्रशंसित रही थी, अब नई शताब्दी के दूसरे दशक के अंत तक आते-आते क्रोनी कैपिटलिज्म के शिकंजे में जकड़ी जा चुकी है ? क्या हम मान लें कि हमारा मीडिया, हमारी राजनीति और हमारे तंत्र पर कारपोरेट की अजगरी जकड़ इतनी सख्त और मज़बूत हो चुकी है कि कसमसाने के सिवा हम कुछ और नहीं कर सकते ?

‘…जब रात हो ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा…?’ जीवन की इस आपाधापी में, चेतना को हैक कर लेने वाले मुद्दों के शोर में किसे यह फुर्सत है कि आने वाले दिनों में हमारा जीवन कैसे बदलने वाला है ?

जैसे, आने वाली नई शिक्षा नीति हमारे शिक्षा तंत्र पर कारपोरेट की जकड़ को मजबूत करने वाली है, शिक्षकों की गरिमा और उनके अधिकारों पर प्रहार बढ़ने वाले हैं, विशाल निर्धन समुदाय को अवसरों की समानता से वंचित किये जाने की रफ्तार और तेज होने वाली है, और सरकारी शिक्षकों के देशव्यापी विशाल वर्ग में कोई खास मानसिक-वैचारिक उथल-पुथल नजर नहीं आ रही.

जबकि, संकेत बता रहे हैं कि जो सरकारी शिक्षक, खास कर उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षक, 2028-30 के बाद रिटायर करने वाले हैं उनके सामने सेवा शर्त्तों और आर्थिक अधिकारों के संदर्भ में चुनौतियां सामने आने ही आने को हैं, जिन्हें इन आशंकाओं पर संदेह है वे नई शिक्षा नीति के विस्तृत ड्राफ्ट के संबंधित अध्यायों का सचेत अवलोकन करने की ज़हमत उठा कर देख लें.

सवाल फिर वही उठता है कि रेलवे, बैंक, एयरपोर्ट सहित अन्य सरकारी उपक्रमों के कर्मियों की तरह ये शिक्षक समुदाय भी अगर आंदोलन करें तो उनका हश्र क्या होगा ? उच्च शिक्षा से जुड़े बहुत सारे लोगों ने इन शिक्षा नीतियों के संदर्भ में अपना विरोध दर्ज भी कराया है, विभिन्न तर्कों को सामने रखते हुए वे निरन्तर विरोध कर भी रहे हैं, लेकिन सरकार के संदर्भ में फिर वही मुहावरा प्रासंगिक बन कर सामने आ रहा है, जिसके कानों पर प्रतिरोध के इन स्वरों से जूंं भी नहीं रेंग रही. फिर क्या हो…?

क्या सरकारी संस्थानों की बिक्री इसी तरह जारी रहेगी और एक दिन हमारे हाथ कुछ नहीं रह जाएगा ? क्या भारत के राष्ट्रपति के अधीन काम करने वाले अधिसंख्य कर्मचारी एक-एक कर छंगामल और मोटू सेठ के अधीन काम करने वाले प्राइवेट कर्मियों में बदलते जाएंगे ? क्या विशाल वंचित समुदाय के साधनहीन बच्चों का भविष्य आगे बढ़ने के अवसरों के संदर्भ में इसी तरह अंधकार में समाता जाएगा ?

इन सवालों के जवाब कैसे मिलेंगे ? दरअसल, हमारे आर्थिक और सामाजिक हित हमारे राजनीतिक संदर्भों से कट गए हैं. बीते दशकों में बदलती हमारी राजनीतिक संस्कृति ने हमें विकल्पहीनता के ऐसे अंधेरे रास्ते पर भटका दिया है, जहां से रोशनी की कोई किरण नजर नहीं आ रही.

आप अपने आर्थिक, सामाजिक हितों और राजनीतिक रुझानों को अलग-अलग खांचों में रख कर नहीं देख सकते. अगर ऐसा होता है तो फिर वही हश्र होगा जो हमारा हो रहा है.

हमारी राजनीति ने हमें विकल्पहीनता के अंधे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है. आखिर हम किसे वोट करें जो सत्ता में आकर अंध निजीकरण के मतवाले घोड़े की रास को थाम सके ? ऐसी तो कोई पार्टी नजर ही नहीं आ रही. कांग्रेस ने नवउदारवाद की राजनीति शुरू की, भाजपा ने इसे आगे ही नहीं बढ़ाया, बल्कि अपने विशिष्ट किस्म के राष्ट्रवाद और धर्मवाद की आड़ में इसे तीव्रता दी.

समाजवाद का नाम लेकर राजनीति करने वाली अधिकांश पार्टियां व्यक्तिवाद और परिवारवाद की जकड़ में ऐसी फंसी कि उनकी वैचारिकता ही नेपथ्य में चली गई. हमने बीते वर्षों में न मुलायम सिंह को, न लालू प्रसाद को, न अखिलेश यादव या तेजस्वी यादव आदि को अंध निजीकरण के विरोध में कोई स्पष्ट स्टैंड लेते देखा. सड़कों पर उतर कर निजीकरण विरोधी आंदोलन को नेतृत्व देने की तो बात ही बेमानी है.

चाहे डीएमके के स्टालिन हों या आंध्र के जगन, बंगाल की ममता हो या उत्तर प्रदेश की मायावती. पता ही नहीं चलता कि निर्धन विरोधी निजीकरण की इस अंध प्रक्रिया पर उनका स्टैंड क्या है ? समय-समय पर वे कुछ जुमले जरूर उछाल देते हैं लेकिन न उनका कोई प्रभाव होता है, न वे कोई प्रभाव डालने की मंशा रखते हैं. उनके अपने-अपने राजनीतिक मुद्दे हैं जिन पर राजनीति करते वे कभी सत्ता में आते हैं, कभी बाहर हो जाते हैं.

मुख्यधारा के वामदलों की बात ही क्या करनी, जिनके नेता सड़कों की राह ही भूल गए लगते हैं. उनमें इतना माद्दा ही नहीं बचा कि वे इस देश के मजलूमों को नेतृत्व दे सकें. अगर वे प्रतिरोध की आवाज बुलंद करते भी हैं, आंदोलनों की राह अख्तियार करते भी हैं तो बावजूद जन हितैषी मुद्दे उठाने के, उन्हें व्यापक जन समर्थन नहीं मिलता. बदलते समय के साथ अपनी वैचारिकता को धार देने की बौद्धिक सामर्थ्य तो वे नहीं ही दिखा सके, भाजपा की राह रोकने के नाम पर जितने राजनीतिक-सैद्धांतिक समझौते उन्होंने किये, उससे उनकी विश्वसनीयता भी खासी प्रभावित हुई.

कुछ ऐसे वाम संगठन, जिन्हें इस देश के संविधान में ही निष्ठा नहीं है, वे भले ही यत्र-तत्र उत्पात मचाते रहें, हत्याएं करते रहें, लेकिन उनका हश्र यही होना है कि एक दिन इतिहास उनकी कब्र पर मिट्टी डाल देगा. वाजिब सवालों के बावजूद उनसे निपटने के गैर वाजिब तरीके किसी भी आंदोलन को सिर्फ भटकाव ही दे सकते हैं.

यह इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है कि आम जन जीवन से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण सवालों पर हमारी राजनीतिक जमीन बांझ हो गई लगती है. इस जमीन से किसी भी जलते सवाल का कोई भी जवाब निकल कर नहीं आ रहा. हम एक अंधी सुरंग में घुसते जा रहे हैं जिसके आगे हमारे सामने क्या आने वाला है, इसकी कल्पना ही की जा सकती है. ऐसी भयावह कल्पनाएं जो सिहरा देने वाली हैं.

हमारी राजनीतिक संस्कृति इतनी विकृत हो चुकी है कि हमारे जीवन से जुड़े जरूरी सवालों से बच कर निकल जाने में ही राजनीतिक दल अपनी भलाई समझने लगे हैं. विचारहीनता और संवेदन शून्यता का यह दौर हमें कहांं ले जा रहा है, हम समझ कर भी समझ नहीं पा रहे, और इन सवालों की अनदेखी करते नैतिक रूप से भ्रष्ट नेताओं और विचारहीन राजनीतिक दलों के उलझे समीकरणों की गुत्थियां सुलझाने में व्यस्त हैं.

हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि जब हमारे देश की राजनीति हमें विकल्पहीनता की स्थिति में ला कर खड़ा कर दे रही है, तो ऐसी स्थिति में हम क्या करें.

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