Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

पत्रकार राज्यरूपी जहाज पर खड़ा एक पहरेदार है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 8, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

वह आदमी जो लिखता है. जो महीने-दर-महीने, हफ्ते-दर-हफ्ते, दिन-रात असबाब जुटाकर लोगों के विचारों को शक्लो-सूरत देता है, दरअसल वही आदमी है जो किसी अन्य व्यक्ति की बनिस्बत, लोगों के व्यक्तित्व या सिफत को तय करता है और साथ ही यह भी, कि वे किस तरह के निजाम के काबिल है.’ – थियोडोर रूजवेल्ट, 1904

पत्रकार राज्यरूपी जहाज पर खड़ा एक पहरेदार है

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

समूचे इतिहास में राजनेता और सत्ता में बैठे तमाम महानुभाव मीडिया और पत्रकारों को पालतू बनाने को जरूरी मानते आए हैं क्योंकि उनके पास वह ताकत है जिसकी शिनाख्त रूजवेल्ट ने अपने कथन में की थी. सत्ता पर काबिज एक शक्तिशाली व्यक्ति किसी पत्रकार को किस हद तक वश में कर सकता है, यह बात बहुत हद तक उस पत्रकार विशेष पर भी निर्भर करता है.

1909 में रूजवेल्ट को चुनौती देने वाले पत्रकार कोई और नहीं, बल्कि सुप्रसिद्ध जोसेफ पुलित्जर थे. ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ नामक अपने अखबार में उन्होंने ‘पनामा नहर’ के निर्माण में करीब 4 करोड़ डालर की रकम के गायब हो जाने की खबर छापी. यह पैसा अमेरिकी कंपनी जेपी मॉर्गन और रूजवेल्ट के साले की जेब में गया था. इस खुलासे के बाद रूजवेल्ट ने पुलित्जर पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया और उन्हें सलाखों के पीछे धकेलने की धमकी दी. आखिर सुप्रीम कोर्ट में पुलित्ज़र की जीत हुई.

पत्रकारिता का एक सांस्कृतिक पहलू भी है. हर समाज में पत्रकारिता की ताकत में अंतर होता है. पुलित्जर, ‘वॉशिंगटन पोस्ट’, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अमेरिका, जो कि दुनिया का सबसे पुराना और सबसे ताकतवर लोकतंत्र है, से टकराने की जुर्रत की. कितने अखबारों ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारों और उनके काम का पक्ष लेते हुए, शक्तिशाली लोगों से टकराने की हिम्मत दिखाई है ? जवाब मिलेगा- बिरले ही.

पुलित्ज़र ने कहा था- ‘पत्रकार राज्यरूपी जहाज पर खड़ा एक पहरेदार है, जो समुद्र में दूर-दूर तक हर संभावित छोटे-बड़े खतरे पर नजर रखता है. वह लहरों में बह रहे उन लोगों पर भी नजर रखता, जिन्हें बचाया जा सकता है. वह धुंध और तूफान के परे छिपे खतरों के बारे में भी आगाह करता है. उस समय वह अपनी पगार या अपने मालिकों के मुनाफे के बारे में नहीं सोच रहा होता. वह वहां उन लोगों की सुरक्षा और भले के लिए होता है, जो उस पर भरोसा करते हैं.’

हालांकि, पुलित्ज़र भारत के संदर्भ में ग़लत साबित हो जाते हैं. आज के भारत में विवेक और नैतिक साहस-विहीन पत्रकारिता से बहुत से ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ और यथास्थितिवादी लोग खुश हैं लेकिन अगर आप में नैतिक साहस है, तो आपको सबसे ताकतवर इंसान से टकराने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती. फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह देश का प्रधानमंत्री है या राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश है या देश-दुनिया का सबसे अमीर आदमी.

पिछले छह साल में मोदी ने देश की सभी संवैधानिक-अर्ध संवैधानिक संस्थाओं पर बुलडोजर फेर दिया है लेकिन इसे दर्ज करने में पत्रकारों की भूमिका बेहद चिंतनीय रही है. जब भी राजनीतिक आकाओं ने अपनी अप्रसन्नता जाहिर की, मीडिया घरानों के मालिक उनके सामने साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में आ गए.

आज से 50 साल बाद पीछे मुड़कर देखने पर वर्तमान दौर के लिखे को पढ़ना ऐसा मालूम होगा, मानो धो-पोंछकर पेश किए गए भारत को जानने-समझने का प्रयास किया जा रहा हो. सत्य और न्याय के लिए आवाज उठाना आज के भारत में बहुत से लोगों को बेहद नैतिकता भरा काम लगता है. इसलिए, क्योंकि दिक्कत उन्हीं के साथ है. इसकी वजह या तो उनका संदेहास्पद अतीत होता है, या ताकतवर हितों की दलाली और रसूखदारों से रिश्ते बनाए रखने की मजबूरी या समाज में अपनी बनी बनाई साख से अपदस्थ हो जाने की फिक्र.

लोगों को लगता है कि एक संपादक बहुत शक्तिशाली होता है लेकिन सिद्धांतों पर चलने वाले संपादक उतना शक्तिशाली नहीं होता, जितना लोगों को दिखाई देता है. अंग्रेज़ी राजनीतिक व्यंगात्मक धारावाहिक ‘यस, प्राइम मिनिस्टर’ में इस बात को सही-सही पकड़ा है.

दरअसल, संपादक एक रिंग मास्टर की तरह होता है. वह काम निर्धारित कर सकता है, लेकिन कलाबाजों को यह नहीं बता सकता कि उन्हें किस दिशा में कूदना है. ज़रा तुलना तो कीजिये कि रिपब्लिक चैनल और उसके एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता के किन मानकों पर पत्रकार है ?

  • सौमित्र राय

Read Also –

 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

मंदिर

Next Post

हिसाब

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

हिसाब

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

राम बहादुर आजाद : शून्य से शिखर तक

February 12, 2019

गोड्डा : अडानी पावर प्लांट के लिए ‘भूमि अधिग्रहण’ के खिलाफ आदिवासियों का शानदार प्रतिरोध

January 22, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.