Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

विफलताओं से जूझती सरकार टैक्स न बढ़ाए तो क्या करे

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 20, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

विफलताओं से जूझती सरकार टैक्स न बढ़ाए तो क्या करे

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

आर्थिक नीतियों के मामले में विफलताओं से जूझती सरकार टैक्स न बढ़ाए तो क्या करे. अब इस कारण पेट्रोल सौ के पार जाए तो जाए, इन्कम टैक्स तमाम रिकार्ड्स तोड़े तो तोड़े, महंगाई के आंकड़े बढ़ते जाएं तो बढ़ें, देश चलाने के लिये टैक्स बढ़ाने के सिवा सरकार के पास फिलहाल और कोई उपाय नहीं.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

बढ़ते टैक्स का सबसे बड़ा बोझ मध्य वर्ग उठाता है. वह कराह रहा है लेकिन उसे लगता है कि इसमें भी कहीं देश हित छुपा हुआ है. मोदी जी हैं तो कुछ सोच कर ही पेट्रोल को सौ के पार ले जा रहे होंगे. अर्थशास्त्री बताते हैं कि जिस देश में आर्थिक असमानता जितनी बढ़ती जाती है उसका ग्रोथ उतना ही प्रभावित होता जाता है, उसका बाजार उतनी ही गतिहीनता को प्राप्त होता जाता है.

अपने मोदी जी के नाम यह रिकॉर्ड भी है. जब से वे सत्ता में आए हैं, उन्होंने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता के मामले में पिछले तमाम रिकार्ड्स तोड़ दिए हैं. उनकी इस उपलब्धि पर विश्वास न हो तो ऑक्सफेम के इस विषयक हालिया रिपोर्ट्स पर एक नजर डाल लें.

अब, जब नीचे की विशाल जनसंख्या की क्रय शक्ति में अपेक्षानुरूप वृद्धि नहीं होगी और ऊपर के एकाध प्रतिशत लोग और धनी, और धनी होते जाएंगे तो बाजार को मंदी के बादल घेरेंगे ही. बाजार सिर्फ धनी लोगों के भरोसे थोड़े ही चलता है, वह तो सबके विकास के साथ ही गतिशील होता है.

तभी तो, मोदी जी का सूत्र वाक्य है, ‘सबका साथ, सबका विकास.’ लेकिन, मुश्किल यह हो गई कि सत्ता में आते ही वे निचलों का साथ छोड़ते गए और उपरले उनके सिर पर चढ़ते गए. तो, व्यावहारिक धरातल पर वे न सबका साथ दे पाए, न सबका विकास कर पाए.

खबरें बता रही हैं कि नीचे के 32 करोड़ लोगों की मासिक आय तीन हजार रुपये से भी कम हो गई है जबकि इसी दौरान ऊपर के महज 11 लोगों की आय में इतनी बढ़ोतरी हो गई जिसने नया रिकार्ड कायम कर दिया. सबसे ऊपर वालों में दो तो लगातार इतने मुटिया रहे हैं कि विश्लेषक हैरान हैं और जयकारे लगाते लोग मंत्रमुग्ध. उनकी इस हैरतअंगेज वृद्धि दर के समक्ष हर तर्क नतमस्तक है.

कुछ खास लोग भले ही धनी होने के रिकार्ड बनाते रहें लेकिन जब जनसंख्या के बड़े हिस्से की आमदनी नहीं बढ़ेगी, उसकी क्रय शक्ति नहीं बढ़ेगी तो सरकार की आमदनी प्रभावित होनी ही होनी है. रोजगार का संकट अब भीषण रूप ले चुका है. सरकारी नियुक्तियां हतोत्साहित की जा रही हैं जबकि बाजार की मंदी ने प्राइवेट नौकरियों के अवसर घटाए हैं. जब रिकार्ड पर रिकार्ड बन ही रहे हैं तो मोदी राज में बेरोजगारी ने भी लगे हाथ अपने तमाम रिकार्ड तोड़ डाले.

रोजगार और बाजार की गति मंद होगी तो सरकार की आमदनी प्रभावित होगी ही होगी. इस घटती आमदनी की भरपाई विभिन्न टैक्सों को बढ़ा कर ही तो होगी.

जो निर्धन हैं और इस देश की आबादी के दो तिहाई के करीब हैं, वे जब विकास की मुख्यधारा से बाहर हैं तो जाहिर है, बाजार की मुख्यधारा से भी बाहर हैं. जो बेहद अमीर हैं, बल्कि बेहद बेहद अमीर हैं, उनके पास हजार रास्ते हैं सरकार और पब्लिक को चूना लगाने के. अमीरी में दिन दूनी रात चौगुनी की बढ़ोतरी यूँ ही नहीं होती, इसके लिये दिमाग लगाना होता है, टैक्सों में छूट हासिल करनी होती है. छूट भी इस विधि, कि आम लोगों को पता ही न चले कि सरकार के किस फैसले से प्रभु वर्ग के किस हिस्से की आमदनी कितनी बढ़ गई, कितने टैक्स में छूट मिल गई.

बच गया नमो नमो करता बीच का वर्ग. टैक्सों का सबसे अधिक बोझ यही उठाता है. एक लीटर पेट्रोल के वास्तविक दाम पर 180 प्रतिशत टैक्स, फिर इन्कम टैक्स, फिर उस पर भी ये सरचार्ज, वो सरचार्ज.

कहा भी जाता है कि नवउदारवादी व्यवस्थाएं निर्धनों का श्रम लूटती हैं, मध्य वर्ग की जेब पर डाका डालती हैं और अरबपतियों को खरबपति, खरबपति को पता नहीं कौन कौन सा पति बनने की राह प्रशस्त करती हैं.

निर्धनों के पास लूटने के लिये श्रम के सिवा और है भी क्या ? तो, उसकी जम कर लूट हो रही है. श्रम कानूनों में जितने भी संशोधन किए जा रहे हैं वह इसी लूट के लिये तो हैं. हालांकि, अपनी औकात भर टैक्स वे भी देते ही हैं. ट्रेन के टिकट से लेकर साबुन की टिक्की तक, वे जो भी खरीदते हैं, सबमें टैक्स देते हैं.

मध्य वर्ग की आमदनी तो बढ़ती है इस सिस्टम में, लेकिन उसे छीन लेने की हर जुगत लगाई जाती है. खास कर तब अधिक, जब सरकार की आर्थिक नीतियां विफल होती रहें और उसकी आमदनी घटने लगे. मध्य वर्ग की जेब पर डाका डालना तब एक बेहतर विकल्प होता है.

विचारहीन उपभोक्ता बन चुके इस वर्ग की रीढ़ की हड्डी इतनी लचीली हो चुकी है कि तन कर खड़े होने का नैतिक बल ही नहीं रहा. तो, आपदा में अवसर खोजते अपने दौर के नायक के जयकारे के सिवा यह कर भी क्या सकता है ? हांं, जब जेब पर डाका पड़ने का भान होता है तो एक झुंझलाहट सी होती है. फिर, नपुंसक चुप्पी में सारा विरोध गुम हो जाता है.

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां देश को आगे ले जाने में विफल रही हैं. तीन तलाक, 370, मन्दिर, पाकिस्तान आदि मुद्दों पर उसके प्रवक्ता जिस उत्साह से उछल कूद करते बोलते हैं उतनी ही मिमियाहट आर्थिक मामलों में उन्हें घेरने लगती है. और तब…’वे 70 साल’ उन्हें याद आने लगते हैं जो उनके अनुसार, इन विफ़लताओं के जिम्मेदार हैं. अभी कल ही तो स्वयं मोदी जी ने भी पेट्रोल के सौ पार करने की जिम्मेदारी उन्हीं 70 सालों पर डाली है.

कितना भी उछल कूद लो, कितना भी उन्माद, वैमनस्य फैला कर कर वोट हासिल कर लो, आर्थिक मामलों में ही असली परीक्षा होती है. किसी नेता की वास्तविक सफलता इससे ही आंकी जाती है कि उसके कार्यकाल में लोगों की आर्थिक स्थितियों में, उनके जीवन स्तर में कितनी बेहतरी आई.

कोई सरकार कितना टैक्स बढ़ा सकती है ? टैक्सों पर कितना सेस लगा सकती है ? अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह रास्ता भी अधिक दूर नहीं ले जा सकता और अत्यधिक टैक्सों को लादते जाने के अपने खतरे हैं. सबसे खतरनाक है, सबसे अफसोसनाक है वह चुप्पी, जो उनके होंठों पर तारी है जिन्हें हद से अधिक टैक्स और सेस के नाम पर लूटा जा रहा है.

वैसे, कुछेक प्रतिशत ऊपर के लोगों के अलावा लुट तो सब रहे हैं. कुछ विश्लेषक तो यह भी कहने लगे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर पब्लिक सेक्टर इकाइयों के निजीकरण की योजनाएं भी एक तरह से व्यवस्थागत लूट ही हैं.

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी क्यों कहा जाता है ?

Next Post

तानाशाह इतना डरपोक होता है !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

तानाशाह इतना डरपोक होता है !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

ओ गाज़ा के शरारती बच्चों…

August 19, 2024

गोदामों में भरा है अनाज, पर लोग भूख से मर रहे हैं

April 20, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.