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Home गेस्ट ब्लॉग

मार्क्सवाद के प्रबल समर्थक थे HSRA के कमांडर इन चीफ चंद्रशेखर आज़ाद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 1, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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भारत के क्रांतिकारी इतिहास के चमकते सितारों में एक चन्द्रशेखर आजाद ऐसे मील का पत्थर हैं, जिनकी निष्ठा व समर्पण पर सन्देह की कोई गुंजाइश किसी भी भारतीय को नहीं है. इसके साथ ही वे एक ऐसे मील का पत्थर हैं, जिनका चिंतन, जिनका हर कदम देश की जनता के लिए पत्थर की लकीर है. विदित हो कि वे आरएसएस के न केवल घोर आलोचक ही थे, अपितु मार्क्सवाद के महान प्रस्थापक कार्ल मार्क्स के प्रशंसक भी थे.

आज जब आरएसएस अपने अनुषांगिक संगठन भाजपा के माध्यम से देश की सत्ता पर काबिज है और कम्युनिस्टों को गालियां दे रहा है और उसके तीसरे महान शिक्षक लेनिन की प्रतिमा तक आरएसएस के द्वारा तोड़ा जा रहा है, तब आजादी के दीवाने चन्द्रशेखर आजाद की मार्क्सवाद और उनके द्वारा स्थापित समाजवाद के अटूट सिद्धांत पर असीम भरोसा देश की जनता को एक नई रोशनी प्रदान करेगी.

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इसी सन्दर्भ में हम यहां भगत सिंह के साथी और एचआरएसए के कमांडर इन चीफ चन्द्रशेखर आजाद पर उनके ही एक साथी शिव वर्मा की यह टिपण्णी यहां प्रकाशित कर रहे हैं, जो चन्द्रशेखर आजाद के मार्क्सवाद और समाजवाद के प्रति अटूट लगाव को दिखाता है, जो हम तमाम भारतवासियों के लिए मील का पत्थर है.

HSRA के कमांडर इन चीफ चंद्रशेखर आज़ाद के बारे में शिव वर्मा

कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट घोषणापत्र पहली बार आदि से अंत तक मैंने आज़ाद को सुनाते समय ही पढ़ा था. वैज्ञानिक समाजवाद की बारीकियों को समझे बगैर भी वे अपने आपको समाजवादी कहने में गौरव अनुभव करने लगे थे.

लिखने-पढ़ने के मामले में आज़ाद की सीमाएं थी. उनके पास कॉलेज या स्कूल का अंग्रेजी का सर्टीफिकेट नहीं था और उनकी शिक्षा हिंदी या मामूली संस्कृत तक ही सीमित थी लेकिन ज्ञान और बुद्धि का ठेका अंग्रेजी जानने वालों को ही मिला हो, ऐसी बात तो नहीं है. यह सही है कि उस समय तक समाजवाद आदि पर भारत में बहुत थोड़ी पुस्तकें थीं और वे भी केवल अंग्रेजी में ही. आज़ाद स्वयं पढ़कर उन पुस्तकों का लाभ नहीं उठा सकते थे लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आज़ाद उस ज्ञान की जानकारी के प्रति उदासीन थे.

सच तो यह है कि केंद्र पर हम लोगों से पढ़ने-लिखने के लिए जितना आग्रह आज़ाद करते थे, उतना और कोई नहीं करता था. वे प्राय: ही किसी ने किसी को पकड़कर उससे सिद्धांत संबंधी अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़वाते और हिंदी में उसका अर्थ करवाकर समझने की कोशिश करते. कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट घोषणापत्र पहली बार आदि से अंत तक मैंने आज़ाद को सुनाते समय ही पढ़ा था. (यह पुस्तक बाद में सहारनपुर में मेरे साथ पकड़ी गई थी.)

भगत सिंह और सुखदेव के आ जाने पर सैद्धांतिक प्रश्नों पर खासतौर पर बहस छिड़ जाती थी. हमारा अंतिम उद्देश्य क्या है, देश की आज़ादी से हमारा क्या मतलब है, भावी समाज कैसा होगा, श्रेणीरहित समाज का क्या अर्थ है, आधुनिक समाज के वर्ग संघर्ष में क्रांतिकारियों की क्या भूमिका होनी चाहिए, राजसत्ता क्या है, कांग्रेस किस वर्ग की संस्था है, ईश्वर, धर्म आदि का जन्म कहां से हुआ आदि प्रश्नों पर बहस होती और आज़ाद उसमें खुलकर भाग लेते थे.

ईश्वर है या नहीं, इस पर आज़ाद किसी निश्चित मत पर पहुंच पाए थे, यह कहना कठिन है. ईश्वर की सत्ता से इनकार करने वाले घोर नास्तिक भगत सिंह की दलीलों का विरोध उन्होंने कभी नहीं किया. अपनी ओर से न उन्होंने कभी ईश्वर की वकालत की और न उसके पीछे ही पड़े.

शोषण का अन्त, मानव मात्र की समानता की बात और श्रेणी रहित समाज की कल्पना आदि समाजवाद की बातों ने उन्हें मुग्ध-सा कर लिया था और समाजवाद की जिन बातों को जिस हद तक वे समझ पाए थे, उतने को ही आज़ादी के ध्येय के साथ जीवन के सम्बल के रूप में उन्होंने पर्याप्त मान लिया था. वैज्ञानिक समाजवाद की बारीकियों को समझे बगैर भी वे अपने आपको समाजवादी कहने में गौरव अनुभव करने लगे थे. यह बात आज़ाद ही नहीं, उस समय हम सब पर लागू थी.

उस समय तक भगत सिंह और सुखदेव को छोड़ और किसी ने न तो समाजवाद पर अधिक पढ़ा ही था और न मनन ही किया था. भगत सिंह और सुखदेव का ज्ञान भी हमारी तुलना में ही अधिक था. वैसे समाजवादी सिद्धांत के हर पहलू को पूरे तौर पर वे भी नहीं समझ पाए थे. यह काम तो हमारे पकड़े जाने के बाद लाहौर जेल में सम्पन्न हुआ. भगत सिंह की महानता इसमें थी कि वे अपने समय के दूसरे लोगों के मुकाबले राजनीतिक तथा सैद्धान्तिक सूझबूझ में काफी आगे थे.

आज़ाद का समाजवाद की ओर आकर्षित होने का एक और भी कारण था. आज़ाद का जन्म एक बहुत ही निर्धन परिवार में हुआ था और अभाव की चुभन को व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने अनुभव भी किया था. बचपन में भाबरा तथा उनके इर्द-गिर्द के आदिवासियों और किसानों के जीवन को भी वे काफी नजदीक से देख चुके थे. बनारस जाने से पहले कुछ दिन बंबई में उन्हें मजदूरों के बीच रहने का अवसर मिला था. इसीलिए, जैसा कि वैशम्पायन ने लिखा है कि ‘किसानों तथा मजदूरों के राज्य की जब वे चर्चा करते तो उसमें उनकी अनुभूति की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी.’

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