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उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2026
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उत्तर-आधुनिक अवसरवादी और कम्युनिस्ट पार्टी

कॉमरेड माओ ने कहा था कि पार्टी वह सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य हथियार है जो लोगों को आज़ाद कराने के लिए जन-सेना और संयुक्त मोर्चे का संचालन करेगी. उन्होंने आगे कहा कि पार्टी की एकता केवल वैचारिक स्पष्टता के साथ ही बनाई जा सकती है. कॉमरेड माओ ने कहा, ‘हमारी पार्टी इस आधार पर बेहतर ढंग से एकजुट होगी, यानी विचारधारा, राजनीति और विभिन्न नीतियों के बारे में हमारी साझा समझ के आधार पर.’ पार्टी के भीतर वैचारिक केंद्रीयता के बिना, किसी पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी नहीं कहा जा सकता. पार्टी बनाने वाले किसी भी संगठनकर्ता की भावना ऐसी ही होनी चाहिए. पार्टी संगठनकर्ता के लिए विचारधारा हमेशा सबसे पहले आनी चाहिए. पार्टी संगठनकर्ता वह होता है जो अन्य सभी कार्यों की तुलना में वैचारिक कार्य को पहली प्राथमिकता देता है.

हमारी पार्टी के संदर्भ में, वैचारिक मोर्चे पर काम का महत्व और भी बढ़ गया है. क्योंकि एक ओर हम पार्टी नेतृत्व पर सबसे गंभीर और घातक हमले का सामना कर रहे हैं, तो दूसरी ओर अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्व पार्टी को शासक वर्ग के अनुकूल एक अर्थहीन संगठन में बदलने की कोशिश कर रहे हैं. यदि हम पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं, यदि हम उत्पीड़ित और शोषित लोगों को हत्यारे दलाल-सामंती-फासीवादी हमले से मुक्त कराना चाहते हैं, तो एकमात्र सहारा MLM (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) है.

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हमें अपने बीच मौजूद सभी गैर-मार्क्सवादी विचारधाराओं और तौर-तरीकों को जड़ से खत्म करना होगा. यदि हम अपनी विचारधारा पर अडिग रहते हैं, तो आज नहीं तो कल हम विजयी होंगे; लेकिन अगर हम अपने संघर्ष के वैचारिक मोर्चे पर एक पल के लिए भी सुस्त पड़ गए, तो हम उस सब कुछ को नष्ट कर देंगे जिसे हमारे शहीदों ने अपने खून से हासिल किया था. हमें याद रखना होगा कि दक्षिणपंथी अवसरवाद हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा है.

हमारी CC-PB (केन्द्रीय कमिटी-पोलिट ब्यूरो) ने भी इस बात को माना था कि ‘राइट डेविएशन’ (दक्षिणपंथी भटकाव) इस झटके की एक वजह थी. लेकिन अवसरवादी गुट के कुछ लोग यह रट लगाए हुए हैं कि पार्टी के लिए ‘लेफ्ट ऑपरच्युनिज्म’ (वामपंथी अवसरवाद) भी उतना ही खतरनाक है. ‘वामपंथी अवसरवाद’ पर यह ज़ोर असल में असली मार्क्सवादी लाइन पर उनके हमले को छिपाने का एक बहाना है. क्योंकि वे इतने ज़्यादा दक्षिणपंथ की ओर झुक गए हैं कि उन्हें सही मार्क्सवादी रास्ता भी ‘लेफ्ट’ (वामपंथी) लगने लगा है.

इस बारे में कॉमरेड माओ ने ‘थिंग्स आर बिगिनिंग टू चेंज’ (चीज़ें बदलने लगी हैं) नाम के एक पैम्फलेट में कहा था, ‘ऐसे कई लोग हैं जिनकी सोच संशोधनवाद या दक्षिणपंथी अवसरवाद की ओर झुकी हुई है. वे ज़्यादा बड़ा खतरा पैदा करते हैं क्योंकि उनके विचार पार्टी के भीतर बुर्जुआ विचारधारा की झलक हैं, और क्योंकि वे बुर्जुआ उदारवाद की चाहत रखते हैं, हर चीज़ को नकारते हैं और पार्टी के बाहर के बुर्जुआ बुद्धिजीवियों से कई तरह से जुड़े होते हैं. पिछले कुछ महीनों में, लोगों ने कट्टरपंथ (डोगमेटिज़्म) की आलोचना तो की है लेकिन संशोधनवाद को बिना किसी चुनौती के चलने दिया है. कट्टरपंथ की आलोचना होनी चाहिए, वरना कई गलतियों को सुधारा नहीं जा सकेगा. अब समय आ गया है कि हम अपना ध्यान संशोधनवाद की आलोचना करने पर लगाएं.’

कट्टरपंथ पार्टी के भीतर निम्न बुर्जुआ वर्ग की विचारधारा की झलक है, जबकि दक्षिणपंथी अवसरवाद पूरी तरह से बुर्जुआ विचारधारा है. हालांकि ‘वामपंथी अवसरवाद’ या कट्टरपंथ खतरनाक है और इसे तुरंत ठीक करने की ज़रूरत है, लेकिन मौजूदा हालात में, जब देश या दुनिया के स्तर पर कोई ‘लेफ्ट डेविएटेड’ (वामपंथी भटकाव वाली) राजनीतिक ताकत नहीं है, तो इसका असर बहुत कम है. ‘लेफ्ट डोगमेटिज़्म’ (वामपंथी कट्टरपंथ) की बात ज़्यादातर दक्षिणपंथी अवसरवादियों की तरफ़ से उठाई जाती है जो सही मार्क्सवादी लाइन पर हमला करना चाहते हैं.

हमारे सामने असली दुश्मन अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी विचारधारा है. मुख्य खतरे को पहचानने के बाद, हमें अपनी पार्टी में इसके असर को भी देखना होगा. दक्षिणपंथी अवसरवादी प्रवृत्तियां/भटकाव इस तरह से दिखते हैं :

  1. भूमिगत जीवन और सशस्त्र संघर्ष के रास्ते को छोड़कर पार्टी को कानूनी और खुला बनाने की कोशिश करना; वे भूमिगत काम पर शक जताते हुए ऐसा करते हैं, उनका कहना है कि खुला काम भी बहुत ज़रूरी है और भूमिगत काम जितना ही अहम है. वे कहते हैं कि हालात बदल गए हैं, राज्य ज़्यादा मज़बूत हो गया है, इसलिए हमें काम करने के अपने पुराने तरीके पर गंभीरता से सोचना चाहिए. (यहां यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि उन्होंने न तो यह कहा है कि भूमिगत जीवन छोड़ देना चाहिए और न ही यह कहा है कि बदले हुए हालात में भूमिगत जीवन और सशस्त्र संघर्ष मुमकिन नहीं है.)
  2. ‘जनवादी केंद्रीयता’ की पार्टी पद्धति में केंद्रीयकरण की ज़्यादा अहम भूमिका को नज़रअंदाज़ करके जनवाद को अहमियत देना. जनवाद के नाम पर वे स्थानीय समिति के स्तर पर पार्टी लाइन को लागू करवाने की उच्च समिति की ताकत छीनना चाहते हैं. वे कहते हैं कि हम उच्च समिति (HC) की बात मानेंगे, लेकिन कोई भी फ़ैसला लेने से पहले HC को हमसे पूछना चाहिए; इसी बहाने वे HC के साथ तालमेल बिठाना बंद कर देंगे. वे शहीद साथियों की कसम खाकर कहेंगे कि वे पार्टी के साथ हैं और सिर्फ़ HC की मनमानी के ख़िलाफ़ हैं. वे कहते हैं कि मैं केंद्रीय समिति (CC) की बात मानता हूं, लेकिन यहां की HC बात मानने लायक नहीं है.
  3. वे उच्च समिति और साथियों/निचली समितियों के बीच ताकत के अंतर को खोजने के लिए भाषा, शब्दों, प्रतीकों, अक्षरों, इनवर्टेड कॉमा आदि पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं. उनका कहना है कि कंटेंट के हिसाब से चिट्ठी या जो कुछ भी कहा गया है, वह ठीक है, लेकिन भाषा का रूप बहुत समस्या वाला है; यह व्यक्तिपरक, नौकरशाही वाला और सत्तावादी है. इसलिए, पूरी चर्चा को भाषा में सत्ता के रूप और उसमें निहित नौकरशाही की ओर ले जाने की कोशिश की जाती है.
  4. वे किसी भी ढांचे को पसंद नहीं करते; वे कोई ढांचा नहीं बनाते, या अगर कोई ढांचा होता भी है, तो वे जानबूझकर उसे HC से न जोड़कर अधिकार-हीन और कमजोर बनाए रखते हैं. जब इस सवाल पर उनसे पूछा जाता है, तो वे कहते हैं कि जब कोई मुद्दा अनौपचारिक रूप से हल किया जा सकता है, तो HC को औपचारिक बैठकें और रिपोर्ट देने की क्या ज़रूरत है ? उनका कहना है कि काम पूरा होना ज़रूरी है; ढांचा हो या न हो, यह गौण बात है.
  5. वे जेंडर और सेक्सुअलिटी पर पार्टी के रुख का विरोध करते हैं; वे मुक्त प्रेम और मुक्त सेक्स के पक्ष में हैं. वे यौन अराजकता के पक्ष में हैं. उनका कहना है कि यौन अवसरवाद और LGBT के मुद्दे पर पार्टी का रुख सामंती और पितृसत्तात्मक है. ऊपर बताए गए मुद्दों पर दक्षिणपंथी अवसरवादी विचारों को जानने के बाद, आइए अब देखते हैं कि इन मुद्दों पर उत्तर-आधुनिक सिद्धांतकारों का क्या कहना है.

दक्षिणपंथी अवसरवादियों द्वारा उठाया गया पहला मुद्दा बटलर के ‘बदलाव’ (flux) के विचार से जुड़ा है, जिसे उन्होंने फूको से लिया था; कई उत्तर-आधुनिक सिद्धांतकारों ने इस पर लिखा है. शायद यह उत्तर-आधुनिकतावाद की आधारशिला है. गतिशीलता जितनी अधिक होगी, वस्तु का पता लगाना उतना ही मुश्किल होगा, और उसे परिभाषित करना और निश्चित करना उतना ही असंभव होगा. ऐसी स्थिति ठोस ढांचे जैसी विशेषताओं को कमजोर कर देगी; इससे अव्यवस्था और अनिश्चितता पैदा होगी. उत्तर-आधुनिक दर्शन के लिए बदलाव हमेशा एक निरंतर प्रवाह (flux) होता है. इसमें कोई चरण या छलांग नहीं होती. बदलाव का मतलब है अनिश्चितता और निरंतरता.

बदलाव को समझने के इसी तर्क के आधार पर, दक्षिणपंथी अवसरवादी कहते हैं कि चूंकि समाज बदल गया है और राज्य अधिक शक्तिशाली हो गया है, इसलिए हमें भी उसी के अनुसार बदलना चाहिए और सशस्त्र संघर्ष छोड़ देना चाहिए. यह बदलाव की अनिश्चितता पर आधारित समझ है. बटलर के सिद्धांत में ‘बदलाव’ (flux) का विचार यही है—बदलाव एक प्रवाह है और निरंतर है—लेकिन माओवादी के लिए बदलाव मात्रात्मक से गुणात्मक होता है, और वह भी एक चरण और छलांग के माध्यम से होता है. हर तरह के बदलाव से भारतीय क्रांति की रणनीति में बदलाव नहीं आता. केवल मात्रात्मक बदलाव से समाज में गुणात्मक परिवर्तन नहीं आएगा.

एक बड़ी छलांग (leap) ज़रूरी है. इस छलांग के कई चरण होते हैं. बिना इस छलांग और चरणों को समझे सिर्फ़ बदलाव की बातें दोहराना, बदलाव के बारे में पोस्ट-मॉडर्न फ़िलॉसफ़ी (उत्तर-आधुनिक दर्शन) के अलावा और कुछ नहीं है. बदलाव के विचार से घबराना नहीं चाहिए; किसी भी तरह के बदलाव को द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद के नज़रिए से समझा जाना चाहिए, जैसा कि कॉमरेड मार्क्स, कॉमरेड लेनिन और कॉमरेड माओ ने हमें सिखाया था. किसी भी प्रक्रिया में कई चरण होते हैं; इन चरणों का अध्ययन ही बदलाव की प्रकृति और भविष्य में उसके संभावित रूप और सामग्री को तय करेगा. क्या इन अवसरवादियों ने कभी उस छलांग और चरण का सिद्धांत बनाने की हिम्मत की है, जिसके बारे में वे दावा करते हैं कि समाज वहां तक पहुंच चुका है ? नहीं, उन्होंने अपने दावों के समर्थन में कोई विश्लेषण नहीं किया है; उन्होंने बस बकवास साम्राज्यवादी पोस्ट-मॉडर्न फ़िलॉसफ़ी के अंधाधुंध बहाव में बहना चुना है.

दूसरा मुद्दा सत्ता के बारे में फूको (Foucault) के विचार से जुड़ा है. फूको का कहना था कि सत्ता मूल रूप से दमनकारी होती है और हर जगह मौजूद होती है. इसलिए, सत्ता को चुनौती देने या पलटने के लिए किसी भी तरह के ‘फ़र्क’ या ‘अलग राय’ का जश्न मनाया जाता है. यह आमतौर पर ‘काउंटर-डिस्कोर्स’ (विपरीत विमर्श) के रूप में होता है; भले ही यह अतार्किक, आधारहीन और अर्थहीन हो, फिर भी इसका जश्न मनाया जाता है और इसे सही ठहराया जाता है.

इस तरह, जो दक्षिणपंथी अवसरवादी किसी भी कारण से HC (उच्च समिति) को अधिकार-प्राप्त संस्था नहीं मानते, वे असल में फूको के इसी तर्क से प्रेरित होते हैं कि सारी सत्ता मूल रूप से दमनकारी होती है. जो कॉमरेड इस अनुशासनहीनता पर ध्यान देने के बजाय HC से दक्षिणपंथी अवसरवादियों के ‘फ़र्क’ का जश्न मनाते हैं, वे भी सत्ता-विरोधी सोच से ही प्रेरित होते हैं; उनका मानना है कि अपने से ऊपर की सत्ता को चुनौती देना प्रगतिशील काम है.

समस्या इस सत्ता-विरोधी सोच में है, जो सीधे सत्ता के बारे में पोस्ट-मॉडर्न समझ से आती है. CC (केंद्रीय समिति) को मानने का दावा सिर्फ़ दिखावे के लिए होता है, क्योंकि यह पता होता है कि CC सीधे तौर पर काम करने वाली संस्था नहीं होगी; इसलिए सत्ता को छिपाने के लिए अवसरवादी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है. जिन मामलों में CC सीधे काम करने वाली संस्था बन जाती है, वहां ये अवसरवादी दावा करते हैं कि CC ने भी HC का ही रास्ता अपना लिया है या वह HC से भी ज़्यादा कठोर हो गई है.

घटना-विज्ञान (phenomenology) और अस्तित्ववाद (existentialism) का दर्शन ही हमारे अवसरवादियों का मार्गदर्शक है; वे मूल रूप से अनुभववादी (empiricist) हैं और कट्टर बुर्जुआ आज़ादी और चुनने की आज़ादी के लिए संघर्ष करते हैं. कम्युनिस्ट होने का बहाना बनाकर, वे बुर्जुआ स्वायत्तता और अपनी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने के अधिकार के लिए संघर्ष करते हैं. उदारवादी बुर्जुआ वर्ग का ‘अति-जनवाद’ (ultra-democracy), उत्तर-आधुनिक युग की चरम स्वतंत्रता है.

जबकि ‘अल्ट्रा-डेमोक्रेसी’ (अत्यधिक जनवाद) अराजकता की निशानी थी, ‘कट्टर आज़ादी’ (radical freedom) का विचार किसी ढांचे के अंदर या बाहर मौजूद सत्ता को पलटने पर आधारित है. जब दक्षिणपंथी अवसरवादी HC (पार्टी की उच्च समिति) के अधिकार को नहीं मानते हैं, तो उनका मकसद सर्वहारा वर्ग की सत्ता को पलटना होता है. लेकिन क्या ये अवसरवादी राज्य की सत्ता के पास मौजूद सामंती-पूंजीपति वर्ग की ताकत को पलटने की हिम्मत करेंगे ?

हमारे समाज पर उत्तर-आधुनिकतावाद (post-modernism) का बहुत बड़ा असर है; जैसे-जैसे मध्यम वर्ग की आबादी बढ़ेगी, आम लोगों पर उत्तर-आधुनिकतावाद की पकड़ भी बढ़ेगी. उत्तर-आधुनिकतावाद में दुश्मन को अपना सबसे असरदार हथियार मिल गया है. पहले उनका हथियार पूंजीपति वर्ग का कल्याणवाद (bourgeoisie welfarism) था, लेकिन उत्तर-आधुनिकतावाद ने जो जादूई कमाल दिखाया है, वह कोई और विचारधारा नहीं कर सकती.

साम्राज्यवादी नव-उदारवादी (neo-liberal) विश्व व्यवस्था को बड़े पैमाने पर खपत (mass consumption) की ज़रूरत होती है. बड़े पैमाने पर खपत को क्रेडिट सिस्टम और बाज़ार अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण से बढ़ावा मिलता है. इससे खपत ज़्यादा से ज़्यादा एक व्यक्तिगत गतिविधि बन जाती है, जो व्यक्ति की पसंद, नापसंद और चुनाव पर आधारित होती है. उत्तर-आधुनिकतावाद ने खुद को पूरी तरह से नव-उदारवादी विश्व व्यवस्था के साथ जोड़ लिया है.

फाइनेंस कैपिटल मार्केट (वित्तीय पूंजी बाज़ार) में जिस तरह का उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता होती है, वैसी ही उनकी विचारधारा में भी है. आज के बाज़ार की भौतिक स्थितियां ‘अत्यधिक व्यक्तिवाद’ (hyper-individualism) को बढ़ावा देती हैं. व्यक्ति को निजी बाज़ार की जगहें (जैसे अमेज़न, फ्लिपकार्ट आदि) और निजी विश-लिस्ट दी जाती हैं; जब किसी को लोन लेने, क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने, गेम खेलने या ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा जाता है, तो पैसे की सीमा को भी नज़रअंदाज़ करने के लिए उकसाया जाता है… लेकिन इस दिखावे के पीछे असल में कुछ भी निजी नहीं रहता; सब कुछ साम्राज्यवादी पूंजी और उसकी नव-उदारवादी ज़रूरतों के तर्क से तय होता है.

आज़ादी और चुनाव का भ्रम ही बाज़ार की विचारधारा वाली मशीनरी को चलाता है. आज़ादी और चुनाव के अधिकार का यह भ्रम राजनीति में भी दिखाई देता है. दक्षिणपंथियों द्वारा HC के अधिकार को न मानने की असल वजह उस डिजिटल बाज़ार अर्थव्यवस्था में है जिसे साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी ने पैदा किया है. यह बाज़ार व्यक्तिगत पसंद और कट्टर आज़ादी का भ्रम पैदा करता है, लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग (petty bourgeoisie) की सोच में जनवादी केंद्रीयता’ (democratic centralism) का विचार गुलामी जैसा लगता है, क्योंकि इसमें विचारधारा और सामूहिक हित के प्रति प्रतिबद्धता की ज़रूरत होती है. इसलिए वे ‘जनवादी केंद्रीयता’ (democratic centralism) के ‘केंद्रीयता’ वाले हिस्से पर हमला करते हैं. वे इस अवधारणा को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और कहते हैं कि इसमें लोकतंत्र ही मुख्य है और हर पहलू और हर समय उसी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

वे केंद्रीयता को एक ‘शक्ति’ के तौर पर देखते हैं और शक्ति के बारे में उनकी सोच वैसी ही है जैसी फूको (Foucault) की थी, जिनका मानना था कि हर तरह की शक्ति मूल रूप से दमनकारी होती है. यहाँ कॉमरेड माओ की उस बात को याद करना ज़रूरी है जो उन्होंने ‘पार्टी की कार्य-शैली को सुधारें’ (Rectify the party style of work) नामक पैम्फलेट में जनवादी केंद्रीयता’ के सवाल पर ठोस रूप से कही थी. आज़ादी या स्वायत्तता की मांग करने वालों के ख़िलाफ़ बोलते हुए उन्होंने कहा था, ‘वे पार्टी की जनवादी केंद्रीयता की प्रणाली को नहीं समझते; उन्हें यह एहसास नहीं है कि कम्युनिस्ट पार्टी को न केवल जनवाद की ज़रूरत है, बल्कि केंद्रीयता की और भी ज़्यादा ज़रूरत है. वे जनवादी केंद्रीयता की उस प्रणाली को भूल जाते हैं जिसमें अल्पमत बहुमत के अधीन होता है, निचली कमेटी ऊपरी कमेटी के अधीन, अंश पूर्ण के अधीन और पूरी सदस्यता केंद्रीय समिति के अधीन होती है. चांग कुओ-ताओ ने पार्टी की केंद्रीय समिति से अपनी ‘आज़ादी’ का दावा किया और नतीजतन पार्टी के साथ गद्दारी की और कुओमिंतांग का एजेंट बन गया.’

मौकापरस्त लोग किसी विरोधाभास के दो पहलुओं के साथ खेलने में बहुत चालाक तर्क अपनाते हैं. उन्होंने बर्नस्टीन के ज़माने से लेकर लारिन और मार्टोव के समय तक ऐसा ही किया है, और आजकल हमारे संदर्भ में देवजी और वेणुगोपाल जैसे लोग इसमें माहिर हो रहे हैं.

कहा जाता है कि ‘किसी भी विरोधाभास के दो पहलू होते हैं; इसलिए, किसी वस्तु/प्रक्रिया/घटना के विकास पर कोई राय बनाते समय दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए और किसी एक पहलू को दूसरे से ज़्यादा अहमियत नहीं देनी चाहिए.” कॉमरेड लेनिन ने इसे ‘दो नावों पर सवार होना’ कहा था. अगर सिर्फ़ इस बात पर गौर करें तो यह सही लग सकता है, लेकिन यहीं पर उस चालाकी का खेल है जिसकी हम बात कर रहे थे; यह चालाकी ‘अनुभव-आलोचना’ से और तेज़ हुई, जो वस्तुनिष्ठता और पक्षधरता को नकारती है. आजकल यह चालाकी फूको, देरिदा, बटलर और अन्य लोगों के ‘पोस्ट-मॉडर्न’ (उत्तर-आधुनिक) तर्क के ज़रिए मौकापरस्त विचारधारा में और भी गहरी हो गई है. उनका कहना है कि किसी वस्तु की पहचान तय करना या उसे निश्चित करना ‘डिस्कर्सिव पावर’ (विमर्श की शक्ति) का इस्तेमाल है और यह दमनकारी होता है; इसलिए मौकापरस्त लोग विरोधाभास के भीतर किसी एक पहलू को ‘प्रमुख’ के तौर पर तय नहीं करते.

मौकापरस्त का ऊपर दिया गया कथन पहचान की अवधारणा को नकारता है और हमें एक ऐसी अनिश्चित और बदलती हुई उत्तर-आधुनिक काल्पनिक दुनिया में धकेल देता है; यह किसी चीज़ के विकास में द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद की प्रक्रिया को भी नकारता है. यह सच है कि हर विरोधाभास के दो पहलू होते हैं, लेकिन किसी चीज़ का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उन दोनों पहलुओं में से मुख्य कौन सा है; कॉमरेड माओ ने इसे ही ‘मुख्य अंतर्विरोध का मुख्य पहलू’ कहा था. कॉमरेड माओ ने कहा था, ‘किसी भी विरोधाभास में, विरोधी पहलुओं का विकास असमान होता है. कभी-कभी वे संतुलन की स्थिति में दिखते हैं, लेकिन यह संतुलन केवल अस्थायी और सापेक्ष होता है, जबकि असमानता ही मूल बात है. दो विरोधी पहलुओं में से एक मुख्य होता है और दूसरा गौण.’

विरोधाभास में मुख्य पहलू ही अहम भूमिका निभाता है. किसी चीज़ का स्वरूप मुख्य रूप से विरोधाभास के उस मुख्य पहलू से तय होता है, जिसने हावी स्थिति हासिल कर ली हो. अवसरवादी इस दार्शनिक सोच से भटक गए हैं; मार्टिन हाइडेगर उनके गुरु हैं. उन्होंने ही कहा था कि ‘होना’ (being) भाषा का ही एक खेल है. देरिदा ने कहा कि ‘होना’ एक कल्पना है जिसे भाषा ने रचा है. ऐसी समझ के साथ, किसी सत्ता के भीतर विरोधाभास या उसके विकास की प्रक्रिया में चरणों के विकास के लिए कहां गुंजाइश बचती है ?

अवसरवादियों द्वारा पेश किए गए विरोधाभास के दर्शन पर चर्चा करने के बाद, आइए अब हमारे सामने मौजूद तीसरे मुद्दे—भाषा, संकेतों, शब्दों आदि के सवाल—पर आते हैं. आइए ल्योतार (Lyotard) को देखें, जो एक उत्तर-आधुनिकतावादी हैं. उनका कहना है कि भाषा एक ऐसा खेल बन जाती है जिसमें ज़्यादा संसाधन वाला व्यक्ति ही अक्सर सच तय करता है. देरिदा का कहना है कि भाषा नियंत्रण का एक साधन है और वे इसे ‘हिंसक पदानुक्रम’ (violent hierarchy) कहते हैं. इससे बाहर निकलने के लिए डेरिडा ‘डिकंस्ट्रक्शन’ (deconstruction) का सुझाव देते हैं, जिसका अर्थ है किसी टेक्स्ट को इस तरह पढ़ना कि उसमें लेखक का कुछ आशय हो सकता है या नहीं भी हो सकता है. उनका कहना है कि यह लेखक के इरादे की पड़ताल किए बिना किया जा सकता है क्योंकि देरिदा के अनुसार लेखक ‘मृत’ (dead) है. इस सिद्धांत ने अवसरवादी राजनीति को समर्थन दिया.

उन्होंने उच्चतर कमेटी (HC) की भाषा का डिकंस्ट्रक्शन करना शुरू कर दिया. भाषा के पीछे के इरादे या मकसद को समझने की परवाह किए बिना, वे प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों पर टूट पड़े. इससे उनकी अवसरवादी ज़रूरतें पूरी होती हैं. खुद फूको (Foucault) ने देरिदा की लेखनी को ‘आतंकवादी अस्पष्टतावाद’ (terrorist obscurantism) कहा था. फूको ने देरिदा के बारे में कहा, ‘वे इतनी अस्पष्ट भाषा में लिखते हैं कि आप समझ ही नहीं पाते कि वे क्या कह रहे हैं – यही अस्पष्टतावाद वाला हिस्सा है; और फिर जब आप उनकी आलोचना करते हैं, तो वे हमेशा कह सकते हैं, ‘आप मुझे समझ नहीं पाए; आप बेवकूफ हैं.’ यही आतंकवाद वाला हिस्सा है.’ देरिदा दर्शनशास्त्र के ‘सोफिस्ट’ (Sophist) स्कूल की सबसे पुरानी चाल का इस्तेमाल करते हैं. इससे अवसरवादी खेमे में देरिदा के प्रति प्रेम की व्याख्या होती है. देरिदा का इस्तेमाल करके कोई भी किसी भी तर्क को पलट सकता है और उसे शब्दों और प्रतीकों की अर्थहीन बाजीगरी में बदल सकता है. अवसरवादी अपने स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं. वे इस हथियार के ज़रिए पार्टी की सही राजनीतिक लाइन पर हमला करते हैं; उनका कहना है कि भाषा तानाशाहीपूर्ण है और इसलिए जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसकी सामग्री (content) अपना अर्थ खो देती है.

चूंकि इन अवसरवादियों के साथ कई बातचीत चिट्ठियों के ज़रिए हुई थी, इसलिए हमारे कुछ साथियों को यह लगने लगा कि चिट्ठी लिखने के चलन ने असल में मामले को उलझा दिया है. उनका मानना है कि चिट्ठियों से बातचीत में उलझनें और गलतफहमियां पैदा हुईं, जिन्हें सिर्फ़ आमने-सामने की मुलाकातों से ही सुलझाया जा सकता है. ऐसी सोच में भी उत्तर-आधुनिकतावाद (post-modernism) की कुछ झलक मिलती है. समस्या चिट्ठियों में नहीं है, क्योंकि हम सब जानते हैं कि दुनिया भर में कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में आंदोलन और उसमें शामिल साथियों का मार्गदर्शन करने के लिए चिट्ठियों का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है. समस्या अवसरवादियों की राजनीतिक लाइन में है; वे पार्टी की राजनीतिक लाइन और नेतृत्व पर निशाना साधने के लिए उत्तर-आधुनिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

हमारे समय के अवसरवादी एक और बहुत गंभीर मुद्दा उठाते हैं, और वह है संगठन के ढांचे का सवाल. इस पर उनका नज़रिया मार्क्सवाद के भेष में छिपा हुआ उत्तर-संरचनावाद (post-structuralism) ही है. उत्तर-संरचनावादियों का मानना है कि पारंपरिक समाज में सत्ता केंद्रित होती थी और ढांचे के भीतर व्यवस्थित होती थी. वे ढांचे को स्वाभाविक रूप से शक्तिशाली, विशिष्ट और इसलिए दमनकारी मानते हैं. इसके विरोध में वे व्यक्तिगत पसंद और आमूल-चूल आज़ादी की वकालत करते हैं. इसलिए वे कोई ढांचा नहीं बनाते, और न ही उसे तोड़ने या उसका विश्लेषण करने के लिए उस पर हमला करते हैं. जब इसे कम्युनिस्ट कार्यप्रणाली पर लागू किया जाता है, तो हमें ऐसे अवसरवादी मिलते हैं जो पार्टी की बैठकें नहीं करते, कोई नया ढांचा नहीं बनाते, और जानबूझकर ढांचे को अस्पष्ट बनाए रखते हैं. इससे वे यह पक्का करते हैं कि पार्टी के ढांचे के भीतर सत्ता केंद्रित न हो, और एकमात्र सत्ता जो केंद्रित होती रहे और हर जगह फैलती जाए, वह राज्य की सत्ता या शासक वर्ग की सत्ता हो; जबकि कम्युनिस्ट पार्टी के पास मौजूद सर्वहारा वर्ग की सत्ता को खत्म होने दिया जाए. कम्युनिस्ट पार्टी की जगह एक व्यक्ति की तानाशाही वाली सोच ले लेती है—एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास बिना किसी जवाबदेही या ज़िम्मेदारी के नौकरशाही वाली ताकत होती है और जो खुद को हमेशा सही मानता है; इस प्रक्रिया में सामूहिक नेतृत्व की जगह एक व्यक्ति ले लेता है. इस तरह हम देखते हैं कि कैसे उत्तर-आधुनिकतावाद कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर बुर्जुआ राजनीतिक लाइन को मज़बूत करता है.

इस सिलसिले में आखिरी मुद्दा उत्तर-आधुनिकतावादियों की ‘जेंडर’ (लिंग) और कामुकता (sexuality) से जुड़ी थ्योरी का है. इस मामले में उत्तर-आधुनिकतावादियों का मशहूर नारा है—’ज़्यादा सेक्स, ज़्यादा आज़ादी.’ इससे बेहतर उनके नज़रिए को और कोई चीज़ साफ़ नहीं करती. उत्तर-आधुनिकतावादियों, खासकर फूको (Foucault) ने ‘जेंडर’ और कामुकता की विक्टोरियन आधुनिक धारणा पर हमला किया. उन्होंने ‘जेंडर’ को एक सामाजिक रचना के तौर पर परिभाषित किया. बाद में, ‘क्वीयर थ्योरी’ के लिए मशहूर एक और पोस्ट-मॉडर्निस्ट विचारक ने कहा कि ‘जेंडर’ एक तरह का प्रदर्शन है और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर यह कोई भी रूप ले सकता है. बायोलॉजिकल शब्द ‘सेक्स’ की जगह ‘जेंडर’ शब्द का इस्तेमाल करना प्रगतिशील माना गया.

जहां सेक्स (जैविक लिंग) के इस्तेमाल को बायोलॉजिकल डिटरमिनिज़्म (जैविक निर्धारणवाद) और मॉडर्निस्ट माना जाता था, वहीं पोस्ट-मॉडर्न फिलॉसॉफिकल नज़रिए में ‘जेंडर’ का मतलब बदलाव और रैंडमनेस (अनिश्चितता) से था; इसने नियो-लिबरल मार्केट लॉजिक के लिए जगह बनाई. किसी व्यक्ति की पसंद के हिसाब से जेंडर बदलना एक आम बात बन गई. यहां भी फ़ोकस व्यक्ति की पसंद और उसे चुनने की पूरी आज़ादी पर था. इसीलिए बटलर हमेशा कहती हैं कि इंसान को अपनी जेंडर पहचान पर सवाल उठाना चाहिए, उस पर शक करना चाहिए और उसे फिर से परिभाषित करना चाहिए. भौतिक सच्चाई को पूरी तरह नकार दिया गया; अंत में सिर्फ़ कल्पना और अमूर्त विचार ही बचते हैं.

पोस्ट-मॉडर्निज़्म का सबसे अहम पहलू तर्क, समझदारी और सोचने-समझने की क्षमता पर हमला करना है, जबकि साथ ही भावनाओं, संवेदनाओं, इच्छाओं और सुखों को प्राथमिकता देना है. बटलर अपनी किताब ‘ट्रबलिंग जेंडर’ में ‘क्वीर’ (queer) कॉन्सेप्ट का इस्तेमाल ऐसी किसी भी चीज़ को परिभाषित करने के लिए करती हैं जो मौजूदा पावर स्ट्रक्चर (सत्ता के ढांचे) को चुनौती देती है या उसे बदलती है. क्वीर शब्द एक अस्पष्ट शब्द है, जिसके दायरे में बाज़ार में कल्पना की जा सकने वाली या बाज़ार में खरीदी जा सकने वाली कोई भी चीज़ समाहित हो जाती है. लेकिन दक्षिणपंथी अवसरवादियों के एक वर्ग को इससे कोई आपत्ति नहीं है. वे क्वीर सिद्धांत को मार्क्सवाद का एक सहायक अंग मानते हैं. हार्ड्ट और नेग्री जैसे कई अवसरवादी बुद्धिजीवियों ने कहना शुरू कर दिया है कि आनंद उत्पादक शक्ति का हिस्सा है और इसलिए क्वीर की परिभाषा और उससे जुड़ी अवधारणा उत्पादक शक्तियों के लिए एक मुक्तिदायक अवधारणा होगी. मार्क्सवाद का ऐसा अश्लीलीकरण पहले कभी नहीं हुआ. शायद पहले कभी लोगों पर मार्क्सवाद की पकड़ इतनी कमजोर नहीं थी जितनी अब है.

लिंग और कामुकता पर प्रचलित उत्तर-आधुनिक समझ के बिल्कुल विपरीत, हमारी पार्टी का मानना था कि लिंग या क्वीर शब्द उत्तर-आधुनिक साम्राज्यवादी प्रायोजित बाज़ार समर्थक बुर्जुआ अवधारणा है और इसलिए इसका विरोध किया जाना चाहिए. इसके बजाय, लिंग शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए, जिसका उपयोग स्वयं जैविक और सामाजिक दोनों पहलुओं के चित्रण के रूप में किया जाता है. इसके अलावा, इसमें यह भी कहा गया कि लिंग परिवर्तन (Sex Change) को तभी स्वीकार किया जाएगा, जब लिंग परिवर्तन की इच्छा के पीछे कोई ठोस जैविक (Biological) स्थिति या कारण मौजूद हो. यदि ऐसा कोई जैविक आधार न हो, तो लिंग परिवर्तन की इच्छा को मूलतः बाज़ार-प्रेरित, साम्राज्यवाद-प्रायोजित और उत्तर-आधुनिक (Postmodern) वैचारिक प्रवृत्तियों का परिणाम माना जाएगा. (चूंकि लिंग परिवर्तन के प्रश्न पर हमारी पार्टी की अभी कोई अंतिम और निश्चित नीति नहीं बनी है, इसलिए पार्टी अपने सदस्यों को लिंग परिवर्तन की अनुमति नहीं देती. किंतु हमने ऊपर जो दृष्टिकोण रखा है, वह केवल पार्टी सदस्यों के लिए ही नहीं, बल्कि आम जनता और पार्टी कैडरों—दोनों के लिए हमारी सामान्य नीति है. यही हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत रहेगा, भले ही केंद्रीय समिति (CC – Central Committee) भविष्य में लिंग परिवर्तन का अधिकार प्रदान कर दे.)

इस कड़े रुख के अलावा, पार्टी ने साम्राज्यवादी और अराजक यौन व्यवहारों के खिलाफ़ अपने संघर्ष को आगे बढ़ाया. इसने ‘यौन अवसरवाद’ को परिभाषित किया. यौन अवसरवाद का मतलब है यौन व्यवहारों के क्षेत्र में अवसरवाद; यानी ऐसी यौन क्रिया जिसमें सर्वहारा विचारधारा का अभाव हो. एक यौन अवसरवादी व्यक्ति अचानक पैदा होने वाली इच्छाओं, निम्न बुर्जुआ (मध्यम वर्गीय) सोच, साम्राज्यवादी प्रभाव और उत्तर-आधुनिक (पोस्ट-मॉडर्न) सुख-आनंद के तर्क से प्रेरित होता है. उत्तर-आधुनिक बुद्धिजीवी ऐसे यौन व्यवहारों को बढ़ावा देते हैं, जबकि अवसरवादी लोग इनसे चिपके रहते हैं, क्योंकि जब राजनीति विकृत होती है, तो जीवन का हर पहलू उसी विकृति का अनुसरण करता है. हर मोड़ पर उत्तर-आधुनिकतावाद की विचारधारा अवसरवादी को जकड़े रखती है. वे एकजुट होकर आगे बढ़ते हैं और एकजुट होकर ही गिरते हैं. कॉमरेड मार्क्स, कॉमरेड लेनिन और कॉमरेड माओ की विरासत वाली पार्टी में उत्तर-आधुनिक अवसरवादियों के लिए कोई जगह नहीं है. पार्टी को अपना काम फिर से शुरू करने के लिए उन्हें बाहर निकालना होगा.

निष्कर्ष

कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक राजनीतिक प्रवृत्ति/भटकाव/लाइन के रूप में अवसरवाद, शासक वर्ग की विचारधारा का ही प्रतिबिंब है. यह दुश्मन की गोली से भी ज़्यादा खतरनाक है और इसे हमारी पार्टी से जड़ से खत्म करने का तरीका सक्रिय वैचारिक संघर्ष है. हमें वर्ग संघर्ष पर अपने विचारों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. हमारे कई साथियों को यह गलतफहमी थी कि सशस्त्र संघर्ष ही वर्ग संघर्ष का एकमात्र रूप है. यह सच है कि सशस्त्र संघर्ष वर्ग संघर्ष का सर्वोच्च रूप है, लेकिन अगर हम वैचारिक मोर्चे पर उदार हो जाते हैं और इस मोर्चे पर होने वाले संघर्ष को वर्ग संघर्ष का हिस्सा नहीं मानते हैं, तो हम सशस्त्र मोर्चे पर भी संघर्ष हार जाएंगे. शासक वर्ग से बेहतर यह सच्चाई कोई नहीं जानता, इसलिए वह मनोवैज्ञानिक स्तर पर सबसे अधिक सक्रिय है. सर्वहारा विचारधारा पर हमला करने की अपनी हताशा में शासक वर्ग को उत्तर-आधुनिकतावाद के रूप में एक नया हथियार मिल गया है. यह 20वीं सदी के ‘एम्पिरियो-क्रिटिसिज्म’ (अनुभव-आलोचनावाद) से भी अधिक धारदार हथियार है. इसे हराने के लिए हमें MLM (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) पर अपनी समझ को और पैना करने की ज़रूरत है. अगर हम अपनी पार्टी के ढांचे के भीतर उत्तर-आधुनिक प्रवृत्तियों की पहचान कर पाते हैं, तो हम अवसरवादियों और अवसरवादी प्रवृत्तियों को कमजोर कर देंगे. केवल सक्रिय वैचारिक वर्ग संघर्ष ही कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर उत्तर-आधुनिक अवसरवादी प्रवृत्तियों को जड़ से खत्म करने के इस संघर्ष में हमारी मदद करेगा.

दुश्मन हमें शारीरिक और वैचारिक, दोनों तरह से खत्म करने के बड़े अभियान पर है. ऐसे समय में हमें कॉमरेड लेनिन की बात याद आती है, जिन्होंने कहा था कि “हमारे खिलाफ़, यानी रूसी ‘अंडरग्राउंड’ (गुप्त) नेटवर्क में छिपे समाजवादियों के छोटे-छोटे समूहों के खिलाफ़, एक बेहद ताकतवर आधुनिक राज्य की विशाल मशीन खड़ी है, जो समाजवाद और लोकतंत्र को कुचलने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही है. हमें यकीन है कि आखिर में हम उस पुलिस-राज्य को खत्म कर देंगे, क्योंकि हमारे समाज के सभी समझदार और प्रगतिशील वर्ग लोकतंत्र और समाजवाद के पक्ष में हैं; लेकिन सरकार के खिलाफ़ व्यवस्थित संघर्ष चलाने के लिए, हमें क्रांतिकारी संगठन, अनुशासन और गुप्त रूप से काम करने के तरीकों को बेहतरीन स्तर तक ले जाना होगा.” कॉमरेड लेनिन के ये शब्द मौजूदा समय में हमारे मुख्य काम को बताते हैं; आइए, MLM (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) में पक्के यकीन के साथ अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर आगे बढ़ें.

  • जून, 2026

श्रृंखला समाप्त.

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