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जल संकट और ‘शुद्ध‘ पेयजल के नाम पर मुनाफे की अंधी लूट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 4, 2017
in ब्लॉग
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दूध के ही कारण इस देश में गाय की पूजा होती है और उसे ‘माता’ कहा जाता है. सैकड़ों लोग इसी गाय के कारण भड़के दंगे की वजह से मारे भी जाते हैं. करोड़ों लोग इसी गाय के दूध के कारण राजनीतिक रूप से दहशत में रहते हैं और करोड़ों रूपये के वारे-न्यारे भी इसी गाय के नाम पर हो जाते हैं. स्थिति तो यह हो गई है कि आज देश के एक राजनीतिक दल इसी गाय के नाम पर देश की सरकार चला रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ नदियों और नहरों के जाल से घिरा हमारा देश, जहां हर साल करोड़ों लोग नदियों में जाकर नहाते हैं. लाखों लोग इसी नदियों के पानी के बहाव के कारण हर साल मरते और बेघर भी होते हैं, इसके बाद भी इस देश में पानी दूध से भी ज्यादा कीमती और मंहगा बिकता है, अद्भूत है.

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पूंजीवादी व्यवस्था हर चीजों को बाजारवाद के नजरिये से देखता है और विस्तार पाता है. वह हर चीज को ‘माल’ समझता है और उसे बेचकर मुनाफा कमाता है. इस बाजारवाद के दौर में प्रकृति का अनमोल खजाना ‘पानी’, जो बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध है, भी इस बाजारवाद का भेंट चढ़ गया है. यही कारण है कि पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने विज्ञापन के बल पर प्रकृति के इस बिल्कुल मुफ्त मिलने वाले इस अनमोल उपहार को भी ‘माल’ में बदल डाला है और पीने के पानी को अपने विज्ञापन के बल पर इतने मंहगे दामों पर बेचने लायक बना दिया है, जिसके मुकाबले में दूध कहीं नहीं ठहरता है.

हमारा देश जो अपने स्वरूप से ही अर्द्ध-सामंती है, पूंजीवाद की अच्छी चीजों को अपनाने के बजाय नकल करना ज्यादा मुफीद समझता है. यही कारण है कि हमारे देश में पीने के पानी तक को स्टेट्स सिंबल के तौर पर प्रयुक्त किया जा रहा है. एक ओर इस देश के करोड़ों लोगों के पीने के पानी को अशुद्ध बता कर डराया जा रहा है, – हालांकि यह एक हद तक सच भी है, क्योंकि बढ़ते प्रदूषण के कारण इन नदियों के जल को जानबूझ कर अशुद्ध बना दिया गया है, ताकि पीने के ‘शुद्ध’ पानी के नाम पर अरबों-खरबों के कारोबार को बढ़ावा दिया जा सके, ताकि प्रकृति के बेमोल उपहार को भी माल बना कर बेचा जा सके और भारी मुनाफा कमाया जा सके.

हमारी प्यारी धरती ब्रह्मांड का सबसे खूबसूरत ग्रह है, जिसका तीन चैथाई हिस्सा जल से ढ़ंका हुआ है. इसके बाद भी मानवीय जीवन के लिए उपयुक्त पेय जल के तौर पर मात्र 10 प्रतिशत से भी कम पानी की उपलब्धता यह दर्शाता है कि जल संरक्षण हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है. यही कारण है कि इसके संरक्षण के लिए विश्वस्तर पर हर साल पहल की जाती है, पर नतीजा हमेशा ही सिफर मिलता है.

नदियां सूखती जा रही है, ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं. झीलें और तालाब लुप्त हो रहे हैं. कुंए, कुंड और बावड़ियों का रखरखाव सही से नहीं हो पा रहा. भू-गर्भीय जलस्तर लगातार कम होता जा रहा है, जिस कारण पेय जल की उपलब्धता लगातार घट रही है. आंकड़े बताते हैं कि सिंचाई का 70 प्रतिशत और घरेलू पेयजल आपूर्ति का 80 प्रतिशत पानी भू-जल से आता है.

एशिया के 27 बड़े शहरों में, जिनकी आबादी 10 लाख या इससे ऊपर है, में चेन्नई ओर दिल्ली की पेयजल की उपलब्धता की स्थिति सबसे खराब है. इसके बाद मुम्बई और कोलकाता की बारी आती है. भारत में उपलब्ध पानी में से 85 प्रतिशत पानी कृषि क्षेत्र, 10 प्रतिशत उद्योगों और पांच प्रतिशत ही घरेलू इस्तेमाल में लाया जाता है. पानी की इस्तेमाल हाईजीन, सेनिटेशन, खाद्य और औद्यौगिक जरूरतों में भी खासा होता है. नासा सेटेलाईट से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि उत्तर भारत में भूजल स्तर खतरनाक स्तर से भी नीचे पहुंच चुका है. पिछले एक दशक में ये हर साल एक फुट की दर से कम हुआ है.

हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और नई दिल्ली में 2002 से 2008 के बीच 28 क्यूबिक माइल्स पानी कम हो गया है । पंजाब का 80 प्रतिशत का इलाका डार्क या ग्रे-जोन में बदल चुका है, यानि जमीन के नीचे का पानी या तो खत्म हो चुका है अथवा खत्म होने के कागार पर पहुंच चुका है. भारत की तीन नदियां विभाजन के बाद पाकिस्तान में चली गई. सतलज और व्यास नदी यहां बहती थी, लेकिन इसमें भी पानी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. इसको बड़ा रूप देने वाली धाराएं जो पंजाब में थी, वो खत्म हो चुकी है. शिवालिक की पहाड़ियों से निकलने वाली नदियों जयंती, बुदकी, सिसुआं पूरी तरह से सूख चुकी है. यह हालत उस पंजाब की हो चुकी है, जहां जगह-जगह पानी था. लेकिन अब पंजाब में भू-जल का कितने बड़े पैमाने पर दोहन हो रहा है इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1986 में वहां ट्यूबवैल की संख्या कोई 55 हजार थी, जो बढ़कर अब 25 लाख से भी ऊपर पहुंच चुका है. अनेक जगह तो अब ये ट्यूबवेल भी जबाव देने लगे हैं. हजारों सालों से जो पानी धरती के अन्दर जमा था, उसका दोहन हमने 35 से 40 सालों में कर डाला है. इसका परिणाम यह हुआ कि पंजाब के 12 हजार गांव हैं, जिसमें 11,858 गांवों में पानी की समस्या है.

देश में पेय जल के उपलब्धता की यह समस्या राजनैतिक तौर पैदा किया गया है. देश में देशी-विदेशी कम्पनियों के द्वारा पानी का अवैज्ञानिक तरीके से दोहन के साथ-साथ बड़े पैमाने पर उत्पन्न औद्यौगिक कचरे के निपटारे के लिए नदियों का इस्तेमाल करने के कारण नदियों की पानी प्रदूषित हो चुकी है. सरकार द्वारा अवैज्ञानिक तरीके से नदियों के किनारे बांधों का अंधाधुंध निर्माण ने नदियों के जल संग्रहण की क्षमता को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है. इस प्रकार देश में पेयजल की समस्या को कृत्रिम तरीके से बढ़ावा देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ‘शुद्ध’ पेयजल के नाम पर लूट की छूट दे दी.

आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने विज्ञापनों के बल देश में पेयजल की उपलब्धता को इस प्रकार चिन्हित कर दिया है कि लोगों में ‘शुद्ध’ पेयजल के नाम पानी खरीदने की होड़-सी मच गई है. इस होड़ का परिणाम यह हुआ है कि जिस देश में दुनिया का सबसे ज्यादा पानी उपलब्ध है, जिसे थोड़ी-सी तकनीक का इस्तेमाल कर शुद्ध पेय जल बनाया जा सकता है, वह आज विश्व का सबसे बड़ा ‘पेयजल’ खरीदनेवाला मुल्क बनता जा रहा है. केवल इतना ही नहीं ‘शुद्ध’ पेय जल इतनी बड़ी कीमत पर बेचा जा रहा है कि उसके सामने दूध भी फीका पड़ने लगा है.

आज वक्त यह आ गया है कि लोग बिसलेरी, एक्वाफिना, किंगफिशर, बैले जैसे पानी की बोतलों की जगह एवियान, एरोनार, हिमालयन जैसे पानी के बंद बोतल बिक रहे हैं. बारिस्ता कम्पनी के पानी के 300 मिलीलीटर बोतल 20 रूपये में मिलते हैं. ऐरोनार कम्पनी के पानी के बाॅटल 100 रूपये प्रति लीटर की दर से बिक रहे हैं. विज्ञापनों के माध्यम से ‘शुद्ध’ पानी पीने के होड़ को इस कदर बढ़ा दिया है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली पीने का पानी फ्रांस से मंगवाते हैं, जिसके 1 लीटर पानी की कीमत 600 रूपये में आती है. अगर में भारत में बिक रहे दूध की बात करें तो बाजार में 50 रूपये से भी कम कीमत पर उपलब्ध दूध की कीमत पानी की तुलना में कुछ भी नहीं है. यह पूंजीवादी विकास की विकृत रूप ही है जहां प्रकृति का अनमोल खजाना पानी आज दूध से भी मंहगा उपलब्ध है और लोग इस मंहगे पानी को ‘शुद्ध’ पेयजल के रूप में इस्तेमाल कर गौरवान्वित महसूस करते हैं.

पेयजल के संरक्षण आज सबसे बड़ी जरूरतें भी बढ़ती जा रही है, परन्तु ‘शुद्ध’ पानी के नाम पर बहुराष्ट्रीयों कम्पनियों के दु्रत गति से बढ़ते व्यापार के कारण लगता नहीं है कि देश की कोई भी सरकार इस दिशा में कोई गंभीर कदम उठा सकती है. केवल नदियों के जल को साफ करने के नाम पर लाखों-करोड़ों के एक नये व्यवसाय की शुरूआत की गई है, जिसमें गंगा नदी के सफाई नाम पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी हजारों करोड़ की विशाल धनराशि भी शामिल है. जरूरत है कि पेयजल के संरक्षण की निगरानी देश की जनता खुद करें अन्यथा पानी को तरसता यह देश निजी कम्पनियों के मुनाफे की भेंट चढ़ जायेगी.

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