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कॉपरनिकस जिनकी आत्मा दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में जीवित है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 24, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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कॉपरनिकस जिनकी आत्मा दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में जीवित है

ब्लैक डैथ हैजे से फैली महामारी थी जिसने यूरोप की आधी आबादी का सफाया कर दिया था. 14वीं शताब्दी के इस त्रासद दौर के बाद अगले तीन सौ बरस तक यूरोप ने अपना पुनर्निर्माण किया. ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के ज्ञान को दोबारा से खोजा गया. कला और विज्ञान के प्रति लोगों में नई दिलचस्पी जागी और पढ़े-लिखे लोगों ने इस सिद्धांत का प्रचार-प्रसार किया कि आदमी के विचारों की क्षमता असीम है और एक जीवन में वह जितना चाहे उतना ज्ञान बटोर कर सभ्यता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है. तीन सौ बरस का यह सुनहरा अंतराल रेनेसां यानी पुनर्जागरण कहलाया.

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रेनेसां के मॉडल के तौर पर अक्सर पोलैंड के निकलॉस कॉपरनिकस का नाम लिया जाता है. गणितज्ञ और खगोलशास्त्री कॉपरनिकस चर्च के कानूनों के ज्ञाता, चिकित्सक, अनुवादक, चित्रकार, गवर्नर, कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री भी थे. उनके पास वकालत में डॉक्टरेट की डिग्री थी और वह पोलिश, जर्मन, लैटिन, ग्रीक और इटैलियन भाषाओं के विद्वान थे. 19 फरवरी 1473 को तांबे का व्यापार करने वाले परिवार में जन्मे कॉपरनिकस चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. दस के थे जब माता-पिता दोनों का देहांत हो गया. आगे की परवरिश मामा ने की.

मामा ने ही उन्हें क्राकाव यूनिवर्सिटी पढने भेजा जहां उन्होंने गणित, ग्रीक और इस्लामी खगोलशास्त्र का अध्ययन किया. वहां से लौटने के बाद मामा ने आगे की पढ़ाई के लिए अपने काबिल भांजे को इटली भेजने का मन बनाया. यातायात के साधन दुर्लभ थे और दो महीनों की लम्बी पैदल यात्रा के बाद कॉपरनिकस किसी तरह इटली पहुंचे जहाँ अगले छः साल तक यूरोप के सबसे प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ दो अलग-अलग विश्वविद्यालयों – बोलोना और पाडुआ – में उनकी पढ़ाई हुई. यहीं उन्होंने उन सारी चीजों पर सवाल करना शुरू किया जो उनके अध्यापक कक्षाओं में पढ़ाया करते रहे थे. ब्रह्माण्ड की संरचना के बारे में अरस्तू और टॉल्मी के सिद्धान्तों में उन्हें घनघोर विसंगतियां नजर आईं.

1503 में जब वे वापस घर लौटे उनकी उम्र तीस की हो चुकी थी. मामा प्रभावशाली आदमी थे और उनकी सिफारिश पर उन्हें स्थानीय चर्च में कैनन की नौकरी मिल गई. इस पेशे में उन्हें नक्शे बनाने के अलावा टैक्स इकठ्ठा करना और चर्च का बही-खातों को देखना होता था. आराम की नौकरी थी. 1510 में मामा सिधार गए.

कॉपरनिकस ने अपना अलग घर बनाया और अपने खगोलीय अध्ययन के वास्ते एक टावर बनवाई. उस समय तक टेलीस्कोप का अविष्कार नहीं हुआ था. लकड़ियों और धातु के पाइपों की मदद से वे नक्षत्रों की गति का अध्ययन किया करते. 1514 में उन्होंने एक वैज्ञानिक रपट लिख कर अपने दोस्तों को बांटी. भौतिक विज्ञान के इतिहास में इस रपट को अब ‘द लिटल कमेंट्री’ के नाम से जाना जाता जाता है. कॉपरनिकस ने दावा किया कि धरती सूरज के चारों ओर घूमती है न कि सूरज धरती के, जैसा कि धर्मशास्त्रों में लिखा था. इस सिद्धांत से अरस्तू और टॉल्मी के सिद्धान्तों की दिक्कतें दूर हो जाती थीं. इस शुरुआती काम के बाद अगले दो दशक गहन अध्ययन के थे.

1532 के आते-आते कॉपरनिकस अपने सिद्धांतों को एक पांडुलिपि का रूप दे चुके थे. इसका प्रकाशन उन्होंने जानबूझ कर रोके रखा क्योंकि उन्हें आशा थी कि वे कुछ और सामग्री जुटा सकेंगे. इसके अलावा उन्हें यह भय भी था कि पादरी लोग भगवान के नाम पर बड़ा बखेड़ा खड़ा करेंगे.

कुछ सालों बाद जर्मनी से एक नामी गणितज्ञ जॉर्ज रेटीकस उनके साथ काम करने पोलैंड आए. कॉपरनिकस अड़सठ के हो चुके थे जब उनकी सहमति से संशोधित पांडुलिपि को लेकर जॉर्ज रेटीकस नूरेमबर्ग पहुंचे जहां योहान पेट्रीयस नाम के प्रिंटर ने उसे ‘ऑन द रेवोल्यूशंस ऑफ द हेवनली स्फीयर्स’ नामक क्रांतिकारी किताब की शक्ल दी.

किताब की शुरुआत में कॉपरनिकस एक रेखाचित्र के माध्यम से ब्रह्माण्ड के आकार के बारे में बताया. इसमें सूर्य को केंद्र में रख उन्होंने उसके चारों तरफ अलग- अलग कक्षाओं में परिक्रमा करने वाले सभी ग्रहों को दिखाया गया था. जटिल गणनाओं के बाद उन्होंने यह भी बताया था कि इनमें से हर ग्रह को सूर्य का एक फेरा लगाने में कितना समय लगता है. आज के उन्नत खगोलविज्ञान और उसकी तकनीकों की मदद से जो ग्रहों की परिक्रमा का जो समय निकलता है, कॉपरनिकस की गणना आश्चर्यजनक रूप से उसके बहुत करीब है.

किताब छपकर नहीं आई थी और लम्बे समय से बीमार कॉपरनिकस कोमा में जा चुके थे. बताते हैं कि जब पहली प्रति उनके पास पहुंचाई गई वे बेहोशी से उठ बैठे और लम्बे समय तक आंखें मूंदे किताब को थामे रहे. कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई. वे यह देखने को जीवित नहीं बचे कि कैसे उनकी महान क्रांतिकारी रचना ने पादरियों और धर्मगुरुओं के बनाए संसार को उसकी धुरी से रपटा दिया था.

जाहिर है कॉपरनिकस की किताब ने धर्म के कारोबारियों को बौखला दिया. चर्च का आधिकारिक बयान आया जिसमें किताब ‘झूठा और पवित्र धर्मशास्त्र की खिलाफत करने वाला’ बताया गया.

कोई 60 साल बाद इटली के ब्रूनो को सिर्फ इसलिए ज़िंदा जलाए जाने की सजा दी गयी कि उसने कॉपरनिकस के सिद्धांत का प्रचार-प्रसार किया. इसी अपराध के लिए गैलीलियो को भी ज़िंदा तो नहीं जलाया गया, अलबत्ता उसके समूचे जीवन को अपमान और तिरस्कार से भर दिया गया.

आज जब आदमी मंगल पर घर बनाने की कल्पना कर रहा है हमें कॉपरनिकस को याद रखना चाहिए, समूचे अन्तरिक्ष विज्ञान की बुनियाद में जिसकी चालीस-पचास सालों की साधना चिनी हुई है. कॉपरनिकस का जीवन बताता है सच्चाई की खोज कभी निष्फल नहीं जाती और उसकी रोशनी सदियों बाद तक आदमी के रास्ते को आलोकित करती रहती है. 1543 में आज ही के दिन 24 मई को कॉपरनिकस की देह की मृत्यु हुई. उनकी आत्मा दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में जीवित है.

  • अशोक पांडे

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