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क्या आदिवासी हिन्दू हैं ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 17, 2021
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क्या आदिवासी हिन्दू हैं ?

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

यह सवाल उत्तेजक और विवादास्पद है कि आदिवासी दरअसल अपनी बुनियाद में ही हिन्दू हैं या उनका हिन्दूकरण करने की कोशिशें लंबे अरसे से की जा रही हैं. समाजशास्त्र, इतिहास और नृतत्वशास्त्र के कुछ विद्वानों के अकादेमिक ऐलान के साथ साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतिनिधि संस्थाएं मसलन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी सभी सम्बद्ध इकाइयां इरादतन समाजसेवा कहते शैक्षणिक एवं अन्य संस्थाओं के जरिए आदिवासियों को ‘वनवासी’ कहती उन्हें अपनी गढ़ी परिभाषा में पहले हिन्दू धर्म का और अब हिन्दुत्व का अविभाज्य अंग करार दे रही हैं. अंगरेजी शब्द ‘इन्डिजिनस‘ का हिन्दी अनुवाद ‘आदिवासी’ तो दुनिया में साहित्य और गम्भीर लेखन में मौजूद है. भारत में आदिवासियों का बड़ा धड़ा हिन्दू कहलाने से परहेज करता है. इसके बरक्स कई आदिवासी हिन्दू धर्म की मान्यताओं, प्रथाओं और परंपराओं में शामिल शरीक होते भी चले जा रहे हैं. बी.बी. कोसांबी उसे व्यापक भारतीय समाज के प्रसार के रूप में कहते हैं.

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कई आदिवासी विचारकों ने हिन्दुत्व के छाते के नीचे आदिवासियों को खड़ा करने का विरोध किया है. आदिवासी शब्द को ही समझना कठिन है. संविधान में आदिवासी के बदले ‘आदिम जनजाति’, कभी ‘ट्राइबल’, कभी ‘वनवासी’ और अब अनुसूचित जनजाति शब्द से पहचाना जाता है. संविधान सभा में आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा ने चिढ़कर कहा था ‘आदिवासियों को ‘जंगली‘ तक कहा जाता है.’ कई लोग उन्हें ‘भूमिपुत्र’ या ‘वनपुत्र’ कहना ज्यादा मुनासिब समझते रहते हैं. तो उन्हें आदिपुत्र और आदिपुत्री भी कहा जा सकता है.

अपनी ताजा किताब ‘हिन्दू एकता बनाम ज्ञान की राजनीति’ में समाजचेता वैज्ञानिक वृत्ति के लेखक और शोधकर्ता अभय कुमार दुबे आदिवासियों के हिन्दूकरण के संबंध में तर्क करते हैं कि ‘संघ विरोधी विमर्श में यह दावा बड़े जोश के साथ किया जाता है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. वे ब्राह्मणवाद के तहत जातिप्रथा को नहीं मानते और उनमें भक्ति तत्व ही नहीं है. इसमें कोई शक नहीं कि इन दावों में बड़ी हद तक सचाई भी है, लेकिन ये दावे कुछ इस तरह से किये जाते हैं मानो सदियों से हिंदू समाज और आदिवासी समाज दो अलग-अलग खानों में एक दूसरे से अपरिचित बने रहे हों. 1941 में प्रकाशित अपने बहुचर्चित लेख ‘हिंदू मेथड आफ ट्राइबल एब्जाॅप्शन’ में प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस ने उन धीरे-धीरे चलने वाली गहन प्रक्रियाओं का वर्णन किया है, जो प्राचीन काल से ही हिंदू दायरे और आदिवासियों को परस्पर निकट लाने की भूमिका निभाती रही हैं.’

प्रसिद्ध भारतीय मानवशास्त्री निर्मल कुमार बोस गांधीजी के निजी सचिव भी रहे हैं. उन्होंने नई अवधारणा प्रस्तुत की थी जिसे गांधी, नेहरू, ठक्कर बापा बल्कि अंबेडकर सहित पूरी संविधान सभा ने भी स्वीकार कर लिया था. इसे विश्वविद्यालयों में मानवशास्त्र तथा समाजशास्त्र के पाठ्यक्रमों के आधारभूत सिद्धांतों की तरह पढ़ाया जाता है. इसका श्रेय एम. एन. श्रीनिवास को दिया जाता है जो निर्मल बोस के दृष्टिकोण के समर्थक रहे हैं. नई चिंताओं से लबरेज खोजों के कारण प्रसिद्ध मानवशास्त्री और निर्मल बोस के समकालीन तारकचंद्र दास (1898-1964) उभर रहे हैं. उन्होंने अपनी समझ की तात्विकता को बेहतर, वैज्ञानिक और सेक्युलर आधारों पर समीक्षित करते लगभग उलट या अलग निष्कर्ष निकाले. तारकदास की खोजें मैदानी हकीकतों पर ज्यादा निर्भर रही हैं. उन्होंने यह भी कहा ‘जनजातियों का आजादी पसंद तबका ब्रिटिश वर्चस्व और हिन्दू संस्कृति के आगे बढ़ते कदमों के सामने ठुकराने की बजाय पीछे हट गया और उसने पहाड़ों की कंदराओं और साल के जंगलों में शरण ली. उसने अपने समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए सामाजिक वर्जनाओं की दीवारें खड़ी कर ली.’

गोविन्द सदाशिव धुर्वेे जनजातियों को जाति मानने की बजाय ‘पिछड़े हिन्दुओं’ की संज्ञा देते हैं. इसके ठीक उलट आदिवासी अकादेमिक वर्जीनियस खाखा मानते हैं कि जनजातियों को हिन्दू नहीं कहा जा सकता. उनका तर्क है कि जनजातियां प्राकृतिक धर्म मानती हैं. भले ही उसके कुछ तत्व हिन्दू धर्म के तत्वों के सामंजस्य में या समानान्तर भी लगें. आदिवासियों के कई जनजातीय आचरण और व्यवहार अमेरिका और अफ्रीका की जनजातियों के व्यवहारों से काफी मिलते जुलते हैं. धुर्वे के विचारों से लाभ उठाते दक्षिणपंथियों ने आदिवासियों को हिन्दू धर्म का हिस्सा करार दिया है. खाखा आपत्ति करते हैं कि गैरजनजातीय समाजों से तुलना करते हुए आदिवासियों का जातियों के खांचे में ढालकर सामाजिक निर्धारण किया जाता है. वह एक अवैज्ञानिक फाॅर्मूला है.

विचारक वाहरू सोनवड़े का कहना है ‘आदिवासी लोग बिल्कुल हिन्दू नहीं है इसीलिए हिन्दू कोड बिल आदिवासियों पर लागू नहीं किया जाता.’ आदिवासी विद्वान डा. रामदयाल मुंडा ने अपनी किताब में आदिवासियों को हिन्दू बताने से होने वाले दूरगामी परिणामों की ओर इशारा किया है. उन्होंने कहा ऐसा होने पर पूरे हिन्दू समाज में आदिवासियों का सामाजिक स्वीकार और स्तर अनुसूचित जातियों अर्थात दलितों के समकक्ष बताया जाकर नीचे कर दिया जाता है.

ए. के. पंकज भारत की जनगणना के आधार पर नई बात कहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत में आदिवासियों के ईसाईकरण से ज्यादा हिंदूकरण हुआ. अंग्रेजी राज में 30 लाख लोगों में 16 लाख हिंदू बन गए. सिर्फ 35 गोंडों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया. बीस लाख भीलों में सोलह लाख हिंदू बन गए. आठ हजार ने मुस्लिम धर्म अपनाया और केवल 133 ने ईसाईयत ली. पच्चीस लाख संथालों में दस लाख हिंदू बने जबकि ईसाई धर्म अपनाने वालों की संख्या केवल चौबीस हजार रही है. इसी तरह दस लाख उरांव में चार लाख हिंदू और दो लाख ईसाई बने. यह संयोगवश है कि 1920 से 1930 का दशक गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी आंदोलन का सबसे सक्रिय दौर रहा है.

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक देश के 30 राज्यों में कुल 705 जनजातियां रहती हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और बाद में बीजेपी में गए आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि ‘जिसकी जो इच्छा हो वह उस धर्म को मानें. संविधान और भारत का विचार दर्शन यही कहता है. यही तो हिन्दुत्व विचारधारा कहती है.’ लेखक अश्विनी पंकज ने अपनी किताब ‘मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा’ के पेज नंबर 68 में यह जिक्र किया कि ‘जयपाल सिंह मुंडा की बनाई आदिवासी महासभा को लाखों आदिवासियों ने अपना समर्थन दिया. 1939 में उन्हें कमजोर करने के लिए ठक्कर बापा ने राजेंद्र प्रसाद के कहने पर आदिम जाति सेवक मंडल बनाया जिसने आदिवासियों के बीच हिंदूकरण की प्रक्रिया की सांगठनिक और राज्य प्रायोजित शुरुआत की.’

हिन्दुइज़्म में आदिवासियों को शामिल करने की प्रक्रिया पर गहरी आपत्ति करते लाल सिंह चौहान का कहना है कि आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं. अब तय है कि आर्य बाहर से आए हैं. यदि आदिवासी हिन्दू हैं तो आर्यों के आने के पहले जो लोग इस देश में रहते और आर्यों से युद्ध हारने के बाद घने जंगलों में बसकर सदियों से वहां रह रहे हैं, वे कौन हैं ? प्राचीन इतिहास में आर्य और अनार्य अलग अलग संबोधन रहे हैं. अनार्य देश के मूल निवासी थे, तो उन्हें आदिवासी (भी) कहते आर्य जाति के हिन्दुओं में कैसे शामिल किया जा सकता है ?

आदिवासियों का कोई मूर्तिमान देवता नहीं होता. वे निराकार आराध्य के उपासक हैं. आर्यों ने तो अपने तमाम साकार देवता रच लिए हैं. कई आदिवासी आर्यों की सोहबत में रहने के कारण कुछ प्रथाओं में शामिल होते गए हैं. आदिवासियों की भी कई आदतें, हावभाव और प्रथाएं हिन्दुुओं द्वारा जज्ब कर ली गई हैं. चौहान कहते हैं हिन्दू धर्म बुनियाद में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का धर्म रहा है. वहां वर्णाश्रम और वर्ग विभेद के प्रतिबंध भी हैं. यह सब आदिवासी जीवन में नहीं है. अंगरेजों ने हिन्दू समाज की कई बुराइयों को दूर करने के लिए भी शिक्षा का प्रसार किया. इससे भी हिन्दू धर्म की आदिवासियों पर आक्रामकता को लेकर समझ की एक नई खिड़की खुली.

लेखक डा. गोविन्द गारे यह थीसिस खारिज करते हैं कि आदिवासियों को हिन्दू धर्म का अंश माना जाए. हिन्दुओं का मुख्य मकसद तो आदिवासियों पर हुकूमत करना और उनसे लाभ उठाते अपनी दकियानूस समाज व्यवस्था को लगातार मजबूत और महफूज रखना रहा है. उन्हें सफलता भी मिलती रही है क्योंकि शिक्षा के अभाव के कारण गरीबी और बदनसीबी झेलते कई आदिवासी हिन्दू प्रथाओं में शामिल होते रहे. उन पर नए-नए भगवान थोपे जाते रहे हैं. उनकी संस्कृति या तो हड़पी जा रही या मिटाई जा रही है.

हजारों आदिवासी दिल्ली या अन्य राजधानियों में रोजगार के लिए बरसों से रह रहे हैं. उनके आंकड़े भी जनगणना में शामिल नहीं किये जाते. न ही उनके राशनकार्ड बनते हैं, न ही वे कहीं के वोटर होते हैं. इस तरह इन्हें नागरिकता से भी वंचित रखा जाता है. घनश्याम गागराई कहते हैं कि मौजूदा शिक्षा पद्धति के कारण आदिवासी बच्चों को हिन्दुओं के सभी तीज त्यौहारों की जानकारी और मानने के हालात पैदा किए जाते हैं. वे अपने मूल तीज त्यौहार तक याद नहीं रख पाते. उनकी सांस्कृतिक-सामाजिकता इरादतन धूमिल की जा रही है. मसलन, विवाह के नाम पर हिन्दू समाज में लिया जाने वाला दहेज एक दैत्य की तरह आदिवासी समाज में भी प्रवेश कर चुका है. गागराई सूक्ष्म बात कहते हैं कि कई आदिवासियों की संस्कृति शहरी हो रही है भले ही उनकी व्यापक सामुदायिक पहचान जातीय नस्ल की नहीं है.

कुछ आदिवासियों का कहना है कि प्रसिद्ध आदिवासी चिंतक डॉ. रामदयाल मुंडा ने आदिवासी धर्म और आध्यात्मिकता को वैचारिक आधार देते हुए ‘आदि धर्म’ नाम की महत्वपूर्ण किताब लिखी है. उनकी यह किताब संघ के ‘एक धर्म हिंदू’ नामक नारे का प्रतिपक्ष है. रांची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा था कि आदिवासियों को सरना धर्म कोड की जरूरत नहीं है. संघ तो उन्हें हिंदू मानता है. तब आदिवासी समाज में काफी उलट प्रतिक्रिया हुई थी. संघ बिल्कुल नहीं चाहता कि आदिवासी हिंदुत्व के फ्रेम से बाहर हो जाएं. उन्हें रोकने के लिए कोई न कोई वैधानिक रास्ता जरूरी है इसलिए जहां जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां वहां धर्मांतरण के खिलाफ अधिनियम पारित कर कठोरता के साथ आदिवासियों के ईसाई बनने पर दबाव बनाया जाए और जो आदिवासी ईसाई बन चुके हैं उनकी हिंदू धर्म में वापसी के लिए रास्ता खोला जाए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सर संघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि आगामी जनगणना में धर्म वाले कॉलम में आदिवासी अपना धर्म हिंदू लिखें. इसके लिए संघ देश भर में अभियान चलाएगा. झारखंड में लंबे समय से आदिवासी अपने लिए सरना धर्म कोड की मांग कर रहे हैं. सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा कहते हैं कि मोहन भागवत के कहने भर से हम आदिवासी हिंदू धर्म नहीं अपनाने वाले हैं. बीती दो जनगणना में हमने अपना धर्म सरना लिखा है. झारखंड ही नहीं, कुल 21 राज्यों के आदिवासियों ने सरना लिखा है. इस बार भी लिखेंगे.

आदिवासी लेखक और सेंट्रल यूनिवर्सिटी गया में असिस्टेंट प्रोफेसर अनुज लुगुन कहते हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. दरअसल, संघ की खयाली चिंता है कि हिंदू आबादी बढ़ाएंगे. इसके लिए दस प्रतिशत आदिवासियों को उसमें शामिल करना चाहते हैं. अगर संघ की चिंता है कि आदिवासी दूसरे धर्मों में नहीं जाएं, तो केंद्र में उसकी सरकार को सरना धर्म कोड लागू करा देना चाहिए. लगातार मांग के बावजूद संसद के भीतर यह विधेयक अभी तक पेश नहीं किया गया है. इसे कांग्रेस भी पेश नहीं करना चाहती क्योंकि उसके साथ ईसाई आदिवासियों की बड़ी संख्या है.’

भारतीय ट्राइबल पार्टी के मुखिया छोटूभाई वासवा कहते हैं कि ‘आदिवासियों के लिए आदिवासी धर्म का ही कॉलम होना चाहिए, सरना, भील, गोंड या मुंडा भी नहीं. वे कहते हैं हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं है. संघ वाले ‘हिंदू’ शब्द स्थापित करना चाहते हैं. वह तो वास्तव में सनातन धर्म है.’ वासवा के अनुसार ‘जब तक बाहरी लोग आदिवासी इलाकों में नहीं आए थे, जन्म से लेकर मृत्यु तक आदिवासी संस्कृति कायम थी. भारत का असली इतिहास तो आदिवासियों से शुरू होता है. ए0 गौतम ने अपनी किताब ‘दि हिंदु आई जेरान ऑफ ट्राइबल ऑफ झारखंडः  ए आउटलाइन सिन्स बिगिनिंग’ में लिखा है कि धार्मिक बंटवारे की जड़ उन्नीसवीं सदी से ही शुरू होती है. कुछ लेखकों और विचारों तथा आदिवासी नेताओं का कहना है कि प्रसिद्ध आदिवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा ने ईसाई मिशनरियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. वह बाद में ब्रिटिश राज के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई के रूप में चित्रित किया गया. हालांकि बिरसा मुंडा का आंदोलन ईसाई धर्म प्रचार के खिलाफ भी काफी मुखर था. उन्होंने सरना धर्म को फिर से सामने रखा था. इसके बारे में हिंदुत्ववादी संगठनों का तर्क है कि सरना और हिंदू धर्म में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों प्रकृति और अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं. इसके विरोध में भी तर्क हैं क्योंकि आदिवासी हिंदुओं की तरह जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते और मूर्ति पूजा भी नहीं करते.

आदिवासियों का धर्म क्या है ?

यह सवाल देश और आदिवासियों तक को लगातार परेशान किए हुए है. सर्वसम्मत उत्तर या हल अभी तक मिल नहीं रहा है. जानबूझकर या नादानी से भी कई पक्षों द्वारा लगातार उलझनें पैदा की जा रही हैं. मामला कब तक हल होगा, यह भी स्पष्ट नहीं है. अंग्रेजों की हुकूमत के वक्त 1891 की जनसंख्या गणना में आदिवासियों के लिए कॉलम था ‘फॉरेस्ट ट्राइब.’ 1901 में उसे लिखा गया ‘एनीमिस्ट’ या प्रकृतिवादी. 1911 में लिखा गया ‘ट्राइबल एनीमिस्ट.’ 1921 में लिखा गया ‘हिल ऐंड फॉरेस्ट ट्राइब.’ 1931 में लिखा गया ‘प्रिमिटिव ट्राइब.’ 1941 में लिखा गया ‘ट्राइब्स.’ देश के आजाद होने के बाद 1951 की मर्दुमशुमारी में आदिवासी आबादी को व्यक्त करने वाला कॉलम ही हटा दिया गया. इसी दरम्यान कई आदिवासी ईसाइयत में धर्मांतरित हो गए थे. बहलाफुसला कर भी धर्म परिवर्तित कर दिए गए थे, इस पर संदेह का कोई सवाल नहीं है.

आदिवासियों के लिए पूरे जीवन प्रखर विदुषी, ईमानदार और समाजचेता बुद्धिजीवी झारखंड निवासी रमणिका गुप्ता ने महत्वपूर्ण प्रतिमान स्थापित किए है. आदिवासियों के लिए उनकी सेवाएं पुरअसर, भविष्यमूलक और अनुसंधान और अनुशीलन के उच्च स्तर पर रही हैं. उन्हें उद्धरित करना मुनासिब होगा – ‘आज कोई सबसे बड़ा खतरा अगर आदिवासी जमात को है तो वह उसकी पहचान मिटने का है. 21वीं सदी में उसकी पहचान मिटाने की साजिश एक योजनाबद्ध तरीके से रची जा रही है. किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है और भारत में यह काम आज हिंदुत्ववादियों ने शुरू कर दिया है. ‘आदिवासी’ की पहचान और नाम छीनकर उसे ‘वनवासी’ घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है. वह भूल जाए अपनी संस्कृति और अपनी भाषा. आदिवासी का अपना धर्म ‘सरना’ है जो प्रकृति का धर्म है. वह पेड़ों और अपने पूर्वजों की पूजा करता है. उसके भगवान या देवता की जड़ें धरती में हैं.’

आदिवासी अपने आपको हिन्दू नहीं कहता और अपनी पहचान अपने धर्म से नहीं बल्कि ‘तुम कौन हो पूछे जाने पर’ करता है ‘मैं आदिवासी हूं.’ वह औरों की तरह हिन्दू मुसलमान या ईसाई कहकर अपना परिचय नहीं देता. आज एक सोची समझी चाल के तहत उसका हिन्दूकरण किया जा रहा है. कहीं उसका रिश्ता राम से जोड़ा जा रहा है, तो कहीं शिव से. और उसे अपने ही उन आदिवासी भाइयों के खिलाफ भड़काया जा रहा है, जो बहुसंख्यक वर्चस्ववादी हिन्दुओं के जातीय भेदभाव भरे व्यवहार से तंग आकर धर्म परिवर्तन कर चुके थे. उड़ीसा में यह क्रम लगातार जारी है. मध्यप्रदेश और झारखंड में ‘घर वापसी’ के अभियान चलाए जा रहे हैं जैसे कि पहले वह हिन्दू रहा हो और बाद में रूठकर आदिवासी सरना या ईसाई बन गया हो और अब पुनः हिन्दू बन रहा हो. कितना बड़ा झूठ बोला जा रहा है उस पर. उसे नहीं बताया जा रहा कि इस ‘घर वापसी’ के आयोजन के बाद हिन्दुओं की जातियों में विभाजित समाज के सबसे निम्न दर्जे पर उसे दाखिला दिया जा रहा है. सेवकों की जाति में उसे रखा जाएगा, शासकों की जाति ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों में नहीं इसलिए इस समय जरूरत है आदिवासी समाज में उसका प्रबुद्ध वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, साहित्यकार और समृद्ध वर्ग अपने समाज को एकीकृत करके अपनी अस्मिता अपने नाम और अपनी संस्कृति को बचाए.

विदेशी हमले हुए, अंग्रेजों का राज आया पर आदिवासी ही एक ऐसी जमात थी जिसने कभी समर्पण नहीं किया, भले लड़ते लड़ते मारे गए सब के सब कबीले वाले. 1857 की आजादी की प्रथम लड़ाई से पहले ही आदिवासियों ने भारत में अंग्रेजों या अंग्रेजों द्वारा घोषित रजवाड़ों या जमींदारों का विरोध करना शुरू कर दिया था. देश आज़ाद होने से पहले ही अंग्रेजों ने आदिवासियों के जंगल में प्रवेश पर रोक लगाकर आदिवासियों को वहां से खदेड़ने की योजना लागू करनी शुरू कर दी थी और इन्हें जंगल की उपज के सब अधिकारों से वंचित कर दिया गया था.

दरअसल सरकार की ये वन नीतियां, वन प्रबंधन और वन कानून उसकी स्वार्थपूर्ण तथा छल बल की अभिरुचियों पर आधारित थी. आजादी के बाद औद्योगीकरण तथा व्यापारियों की धनलिप्सा इनके आधार बन गई थी. इस प्रकार अपने ही देश की सरकार द्वारा ही जंगलवासियों को उनके परंपरागत वन अधिकारों से लगातार वंचित किया जाता रहा था. जंगल के व्यवसायीकरण के कारण जंगलों को बर्बरतापूर्वक उजाड़ा भी जाने लगा था. इस प्रकार आजा़दी के बाद की सरकार ने न केवल साम्राज्यवादी सरकार के सिद्धान्तों को दोहराया बल्कि उन्हें और भी सशक्त और सबल बनाया, जिसका नतीजा निकला वन में रहने वालों यानी आदिवासियों का खदेड़ा जाना और जंगल पर राज्य के वन विभाग का एकाधिकार स्थापित करना.

संविधान सभा में आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा ने 24 अगस्त 1949 को अनुच्छेद 292 पर सार्थक बहस करते याद दिलाया था कि अध्यक्ष डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने रामगढ़ कांग्रेस की स्वागत समिति के सभापति की हैसियत में कहा था कि इस इलाके के निवासी अधिकतर वे लोग हैं, जो भारत के आदिवासी कहे जाते हैं. उनकी सभ्यता अन्य लोगों की सभ्यता से बहुत भिन्न भी है. प्राचीन वस्तुओं की खोज से यह प्रमाणित हुआ है कि यह सभ्यता बहुत प्राचीन है. आदिवासियों का वंश (आस्ट्रिक) आर्य वंश से भिन्न है. हालांकि जयपाल सिंह ने माना कि भारत के कुछ भागों में अंतरजातीय रक्तसंबंध हुए हैं. नतीजतन कई आदिवासी हिन्दू संप्रदाय में शामिल हो गए हैं लेकिन कुछ भागों में ऐसा नहीं भी हुआ है. पुराने लोगों और नवागन्तुकों में संघर्ष भी हुआ है. आर्यों के गिरोह इस देश में आए तो उनका स्वागत नहीं हुआ क्योंकि वे हमलावर थे. उन्होंने आदिवासियों को दूर जंगलों में खदेड़ दिया. जयपाल सिंह ने कहा कि नतीजतन आज भी असम, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार से निकाले हुए लगभग दस लाख लोग एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते फिर रहे हैं.

जयपाल सिंह के बरक्स गांधी के चहेते ठक्कर बापा ने कहा कि उड़ीसा में ब्राह्मणों का एक वर्ग अपने को आरण्यक अर्थात वन ब्राह्मण कहता है. उन्होंने कहा कि आदिवासी और गैर-आदिवासी के बीच अंतर करने से उत्पन्न मुसीबतों से मुल्क को बचाया जाना चाहिए. यह भी कि आर्य या वन ब्राह्मण जैसे वर्ग भी यही कोशिश करें कि आदिवासियों में भी उनका शुमार किया जाए. लक्ष्मीनारायण साहू ने भी कहा पहले के भी कई आदिवासी हिन्दू हो गए हैं. एबओरीजीनल्स के कुछ रीतिरिवाज हिन्दुओं में आ गए हैं और हिन्दुओं के कुछ अच्छे रीतिरिवाज आदिवासियों के भीतर आ गए हैं. यह इतिहाससम्मत तथ्य है कि देश में करोड़ों आदिवासी हजारों वर्षों से कथित मुख्यधारा के नागरिक जीवन से कटकर वन क्षेत्रों में अपनी संस्कृति, परंपरा, स्थानिकता, सामूहिकता और पारस्परिकता के साथ जीवनयापन करते रहे हैं. सदियों से चली आ रही आदिवासी जीवन पद्धति की उपेक्षा करते हुए उसमें हस्तक्षेप करने का स्वयमेव अधिकार ले लेना संविधान के मकसदों से मेल नहीं खाता.

धर्म के मानने वालों के संबंध में परिभाषा

यह महत्वपूर्ण है कि संविधान में किसी धर्म के मानने वालों के संबंध में कोई परिभाषा नहीं है, न ही शब्द अल्पसंख्यक की. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग 1992 की धारा 2 (ग) के अनुसार केन्द्र शासन ने अल्पसंख्यकों की परिभाषा को स्पष्ट करते मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध और पारसियों को अधिसूचना दिनांक 23.10.93 के द्वारा शामिल किया. दलितों और आदिवासियों के लिए किसी परिभाषा का निर्धारण नहीं किया गया. उन्हें अलगाव का मनुष्य संकुल व्यक्त करते संविधान की भाषा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कहकर आरक्षित वर्गों में शामिल किया गया.

धर्म से अलग हटकर जाति के खांचों में बंटी हिन्दू जातिवादिता के तहत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्य कुल सवर्ण कहलाए. शेष सभी शूद्रों की परिभाषा में रखे गए. पिछड़ों का भी वर्गीकरण करते दलितों और आदिवासियों को सबसे नीचे त्यज्य स्थिति में रखा गया. दलित वर्ग सदियों से नागर सभ्यता में सबसे उपेक्षित और पीडि़त होने के बावजूद वन सभ्यता में शामिल नहीं हुआ. इसके बरक्स आदिवासी कभी भी नागर सभ्यता का हिस्सा नहीं रहे. आदिवासियों का शुरू से कहना है कि वे जातिवाद की थ्योरी के परे हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में आदिवासियों की संख्या 10,42,81,034 देश की आबादी का 8.6 प्रतिशत है. सांसद रामदयाल मुंडा ने इसीलिए ‘आदि धर्म’ की वकालत की थी.

2011 की जनसंख्या गणना के पहले से आदिवासी संगठन पुरजोर लगातार मांग करते रहे हैं कि आदिवासियों के लिए उनका धर्म उल्लेखित करने हेतु अलग कॉलम की व्यवस्था की जाए. किसी एक नाम को लेकर उनमें भी पूरी सहमति नहीं है. कुल मिलाकर आम सहमति है कि उन्हें हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख से अलग हटकर अपना धर्म चिन्हित करने के लिए विधिक स्कोप दिया जाए. तयशुदा है कि जाति नाम का शब्द आदिवासियों के लिए बना ही नहीं है, न ही उन्होंने उस पर कोई आचरण किया है. उन्हें छोड़कर हिंदू धर्म से जुड़े सभी लोग चाहे दलित हों या पिछड़ी जातियों के हों, जातिगत ढांचे में वर्णित हैं. वर्णाश्रम व्यवस्था भी उन पर चिपकी हुई ही है. जाति प्रथा सदियों से जीवित है लेकिन जातिवाद रहित आदिवासियों का जीवन उसके समानांतर रहा है.

आदिवासी प्रतिनिधियों का आरोप है जनगणना में धर्म के कॉलम में उन्हें ट्राइबल या एबॉरिजिनल रिलीजन यानी ‘मूलनिवासी धर्म’ चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए. आदिवासियों की गिनती अलग अलग धर्मों में बंटती गई. उसके चलते उनके समुदाय की संख्या कम गिनी जा रही है. धर्म के लिए सिर्फ छह विकल्प दिए जाते हैं – हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख. इससे नुकसान यह है कि आगे चलकर पता भी नहीं चल पाएगा कि देश में आदिवासियों की वास्तविक आबादी कितनी है ? आदिवासियों को हिंदू या किसी अन्य धर्म में जोड़कर दिखाया जाने लगा.

आरोप है मूलनिवासी का विकल्प हटाकर सरकार ने 1947 से ही उन्हें धार्मिक गुलाम बनाना शुरू कर दिया. आदिवासियों का कहना है कि देश में आदिवासियों में कुल 83 धार्मिक रीतिरिवाज हैं. वे राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट धार्मिक पहचान चाहते हैं, जिससे मजबूरन किसी अन्य धर्म का दामन थामना न पड़े. क्षेत्रीय स्तर पर मान्यताओं और सांस्कृतिक स्वरूपों में विविधता भले ही हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सभी आदिवासियों के लिए समान धार्मिक पहचान या कोड की उनकी मांग है. उन्होंने कहा हिंदू धर्म में भी तो धार्मिक रीति रिवाज या पूजा-अर्चना की विधियां एक जैसी नहीं हैं. आदिवासी प्रतिनिधियों का मानना है कि देश के विभिन्न आदिवासी समुदायों में धार्मिक रीति-रिवाज काफी हद तक एक जैसे ही होते हैं. सभी समुदाय मूलतः प्रकृति के पूजक हैं. उनके दार्शनिक विचार भी लगभग एक जैसे हैं. झारखंड के सरना आदिवासी इस मांग को लेकर कई वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं.

देश के सभी आदिवासी एकजुट हैं कि 2021 की जनगणना से पहले अलग धर्म कोड मिलना चाहिए. सवाल है आखिर समस्या भावनात्मक है या व्यावहारिक ? धर्म कोड में अन्य का विकल्प नहीं होने पर उन्हें हिंदू धर्म चुनने कहा जाता है. आदिवासी रिसर्जेंस के फाउंडर एडिटर और स्वतंत्र शोधकर्ता आकाश पोयाम करते हैं. जब 1941 में जनगणना की बात आई तो नृतत्वशास्त्री वेरियर एलविन, उस समय भारत सरकार के सलाहकार थे. उन्होंने बस्तर के मारिया आदिवासियों पर अध्ययन करके सलाह दी कि ये शैववाद के निकट हैं, जो हिंदू धर्म का हिस्सा है इसलिए उन्हें हिंदू धर्म के तहत रखा जाना चाहिए. उसके बाद से आदिवासियों को (जो ईसाई नहीं बने थे) हिंदू धर्म में गिना जाने लगा.

गोंडवाना महासभा ने 1950 से पहले से ही आदिवासियों के लिए अपने धर्म की मांग शुरू की थी, तभी से गोंडी धर्म की मांग होने लगी थी लेकिन उसे मान्यता नहीं मिली. देश की बड़ी आबादी को हिंदू धार्मिक रिवाजों से हटकर विशिष्ट धार्मिक विधियां अपनाने के बावजूद अलग धर्म की पहचान आदिवासियों को नहीं मिली. उनका आरोप है कि ब्राह्मणवादी विचारधारा इसके लिए जिम्मेदार है. आजादी के बाद सत्ता में ब्राह्मणवाद को मानने वाले हैं इसलिए उन्होंने आदिवासियों को उसी नजरिए से देखा. आरएसएस आदिवासियों को वनवासी कहता है इस वजह से हिंदुओं की आबादी में कुछ प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई है और वोट बैंक में भी. कई आदिवासी भी खुद को हिंदू बताने लगे हैं क्योंकि उनसे 1950 से लगातार कहा जाता रहा है कि हिंदू हो. आजादी के बाद से ही उनको हिंदू के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है. इस वजह से आज की पीढि़यां खुद को हिंदू मानने लगी हैं. उनके रीति रिवाजों का हिंदू धर्म से कोई रिश्ता नाता नहीं है.

डा. हीरालाल शुक्ल के अनुसार आज एक नया सिद्धांत ‘छद्म आदिवासीकरण’ का है. उसका प्रवाह उच्च से निम्न की ओर है. इस प्रक्रिया के तहत गैर-आदिवासी कतिपय समानताओं के आधार पर आदिवासी होने का दावा करते हैं. यह गैर-आदिवासी अस्मिता का आदिवासी अस्मिता में जुड़ने का भाव है, किन्तु इससे वास्तविक आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है. आदिवासियों को प्राप्त आरक्षण की सुविधाओं के कारण ही ऐसा भाव जागा है. आज ऐसे झूठे प्रमाणपत्रों को जुटाने वालों का एक’‘रैकेट’ है, जो इनके माध्यम से चिकित्सा तथा अभियांत्रिकी-महाविद्यालयों में प्रवेश पा चुका है.’

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