Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

किसान आंदोलन को लाल सलाम, इंकलाब जिंदाबाद !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 26, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

किसान आंदोलन को लाल सलाम, इंकलाब जिंदाबाद !

राम अयोध्या सिंह

भारत में किसान आंदोलन के आज नौ महीने पूरे हो गए. भारतीय इतिहास में किसानों का यह आंदोलन अपनी तरह का अकेला ऐसा आंदोलन है, जो भारतीय राजसत्ता और सत्ताधारी वर्ग के नियत, नीतियों, निर्णयों और कार्ययोजनाओं के खिलाफ अहिंसक तरीके से लगातार चलते हुए नौवें महीने में प्रवेश कर गया है. इतने लंबे समय तक विपरीत परिस्थितियों, विपरीत मौसम और मोदी सरकार की अमानवीय व्यवहार, षड्यंत्र और दूरभिसंधि के बीच अबतक चलता रहा है.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

एक तरफ सरकार और उसके आका पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों की भारत के किसानों को कृषि भूमि से वंचित कर उन्हें गुलाम बनाने की साज़िश है, तो दूसरी तरफ भारत की अर्थव्यवस्था के मेरुदंड और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक किसान एक-दूसरे के खिलाफ आमने-सामने खड़े हैं. एक तरफ सरकार और पूंजीपति वर्ग किसानों को जमीन से बेदखल करने के लिए कृत-संकल्पित है, वहीं दूसरी तरफ अपनी जिंदगी से भी प्यारी जमीन को हर हाल में बचाने के लिए किसान भी दृढ़प्रतिज्ञ हैं.

सरकार द्वारा दमन के सारे हथकंडे अपनाने, किसानों को बदनाम करने और आंदोलन को दिग्भ्रमित कर उसे पटरी से उतारने की हर संभव प्रयास के बावजूद किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में अपनी चट्टानी एकता का परिचय देते हुए आंदोलन को राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक महत्त्व का आंदोलन भी बना दिया है.

भारत का यह अकेला ऐसा आंदोलन है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. वास्तव में यह आंदोलन भारत की दूसरी आजादी का प्रतीक बनने के साथ ही उस आजादी का मेरुदंड बन गया है.

आज जब मोदी सरकार के हाथों में सारी संवैधानिक शक्तियां केन्द्रित हो गई हैं, संविधान और सारे संवैधानिक संस्थाओं का अपहरण कर लिया गया है और उनकी अस्मिता, प्रतिष्ठा, मर्यादा और भूमिका को तार-तार कर दिया गया है, न्यायपालिका सहित सारी स्वायत्त संस्थाओं को पालतू तोता बना दिया गया है, विरोधी दलों को लकवा मार गया है, और पूरे देश में एक अनजाना आतंक का माहौल बनाया गया है, सरकार के विरोध में सारे आंदोलन और जनसंघर्ष मृतप्राय हो चुके हैं, ऐसे में यह किसान आंदोलन अकेला समुद्र तट के प्रकाश स्तंभ की तरह अपनी जगह अटल और अडिग सीना ताने खड़ा है.

आज जब पूरा देश ही मोदी सरकार के आगे घुटने टेक चुका है, लोगों की जुबान बंद हो चुकी है, लोग अपनी जान की खैर मना रहे हैं और हर पल एक अनजाने खतरे की संभावना तले जी रहे हैं. किसानों का यह आंदोलन और संघर्ष अपने पूरे तेवर, जूनून, ऊर्जा और उत्साह के साथ अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए कमर कस जंगे-मैदान में डटा हुआ है.

किसानों का यह आंदोलन मोदी सरकार की फासीवादी, आतंकवादी, वर्चस्ववादी और दमनकारी काली करतूतों के खिलाफ भारतीय राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक बन हर तरह के झंझावातों के थपेड़े सहता हुआ दमनकारी राजसत्ता के लिए चुनौती बना हुआ है.

मोदी सरकार ने अपने तई आंदोलन को दिग्भ्रमित करने, नेताओं को बहलाने और फुसलाने के लिए झुठ, अफवाह, भयादोहन, निंदा, षड्यंत्र और दूरभिसंधि का सहारा लिया, पर वह किसानों की संकल्प-शक्ति को डिगा नहीं सकी. राष्ट्रीय अस्मिता का अंतिम किला बनकर किसानों का यह आंदोलन दमनकारी राजसत्ता के खिलाफ प्रतिरोध के अंतिम गढ़ के रूप में अविचल निष्ठा के साथ अपनी लड़ाई लड़ रहा है.

भारत और दुनिया के अनेक देशों में लोगों ने एक से बढ़कर एक जनप्रतिरोध को अभिव्यक्त करते जनांदोलनों को देखा है और उनके ऐतिहासिक महत्ता के गवाह भी रहे हैं. पर, भारत का वर्तमान किसान आंदोलन इस रूप में सबसे अलग और अनूठी विशिष्टता वाला आंदोलन है, जो नौ महीने तक भारतीय जनता के जनप्रतिरोध की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति बनकर खड़ा है.

किसानों के खिलाफ बना यह ड्रैकूनियन कानून अगर अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं, तो भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम के साथ-साथ भारत के किसान भी अपनी आजादी खोकर हमेशा के लिए गुलाम बना जाएंगे. अपने साथ-साथ देश की आजादी की रक्षा के लिए कमर कसे किसानों का यह आंदोलन राजसत्ता की संपूर्ण शक्ति को आज चुनौती दे रहा है.

हजारों किसानों के बलिदान के बावजूद भी अपने पद पर अडिग रहना कोई मामूली बात नहीं है. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देश के विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोग सम्मिलित होकर विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन कर रहे थे, और आजादी सबकी सामुहिक चेतना और जनशक्ति के प्रतिरोध का परिणाम था.

क्यूबा में फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा, फिलिस्तीन में यासिर अराफात, दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला, अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर की तरह दुनिया में अनेकों ऐतिहासिक आंदोलन और जनप्रतिरोध की लड़ाईयां लड़ी गईं, पर अपनी विशाल सदस्यता, लंबे कालखंड, वचनबद्धता और तीव्रता के मामले में यह सबसे अलग और अनूठा आंदोलन रहा है.

एक मोहनदास करमचंद गांधी के अहिंसक आंदोलन ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था, उसी के नक्शे-कदम पर चलते हुए भारत का यह किसान आंदोलन भारतीय सत्ताधारी वर्ग और उसकी प्रतिनिधि मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गई है. सरकार से न निगलते बनता है और न ही उगलते.

एक तरफ अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ भारत का पूंजीपति वर्ग अपनी जिद पर अड़ा हुआ है, तो दूसरी ओर भारत का किसान भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार राष्ट्रीय अस्मिता के साथ ही भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम की आजादी की अक्षुण्णता के लिए प्रतिबद्ध और कटिबद्ध है. भारत के इन वीर-बांकुड़ों को तहेदिल से स्वागत करते हुए अपनी सारी संवेदनाएं भी उन्हें अर्पित करता हूं. अपने किसान भाईयों को लाल सलाम, इंकलाब जिंदाबाद.

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

शुद्ध हिंदी ने हिंदुस्तानी डुबोई, अंग्रेज़ी तार दी

Next Post

स्वरा भास्कर : ज़रूरी आवाज़ को एक पल में नकारना सही नहीं

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

स्वरा भास्कर : ज़रूरी आवाज़ को एक पल में नकारना सही नहीं

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘भारतीय इतिहास का प्रमुख अन्तर्विरोध हिन्दू-मुस्लिम नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद है’ – अम्बेडकर

January 4, 2024

मार्क्स के जन्मदिन पर विशेष : मार्क्स की स्‍मृतियां – पॉल लाफार्ज

May 6, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.