Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 22, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

संघ अपने स्वयंसेवकों तथा जन-सामान्य को संघ के गठन की वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं देता क्योंकि इससे उसकी इटली के सिगनोर बेनिटो मुसोलिनी की फासीवादी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होने का पता चल जायेगा. परंतु इधर ऐसे सारे प्रमाण सामने आ चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि हेडगेवार एंड कंपनी फासिस्टों के सिर्फ मानस-पुत्र ही नहीं थे बल्कि वे सीधे तौर पर मुसोलिनी के साथ संपर्क साधे हुए थे और काफी वर्षों तक उनके निर्देशन में भारत में काम करते रहे थे.

1 अप्रैल, 1920 के दिन जर्मनी की जर्मन वर्कर्स पार्टी का नाम बदलकर नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी हुआ, जिसका संक्षिप्त नाम नाजी पार्टी होता है. हिटलर अपने कुछ अत्यंत विश्वस्त लोगों, रूडोल्फ हेस, आल्फ्रेड रोजेनबर्ग, हर्मन गोरिंग, मैक्स अमानज तथा जूलिया स्ट्रेचर के साथ इस पार्टी पर काबिज हो गया और उसने इसके तूफानी दस्ते (स्टॉर्म ट्रुपर्स) का गठन किया.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

हिटलर के इस तूफानी दस्ते की भयावह कारस्तानियों की खबरें 1923 के बाद से सारी दुनिया में फैल रहीं थीं. इसी प्रकार 1920-21 के जमाने से ही इटली में सिगनोर बेनिटो मुसोलिनी की फासीवादी पार्टी तथा उसके हथियारबंद दस्तों का बढ़ावा शुरू हुआ था.

इटली की सरकार की शह पर मुसोलिनी के सशस्त्र दस्ते वहां की सोशलिस्ट पार्टी तथा मजदूर संगठनों पर कातिलाना हमले किया करते थे. 28 अक्टूबर, 1922 को इटली के राजा, वहां की सरकार और सेना की साजिश से मुसोलिनी इटली का प्राधनमंत्री बन गया और 1924 के बाद उसने सुनियोजित ढंग से इटली की तमाम जनतांत्रिक संस्थाओं का गला घोटना शुरू किया.

1926 तक फासीवादी पार्टी को छोड़कर बाकी सभी पार्टियां भंग कर दी. सन 1920 से 1925 के दौरान सारी दुनिया में इटली की फासीवादी पार्टी की बढ़त और उसकी सफलता के किस्से भी काफी चर्चित थे.

आरएसएस के गठन के वक्त हेडगेवार के दिमाग में नाजी और फासीवादी पार्टियों का पूरा खाका निश्चित रूप से काम कर रहा था. आरएसएस के सांगठनिक स्वरूप की उनकी परिकल्पना को देखते हुए यह बात पूरे निश्चय के साथ कही जा सकती है. उन्होंने अपने संगठन के नामकरण तक में फासिस्टों से प्रेरणा ली थी. इटैलियन भाषा में ‘फासी’ शब्द ‘संघ’ का पर्यायवाची है.

इटली के फासिस्ट काली कमीज पहना करते थे. उन्हीं की तर्ज पर हेडगेवार ने संघ के कार्यकर्ताओं को काली टोपी पहनाई. दुनिया में इटली के फासिस्टों को ‘काली कमीज’, स्पेन के फासिस्टों को ‘भूरी कमीज’ के नाम से जाना जाता था, उसी प्रकार संघियों ने अपना परिचय खाकी निकर और काली टोपी वालों के रूप में स्थापित किया.

इसके अलावा संघ के सांगठनिक ढांचे को उन्होंने सचेत रूप में शुरू से ही पूरी तरह से तानाशाहीपूर्ण बनाए रखा, जिसमें संघ के सर्वोच्च नेता सरसंघचालक के प्रति पूर्ण और प्रश्नहीन निष्ठा संघ की सदस्यता की पहली शर्त रखी गई. यह बिल्कुल उसी प्रकार था जिस प्रकार फासीवादी पार्टी में हर सदस्य को ड्यूस (नेता) अर्थात् मुसोलिनी के नाम पर यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह बिना कोई प्रश्न किए नेता के आदेश का पालन करेगा.

मुसोलिनी से सीधा संपर्क

इधर ऐसे सारे प्रमाण सामने आ चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि हेडगेवार एंड कंपनी फासिस्टों के सिर्फ मानस-पुत्र ही नहीं थे, वे सीधे तौर पर मुसोलिनी के साथ संपर्क साधे हुए थे और काफी वर्षों तक उनके निर्देशन में भारत में काम करते रहे थे. ‘इकोनामिक एंड पालिटिकल वीकली’ (ईपीडब्ल्यू) के 22-28 जनवरी, 2000 के अंक में मार्जिया कैसालेरी के शोध प्रबंध ‘हिंदुत्वाज फोरेन टाइ-अप इन द नाइन्टीन थर्टीज, आर्काइवल एविडेंस’ में उन सारे तथ्यों का ब्यौरेवार विवरण दिया गया है, जिनसे आरएसएस के नेतृत्व के साथ मुसोलिनी और उसकी फासिस्ट पार्टी के सम्बंधों का खुलासा होता है.

इसमें कैसालेरी कहते हैं कि सच्चाई यह है कि हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे प्रमुख संगठनों ने न सिर्फ सचेत रूप में और जान-बूझ कर फासीवादी विचारों को अपनाया था, बल्कि इसके पीछे प्रमुख हिंदू संगठनों और फासीवादी इटली के बीच सीधे संपर्क का भी काम कर रहे थे.

कैसालेरी ने इसके प्रमाण के तौर पर आरएसएस के संस्थापकों में एक बालकृष्ण शिवराम मुंजे, जिन्हें हेडगेवार अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, की 1931 में इटली यात्रा का विस्तृत ब्यौरा दिया है. हेडगेवार के जीवनीकार एस. आर. रामास्वामी ने लिखा है कि मुंजे ने ही हेडगेवार को उनकी जवानी के दिनों में अपने घर में रखा था और बाद में कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के लिए वहां के नेशनल मेडिकल कॉलेज में भेजा था.

कैसालेरी ने ईपीडब्ल्यू के अपने लेख में बताया है कि 1931 के फरवरी और मार्च महीने के बीच मुंजे ने यूरोप की यात्रा की थी, जिस दौरान वे इटली में काफी दिनों तक रुके थे. वहां उन्होंने कुछ सैनिक स्कूलों और शिक्षा संस्थाओं का दौरा किया और खुद मुसोलिनी से मुलाकात की. मुंजे ने इन तमाम बातों को अपनी डायरी में दर्ज किया है.

अपनी डायरी में उन्होंने अपनी इटली यात्रा और मुसोलिनी के साथ हुई मुलाकात पर 13 पन्ने लिखे हैं. यह डायरी नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में ‘मुंजे पेपर्स’ के तौर पर माइक्रो फिल्म्स में सुरक्षित है.

कैसालेरी के ब्यौरों से पता चलता है कि मुंजे 15 से 24 मार्च, 1931 तक रोम में थे. 19 मार्च को वे अन्य कई स्थलों के अलावा मिलिट्री कॉलेज, सेंट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ फिजिकल एडुकेशन तथा सर्वोपरि मुसोलिनी के हमलावर दस्तों के संगठन ‘बलिल्ला’ और ‘आवांगर्द’ संगठनों में भी गये. अपनी डायरी में उन्होंने इन दोनों संगठनों के बारे में दो से अधिक पृष्ठ लिखे हैं. ये संगठन फासीवादी विचारों की दीक्षा के मुख्य संगठन थे. युवकों को इनमें दीक्षित किया जाता था.

संघ का स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा

कैसालेरी लिखते हैं कि ‘मुंजे की डायरी में इन संगठनों का जो विवरण मिलता है आश्चर्यजनक रूप से आरएसएस का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल वैसा ही है. इन संगठनों में छह से अठारह वर्ष की आयु के युवकों का दाखिला किया जाता था. उन्हें साप्ताहिक सभा में शामिल होना पड़ता था, जहां वे शारीरिक व्यायाम करते थे, अर्द्ध सैनिक प्रशिक्षण लेते थे, ड्रिल और परेड किया करते थे.’

मुंजे की डायरी में मुसोलिनी के साथ वार्ता का बखान

19 मार्च, 1931 को ही दोपहर 3 बजे इटली की फासीवादी सरकार के सदर दफ्तर पलाजो वेनेजिया में मुंजे की मुलाकात मुसोलिनी से हुई. मुंजे की डायरी के 20 मार्च के पृष्ठ पर इस मुलाकात के बारे में लिखा हुआ है. कैसालेरी ने अपने प्रबंध में डायरी के इस पूरे अंश को उद्धृत किया है जो इस प्रकार है―

जैसे ही मैंने दरवाजे पर दस्तक दी, वे उठ खड़े हुए और मेरे स्वागत के लिए आगे आये. मैंने यह कहते हुए कि मैं डॉ. मुंजे हूं, उनसे हाथ मिलाया. वे मेरे बारे में सबकुछ जानते थे और लगता था कि स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष को बहुत निकट से देख रहे थे. गांधी के लिए उनमें काफी सम्मान का भाव दिखायी दिया.

वे अपनी मेज के सामने की दूसरी कुर्सी पर मेरे ठीक सामने बैठ गये और लगभग आधा घंटा तक मुझसे बात करते रहे. उन्होंने मुझसे गांधी और उनके आंदोलन के बारे में पूछा और यह सीधा सवाल किया कि ‘क्या गोलमेज सम्मेलन भारत और इंगलैंड के बीच शांति कायम कर पायेगा ?’

मैंने कहा― यदि अंग्रेज ईमानदारी से हमें अपने साम्राज्य के अन्य हिस्सों की तरह समानता का दर्जा देते हैं तो हमें साम्राज्य के प्रति शांतिपूर्ण और विश्वासपात्र बने रहने में कोई आपत्ति नहीं है, अन्यथा संघर्ष और तेज होगा, जारी रहेगा. भारत यदि उसके प्रति मित्रवत् और शांतिपूर्ण रहता है तो इससे ब्रिटेन को लाभ होगा और यूरोपीय राष्ट्रों में वह अपनी प्रमुखता को बनाये रख सकेगा. लेकिन भारत में तब तक ऐसा नहीं होगा जब तक उसे अन्य डोमीनियन्स के साथ बराबरी की शर्त पर डोमीनियन स्टेटस नहीं मिलता.

सिगनोर मुसोलिनी मेरी इस टिप्पणी से प्रभावित दिखे. तब उन्होंने मुझसे पूछा कि आपने विश्वविद्यालय देखा. मैंने कहा―’मेरी लड़कों के सैनिक प्रशिक्षण के बारे में दिलचस्पी है और मैंने इंगलैंड, फ्रांस तथा जर्मनी के सैनिक स्कूलों को देखा है. मैं इसी उद्देश्य से इटली आया हूं तथा आभारी हूं कि विदेश विभाग और युद्ध विभाग ने इन स्कूलों में मेरे दौरे का अच्छा प्रबंध किया. आज सुबह और दोपहर को ही मैंने बलिल्ला और फासिस्ट संगठनों को देखा और उन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया. इटली को अपने विकास और समृद्धि के लिए उनकी जरूरत है. मैंने उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं देखा जबकि अखबारों में उनके बारे में तथा महामहिम आपके बारे में बहुत कुछ ऐसा पढ़ता रहा हूं जिसे मित्रतापूर्ण आलोचना नहीं कहा जा सकता.

सिगनोर मुसोलिनी―’इनके बारे में आपकी क्या राय है ?’

डॉ. मुंजे―’महामहिम, मैं काफी प्रभावित हूं. प्रत्येक महत्वाकांक्षी और विकासमान राज्य को ऐसे संगठनों की जरूरत है. भारत को उसके सैनिक पुनर्जागरण के लिए इनकी सबसे अधिक जरूरत है. पिछले डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन में भारतीयों को सैनिक पेशे से अलग कर दिया गया है. भारत अपनी रक्षा के लिए खुद को तैयार करने की इच्छा रखता है. मैं उसके लिए काम कर रहा हूं. मैंने खुद अपना संगठन इन्हीं उद्देश्यों के लिए बनाया है. इंगलैंड या भारत, जहां भी जरूरत पड़ेगी आपके बल्लिला और अन्य फासिस्ट संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक मंच से आवाज उठाने में मुझे कोई हिचक नहीं होगी. मैं इनके अच्छे भाग्य और पूर्ण सफलता की कामना करता हूं.’

यह है मुंजे की डायरी का वह अंश जिसमें उन्होंने मुसोलिनी के साथ अपनी वार्ता का बखान किया था. इटली में अन्यत्र कहां-कहां गये, इसका ब्यौरा डायरी के अन्य पृष्ठों पर दिया हुआ है. इसमें फासीवाद, उसके इतिहास और फासिस्ट क्रांति आदि के बारे में भी कई सूचनाएं दर्ज हैं. मुझे लगता है कि भारत के लिए वे सर्वथा उपयुक्त हैं. यहां की खास परिस्थिति के अनुरूप उन्हें अपनाना चाहिए. मैं इन आंदोलनों से भारी प्रभावित हुआ हूं और अपनी आंखों से पूरे विस्तार के साथ मैंने उनके कामों को देखा है.’

उल्लेखनीय है कि 31 जनवरी, 1934 के दिन हेडगेवार ने के. वाई. शास्त्री द्वारा आयोजित ‘फासीवाद और मुसोलिनी’ के बारे में एक सेमिनार की अध्यक्षता की थी.

  • स्रोत : अरुण माहेश्वरी की प्रसिद्ध पुस्तक—’आरएसएस और उसकी विचारधारा’) से साभार

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

कन्हैया कुमार कांग्रेस ज्वाइन करेगें ?

Next Post

पत्रकारिता नहीं होगी तो पत्रकार की ज़रूरत ही क्यों रहेगी ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

पत्रकारिता नहीं होगी तो पत्रकार की ज़रूरत ही क्यों रहेगी ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

किसान

December 13, 2020

कैसा सम्मान ? गत्ते और बोरी में जवानों का शव

October 11, 2017

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.