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मनीष गुप्ता हत्याकांड : हिन्दुत्व की राह में हिन्दुत्व के ‘शहीद योद्धा’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 2, 2021
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मनीष गुप्ता हत्याकांड : हिन्दुत्व की राह में हिन्दुत्व के 'शहीद योद्धा'
मीनाक्षी गुप्ता और कल्पना तिवारी

मैं बहुत खुश हूं CM योगी ने घर के बड़े अभिभावक की तरह व्यवहार किया. उन्होंने सरकारी नौकरी, आर्थिक मदद और SIT जांच की मेरी मांगें मानी है. – मीनाक्षी गुप्ता, मृतक मनीष की पत्नी.

सीएम योगी से मिलने के बाद राज्य सरकार पर उनका भरोसा बढ़ा है. उनके ऊपर परिवार की जो जिम्मेदारियां आ पड़ी हैं, वो शायद पूरा कर सकें. इस मदद के लिए सीएम योगी का आभार – कल्पना तिवारी, मृतक विवेक तिवारी की पत्नी

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मीनाक्षी गुप्ता और कल्पना तिवारी हिन्दुत्व का वह शानदार नमूना है जिसने देश में हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए अपने-अपने पतियों को ‘शहीद’ मानकर हिन्दुत्ववादी ताकतों से उसका मूल्य हासिल कर चुकी है.

लखनऊ में 28 सितंबर 2018 की रात एपल के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी अपनी सहकर्मी सना को छोड़ने अपनी एक्सयूवी से जा रहे थे. तभी रात के करीब डेढ़ बजे बाइक सवार दो पुलिसकर्मियों प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार ने उन्हें रुकने का इशारा किया था. जब ने नहीं रुके तो सिपाही प्रशांत चौधरी ने विवेक निशाना बनाकर गोली चला दी थी. जिसमें विवेक की मौत हो गई थी. जबकि सना इस हमले में बाल-बाल बच गई थीं.

उसी तरह मनीष गुप्ता की भी पुलिस ने पीट पीट कर हत्या कर दी. विगत दिनों सोमवार को गुरुग्राम से दो दोस्तों के साथ गोरखपुर घूमने आए कानपुर के रियल इस्टेट कारोबारी मनीष गुप्ता (36) की सोमवार देर रात पुलिस की पिटाई से मौत हो गई. आरोप है कि जांच का विरोध करने पर पुलिस कर्मियों ने उनकी बेरहमी से पिटाई की थी साथ ही उनके दोस्तों को भी पीटा था.

ये दो अलग अलग मामले लग सकते हैं लेकिन दोनों ही कई मामलों में एक समान है. दोनों की ही पत्नियों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया और लोगों के शानदार विरोध के आवाज को हिन्दुत्व की सरकार के साथ मिलकर सौदा कर लिया. केवल इतना ही नहीं, एक बार फिर से हिन्दुत्ववादी ताकतों के साथ मिलकर हिन्दुत्ववादी सरकार के खिलाफ उठ रहे विरोध के खिलाफ बयान जारी कर सरकार के साथ मिल गई. पत्रकार श्याम मीरा सिंह लिखते हैं –

मनीष गुप्ता और उनकी पत्नी जैसों को लगता है कि योगी राज में तभी समस्या है जब पीड़ित सवर्ण हो. अगर उस सिस्टम का शिकार कोई दलित, OBC, मुस्लिम है, तो ये तो शासन पद्धति का रूटीन काम है, उस पर कैसी चिंता ?

न जाने कितने मुसलमान इस दौरान मारे गए, ऐसे लोग तब भी योगी समर्थक बने रहे. खुद पीड़ित हुए तो न्याय की दुहाइयां दीं, लेकिन जैसे ही कुछ रियायत मिली तुरंत प्रचार में लग गईं और साबित करने भी लग गईं कि रामराज है. उन्हें एक पल के लिए याद नहीं आया कि उनसे पहले योगी शासन ने कितने मासूमों को कुचला है, कितनों के घर बर्बाद किए हैं.

मनीष गुप्ता की पत्नी का दर्द समझ सकता हूं. मगर योगी शासन का शिकार केवल वे नहीं हैं इसलिए केवल उन्हें मुआवज़ा मिल जाने से ही योगी ‘न्यायपूर्ण’ नहीं हो जाते. जिन लोगों को योगी शासन हर रोज़ कुचलता है, अगर वे लेखक, पत्रकार, दबे कुचले लोग ही अवाज़ न उठाते तो उन्हें कोई पूछने वाला नहीं था. पुलिस ने तो कह ही दिया था कि गिरकर मौत हुई है. अगर योगी शासन की और अधिक चलती तो ये साबित कर देता कि मनीष गुप्ता ने जानबूझकर ज़मीन पर गिरकर मौत चूमी है.

मनीष गुप्ता की हत्या कोई एक घटना नहीं थी बल्कि यूपी में पुलिसिया सिस्टम का रेगुलर इवेंट था. सवाल मुआवज़ा नहीं था बल्कि इस सिस्टम के शीर्ष पर बैठे आदमी के इंसान होने पर था. अगर वह इंसान है तो सबसे लिए न्याय करता, अगर वह इंसान नहीं है तो एक आदमी को मुआवज़ा मिल जाने से उसके सिस्टम को क्लीनचिट नहीं मिल जाती.

ऐसे सिस्टम के शीर्ष पर बैठे आदमी को क्लीनचिट देकर आप भी उसके अत्याचारों में हिस्सेदार हो जाती हैं, मुआवज़ा सवाल नहीं है, सवाल ‘सम्पूर्ण न्याय’ का है, जो दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों, कमज़ोरों, पीड़ितों, वंचितों के लिए भी बराबर होता लेकिन आप तो अपना न्याय लेकर निकल जा रहे हैं.

इन दोनों की पत्नियों ने अपना न्याय लेकर फिर से हिन्दुत्व के प्रचार के लिए निकल पड़ी. ये वही हिन्दुत्व है जो शुद्रों, अछूतों, आदिवासियों, मुसलमानों की इसी तरह की पुलिसिया हत्या करता है और इन जैसे लोग तालियां बजाते हुए ऐसे क्रूर हत्या का समर्थन करते हुए समर्थन में जुलूस निकालते हैं. विदित हो कि विवेक तिवारी और मनीष गुप्ता दोनों ही हिन्दुत्व और उसकी हिंसा के प्रबल समर्थक थे, जिसे भी उसी हिंसा ने निगल लिया.

20 लाख रुपया का मुआवजा देने और 2 करोड़ का मुआवजा सरकार से देने की मांग करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री के अखिलेश यादव के खिलाफ मीनाक्षी गुप्ता के विद्रोही तेवर और मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ठ उर्फ योगी आदित्यनाथ के द्वारा 10 लाख और एक नौकरी देने के बाद उसी मीनाक्षी गुप्ता का माधुर्य देख कर यह साफ लगता है कि वह यह मान रही है कि उसके पति मनीष गुप्ता ने हिन्दुत्व की राह में ‘शहादत’ दी है. ठीक इसी तरह कल्पना तिवारी ने भी अपने पति विवेक तिवारी की हत्या के बाद मान ली थी.

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हेमंत कुमार झा कहते हैं –

अभी एक परिचर्चा में सुन रहा था कि गोरखपुर में पुलिस बर्बरता का शिकार हो कर अकाल मौत मरा व्यवसायी योगी जी का बड़ा फैन और भाजपा का कट्टर समर्थक था. मन में सवाल उठा कि वह व्यवसायी जब ज़िन्दा रहा होगा तो योगी जी के प्रशासन की ‘ठोक दो’ वाले बर्बर और गैर-कानूनी रवैये पर अपने मित्रों-संबंधियों के बीच कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करता होगा. फिर, मन में जिज्ञासा उपजी कि वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच किस तरह के व्हाट्सएप मैसेजों का आदान-प्रदान करता होगा.

जाहिर है, मेरे मन में उठे सवाल और उपजी जिज्ञासाएं यूं ही शून्य में खो कर रह जाएंगी क्योंकि कोई एसआईटी इस तरह का अनुसंधान नहीं करने वाली. जरूरत भी नहीं. ‘वह क्यों मरा’, ‘उसे किसने मारा’ टाइप के सवाल भी अंततः अनुत्तरित ही रह जाने की आशंकाएं हैं क्योंकि होटल के उसके कमरे में आधी रात को अचानक से घुसने वाली पुलिस टीम के मुखिया के ऊंचे राजनीतिक संपर्कों की भी कथाएं कही जा रही हैं.

सबसे बड़ी बात कि जब राजनीतिक नेतृत्व ‘ठोक दो’ कहते हुए पुलिस वालों को कानून तोड़ने और हैवान बन जाने को प्रेरित करता है तो वह इसके लिये भी तैयार रहता है कि कभी-कभार दारोगा जी की शान में गुस्ताखी करने वाले आम और निर्दोष नागरिक भी ठोके जा ही सकते हैं. पुलिस का जज बन जाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है इसके उदाहरण के लिये योगी राज से पहले भी कई घटनाएं सामने आती रही हैं.

लेकिन, ‘तुम एक मारोगे तो हम दस मारेंगे’ की तरह के सस्ते बयान योगी आदित्यनाथ के पहले किस राज्य के किस मुख्यमंत्री ने दिया होगा ? दिया भी होगा या नहीं, यह शोध का विषय है. ‘हम दस मारेंगे…’ किसी एक के बदले आप जिन दस को मारेंगे, उन दसों की पहचान कौन करेगा ? यहीं से कानून के राज की जगह अराजकता लेने लगती है. ऐसी अराजकता, जिसे सांस्थानिक संरक्षण मिलने का खतरा उत्पन्न हो जाता है.

योगी प्रशासन के इस रुख से उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में वास्तविक सुधार कितना हुआ है, यह वहां के लोग बेहतर बता सकते हैं, लेकिन इस रुख से उत्पन्न अराजकता के शिकार हुए लोगों के परिजनों की गुहार की गूंज अक्सर उठती रहती है. मरने वाला दोषी था या निर्दोष, अगर दोषी था भी तो उसका दोष क्या था, कैसा था, यह सब तय करने के लिये अदालतें हैं, कानून की प्रक्रियाएं हैं.

नेताओं की ‘ठोक देंगे’ जैसे फूहड़ और सस्ते बयानों पर निसार होने वालों की कोई कमी नहीं. नेताओं की राजनीति को चमकाने के लिये झूठे आंकड़ों और भ्रामक प्रचारों से भरे व्हाट्सएप मैसेजेज को विद्युत गति से शेयर करने वालों के लिये तो इतने लोगों और इतने तरह के लोगों की भरमार है कि एक नए शब्द ने ही जन्म ले लिया – ‘व्हाट्सएप युनिवर्सिटी.’

इस ‘व्हाट्सएप युनिवर्सिटी’ ने लोगों की चेतनाओं को जितना प्रदूषित किया है, इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलती. संचार क्रांति के इस तरह सुनियोजित दुरुपयोग को अगर संगठित शक्तियां प्रोत्साहित करने पर तुल जाएं तो हालात कितने बदतर हो सकते हैं, यह आज देखा जा सकता है, जब आम लोगों के लिये सही-गलत की पहचान धूमिल होने लगी है.

वो एक कवि ने कहा है न, ‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.’ ‘ठोक देंगे’ पर निसार बंदे भी कब बेकसूर ठोक दिए जा सकते हैं, यह कोई नहीं कह सकता क्योंकि, आवारा आग मकानों में रहने वालों की पहचान नहीं करती.

हिन्दुत्व को स्थापित करने में ‘शहादत’ देते इन लोगों और उसके परिजनों को इस बात न तो कभी ग्लानि ही हो सकती है कि वह जिसे ‘शहादत’ देना समझ रही है, दरअसल वह मानवता के एक ऐसे नृशंस ताकतों का साझीदार बन रहे हैं जो करोड़ों दलितों पिछड़ों (शुद्रों), आदिवासियों, मुसलमानों को गुलाम बनाने की कोशिश में लाखों लोगों को मौत की नींद सुला रहे हैं.

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