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Home गेस्ट ब्लॉग

कट्टरपंथ के शिकार विराट कोहली और रावलपिंडी के ये लड़के

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 1, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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कट्टरपंथ के शिकार विराट कोहली और रावलपिंडी के ये लड़के

Shyam Mira Singhश्याम मीरा सिंह

विराट कोहली आज अपने ही उगाए पेड़ के बीज ढो रहे हैं. उन्हें उसी कट्टरपंथ ने शिकार बनाया जिसके संरक्षण के लिए उन्होंने किसान आंदोलन पर ट्वीट करते हुए कहा था कि ‘यह आन्तरिक मामला है.’

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किसानों को खालिस्तानी कहना और कोहली को देशद्रोही कहना, ये ‘आन्तरिक मामला’ नहीं हैं. ये हमारे समाज के वैचारिक और मानसिक रूप से गंभीर बीमार होने को दिखाते हैं. ये समाज की चिंता के विषय हैं, आंतरिक मामले नहीं. मोहल्ले में आग लगेगी तब न कोहली का घर बचेगा न सहवाग का. पर हम उनके साथ हैं.

किसी अंग्रेज़ी विचारक की एक बात पढ़ी थी कि अगर किसी समाज में एक समूह ख़तरे में है तो पूरा समाज ख़तरे में हैं. मुस्लिमों के प्रति इस समाज में जो घृणा पैदा की जा रही है, वो एक दिन इस पूरे देश के लोकतंत्र, उसकी आज़ादी, उसके कारोबार, उसकी रोज़ी-रोटी को निगलकर मानेगी. तब कोहली, सचिन, अक्षय कुमार, अमिताभ बच्चन को समझ आएगा कि ये इंटर्नल मामले नहीं थे, जब कुछ लोग सांप्रदायिकता के इस ख़तरे के प्रति आगाह कर रहे थे और अपने अपने स्तर पर जूझ रहे थे.

ये लोग आज कोहली को नोच रहे हैं कल उसके बच्चे पर भी आएंगे. ये सबक़ है. सीखना चाहिए उन्हें इससे.

मेरे गांव में बच्चों ने क्रिकेटरों के नाम पर अपने नाम रखे. सबने अपनी अपनी पसंद और खेल के हिसाब से अपने नाम बताए. किसी ने एंड्रु सायमंड रखा, किसी ने क्रिस गेल, किसी ने राहुल द्रविड़, तो किसी ने सचिन. मेरा नाम शाहिद अफ़रीदी रखा गया. एक चाचा थे जो उम्र में अधिक नहीं थे लेकिन रिश्ते में चाचा लगते थे, वे भी हमारे साथ क्रिकेट खेलते थे, आज भी जब गांव जाता हूं और रास्ते में कहीं मिलते हैं तो पूछते हैं ‘और ! अफ़रीदी.’

मेरा नाम अफ़रीदी रखने के पीछे कारण ये था कि अफ़रीदी हमेशा क्रीज़ के बाहर आकर खेलते थे, ऐसे ही मैं. और उन दिनों अफ़रीदी का भारी ज़ोर था. वे खेलते थे तो गेंद और बॉलर को पानी नहीं पीने देते थे. मेरे गाँव के अधिकतर बच्चे उन्हें पसंद करते थे, इंज़माम उल हक़ को भी बहुत से बच्चे पसंद करते थे. कुछ कामरान अकमल को पसंद करते थे. किसी ने भी न उन्हें देशद्रोही कहा, न मुझे. बाद में मुझे धोनी पसंद आने लगे, फिर गांव में मेरा नाम धोनी पड़ गया. न अफ़रीदी नाम रखे जाने पर मैं देशद्रोही था, न धोनी नाम रखे जाने पर अधिक देशभक्त. इस बात को भोले-भाले गांव वाले भी समझते थे और मैं भी.

रावलपिंडी के इस लड़के को देखिए, इसने धोनी नाम की टी-शर्ट पहनी हुई है. ये शायद धोनी को पसंद करता हो. वैसे पसंद तो बहुत लोगों को बहुत लोग करते हैं, ये शायद धोनी को प्यार करता होगा जितना इसे किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर से न हुआ होगा. शायद इसलिए किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर की टी-शर्ट न पहनके इसने धोनी की टी-शर्ट पहनी है. हो सकता है इसका कमरा धोनी की तस्वीरों से सज़ा हो. हो सकता है जब बाक़ी साथी इसे धोनी कहते हों तो ये मुस्कुरा जाता हो.

ये दोनों तस्वीरें और कहानियां इसलिए बताईं ताकि आपको समझ आ सके कि क्रिकेटर किसी भी मुल्क का पसंद आ सकता है, और क्रिकेट टीम भी किसी दूसरे मुल्क की पसंद आ सकती है, ये देशद्रोह में नहीं आता. भारतीय टीम को पसंद करने वाले सभी भारतीय कोई अधिक देशभक्त नहीं हैं, अगर ऐसा होता तो देश भ्रष्टाचार, ग़रीबी, हेल्थ, शिक्षा, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में इतने निचले स्थान पर न होता.

क्रिकेट, संगीत, डांस या कोई आर्ट हो, ये दो मुल्कों के फासलों को भरने के लिए हैं, ये लड़ने की चीजें नहीं हैं. लेकिन इस सरकार ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें अति राष्ट्रवाद में धकेल दिया है, जहां केवल नफ़रत का साम्राज्य जी सकता है. आज पाकिस्तानी क्रिकेटरों को पसंद करने पर भी देशद्रोह लगाया जा रहा है. ग़ज़ब का देशभक्ति माहौल है.

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