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पशुपालन के रोजगार छीनने की साजिश – मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 7, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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पशुपालन के रोजगार छीनने की साजिश - मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना

उत्तराखंड में आजकल ‘मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना’ खासी चर्चा में है. इस योजना का उद्घाटन केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 30 अक्टूबर को देहरादून में किया गया. कहा जा रहा कि उत्तराखंड सरकार अब इस योजना के तहत उत्तराखंड के पशुपालकों को घास चारा बंद पैकेटों में दो रुपए प्रति किलो के भाव से उपलब्ध कराएगी. दावा किया जा रहा है कि इसके लिए प्रदेश के हर गाँव में सरकारी राशन विक्रेता की तरह ही घास विक्रेता की दुकान भी खोली जाएगी. सरकार इसे पहाड़ की महिलाओं के सर से बोझ उतारना बता रही है. कह रही है कि इससे लोगों की वनों पर निर्भरता खत्म होगी और घास काटते हुए पेड़ों व पहाड़ों से महिलाओं के गिर कर दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाओं पर भी रोक लग जाएगी.

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जाहिर है लोगों की इस पर प्रतिक्रिया आनी ही थी. इन प्रतिक्रियाओं में ज्यादातर ने इसे अव्यवहारिक, पहाड़ की महिलाओं को मजदूर बनाने वाला, चारे के बाजार पर कम्पनियों का कब्जा कराने वाला, वनों पर से जनता के परम्परागत अधिकारों को हड़पने वाला बताया है. कई लोगों को योजना के बजाए घस्यारी नाम पर एतराज है, वे इसे पहाड़ की महिलाओं का अपमान बता रहे हैं. घस्यारी नाम पर एतराज जताने वालों में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हरीश रावत भी हैं. उनकी समझ के अनुसार घस्यारी और हलिया तो जमींदारी विनास कानून आने से पहले होते थे. उन्हें नामकरण के अलावा इस योजना से कोई एतराज नहीं है. उनका कहना है कि उनकी सत्ता आने पर वे इस योजना का नाम बदल कर “कामधेनु कल्याण योजना” रख देंगे.

कृषि क्षेत्र में हुए ऐसे प्रयोगों के नतीजे

इस योजना को पूरी तरह से समझने के लिए जरूरी है कि कृषि क्षेत्र में किए गए ऐसे ही लोकलुभावन योजनाओं और उनके परिणामों पर एक नजर डाल ली जाए. कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति लाने के लिए तथा ज्यादा उत्पादन का लालच दे कर हमारे किसानों को इसी तरह से पैकेट बंद खाद और पैकेट बंद बीजों का लालच दिया गया था. शुरू में तो प्रयोग के लिए ये पैकेट बंद खाद और बीज किसानों में निशुल्क भी बांटे गए. धीरे-धीरे हमारे परम्परागत बीजों व खाद की जगह कम्पनियों के इन पैकेट बंद बीजों व खाद ने ले ली. नतीजा आज आपके सामने है.

आज भारत के बीज बाजार के 75 प्रतिशत हिस्से पर दो अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है. एकाधिकार हो जाने बाद वे आज उच्च क्वालिटी का बीज बताकर गोभी, टमाटर का बीज हमें 25 हजार से 80 हजार रुपया प्रति किलो के भाव से और शिमला मिर्च का बीज 1 लाख से 1.50 लाख रुपए प्रति किलो के भाव तक बेच रहे हैं. ऐसा ही हाल खाद और कीटनाशकों का भी है. नतीजतन हमारी खेती किसानी एक बड़े संकट के दुश्चक्र में फंसती गयी. खेती लगातार घाटे में जाती रही और किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने लगे.

अब इस संकट से भारत की खेती को उबारने के लिए कारपोरेट खेती के नए कानून लेकर सरकार सामने आ गई है. सरकार अब इन नए कृषि कानूनों के जरिए देश से छोटी मझोली खेती को ख़त्म कर बड़ी कारपोरेट कृषि फार्मिंग की जमीन तैयार कर रही है और जल्द ही भारत के 50 करोड़ लोगों को खेती से बाहर धकेलने पर आमादा है.

पर्वतीय क्षेत्र की खेती के बर्बादी के कारणों पर भी अगर नजर दौडाएं तो यहाँ की आजीविका के मुख्य साधन पहाड़ की खेती, पशुपाल और ग्रामीण दस्तकारी को संरक्षण देने की कोई नीति किसी भी सरकार ने नहीं बनाई. उसकी जगह कूजा एक्ट के जरिए कृषि क्षेत्र के विस्तार पर पूर्ण रोक, वन संरक्षण, बृक्ष संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, गो रक्षा कानून, सेंचुरी और राष्ट्रीय पार्कों का विस्तार, ईको संसिटिव जोन कानून जैसे कानूनों के जरिये हमारी सरकारों ने हमेशा पहाड़ की कृषि, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी को हतोत्साहित ही किया.

नतीजा आपके सामने है. आज देश में उत्तराखंड के पहाड़ ही हैं जहां इन नीतियों के माध्यम से सैकड़ों गाँव मानव विहीन बना दिए गए हैं. पहाड़ की आजीविका के मुख्य साधन खेती, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी दम तोड़ रहे हैं, आजीविका के लिए पलायन ही आज लोगों का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है.

घस्यारी कल्याण योजना से पहले लाए गए कानूनों पर एक नजर

उत्तराखंड सरकार की घस्यारी कल्याण योजना को समझने के लिए कुछ कानूनों में हो रहे परिवर्तनों पर एक नजर डाले बिना इस योजना के निहितार्थ को समझना कठिन है. अभी दो साल पहले केंद्र सरकार ने भारत के वन कानून 1927 में संशोधन का एक प्रारूप तैयार किया था जो भारी विरोध के कारण अभी ठन्डे बस्ते में पड़ा है. वन कानून में मोदी सरकार का यह संशोधन कहता है कि अब राज्य सरकार किसी भी सरकारी वन, सामुदायिक वन, निजी वन व अन्य किसी भी प्रकार की भूमि में आरक्षित वन गठित कर सकती है.

यदि सरकार को पारस्थितिक, वानस्पतिक, पुष्प, जीव, सिल्वीकल्चर, ज्यूलाजिकल, भू-आकृति विज्ञान, हाइड्रोलाजिकल महत्व के लिए वहां ऐसा करना जरूरी लगे. जहां राज्य सरकार ने ऐसा वन गठित न किया हो, वहाँ केंद्र सरकार राज्य सरकार को इसके लिए समयबद्ध दिशा निर्देश दे सकती है. यह संशोधन किसानों, आदिवासियों और वनवासियों के वन अधिकारों पर रोक लगाता है. अब वन भूमि में घास, गिरी सूखी पत्तियों, गिरी लकड़ी, पेड़ की छाल, घास पत्ती सहित किसी भी वन उत्पाद का दोहन नहीं किया जा सकेगा. वन भूमि में आग जलाना, किसी भी प्रकार के पालतू जानवर को चराने के लिए ले जाना भी गंभीर वन अपराध की श्रेणी में होगा.

भारी जुर्माने का प्रावधान

प्रस्तावित संशोधन कहता है कि रेंज स्तर का वन अधिकारी अब ऐसी किसी भी भूमि के लिए सर्च वारंट जारी कर वहाँ जांच कर सकता है. वह सीआरपीसी (CRPC) की धाराओं के तहत लोगों के लिए वारंट जारी कर सकता है और उन्हें गिरफ्तार कर सकता है. वन अपराध दिखने पर जरूरत पड़े तो उसे गोली चलाने का भी अधिकार दे दिया गया है. इस नए बदलाव में अलग-अलग धाराओं के वन अपराधों के लिए जुर्माना और सजा का प्रावधान बदला गया है. जो न्यूनतम 10,000 रूपए जुर्माना और एक माह की सजा से शुरू कर 50,000 रुपए जुर्माना और छः माह की सजा तक बढ़ा दिया गया है. दूसरी बार उसी अपराध में पकड़े जाने पर जुर्माना व सजा दोगुना हो जाएंगे. यानी एक साल की सजा और 1,00,000 (एक लाख) रूपए का जुर्माना भरना पड़ेगा.

अब सरकारी वनों को व्यावसायिक उत्पादन के लिए कम्पनियों को देने का प्रावधान

प्रस्तावित प्रारूप वनों की नई परिभाषा भी बताता है. जैसे –

  1. कोई भी ऐसी भूमि जिसे केंद्र या राज्य सरकार ने जंगल के रूप में नोटिफाइड किया हो, वह निजी या सामूहिक भी हो सकती है.
  2. ग्राम सभा, वन पंचायत, समुदाय द्वारा संचालित ग्राम वन अब सरकार की सूची में आ गए हैं.
  3. वन पंचायतों को अब वन कानून या सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत कराना अनिवार्य होगा.
  4. वन पंचायतें फिर से संयुक्त वन प्रवंधन समिति (जे एफ एम) के माध्यम से संचालित होंगी.
  5. वनों में अब उत्पादक जंगल एक नई श्रेणी होगी. जिनमें किसी ख़ास समय तक के लिए सरकार कंपनियों या संस्थाओं को लकड़ी, प्लाइबुड, जड़ी-बूटी, मछली, घास सहित तमाम वन उत्पादों के व्यवसायिक उत्पादन और दोहन की इजाजत देगी.

डीम्ड फारिस्ट के नाम पर किसानों की बंजर जमीनें हथियाने की साजिश

इधर एक और योजना डीम्ड फारिस्ट के नाम से लाई जा रही है. इसके तहत जमीनों में वन क्षेत्र का सैटेलाईट के माध्यम से सर्वे होगा. कहीं भी चाहे वह किसानों की निजी भूमि ही क्यों न हो, अगर 12 हैक्टेयर का क्षेत्र पेड़, पौधों, झाड़ियों से आछान्दित होगा तो सरकार उसे डीम्ड वन घोषित करेगी. डीम्ड वन घोषित होते ही उस भूमि पर वन कानून लागू हो जाएंगे. इस तरह से खेती किसानी की बर्बादी के बाद बंजर पड़ी पहाड़ के किसानों की वो जमीनें जिनमें पेड़ और झाड़ियाँ उग आई हैं, अब डीम्ड फारिस्ट के नाम पर वन कानूनों के दायरे में पहुंच कर उनके उपयोग के अधिकार से बाहर हो जाएँगी. पूरी तरह से पलायन कर बंजर हो चुके पहाड़ के सैकड़ों गाँव वासियों के पास तो इसके लागू होने के बाद कुछ भी नहीं बचेगा.

संशोधित भू-कानून लागू कराने के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करने की साजिश

जंगली जानवरों तथा आवारा पशुओं से खेती-किसानी की तबाही के बाद भी पहाड़ के किसानों का एक हिस्सा इस जमीन पर पशुपालन के जरिये अपनी आजीविका के साधन जुटा रहा है. इसमें दुग्ध उत्पादन और भेड़-बकरी पालन मुख्य है. इसके लिए चारे और चारागाह की जरूरतें हमारी बंजर जमीनें, उनमें उगे चारा पत्ती के पेड़, वन पंचायतें और सरकारी जंगल पूरी करते हैं. यही कारण है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इनसे संबंधित कानूनों और नियमों में बदलाव का यहाँ के लोग भारी विरोध करते हैं. अब जबकि सरकार मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना के नाम पर 2 रुपया किलो पैकेट बंद घास उपलब्ध कराने की योजना लाई है तो अपने पुरुखों की जमीन से पहाड़ के किसानों के बचे खुचे इस अंतिम लगाव को भी वह ख़त्म करना चाहती है.

इससे एक तीर से दो निशाने साधे जाएंगे, पहला पहाड़ में भूमि की बिक्री में तेजी आएगी. दूसरा पशु चारे के बाजार पर सरकार की चहेती कम्पनी का एकाधिकार स्थापित हो जाएगा. मगर याद रखना! कम्पनी का यह एकाधिकार सिर्फ चारे के बाजार पर ही नहीं होगा, बल्कि पहाड़ के किसानों की जमीनें भी वही कम्पनी हड़प लेगी और उत्पादक वन के कानूनी प्रावधान के तहत हमारे वनों और वन पंचायतों को भी यही कम्पनियां हथिया लेंगी. इस तरह जब हमारी जमीनों, वन पंचायतों और वनों को हथियाकर चारे के उत्पादन से लेकर विपणन तक इन कम्पनियों का एकाधिकार हो जाएगा, तो चारे के पैकेट की कीमत चुकाना आज के दुग्ध उत्पादक घसियारियों के बस में नहीं रहेगा.

घस्यारी कल्याण योजना गरीब किसानों को दुग्ध उत्पादन से बाहर धकेलने की साजिश है

घसियारी कल्याण योजना कारपोरेट डेयरी फार्मिंग की तरफ बढ़ने का पहला कदम है. विश्व व्यापार संगठन के दवाव में जिस तरह से आज हमारी सरकार खेती के कारपोरेटीकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने की तरफ बढ़ रही है. उसी तरह से उस पर डेयरी क्षेत्र में भी कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए दरवाजे खोलने का भारी दबाव है. भारत में कुल दुग्ध उत्पादन का 70 प्रतिशत हिस्सा यहाँ के गरीब और माध्यम किसान, भूमिहीन व खेत मजदूर पैदा करते हैं. उनकी पहुंच सीधे बाजार तक है.

भारत के शहरी लोग आज भी डेयरी के पैकेट बंद दूध की बजाए सीधे पशुपालकों से दूध खरीदना ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं. जब तक उनके नजदीक इस सीधी सप्लाई चेन को तोड़ा नहीं जाएगा तब तक कारपोरेट डेयरी फार्मिंग का रास्ता भारत में नहीं खुल सकेगा. इसलिए सरकार पर यह दबाव है कि वह ऐसी नीतियाँ बनाए जिससे आम ग़रीबों के लिए दुग्ध उत्पादन कठिन हो जाए. इसी नजरिये से वन कानूनों के बदलाव को देखिये !

वन कानूनों में बदलाव से एक तरफ जहां आम लोगों के लिए वन उत्पादों के उपयोग को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्पादक वन की एक अलग श्रेणी बनाकर कम्पनियों को उसके दोहन का कानूनी अधिकार दिया जा रहा है. कारपोरेट डेयरी फार्मिंग की दिशा में बढ़ते ही आम दुग्ध उत्पादकों को बाहर आम आमदी या आम दुकानदार को दूध बेचने पर भी कानूनी रोक लग जायेगी. इस तरह चारे और दूध की बिक्री के लिए आज की घसियारी कारपोरेट कम्पनियों के फंदे में फंसा दी जाएंगी. उसका अंतिम नजीजा होगा या तो कर्ज के जाल में फंस कर आत्महत्या या दुग्ध उत्पादन के रोजगार से तौबा.

सावधान हो जाओ पहाड़ की घसियारियों !

घस्यारी कल्याण योजना बड़े शिकारियों का बिछया हुआ मजबूत जाल है, एक बार इसमें फंस गए तो निकलने का कोई रास्ता नहीं है. इसलिए राज्य की पुष्कर धामी सरकार अगर सचमुच में पहाड़ की घसियारियों का कल्याण करना चाहती है तो इस योजना को तुरंत वापस ले और उनके लिए निम्न काम करे-

  1. पहाड़ के दुग्ध उत्पादकों को उनके दूध का जैविक मूल्य दिलाने की गारंटी करे.
  2. पशुपालन को बढावा देने के लिए सरकारी वनों में चरागाह और चारे के उपयोग का अधिकार उन्हें वापस करे.
  3. पहाड़ के सभी पशुपालकों का निशुल्क गोबर गैस प्लांट लगाए.
  4. पशुओं की दुघटना में मृत्यु या बाघ द्वारा मारे जाने पर मुआवजा मिले और मुवावजे की प्रक्रिया को सरल कर ग्राम पंचायत के आम प्रस्ताव को प्रमाण माना जाय.
  5. घसियारियों का 5 लाख रूपये का दुर्घटना बीमा किया जाए. दुर्घटना के बाद काम करने लायक न रहने वाली घसियारी को 3 हजार रुपया महीना राजकीय सहायता दी जाए.
  6. हर तहसील क्षेत्र के अस्पतालों में एक हड्डी रोग विशेषज्ञ की नियुक्ति को अनिवार्य किया जाय, दुर्घटना में घायल घसियारियों के बेहतर इलाज की जिम्मेदारी राज्य सरकार उठाए.
  • पुरुषोत्तम शर्मा, राष्ट्रीय सचिव, अखिल भारतीय किसान महासभा

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