Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

एल्ज़ार बूफिये की कहानी निर्माण और उम्मीद की कहानी है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 4, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

जिस तेज़ी से संसार की सत्ता पर मूर्खों और पागलों का अधिकार होता जा रहा है, यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम एक दूसरे को ऐसी कथाएँ सुनाएं जो बताती हों हम कौन हैं, हम क्यों हैं, हम कहाँ से आए हैं और कौन-कौन सी चीज़ें कर सकना हमारे लिए अब भी संभव हैं. यह भी बताया जाए कौन सी चीजें असंभव हो चुकी हैं और यह भी कि फैंटेसी कोई नकली, अमूर्त चीज नहीं होती.

यह कहानी 1913 में शुरू होती है. बीस साल का एक उत्साही युवक आल्प्स के पहाड़ी इलाके में यात्रा करने निकलता है. एक दिन वह खुद को बंजर हो चुकी एक उदास घाटी के एक परित्यक्त गाँव में पाता है. चटियल नंगी जमीन पर दूर-दूर तक कहीं एक पेड़ तक नहीं दिखाई देता. उसे कहीं पीने का पानी भी नहीं मिलता. पानी की तलाश में काफी देर तक भटकने के बाद इस थके-हारे युवक को एक चरवाहा मिलता है. पचास-पचपन साल का यह चरवाहा उसे पानी पिलाता है और रात बिताने के लिए अपनी झोपड़ी में ले जाता है.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

अगली सुबह जब चरवाहा अपनी भेड़ों को लेकर घाटी में जाता है तो युवक भी उसके साथ हो लेता है. युवक देखता है कि चरवाहा अपने साथ लाई लोहे की एक छड़ की मदद से जमीन में सूराख बनाता जाता है और उनके भीतर बांज के बीज रोपता जाता है. उस दिन वह सौ बीज रोपता है.

बातचीत में पता लगता है चरवाहे की बीवी और इकलौते बेटे की मौत हो चुकी है और वह तीन सालों से उस घाटी में अकेला रह रहा है. उस समय तक वह एक लाख बीज रोप चुका था जिनमें से बीस हजार में कोंपलें फूट चुकी थीं. उसे उम्मीद थी उनमें से आधे बच जाएंगे.

अगले दिन युवक वापस चला जाता है. कुछ दिनों बाद पहला विश्वयुद्ध शुरू होता है और युवक को अगले पांच साल उसमें सिपाही की तरह हिस्सा लेना पड़ता है. पांच साल की अमानवीय हिंसा और विभीषिका झेलने के बाद जीवन से त्रस्त हो चुके युवक को उसी चरवाहे की याद आती है और वह उसी बंजर घाटी की यात्रा पर निकल पड़ता है.

उसे यकीन होता है कि चरवाहा तब तक मर चुका होगा क्योंकि बीस साल की आयु में आप पचास साल के आदमी को ऐसा बूढ़ा समझते हैं जिसके पास मरने के अलावा कोई और काम नहीं बचा होता. लेकिन चरवाहा न सिर्फ ज़िंदा है उसका स्वास्थ्य पहले से भी बेहतर हो गया है. उसने भेड़ें पालना छोड़ मधुमक्खियाँ पालना शुरू कर दिया है क्योंकि भेड़ें उसके लगाए बीजों से उगने वाले पौधों-कोंपलों को चर जाती थीं.

युवक देखता है कि घाटी में जहाँ तक निगाह जाती है चरवाहे के लगाए पौधे फैल गए हैं और उसके उसके कन्धों जितने ऊंचे हो गए हैं. युवक को अचरज होता है गाँव में पानी की वह धारा भी पुनर्जीवित हो चुकी है जिसके बहने की स्मृति तक किसी को नहीं थी.

युवक को समझ में आता है कि चरवाहे ने निचाट अकेलेपन में उस काम को अंजाम दिया है और एक ऐसी बंजर जगह को स्वर्ग में बदल दिया है, जिसके उद्धार की कोई सूरत नजर नहीं आती थी. वह उस सुबह को याद करता है जब उसने चरवाहे को जमीन में बीज रोपता हुआ देखा था. युवक को अहसास होता है कि पूरा नया जंगल एक अकेले आदमी के दो हाथों और उसकी आत्मा के कारण अस्तित्व में आया है.

कहानी सुना रहा युवक आपको बताता है कि दुनिया में खुद को ईश्वर समझकर उसके भीतर विनाश करता आ रहा आदमी चाहे तो ईश्वर की ही तरह निर्माण भी कर सकता है. बाद के सालों में जब उस इलाके में हजारों लोग आकर बस चुके होते हैं चरवाहे के बारे में कोई नहीं जानता. उसकी कहानी के बारे में किसी को भी मालूम नहीं होता.

एल्ज़ार बूफिये की इस कहानी को मशहूर फ्रांसीसी लेखक ज्यां जिओनो ने अपनी छोटी सी किताब ‘द मैन हू प्लांटेड ट्रीज़’ में सुनाया है. 20वीं सदी के यूरोपीय साहित्य के स्तंभों में गिने जाने वाले ज्यां जिओनो की इस किताब को दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया और इसकी करोड़ों प्रतियों को मुफ्त बांटा गया.

ज्यां जिओनो मानते थे कि लोगों ने अपने घरों की दीवारों के भीतर इतनी यातना झेल ली है कि वे आजाद रहना भूल गए हैं. आदमी को अपार्टमेंटों, सब-वे ट्रेनों और ऊंची इमारतों में रहने के लिए नहीं बनाया गया था क्योंकि घास और पानी उसके पैरों की स्मृति के बड़े हिस्से पर आज भी काबिज हैं.

‘द मैन हू प्लांटेड ट्रीज़’ का कथावाचक युवक खुद ज्यां जिओनो थे और किताब के छपने के कई बरसों तक लोग समझते थे कि एल्ज़ार बूफिये की कहानी सच्ची थी. जिओनो मानते थे कि जीने के अधिकार के बदले में आदमी का फर्ज बनता है कि उम्मीद को अपनी वृत्ति बनाए, उम्मीद को अपना पेशा बनाए.

‘द मैन हू प्लांटेड ट्रीज़’ एक ऐसा रूपक है जो बताता है कि अगर देखने को मिली आँखों और सुनने को मिले कानों का सही इस्तेमाल करना आ जाय तो यह धरती हमारे भीतर के कलाकार, कवि, इंसान, किस्सागो और किसान–सभी को जगा सकती है.

एल्ज़ार बूफिये की कहानी निर्माण और उम्मीद की कहानी है. यह हम सब की कहानी भी हो सकती है. अगर कहीं कोई भगवान, कोई सृष्टा, कोई सर्वशक्तिमान था तो उसने इस धरती को हम सब के लिए साझा घर के तौर पर बनाया था जिसके हर दुःख को बांटते रहने के लिए हमारे कुछ फर्ज तय थे. उम्मीद हमारा सबसे बड़ा फर्ज था.

  • अशोक पांडे

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें] 

Previous Post

कानून तो सुधा के पक्ष में है भाई

Next Post

त्रिपुरा : लोकतंत्र की खिल्ली

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

त्रिपुरा : लोकतंत्र की खिल्ली

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

बलात्कारियों के समर्थक चीफ जस्टिस बोबड़े इस्तीफा दो

March 3, 2021

मोदी सरकार माने अडानी-अंबानी सहित चंद कॉरपोरेट्स ही हैं, जनता नहीं

July 18, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.