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Home गेस्ट ब्लॉग

नफरत का कॉमन कॉज़, उसे पहचानिये

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 13, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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ये तीन कहानियां तीन अलग अलग समाज की है लेकिन एक किरदार है जो तीनो में मौजूद है. उसे पहचानिये.

नफरत का कॉमन कॉज़, उसे पहचानिये

मैं 84 की सिख विरोधी हिंसा का चश्मदीद हूं. सिखों की दुकानों को पुलिस और प्रशासन की निगरानी में लुटते देखा है. मैं सिख नहीं था तो दूसरी तरफ से इसे देखना आसान था. ये हिंदू समाज के एक तबके की प्रतिक्रिया थी. उस हिंसा और लूट के पीछे मूल भावना न राष्ट्रवाद थी और न ही इंदिरा गांधी के प्रति सम्मान. इसमें इंदिरा गांधी के विरोधी भी शामिल थे. वो भी शामिल थे जो इमरजेंसी में अंडरग्राउंड थे.

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मूल भावना थी सिखों के प्रति ईर्ष्या. उनका बढ़ता कारोबार चुभ रहा था. सिख दूकानदारों के मकान अच्छे हो गये थे. उनकी दूकानें पहले से बड़ी हो गई थी. कुछ व्यापार खासकर मोटर स्पेयर पार्ट्स और रेडिमेड कपड़ों में तो लगभग पूरी पकड़ थी. मेरे एक पड़ोसी एक दुकान से अच्छा खासा माल लूट कर लाये थे. वो जिस दुकान का था वो दिन भर वहीं बैठते थे, उसी की चाय पीते थे, उधार भी लेते थे. ऐसे बहुत से थे.

लूट का माल कुछ दिन में चुक गया और सिख दुकानदार फिर खड़े हो गये. अभी भी व्यापार में वैसा की कब्ज़ा है उनका. जिन्होने सिखों को सबक सिखाने के लिये लूटा था, उन्हें भी देखता हूं. वो भी वहीं हैं जहां थे. वैसे ही मकान, कोई छोटी मोटी नौकरी या दुकान. अगली पीढ़ी भी कुछ खास नहीं कर पाई. शुरुआती गुंडागर्दी के बाद नाली-गिट्टी-खड़िंजे के ठेकेदार ही बन पाये.

2

अस्सी के दशक के बिलकुल शुरुआती दौर की बात है. तब राम मंदिर का मुद्दा पैदा भी नहीं हुआ था लेकिन विश्व हिंदू परिषद था. उसकी एक बैठक घर के पास हो रही थी. जो बाते हो रही थी उसे सुना. बैठक ‘पेट्रो डॉलर’ पर केंद्रित थी. खाड़ी के देशों से मुसलमान के पास पैसा आ रहा था. उसके खिलाफ आंदोलन चलाने की बात हो रही थी.

सत्तर के दशक में बड़ी संख्या में मुसलमान खाड़ी के देशों में काम धंधे के लिये गये. एक गया तो उसने अपने परिवार या जानने वालों में चार और को बुलाया. ये आमतौर पर छोटे काम धंधे वाले लोग थे. जब लौटते थे तो अपने साथ बड़े-बड़े टेप रिकार्डर और इलेट्रॉनिक्स का दूसरा सामान लाते थे. कपड़े सूती की जगह सिंथेटिक हो गये थे इनके. शाम को तैयार होकर, सेंट लगा कर शहर में घूमते थे. विदेशों के किस्से उनसे सुनने पर लगता था कि किसी परी लोक को देख कर आये थे. एक दोस्त था महफूज़. अंडे की दुकान थी उसकी. उसके भाई भी वहां नौकरी करने गये थे. बड़ा टेप रिकार्डर वहीं देखा था पहली बार.

कई साल बाद विश्व हिंदू परिषद के उस ‘पेट्रो डॉलर’ के खिलाफ अभियान और खाड़ी से लौटे मुसलमान के बड़े टेप रिकार्डर का रिश्ता समझ में आया. हां, राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद का आंदोलन शुरु होते ही ये समझ में आ गया था कि इसकी मूल वज़ह बाबर नहीं महफूज़ के भाई का टेप रिकार्डर है.

3

कुछ महीने पहले मेट्रो स्टेशन से घर आ रहा था. रिक्शे पर था. रास्ते में रिक्शेवाले से बात होने लगी. बिहार के छपरा का था. मैंने पूछा किसे वोट दिया था चुनाव में. बिना किसी हिचक के उसने जवाब दिया ‘लालू जी को’. मैंने पूछा क्यों ? उनकी सरकार में कोई विकास नहीं हुआ, घोटाले का आरोप भी लगता है, जेल भी काट आये. उसका जवाब था कि आप शहर में रहने वाले कभी नहीं समझ पायेंगे कि लालू जी ने क्या दिया है हमको.

आगे उसने बताया कि पहले अगर गांव में हम साइकिल पर जा रहे हों और सामने से कोई ‘बड़ा आदमी’ आ जाये तो हम साइकिल से उतरते थे, उसके पैर छूते थे और फिर साइकिल पर चढ़ते थे. लालू जी के आने बाद अब हम किसी के पैर नही छूते हैं, हाथ मिलाते हैं.

  • प्रशांत टंडन

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