Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

बैंकों का बढ़ता घाटा और पूंजीवादी संकट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 11, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

अक्टूबर-दिसंबर के 3 महीने में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को 2,416 करोड़ का घाटा हुआ. उसके 25 हजार 836 करोड़ के कर्ज और डूब गए. कुल एनपीए अब 1 लाख 99 हजार करोड़ है, जिसमें वो शामिल नहीं जो पहले ही राइट ऑफ कर दिए गए हैं. कुल कर्ज का 10.35% अब एनपीए है और मेरा अनुमान है कि अभी यह ओर बढ़ेगा. हालांकि सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर इसे छिपाने की कोशिश में जुटे हैं – दो दिन पहले ही बैंकों को छूट दी गई है कि कुछ छोटी-मध्यम कंपनियों के कर्ज को 6 महीने तक वसूली न होने पर ही एनपीए दिखाया जाये जबकि पहले 90 दिन तक वसूली रुकने पर ही एनपीए दिखाना होता था. घाटे का यह स्तर भी तब है जबकि बैंक ने अभी डूबे कर्ज से होने वाली हानि के 2 तिहाई से कम के लिए ही अलग राशि का इंतजाम किया है – अर्थात होने वाले घाटे के लिए प्रोविजन अभी 66% से कम हैं !

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

इसको कैसे समझा जाये ?

एसबीआई भारत की कुल बैंकिंग का एक चौथाई है अर्थात इसके नतीजों से पूरी अर्थव्यवस्था के बारे में निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं.

हुआ यह है कि पहली संकटग्रस्त कंपनियां तो अभी फंसी ही हैं, पर अब कुछ और नई कंपनियां आर्थिक संकट के दलदल में जा फंसी हैं – खास तौर पर स्टील और बिजली क्षेत्र में संकट ने कुछ और कॉर्पोरेट को निगल लिया है, जिसका नतीजा ये नए सिरे से बढ़ते एनपीए हैं. साथ ही नोटबंदी से बैंकों के पास सस्ते जमा का जो भंडार इकठ्ठा हुआ था, अब वह ख़त्म है. मोदी-जेटली और भाड़े के भोंपुओं के तमाम झूठे दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था में नकदी लेन-देन पहले के स्तर पर जा पहुंचा है. सस्ते फंड के ख़त्म होने से बैंकों की सेहत में हुये नकली सुधार का दौर ख़त्म हो चुका है. जमा की तरलता के अभाव में ब्याज दर बढ़ने लगी हैं, उनके कम ब्याज दर वाले सरकारी बांड भी उतने फायदेमंद नहीं रहे, उनकी कीमतें भी गिर रही हैं.

पर संकट की वजह क्या है?

हालांकि भ्रष्टाचार की भी एक भूमिका है लेकिन मुख्य वजह पूंजीवादी व्यवस्था का गहराता आर्थिक संकट है. पहले कम आमदनी की वजह से उपभोक्ता मांग कम होती है, अति-उत्पादन अर्थात मांग से ज्यादा उत्पादन हो जाता है; इससे उद्योग में नया निवेश कम होता है जिससे फिर मशीनें, आदि पूंजीगत माल बनाने वाले उद्योगों में संकट आता है, स्टील-बिजली, धातुओं की मांग कम होती है. ये उद्योग भी संकट में आते हैं, इससे और बेरोजगारी तथा उपभोक्ता मांग में कमी और तीव्र होती है.

जहां अधिकांश गरीब मेहनतकश लोग खुद अभाव के बावजूद संकट में अक्सर दूसरे की थोड़ी-बहुत मदद करते हैं, वहीं चिकने-चुपड़े, मुस्कराते, ‘सुसभ्य’ दिखते पूंजीपति संकट के दौर में जंगली कुत्तों-भेड़ियों जैसे हो जाते हैं जो ज्यादा बरसात, सूखे, सर्दी में भोजन के अभाव में एक-दूसरे पर गुर्राते, झपटते ताकत भांपते हैं और जो जरा भी कमजोर पड़े बाकी सारे मिलकर उस पर टूट पड़ते, फाडकर खा जाते हैं. संकट के दौर में पूंजीपति भी अपने में से जिसे कमजोर पाते हैं, सब उस पर टूट पड़ते हैं, फाड डालते हैं, खून पी जाते हैं, लोथड़े निगल लेते हैं! वही दौर चल रहा है – जो कंपनी थोड़ा भी खुद को भुगतान में कमजोर पाती है, उसका यही हाल होता है – दिवालिया होकर बंद या कौड़ियों के दाम किसी मजबूत द्वारा निगला जाना.

इस संकट का नतीजा सिर्फ एसबीआई और सरकारी बैंकों में ही नहीं, अब बड़े सशक्त माने जाने वाले एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, एक्सिस, यस, कोटक महिंद्रा बैंकों के नतीजों में भी प्रतिबिंबित हो रहा है. साथ ही कुछ दशक पहले की तरह यह संकट आ और जा नहीं रहा बल्कि एक दौर के ख़त्म होने की बातें करते करते नए संकट की आहट आ जा रही है !

@ मुकेश असीम के वाल से साभार

Previous Post

दिल्ली मेट्रोः किराया बढ़ोतरी के विरोध में एक जरूरी कदम

Next Post

आरएसएस का सैनिकद्रोही बयान, देशद्रोही सोच एवं गतिविधियां

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

आरएसएस का सैनिकद्रोही बयान, देशद्रोही सोच एवं गतिविधियां

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

तबलीगी जमात : संघी फ़ैक्ट्री सिर्फ़ झूठ फैलाती है

April 6, 2020

कॉरपोरेटपरस्त राजनीति हाशिए पर धकेल रही है आम आदमी केन्द्रित राजनीति को

June 23, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.