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लोकतंत्र के नाम पर राजशाही मिजाज, सामंती फैसला और गुलाम मानसिकता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 8, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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girish malviyaगिरीश मालवीय

एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें युक्रेन से ‘आपरेशन गंगा’ के तहत लाए गए बच्चे एयरपोर्ट लाउंज से बाहर निकल रहे हैं. एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री हाथ जोड़े हुए खड़ी है. उनकी इस ‘नमस्ते’ का कोई छात्र जवाब नहीं दे रहा है. ऐसे ही और भी एक वीडियो में छात्र गेट के बाहर गुलाब की कली लेकर खड़े मंत्री से फूल स्वीकार नहीं कर रहे है और अपनी धुन में आगे निकल रहे हैं !

कुछ लोग छात्रों के इस एटीट्यूड से बेहद खफा हैं. वे चाहते हैं कि छात्र मंत्री जी की ‘नमस्ते’ की मुद्रा का जवाब देते हुए उन्हे साष्टांग दंडवत करे और रोते हुए उनके पैरो में गिर उनकी इस कृपा के लिए कैमरे के सामने मोदी की प्रशंसा के पुल बांध दे !

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दरअसल कई सौ साल की गुलामी के बाद इस राष्ट्र के डीएनए में ही गुलामी घुस गई है. लोग चाहते हैं कि जेसे प्लेन में बैठे छात्र ‘भारत माता की जय’ नारे पर ‘जय’ बोल रहे थे, वैसे ही नरेंद्र मोदी जिंदाबाद बोलने पर जोर से चिल्लाकर जिंदाबाद बोले ! क्यो बोले नरेंद्र मोदी जिंदाबाद ? क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसे ही अमरिकी नागरिकों से भरे हुआ प्लेन में ट्रंप जिंदाबाद बोलने को कहा जाए तो क्या वे ट्रंप जिंदाबाद बोलेंगे ?

क्या उन्हे ट्रंप की जयजयकार करने को कहा जा सकता हैं ? नही कहा जा सकता न ? अमरीका के लिए आप ऐसा सोच भी नही सकते. लेकिन न सिर्फ भारत के लिए ऐसा आप सोचते हैं बल्कि ऐसा आप करते भी हैं. ऐसा करने में आपको शर्म महसूस ही नहीं होती जबकि भारत और अमेरिका दोनों ही जगह लोकतंत्र हैं।

दरअसल इस तरह से जिंदाबाद का नारा लगवाना ‘लॉन्ग लिव द किंग’ की तरह की ही बात है, जो हमें औपनिवेशिक काल की याद दिलाता है. और जब हम जिंदाबाद के जयघोष की उम्मीद करते हैं हम उसी गुलामी की भावना को अपने मे बनाए रखना चाहते हैं. यहां हम यह कभी सोच ही नहीं पाते कि वह मंत्री और भारत लौटने वाला छात्र एक ही केटेगेरी के हैं. सरकार अपना फर्ज ही निभा रही हैं जबकि सरकार को शर्मिंदा होना चाहिए कि उनकी गलती के कारण छात्रों को इतनी तकलीफें झेलना पड़ रही थी.

अब अंत में एक विडियो मैं आपको याद दिलाता हूं. कुछ साल पहले ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन मोरिसन आस्ट्रेलिया के किसी शहर में एक सड़क पर चलते हुए संवाददाताओं से लॉन में खड़े होकर बातचीत कर रहे थे. तभी वीडियो में दिखाई पड़ा कि एक शख्स अपने घर से बाहर निकलता है और अपने पीएम को टोकते हुए स्पष्ट शब्दों में मॉरिसन को कहता है कि ‘क्या आप लोग उस लॉन से हट सकते हैं, यह मेरा लॉन है और मैंने अभी इसमें बीज डाले हैं.’ जिसके जवाब में मॉरिसन बोले, ‘ठीक है. क्यों नहीं, हम यहां से हट जाते हैं, और उस शख्स को ‘सॉरी’ कहते हुए उस जगह से पीछे हट जाते हैं.

क्या ऐसे एटिट्यूड की आप भारत में उम्मीद करते हैं ? ऐसा भारत में हो जाए तो सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता उस व्यक्ति का मार-मारकर जुलूस निकाल दे, 70 सालों से हम कहने को ही लोकतांत्रिक देश हैं लेकिन आज भी हमारी मानसिकता ‘लॉन्ग लिव द किंग’ वाली ही है.

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क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि दिल्ली/मुंबई में बस स्टैंड पर एक बड़ा विस्फोट हों. इस विस्फोट में लगभग 80 लोगों मारे जाए और वो भी ऐसे कि उनके शरीर के चिथड़े पोटली बनाकर समेटने पड़े हों, लेकिन जब इस मामले की पुलिस जांच हो और 7 साल बाद निचली अदालत का फैसला आए तो किसी भी आरोपी को कोई सजा न हो !

आप कहेंगे कि ऐसा कैसे संभव हैं ? यह चमत्कार संभव हुआ है मध्यप्रदेश के पेटलावद ब्लास्ट में आए अदालती फैसले में. एमपी के झाबुआ जिले के पेटलावद में 12 सितंबर, 2015 को बस स्टैंड के पास जिलेटिन छड़ों के गोदाम में हुए भीषण विस्फोट से हुईं 79 मौतों के मामले जिला न्यायालय का फैसला आया है.

इसमें मुख्य आरोपी राजेन्द्र कासवां (जिसे विस्फोट में मृत बताया गया) और सह आरोपी धर्मेन्द्र राठौड़ (विस्फोटक सप्लाई का आरोपी) को भी बरी कर दिया गया. विस्फोटक रखने के 5 आरोपी पहले ही बरी हो चुके हैं. यानी पेटलावद विस्फोट कांड में बनाए गए तीन अलग-अलग केसों के सभी 7 आरोपी बरी हो गए हैं.

सजा के नाम पर सिर्फ तत्कालीन पेटलावद थानाधिकारी शिवजी सिंह की सेवानिवृत्ति से ठीक पहले एक वेतनवृद्धि (1600 रुपए) रोकने के आदेश हुए हैं. एमपी पुलिस जांच में यह तक पता नहीं कर पाई कि विस्फोटक कौन लाया, कहां से लाया, कितना स्टॉक था ? जो रैपर मिला उसकी बरामदगी कहां से हुई ? सब के सब बरी हो गए.

पेटलावद का रहने वाला राजेंद्र कांसवा विस्फोटक का व्यापारी था. उसके परिवार के लोग भाजपा से जुड़े हुए थे. विस्पोट में मारे गए पीड़ित परिवारों का कहना है कि ‘शासन एवं पुलिस की मिलीभगत के कारण न्यायालय में जो चीज प्रस्तुत होना था, वह ना होकर दूसरे तरीके से उसको पेश किया गया.’ शिवराज सरकार की भी बडी अनियमितता सामने आई थी, क्योंकि एक घर में इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक कैसे रखा जा सकता है, जबकि राजेंद्र कांसवा के पास खाद भंडारण का ही लाइसेंस था ?

पीड़ित परिवार वालों का कहना है कि ‘इस मामले में मुख्य आरोपित बीजेपी से जुड़ा था, इसलिए उस वक्त पुलिस कार्रवाई में ढिलाई बरती गई. कांग्रेस ने भी आरोप लगाया है कि विस्फोट कांड का मुख्य आरोपी राष्टीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता था और उसका छोटा भाई भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ का पदाधिकारी था इसलिए सरकार ने उन्हें बचाने के लिए पूरे मामले की लीपापोती कर दी.’ फर्ज कीजिए कि मुख्य आरोपी राजेंद्र कसावा न होकर कथित रूप से कोई अब्दुल या वसीम रहा होता तो क्या होता !

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