Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

सत्ता शीर्ष से फैलाई जा रही अंधविश्वास और अवैज्ञानिक चिंतन की चपेट में देश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 20, 2022
in ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
सत्ता शीर्ष से फैलाई जा रही अंधविश्वास और अवैज्ञानिक चिंतन की चपेट में देश
सत्ता शीर्ष से फैलाई जा रही अंधविश्वास और अवैज्ञानिक चिंतन की चपेट में देश

हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 51(क) में स्पष्ट उल्लेख है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करें, लेकिन आज जब सत्ता से ही अवैज्ञानिक विचारधारा का प्रचार प्रसार बकायदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा फैलाया जा रहा है तब पहले से संकट झेल रहा वैज्ञानिक चिंतन कितने मुश्किल दौर में आ गया है इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है.

प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से लेकर न्यायपालिका, मुख्य धारा की मीडिया समेत समूचा तंत्र ही वैज्ञानिक चिंतन के खिलाफ अवैज्ञानिक चिंतन का रात-दिन प्रचार प्रसार कर रहा है, दुनिया के तमाम महान वैज्ञानिक मसलन, डार्विन, न्यूटन, आईंस्टीन, स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों को चोर, डाकू और लुटेरा बताया जा रहा है. सत्ता शीर्ष से नाइट्रोजन गैस को ऑक्सीजन गैस में बदलने की तरकीब खोजी जा रही है, गोबर-गोमूत्र से सोना निकाला जा रहा है, ढ़ोंगियों-पाखंडियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करना अपराध और देशद्रोह साबित किया जा रहा है, तब देश में विज्ञान की जगह अविज्ञान बढ़ने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा.

You might also like

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

जनसत्ता में प्रकाशित एक लेख के माध्यम से ज्योति सिडाना देश में बढ़ रहे अवैज्ञानिक चिंतन यानी अंधविश्वास के बढ़ते जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की है. उनका कहना है कि आदिम समाज में या कहें कि पूर्व वैज्ञानिक युग में मनुष्य प्रत्येक घटना के लिए धर्म और जादू को जिम्मेदार मानता था. जैसे बरसात का होना या न होना इंद्र देव की प्रसन्नता और नाराजगी पर निर्भर करता है, किसी महामारी के लिए दैवीय प्रकोप को जिम्मेदार मानना, बीमार होने पर झाड़-फूंक करवाना आदि-आदि.

परंतु वैज्ञानिक युग में प्रवेश करने के बाद परिवेश में घटने वाली हर घटना के पीछे के कारणों और परिणामों में संबंधों से मनुष्य परिचित होता गया, तब उसे पता चला कि बरसात कैसे होती है या बीमारी-महामारी के पीछे के कारण क्या हैं. इस तरह अंधविश्वास के युग से विज्ञान के युग तक की यात्रा अनुकरण से तार्किकता की ओर बदलाव की कहानी को बताती है. अंधविश्वास जहां एक तरफ पारंपरिकता और रूढ़िवादिता को व्यक्त करता है, वहीं विज्ञान आधुनिकता का परिचायक है. आज विज्ञान हर जगह प्रवेश पा चुका है. घर में, रसोई में, प्रत्येक कार्यालय में, खेती में यहां तक संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया में भी विज्ञान का वर्चस्व दिखाई दे देता है.

यानी कहा जा सकता है कि जीवन के प्रत्येक पक्ष को विज्ञान और प्रौद्योगिकी निर्देशित व नियंत्रित करने लगे हैं. ऐसे समय में अगर आए दिन अंधविश्वास की घटनाएं देखने और सुनने को मिलें, तो इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आज भी हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सभी के जीवन मूल्य का हिस्सा नहीं बना पाए.

हाल में राजस्थान के राजसमंद जिले के खमनोर क्षेत्र में एक घटना सामने आई. सात वर्षीय बच्चे को दो साल पहले आंख में फुंसी हुई थी. परिवार वाले दो साल तक मेडिकल स्टोर से दवा लाकर देते रहे. दर्द बढ़ने पर गांव के एक भोपे के पास ले गए. करीब चार महीने तक वह भोपा तंत्र-मंत्र से इलाज करता रहा. बच्चे की तकलीफ कम होने की बजाय इतनी बढ़ गई कि उसकी आंख तीन इंच तक बाहर निकल आई. अस्पताल ले गए तो पता चला आंख का कैंसर है. डाक्टरों के मुताबिक बच्चे की आंख निकालनी पड़ेगी.

सवाल इस बात का है कि यह कैसी आस्था है जिसकी वजह से एक बच्चे को केवल अंधविश्वास और उपेक्षा के कारण अपनी आंख खोने को मजबूर होना पड़ा ? एक अन्य घटना में जालौर जिले के भीनमाल शहर में एक दंपति से तंत्र-मंत्र के नाम पर एक तांत्रिक ने लाखों रुपए और गहने हड़प लिए. कारण इस दंपति के दो पुत्रिया हैं और पुत्र प्राप्ति की लालसा में वह इस तंत्र विद्या का शिकार बने.

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जनपद के गणेशपुर गांव में एक नौ वर्षीय बच्चे की बुखार से मौत होने के बाद परिजनों ने उसे कब्रिस्तान में दफन कर दिया था. इसी बीच गांव की एक महिला बच्चे के घर पहुंची और परिजनों को कहा कि आपके बच्चे को किसी ने तंत्र-मंत्र से मार दिया और वह उसे फिर जिंदा कर सकती है.

ऐसी घटनाएं आम हैं और गांवों से लेकर शहरों तक में रोजाना देखने को मिलती हैं. इन घटनाओं को देख या सुन कर क्या लगता है कि हम किसी आधुनिक वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं ? ऐसी घटनाओं पर कुछ बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया होती है कि ये सब अनपढ़-अशिक्षित लोग ही करते हैं. परंतु यह सच नहीं है.

पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं पर नजर डालें तो दिल्ली का बुराड़ी कांड, आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में शिक्षक दंपति द्वारा अंधविश्वास के कारण अपनी दो युवा बेटियों की हत्या कर देना और दिल्ली में ही एक चिकित्सक दंपति द्वारा एक बेटे को अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए अपने दूसरे बेटे की बलि दे देना ऐसे उदाहरण हैं जो उच्च शिक्षित वर्ग में भी गहरी जड़ें जमाए अंधवविास को बताते हैं. इसलिए यह कहा जा सकता है कि ऐसी घटनाओं का शिक्षा के स्तर से कोई संबंध नहीं दिखाई देता.

पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में डायन-बिसाही के नाम पर झारखंड में हर साल औसतन पैंतीस हत्याएं हो जाती हैं और इनकी शिकार नब्बे फीसद महिलाएं ही हैं. ऐसा तब हो रहा है जब हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 51(क) में स्पष्ट उल्लेख है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करें. इसके बावजूद अंध आस्था का बाजार तेजी से विस्तार लेता जा रहा है..

इसका अर्थ स्पष्ट है कि न तो संविधान और न ही शिक्षा अंधविश्वास को रोक पाने में सक्षम साबित हुई है. यह न केवल चिंता का विषय है, अपितु आज के वैज्ञानिक युग के समक्ष एक गंभीर चुनौती भी है.

जहां एक तरफ मनुष्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सहायता से रोबोट बना कर और मानव मन को एक चिप के माध्यम से पढ़ लेने का दावा कर स्वयं को सर्वशक्तिमान के रूप में स्थापित करने में लगा है, वहीं आज भी बिल्ली के रास्ता काटने, काम पर जाते समय किसी के छींक देने, पुत्र या संतान प्राप्ति के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेने, अमुक दिन बाल और नाखून नहीं काटने, बरसात न होने पर यज्ञ करने जैसी बातें विज्ञान को धता बताती नजर आती हैं.

महाराष्ट्र में अंधविश्वास उन्मूलन की दिशा में सक्रिय योगदान देने वाले डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर ने अपनी किताब में लिखा है कि ढकोसले और चमत्कारों का शिकार बना मन मानसिक गुलामी को जन्म देता है. भारतीय समाज की रचना अथवा व्यवस्था मूल रूप से दैववाद की बुनियाद पर खड़ी है। कोई भी छोटा-बड़ा संकट उनके लिए भाग्य का फेर होता है. लोग मानते हैं कि दैवीय शक्ति को प्राप्त किए बाबा हमें संकटों से मुक्ति दिलाएंगे. समस्याओं का मुकाबला करने की बजाय चमत्कार के अंधविश्वासी लोग ढकोसले की ओर मुड़ते हैं. इसलिए हमारा समाज ईश्वर, रूढ़ियों, कर्मकांडों जैसे अंधविश्वास के चक्रव्यूह में फंसा पड़ा है और डरपोक बन गया है.

कठिन यथार्थ से डर कर लोग अपनी बुद्धि और स्वाभिमान को तांत्रिकों या बाबाओं के पास गिरवी रख देते हैं इसीलिए आवश्यक है कि समाज को आत्मविश्वासी, भयमुक्त और तार्किक बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं. प्रकृति की पूजा इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उसके नाराज होने से कोई महामारी फैलेगी या कुछ बुरा होगा, बल्कि इसलिए करनी चाहिए कि प्रकृति मनुष्य के जीवन का आधार है.

इसलिए यह जरूरी है कि दाभोलकर की तरह ही समाज के अनेक बुद्धिजीवियों का यह कर्तव्य है कि वे अपने विचारों और संवाद के द्वारा लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करे और विज्ञान की बढ़ती खोजों के साथ मनुष्य को उनकी तार्किक क्षमता से भी परिचित करवाएं. यह सत्य है कि धर्म का अंधविश्वास से कोई संबंध नहीं होता, क्योंकि धर्म आस्था और विश्वास पर टिका होता है और अंधविश्वास बेबुनियाद भय और तर्कहीनता पर आधारित होता है. कुछ स्वार्थी लोग अपने हितों को पूरा करने के लिए अंधविश्वासों की निरंतरता को बनाए रखने की कोशिश करते हैं और लोगो में भय का मनोविज्ञान पैदा कर अपने हित साधते रहते हैं.

यही कारण है कि आज भी जब कुछ लोग किसी समस्या में फंसते हैं या खुद पर विश्वास खो देते हैं तो उन्हें ओझा, तंत्र-मंत्र, बाबाओं की शरण ही अंतिम विकल्प नजर आता है. इसलिए जरूरत है कि भय के मनोविज्ञान के स्थान पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लोगों की मानसिकता में प्रवेश कराया जाए. इसके लिए शिक्षा के माध्यम से इस तरह के अंधविश्वासों पर कुठाराघात किया जाना चाहिए, विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में इनका विरोध और वैज्ञानिक सोच का प्रसार करना चाहिए, ताकि बचपन से ही संविधान में शामिल वैज्ञानिक सोच नागरिकों की चेतना और व्यक्तित्व का हिस्सा बन सके.

ज्योति सिडाना का आलेख यहां खत्म हो जाता है. सिडाना की जोर जनता के बीच काम कर रहे सामाजिक संगठनों के जिम्मे इस अवैज्ञानिक चिंतन को दूर करने का है, यह जिम्मेदारी ऐसे सामाजिक संगठन और उसके कार्यकर्ता तो उठा ही रहे हैं और अपनी जान भी दे रहे हैं. खुद दाभोलकर की हत्या कर दी गई. लेकिन इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए यह कार्य चुनौती भरा तब और हो जाता है जब ऐसे अवैज्ञानिक विचारधारा का प्रवाह और संरक्षण सत्ता शीर्ष से होने लगता है.

जैसा कि उपर कहा जा चुका है तथाकथित बाबाओं ने राज्य और देश  की सत्ता संभाल ली है. शिक्षण संस्थानों की जगह बड़े-बड़े मंदिर बनाये जा रहे हैं, अस्पतालों की जगह विशालकाय मूर्तियां स्थापित की जा रही है, गाय-गोबर-गोमूत्र का महिमामंडन हो रहा है और बड़े पैमाने पर मीडिया, सोशल मीडिया और फिल्मों के माध्यम से अंधविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों को फैलाया जा रहा है ऐसे में पहले से ही मतिमूढ़ आमजनता के बीच सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे सामाजिक संगठन और उसके कार्यकर्ताओं कितना  वैज्ञानिक चिंतन का प्रसार कर पायेंगे, यह सोचनीय है.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

असुर कृष्ण को आर्यों ने विष्णु का अवतार घोषित कर दिया ?

Next Post

मोदी सरकार की विदेश नीति के कारण नेपाल से खराब होते रिश्ते

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
ब्लॉग

आख़िर स्तालिन के अपराध क्या था ?

by ROHIT SHARMA
November 6, 2025
Next Post

मोदी सरकार की विदेश नीति के कारण नेपाल से खराब होते रिश्ते

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

एग्ज़िट पोल बनाम एग्ज़िट खोल

March 8, 2022

तुमने कभी…

August 18, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.