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Home गेस्ट ब्लॉग

भगतों के अनंत दुःख का पारावार नहीं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 28, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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विष्णु नागर

भारत के ‘महान उपन्यासकार’ और माननीय मोदी जी के ‘चरमभक्त’ श्री-श्री चेतन भगत जी ने सवाल उठाया है कि हिंदुओं के दु:खों पर बात करने से परहेज़ क्यों ? भगत जी का मतलब दरअसल हिंदुवादियों के दु:खों से है क्योंकि जब से मोदी जी हैं, इनके दुःख भी कुछ ज्यादा बढ़ गए हैं. इनके दुःख सामान्य हिंदुओं के दुःख नहीं हैं क्योंकि उनके दुःख तो वही हैं, जो कि किसी भी आम हिंदुस्तानी के दुःख हैं – बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, झूठ आदि.

हिंदूवादी इन भौतिक दुःखों से परे रहते हैं. इनके फर्जी किस्म के स्थायी दुःख हैं, जो पिछले लगभग 100 सालों से इन्हें सता रहे हैं और अगले दो सौ वर्षो तक इन्हें सताते रहेंगे. चाहे सौ मोदी आ जाएं, चाहे दस हजार भगत इन दुःखों की भक्ति करते पाए जाएं. ये अविनाशी दुःख हैं, जैसे गोहत्या, धर्म परिवर्तन, लव जिहाद, मुसलमानों की बढ़ती आबादी वगैरह.

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दुनिया इधर से उधर हो जाए मगर इनके ये दुःख मिट सकते नहीं क्योंकि इनके दुःखों का स्थायी कनेक्शन भारत के मुसलमानों से जुड़ा है. जब तक इस धरती पर मुसलमान रहेंगे और हिन्दू भी और ये हमेशा रहेंगे इसलिए इनके ये लाइलाज़ दुःख भी सदैव रहेंगे. सौ साल से उम्र हुईं इन दुःखों की मगर तारीफ करना होगी कि इन्होंने इन बीमार-अशक्त दुःखों को छाती से चिपका कर रखा है, साथ नहीं छोड़ा !

अंग्रेज चले गए, कांग्रेसी भी सत्ता में नहीं रहे, मोदी जी भी आ गए मगर इनके दुःख वहीं के वहीं हैं. ये चूंकि निवारणीय दुःख हैं नहीं, अभिवृद्धात्मक हैं, इसलिए इनकी और आनेवाले सभी मोदियों की यह जिम्मेदारी है कि वे इन्हें बढ़ाते रहें और स्वयं आगे बढ़ते रहें. इनकी सेवा में नये-नये चेतन भगत भी आते रहेंगे. आज एक है, जल्दी ही डेढ़ सौ हो जाएंगे.

तो भगत जी महाराज, आपके सूचनार्थ निवेदन है कि पिछले दो-तीन हफ्तों से ‘कश्मीर फाइल्स’ के बहाने इन आरक्षित कोटि के चिरंतन हिंदू-दुःखों पर ही चर्चा हो रही है. इन्हीं दुःखों का सेलिब्रेशन चल रहा है. इन दुःखों पर बात करने का परहेज़ कहां दिखा आपको ? प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, भाजपाई मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक सभी तो आजकल दुःखी हैं. बुक्का फाड़कर रो रहे हैं.

कश्मीरी पंडितों का दुःख अब जाकर वोटदाता दुःख बना है, इसलिए अब ये छाती पीटने का कार्यक्रम कर रहे हैं. इस दुःख में कश्मीरी मुसलमानों के दुःख शामिल नहीं है, इसलिए ये दुःख मोस्ट इंपार्टेंट है. इसके विलेन मुसलमान हैं, इसलिए ये दुःख, दुःख हैंं. जो दुःख सबके होते हैं, उनसे इनका स्वार्थ नहीं सधता.

तीस बरस पुराना कश्मीरी पंडितों वाला यह दुःख, हिंदूवादियों के बाकी सभी दुःखों पर आजकल भारी है. इनके दुःख को देखकर कश्मीरी पंडितों की आंखें भी भर आई हैं. इस दुःख में भाजपाइयों की वोटात्मक खुशी छुपी है, जो इनके तन-मन में समा नहीं रही है. इस दु:ख के हिंदूवादियों की नई रामजन्म भूमि मंदिर दु:ख बन जाने की प्रबल संभावनाएं छिपी हुई हैं.

‘कश्मीर फाइल्स’ ने फिल्म निर्माताओं को भाजपा के संरक्षण में हिंदू दुःखों से मोटी कमाई करने का नया रास्ता दिखाया है, इसलिए अब ऐसे दुःख हर दूसरे-तीसरे महीने पधारा करेंगे. इससे आज फिल्म निर्माता कमाई करेंगे और 2024 में मोदी वोट की बंपर कमाई करेंगे.

अब तो लगता है कि दुःख किसी और के पास बचे ही नहीं. सारे दुःख हिंदू-दुःख हो चुके हैं क्योंकि बाकी सब तो मोदी जी के आने से सुखी हो चुके हैं, दुःखी केवल ये हैं. किसानों की आय अब दुगुनी हो चुकी है. मनरेगा मजदूरों को तत्काल और बढ़ी हुई मजदूरी मिल रही है. छोटे कारोबारी लाकडाउन में अपना धंधा सिमट जाने से बहुत सुखी हैं. कश्मीरी मुसलमान धारा 370 के हटने से इतने अधिक सुखी हैं कि यह समझना कठिन है कि हिंदुत्ववादी अधिक खुश हैं या ये ? हिंदुस्तान के मुसलमान तो सेक्युलरिज्म की अर्थी उठ जाने से इतने अधिक खुश हैं कि बेचारे हिंदुओं के दुःखों की उन्हें परवाह तक नहीं रही.

वैसे भगत जी भक्ति-रस में डूबने के कारण आपको यह नहीं दिखा कि हिंदुओं के दुःखों पर बात करने से हिंदुवादियों को पहले भी कभी परहेज़ नहीं रहा. परहेज़ शब्द से तो इनकी स्थायी रूप से परहेज़ है. अंग्रेजों का साथ देने और स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध करने से उन्हें कभी परहेज़ नहीं रहा. गांधी जी की हत्या हुई तो इन्हें मिठाई बांटने-खाने से परहेज़ नहीं रहा. परहेज़ खाकी चड्ढी से जरूर अब हो चला है मगर यह स्वैच्छिक है. बाकी परहेज़ और संघ, परहेज़ और मोदी का हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है.

भगत जी आजकल आपके ये सारे मित्र-हितचिंतक छाती कूट-कूट कर अपने दुःख रो रहे हैं बल्कि नये-नये नकली दुःखों का आयात कर रहे हैं, ताकि वे स्थायी रूप से छातीकूटू मुद्रा में सुखपूर्वक रह सकें. जैसे जुमे की नमाज़ प्रशासन की अनुमति लेकर मुसलमान कहीं पढ़ें तो इससे ये दुःखी. मुसलिम छात्राएं हिजाब पहनें तो ये दुःखी. मंदिर परिसर से बाहर पर्व-त्योहार पर लगे मेले में मुसलमान दुकान लगाएं तो ये दुःखी. उनकी दाढ़ी से ये दुःखी, उनकी टोपी से ये दुःखी. और दुखी होने के लिए यह फिल्म भी आ गई है.

वैसे ये नानमोदी, सेक्युलर हिंदुओं से भी दुःखी हैं. अगर कोई साहू महिला व्यासपीठ पर बैठकर भागवत बांचे तो उससे भी ये दुःखी. इतने अधिक दुःखी हैं कि उसे मुजरा करने की सलाह दे रहे हैं. दलित दूल्हा सवर्ण बस्ती से घोड़े पर बैठकर जुलूस निकाले तो उससे भी ये दुःखी. इनके दुःखों का पारावार नहीं. दुःख ही इनके जीवन का कथा रही. इन्हें सुखदायक-कुर्सीदायक मगर जनता को दुःखदायक इनके दुःखों के लिए हार्दिक…. !

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