Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

मैक्सिम गोर्की : स्वाधीनता का रूसी उपासक

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 30, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
गणेशशंकर विद्यार्थीगणेशशंकर विद्यार्थी
‘बोल्‍शेविकों ने गोर्की की हत्‍या कर दी’, इस पूंजीवादी प्रोपगेंडा का इस कदर प्रचार हुआ कि दिल से भरोसा न करते हुए भी गणेश शंकर विद्यार्थी जी को इस कदर आघात पहुंचा कि उन्होंने गोर्की को श्रद्धांजलि तक दे दी. हलांकि गोर्की का‍ निधन विद्यार्थीजी के बलिदान (25 मार्च, 1931) के बाद हुआ, लेकिन गोर्की को श्रद्धांजलि अर्पित करने का श्रेय विद्यार्थीजी को उनके जीवनकाल में ही मिल गया था. अगस्‍त 1919 के अंतिम दिनों, पश्चिमी के पूंजीवादी प्रेस ने एक अफवाह उड़ाई थी कि रूस के बोल्‍शेविकों ने गोर्की की हत्‍या कर दी. उसकी विश्‍वसनीयता पर यद्यपि विद्यार्थीजी को शक था, तथापि 1 सितंबर, 1919 के साप्‍ताहिक ‘प्रताप’ में उन्‍होंने गोर्की के प्रति अपनी यह हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की – संपादक

इस सप्‍ताह रूस के एक प्रसिद्ध उपन्‍यास-लेखक मैक्सिम गोर्की की मृत्‍यु का समाचार आया है. इस देश के सुशिक्षित लोगों में भी बहुत ही कम ऐसे हैं जिन्‍हें पता है कि गोर्की किस ढंग का आदमी था ? एक गरीब घराने में पैदा हुआ. लड़कपन ही में उसके माता-पिता जाते रहे. नाना के घर परविश पाई, परंतु अभागे का ठिकाना वहां भी न लगा. नाना का काम गिर गया, और नाती को पेट पालने के लिए घर छोड़ बाहर का रास्‍ता देखना पड़ा.

कभी चमार की दुकान का उम्‍मेदवार बना, तो कभी अस्‍तबलों में घोड़ों की सेवा करता फिरा. नानबाइयों की दुकानें उसने साफ कीं और मालियों की खिदमतगारी उसने की. एक दिन तो नौबत यहां तक पहुंची कि सेब बेचते-बेचते जब थक गया और तो भी पेट भरने के लायक पैसे न मिले, तो आत्‍महत्‍या के लिए तैयार हो गया, परंतु आगे उसे चलकर प्रसिद्ध उपन्‍यास लिखना और नाम कमाना था, इसलिए मरते हुए भी न मरा.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

15-16 वर्ष का हो गया, उस समय तक उसने कुछ पढ़ा ही नहीं. पढ़ता भी कैसे, पढ़ने से तो उसे चिढ़ थी. उसने स्‍वयं एक बार कहा था कि किताबें और छापे की अन्‍य चीजें मुझे काटे-सी खाती थीं, मैं जहाज पर सवार हुआ तो छपा हुआ पासपोर्ट तक मेरी आंखों में खटकता था, परंतु जहाज पर नौकरी करते ही, उसकी आंखों का यह शूल दूर हो गया. जहाज का एक बावर्ची उसका गुरु बना और उसने पकड़-धकड़ कर लड़के गोर्की का अक्षरों के साथ प‍रिचय करा ही दिया.

अब तो गाड़ी चल निकली, और कुछ ही दिनों में वह डाकगाड़ी बन गयी. फिर तो उसने जहां-जहां नौकरी की – वह एक जगह कहीं जमा ही नहीं-वहां-वहां उसे गुरु मिलते रहे, और अंत में, एक लेखक उसे ऐसा मिला, जैसा बंगला साहित्‍य के धुरंधर लेखक रमेशचंद्र दत्‍त को बंकिमचंद्र चटर्जी के रूप में मिल गया था. उसने कहा, गोर्की, तुम लिखो. बस, गोर्की लिखने लगा, और कुछ ही दिनों में उसकी पूछ हो गई. और, अंत में, तो वह इतना बढ़ा कि रूस के घर-घर में उसका नाम हो गया और यूरोप-भर में उसके उपन्‍यास फैल गये और उनके अनुवाद हो गये.

गोर्की की सारी उम्र कष्‍टों में कटी. दरिद्रता से छुट्टी मिली, तो हृदय की वीणा के खुले स्‍वरों के कारण रूस के स्‍वेच्‍छाचारी शासकों ने उस पर कृपादृष्टि फेंकी. उसकी कहानियां और उपन्‍यास दर्देदिल के नक्‍श होते थे, और उन सबसे, देश के उद्धार और स्‍वेच्‍छाचार के मूलोच्‍छेदन का संदेश मिलता था. गोर्की अपनी रचना के नहों तक से यही पुकारता था कि रूस विपदाओं और स्‍वेच्‍छाचार से आच्‍छादित है. बोलने और लिखने की, घूमने और फिरने की, सोचने और समझने की आजादी नहीं. वह बात नहीं, जिससे व्‍यक्ति की आत्‍मा ऊपर उठ सकती है, और जाति की आत्‍मा आगे बढ़ सकती है.

जीवन के उस अधिक अच्‍छे क्षेत्र में पदार्पण करने के लिए, वर्तमान बंधनों को टूक-टूक कर दो ! एक स्‍थान पर वह अपने देश की दुर्दशा का रोना रोता हुआ, बड़ी मार्मिकता के साथ कहता है कि, ‘इस देश में अच्‍छे और भले कामों का नाम अपराध है, ऐसे मंत्री शासन करते हैं जो किसानों के मुंह से रोटी का टुकड़ा तक छीन लेते हैं और ऐसे राजा राज करते हैं जो हत्‍यारों को सेनापति और सेनापति को हत्‍यारा बनाने में प्रसन्‍न होते है.’

1905 में रूस में कुछ सुधार हुए थे. गोर्की उनसे संतुष्‍ट न हुआ. उसकी लेखनी स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहती रही कि ‘यह कुछ भी नहीं, यूरोप वाले भूलें नहीं, रूस की आग बुझी नहीं है, वह दबकर मर गई है. वह दब गई है इसलिए कि दस गुनी शक्ति के साथ उखड़ पड़े और दसों दिशाओं को भस्‍मीभूत कर दे.’ दस वर्ष बाद गोर्की के वे शब्‍द बिल्‍कुल सच निकले.

गोर्की लेखक था, परंतु सिर खरोंच कर कलम घिसनेवाला नहीं. वह ऊंचे स्‍वप्‍नों का देखने वाला था, परंतु उन पर केवल स्‍वयं ही मुग्‍ध हो जाने वाला नहीं, अपनी लेखनी के चमत्‍कार से गरीबों के झोंपड़ों तक में मोहन-वंशिका की गूंज फैला देने वाला. उसके लिए, उसे दरिद्रता की थपेड़ें सदा खानी पड़ी. इसके लिए उसे कई बार जेल जाना पड़ा. मुसीबतें उसे न बचा सकीं. अंतिम समय में वह समझा कि देश के उद्धार के दिन आ गये, और अब उसे चैन मिलेगा.

परंतु कठिनाइयों की मार से बूढ़े पड़ जाने वाले लेखक को मालूम पड़ा कि जिस युग को उसने बल और उत्‍साह के साथ, अपने दोनों बाहुओं से बुलाया था, वह आया भी और आगे भी बढ़ गया. गोर्की तेज था और परिवर्तनों को निमंत्रण देता था. परंतु, रूस की वर्तमान क्रांति के सामने उसकी तेजी फीकी पड़ गई और जो परिवर्तन हुए, उससे उसकी बुद्धि तक चक्‍कर खा गई.

क्रांतिकारी रूस ने उसका आदर किया, उसे ललित-कलाओं और अजायब घरों का निरीक्षक बनाया, और अब उसका आदर यह हुआ है, जैसा कि अंग्रेजी पत्र कहते हैं, और जो बिल्‍कुल विश्‍वसनीय नहीं है, क्‍योंकि वे राजकुमार क्रोपाटकिन के विषय में भी पहले ऐसी ही खबर उड़ा चुके हैं, जो पीछे असत्‍य साबित हुई. गोर्की बोलशेविको की गोली का शिकार बना दिया गया.

रूसी स्‍वाधीनता के इस देवता का यह अंत बहुत खेदजनक है – निरंकुशता की अग्नि मनुष्य को पशु बना देती है, और यह पशुता और कहीं और कभी उस भयंकर रूप में नहीं देखी जा सकती जितनी कि किसी दबे हुए देश की स्‍वाधीनता के उखाड़-पछाड़ के समय. हम गोर्की को बोलशेविकों की गोली का निशाना नहीं मानते, हम अंत में उसे उसी जुल्‍म का बलिदान समझते हैं जो शुरू में उसे पीसता रहा और जो मरते-मरते भी लोगों की बुद्धि को ऐसा गहरा झोंका दे गया कि वे अपने-पराये को नहीं परख पाये.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

बौना तानाशाह

Next Post

रोटी एक तमाशा है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

रोटी एक तमाशा है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

सरकार और पुलिस से बड़ा आतंकवादी कोई नहीं

July 13, 2020

यूक्रेन के हारे राष्ट्रपति अमेरिकी टट्टू वोलोदिमीर जेलेंस्की की रुस से ‘अपील’

March 1, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.