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Home कविताएं

इतिहास बदल रहा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 5, 2022
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फर्क साफ है

इतिहास बदल रहा है
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कौन है श्रेष्ठ ?

स्वप्न

क्लीनचिट का तमग़ा
यूं ही नहीं मिलता
जतन करना पड़ता है
जुगत भिड़ानी पड़ती है

छिपी बात
सबको पता है कि कितनी छिपी है
कहता कोई नहीं
अलबत्ता रात्रिभोज में आमंत्रित
काले गोरे
लंबे ठींगने सब हैं

मत मतांतर तो रहता है
और कब नहीं रहा है
अपना मत इसलिए
अपने मत अनुसार ही
बिना लोटा, बिना सोटा प्रयोग करें

बाकी का पता नहीं लेकिन राना अयूब
प्रिंसिपिआ मैथेमैटिका के कोडेड कोड समझ लेती है
गुजरात डायरी तब डायरी नहीं रह जाती
और रोज़नामचे में उसके नाम
एक ग़ैरज़मानती अपराध दर्ज हो जाता है

देश तब देश नहीं
ख़ूंख़ार जानवरों का मांद बन जाता है
प्रजातंत्र प्रजातंत्र नहीं
कुत्तातंत्र हो जाता है
दुम हिलाओ तलवे चाटो का
पावन दृश्य आम हो जाता है
आस्था से सराबोर भक्तिरस टपकने लगता है

डर केवल आवारा पशुओं से ही नहीं
डर अब आवारा रहबरों से भी है

संजीव (भट्ट)
जेल में क्यों सड़ते हो
झुकोगे नहीं
उलटे तनोगे
तो क्या होगा

हुक्म सुनना था
जो हुक्म था
अच्छा खराब बजाना था
सोचना नहीं था
सोचने की ज़रूरत क्या थी
हॉट सीट पर सोचनेवाला तो था
जो कहा गया था
जितना कहा गया था करना था
तुम्हारा लाइन हाज़िर होना तो बनता है
उदूलहुक्मी आखिर कैसे बर्दाश्त होती

ग़नीमत है तुम आइसोलेसन सेल में हो
तुम्हारी पुलिस की गाड़ी एहसान मानो
कि विकरू गांव वाले की गाड़ी की तरह
बीच रास्ते नहीं पलटी
तुम सुरक्षित जेल पहुंच गये

कुछ अच्छा पाने के लिए
कुछ बहुत अच्छा करना पड़ता है
राज्य सभा की सीटें रेवड़ी नहीं है
कि जिसे चाहो बांट दो
महज आर्हता रखना काफी नहीं है, संजीव भट्ट
पुण्य भी कमाना पड़ता है

तुम्हें मिसाल बनने का शौक था
लो, तुम्हारी मनोकामना पूरी हुई
तुम अब एक बेमिसाल मिसाल हो
आमो खास के लिए
एक बेसबब सबक़ हो

तुम्हारी सजा
ख़ता की नहीं
तुम्हारी सजा उस ख़ता की है
जो तुम्हें करनी थी और की नहीं

संविधान के अधिशासी रखवाले
रखवाली में बेतरह मुस्तैद हैं
जो अपने अपने ईश्वर की क़समें खाये
वे बेचारे संविधान कैसे खा सकते हैं

यहां कानून का राज है
जो चलता है कानून का चलता है
यहां कोई खुदा कोई हबीब नहीं है
विधि व्यवस्था बनाये रखना एक की नहीं
सब की जिम्मेदारी है

अब तक जो हुआ कानून से हुआ
आगे जो होगा कानून से होगा

कोई देखे न देखे
पुरखे ज़रूर देखते हैं
पीढ़ियों के भी आंख हैं
वे अंधे नहीं है
धरती एक साथ अंधेरे में नहीं जाती

इतिहास बदल रहा है
फर्क साफ है

  • राम प्रसाद यादव

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