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1857 के एलाननामे और हुक्मनामे – इकबाल हुसैन

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 11, 2022
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आज दस मई है, सन् 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत आज के ही दिन हुई थी. यूपी सरकार और केन्द्र इस संग्राम से शिक्षा ग्रहण करके काम करे, अपना नजरिया बदलें. यह कोई इवेंट नहीं है. यहां हम एक महत्वपूर्ण लेख दे रहे हैं, आप पढें और सरकार पढे.

1857 के एलाननामे और हुक्मनामे - इकबाल हुसैन
1857 के एलाननामे और हुक्मनामे – इकबाल हुसैन

1857 की जंगे-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे. यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खवास विभिन्न कारणों से सभी शामिल हो गए थे. स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे. अफसोस है कि एलाननामों की मूल कापियां नहीं के बराबर मिलती हैं. 1858 तक ये मौजूद थीं जिन्हें अंगरेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंगरेजी में अनुवाद करवा कर पेश किया था जो राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं.

मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल कापियां प्राप्त की हैं. इनमें अधिकतर उर्दू में हैंतीन एलाननामे उर्दू और हिंदी और कई फारसी में हैं. इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं. पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया गया है, अंगरेजों की बुराइयां बताई गई हैं और हिंदू-मुसलिम एकता का महत्व बताया गया है. दूसरे दौर के एलाननामों में हिंदू-मुसलिम की एकता पर जोर, एक दूसरे के धर्म की रक्षा, अंगरेजों का पूर्ण सफाया, नई हुकूमत के बनने के बाद अच्छी व्यवस्था, धर्म की आजादी, बेहतर खेती-बाड़ी और आर्थिक बंदोबस्त आदि के वादे हैं. तीसरे दौर के एलाननामों से मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी बचाव के लिए जंग लड़ रहे थे. इनमें अवाम-खवास सबसे अपील की गई है कि वह दिलोजान से अंगरेजों के विरोध में एकजुट हों. जंग में विशेष सफलता पाने वालों को पुरस्कार देने के वादे भी किए गए हैं. भारतीयों को इस बात से भी खबरदार कराया गया है कि अगर अंगरेज दोबारा सत्ता में आ गए तो भारतीयों का क्या हाल होगा.

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यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर एलाननामे उर्दू में हैं. अगर हम उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रकाशित होने वाले अखबारों का जायजा लें तो मालूम होगा कि उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तानी भाषा और फारसी लिपि में छप रहे थे. अब उसे उर्दू जबान के नाम से जानी-पहचानी जाती है. ये उर्दू के अखबारों के मालिक ज्यादातर हिंदू थे, वही उनके संपादक और प्रकाशक थे. इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस वक्त उर्दू भाषा एक मिली-जुली राष्ट्रीय भाषा की हैसियत से अपनी जगह बना चुकी थी जिसकी उन्नति में हिंदू और मुसलमान बराबर के भागीदार थे. 1857-58 के स्वतंत्रता सेनानियों के द्वारा जारी किए गए एलाननामों से इसकी और जानकारी मिलती है.

पहली जंगे-आजादी के एलाननामों से न केवल स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं का पता लगता है बल्कि हमें समस्याओं का भी पता चलता है कि वे इतनी बड़ी जंग में क्यों कूद पड़े थे, उन्होंने जनता से क्या-क्या वादे किए थे और वे अंगरेजों के चंगुल से आजाद कराने के बाद देश को किस प्रकार चलाना चाहते थे. एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी जिनमें अंगरेजी फौज के बागी सिपाही थे, अंगरेजों के आर्थिक शोषण, रंग-भेद, असामान्य टैक्स, खेती-बाड़ी पॉलिसी, बेरोजगारी और भारतीय कल-कारखानों के सर्वग्रासी विनाश को पिछली एक सदी से बर्दाश्त करते चले आ रहे थे.

इस गरीबी के बावजूद वे शांत थे और सब्र कर रहे थे लेकिन उनके सब्र का पैमाना उस वक्त टूट गया जब अंगरेजी शासन के प्रोत्साहन में ईसाई मिशनरीज द्वारा धर्मांतरण का प्रयास किया गया. यह एक ऐसा कारण था जिसने उन वफादार फौजियों को भी अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया, जो भारत में अंगरेजी शासन के उद्भव और विकास में एक सदी से लगे हुए थे. 10 मई 1857 को मेरठ में बंगावत का आरंभ करके फौजियों की टोली दिल्ली पहुंची और 11 मई 1857 को उनका पहला एलाननामा पेश किया गया, ‘सब हिंदू-मुसलमान, रिआया और मुलाजिम हिंदुस्तानियों को अफसरान फौजें-अंगरेजी मुकीम दिल्ली और मेरठ की तरफ दरयाफ्त होवें कि अब सब फिरंगियों (अंगरेज) ने ऐसा किया है कि अव्वल सब फौज हिंदुस्तानी को बेधर्म करके फिर सब रिआया को बजोरे-तदब्बुर क्रिस्टान (ईसाई) कर लें. चुनांचे हम सबने फकत दीन (धर्म) के वास्ते मय-रिआया के इत्तिफाक करके एक-एक काफिर (अंगरेजों) को जिंदा न छोड़ा और बादशाहते-दिल्ली इस अहद पर कायम है कि फौज कंपनी के फिरंगियों को कत्ल करे.

ये एलाननामा बंगाल आर्मी के फौजियों ने जारी किया था जिसमें अधिकतम ऊंची जाति के हिंदू थे. इसमें यह भी कहा गया था, ‘अब लाजिम यह है कि जिसको क्रिस्टान होना दुश्वार होवे, रिआया और फौज हर मकाम की एकदम होकर हिम्मत करे और तुख्म इन काफिरों (अंगरेजों) का बाकी न रखें.’

एलाननामे में हिंदू और मुसलमानों के मजहब की रक्षा और अंगरेजों के खिलाफ नफरत और गुस्सा यूं ही नहीं था. उस समय के एक पादरी शेयरिंग के खयाल देखें, ‘तमाम मुल्क मिशनरीज की सरगर्मियों से सख्त खौफजदा हो चुका था. हिंदू अपने धर्म और मुसलमान अपने मजहब के लिए परेशान थे.’

यहां यह बात गौर करने की है कि एलाननामे में अंगरेजों को काफिर बताया गया है. महाराजा पेशवा नाना साहब, रानी झांसी, खान बहादुर खान, बिरजिस कदर, बहादुरशाह, शाहजादा फिरोज शाह और मौलवी लियाकत अली के एलाननामों में सभी अंगरेजों को नसारा (ईसाई) और काफिर ही कहा गया है. नाना साहब ने ये भी लिखा है, ‘काफिर अंगरेजों ने इस हद तक मजलिम, बदमाशियां, नाइनसाफियां की हैं जिनकी वजह से ईश्वर ने इन काफिरों को सजा देने और उखाड़ फेंकने और हिंदू-मुसलमान शासन को दोबारा कायम करने के लिए, मुल्क के तहफ्फज (रक्षा) के लिए मुझे मुअय्यन (तय) किया है.’

एलाननामों के अंदाज से यह समझा जा सकता है कि सेनानी हिंदू धर्म और इसलाम की रक्षा को बहुत आवश्यक समझ रहे थे. इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए उन्होंने धर्मयुध्द छेड़ दिया था. और उस वक्त एक आम राय यह भी थी कि धर्म तो सिर्फ दो ही हैं, ‘धर्म तो दूई हैं, हिंदू का धर्म और मुसलमान का ईमान.’

स्वतंत्रता सेनानी हिंदू धर्मों के बारे में जो भावना रखते थे वह उनके इस नारे से भी समझा जा सकता है, ‘एक पिता के दुई पुत्र, एक हिंदू एक तुर्कउनका चोली-दामन का साथ.’ दुर्गा दास बंदोपाध्याय अंगरेजी फौज में मुलाजिम थे. वह एक नारे का वर्णन करते हैं जिसे सेनानियों ने बरेली में लगाया था, ‘हिंदू-मुसलमान एक, राम-रहीम एक, श्रीकृष्ण-अल्लाह एक.’~ यह धर्मिक एकता एक दिन की पैदावार या 1857 के हालात के कारण नहीं थी, बल्कि यह हिंदू और मुसलमानों के हिंदुस्तान में सदियों की एकता और एक दूसरे की विचारधाराओं को समझ लेने के बाद पैदा हुई थी.

रामबख्श (जनरल ऑफ डिवीजन) मंशा राम, ब्रिगेड मेजर ने स्वतंत्रता सेनानियों के कैंप से महाराजा जंग बहादुर नेपाल के नाम अपनी अर्जी में लिखा था कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने एक सदी तक अंगरेजों की मुलाजमत ईमानदारी के साथ की थी जिसके कारण वह इस देश के मालिक बन गए, लेकिन उन्होंने हमारी धार्मिक भावनाओं का खयाल न करते हुए ऐसे कारतूस बनाए जिनमें सूअर और गाय की चर्बी की मिलावट थी जिससे वह हमारा धर्म खराब करना चाहते थे, ‘इससे पहले कभी हिंदुस्तान में बहुत से बादशाह गुजरे हैं लेकिन किसी ने कभी हमारा धर्म और ईमान खराब करने की कोशिश नहीं की. अगर किसी हिंदू या मुसलमान का मजहब ही खतम हो जाए तो फिर दुनिया में क्या रह जाएगा.’

यही वे भावनाएं थीं जिनके कारण बागी फौजी बिना किसी भेदभाव के अपने-अपने धर्म की रक्षा के लिए अंगरेजों के आमने-सामने हुए थे. वे यह मानते थे कि अंगरेज जिस मजहब को मानते हैं वह झूठा है. वह तीन ईश्वरों में विश्वास करने वाले थे जबकि हिंदू और मुसलिम एक-एक ईश्वर के मानने वाले थे इसीलिए हिंदुस्तान में हिंदू, मुसलमान, आतिश-परस्त और यहूदी उनके मजहब को सच मजहब नहीं मानते थे. स्वतंत्रता सेनानियों ने पहली जंगे-आजादी के दौरान इसी पर कायम रहते हुए हुकूमत से जंग किया.

1857 के एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि बागी फौजियों को जनता का समर्थन प्राप्त था. जनता को विश्वास था कि अंगरेजों के शासन में हिंदुस्तानियों की जान, माल और आबरू सुरक्षित नहीं थी. वह अंगरेजों की धोखेबाजी और शातिराना चालों को खूब समझ रहे थे.

एलाननामों के द्वारा स्वतंत्रता के सिपाहियों ने जनता को यकीन दिलाया था कि हिंदुस्तानियों की हुकूमत में पूरी धार्मिक आजादी होगी जैसे कि पहले थी. हर आदमी अपने दीन-धर्म पर कायम रहेगा, हर किसी की इज्जत-आबरू कायम रहेगी और किसी बेगुनाह का कत्ल नहीं किया जाएगा. किसी का माल जोर-जबरदस्ती से हासिल नहीं किया जाएगा. शाहजादा फिरोज शाह ने अपने एलाननामे में यह विश्वास दिलाया था कि बादशाही के बाद देश के हर वर्ग को व्यवसाय, नौकरी में आसानी होगी और जमींदारों को भी अंगरेजों के अत्याचार से राहत मिलेगी.

कुछ एलाननामे, जैसे मौलवी लियाकत अली का एलाननामा फारसी शब्दों और कुरआन की आयतों से भरा हुआ है. इस एलाननामा का आरंभ खुदा के नाम से और पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा से होता है.

एक विशेष एलाननामा पत्रिका फतहुल-इसलाम 1857 की जंगे-आजादी का एक अमूल्य दस्तावेज है. इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम नहीं मिलता लेकिन पत्रिका के विषय और दूसरे विवरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने जो ‘फैजाबाद के मौलवी’ के नाम से भी प्रसिध्द थे, निकाला था. इस पत्रिका में अंगरेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने की अपील की गई है. इस पत्रिका की भाषा सामान्य है. इसमें अरबी और फारसी के शब्द कम हैं. पत्रिका में सेनानियों को युध्द के तरीके सिखाने का प्रयास किया गया है.

इसके अलावा इस एलाननामे में नेतृत्व के बारे में समझाया गया है जो दिलचस्प है, ‘अक्ल और दीन (धर्म) की शर्म भी यही कहती है कि मलेका विक्टोरिया काफिरा और दीन की दुश्मन, अंगरेजों की ताबेदारी से मुसलमान अमीर (बादशाह) की ताबेदारी और बादशाह के ताबेदार राजा की ताबेदारी करोड़ों दर्ज अफ्जल (उत्तम) है… और सब हिंदू दिलो-जान से इसलाम और बादशाह के खैर-खाह थे. तो अब भी वही हिंदू और वही मुसलमान हैं और वही किताब है. अपने दीन पर वह रहें और अपने दीन पर हम रहेंगे. हम उनकी मुहाफिजत (सुरक्षा) करेंगे वो हमारी मदद और मुहाफिजत करेंगे. ईसाइयों ने हिंदू और मुसलमान दोनों को ईसाई करना चाहा था, अल्लाह ने बचा लिया. उल्टे वो आप ही खराब हो गए.’

इस पत्रिका के अंत में अंगरेजों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने को कहा गया है और यह निवेदन किया गया है, ‘सारे हिंदू और मुसलमान उनकी किसी किस्म की नौकरी न करें.’

1857 में दिल्ली से बहुत से फरमाननामे, एलाननामे और हुक्मनामे जारी हुए थे जो अधिकतर उर्दू ही में थे और कुछ फारसी में. ये दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखगार नई दिल्ली में सुरक्षित हैं. इस लेख में कुछ दस्तावेजों को बतौर हवाला पेश किया जा रहा है. 1857 में दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों के काबिज होने के बाद नई आजाद हुकूमत विभिन्न समस्याओं से दो-चार हुई थी. अमनो-अमान खतम हो चुका था. दिल्ली और उसके आसपास के थानों से रिपोर्ट आनी बंद हो चुकी थी. बहादुरशाह ने अपने हुक्मनामा (19 मई 1857) के द्वारा थानेदारों को रोज रिपोर्ट भेजने की ताकीद की कि वो अपने-अपने थानों पर मौजूद रहें और शहर में अमनो-अमान बहाल करें. रोजाना गश्त लगाएं और शहर में होने वाली सारी घटनाओं की रिपोर्ट कोतवाल को भेजते रहें. हुक्म की खिलाफवर्जी पर सख्त सजा देने का इशारा किया गया था.

बहादुरशाह के सतर्क रहने के बावजूद भी दिल्ली की जनता और विशेष रूप से व्यापारी वर्ग लूटमार की घटनाओं से परेशान थे. 13 मई को बहादुरशाह ने चांदनी चौक का दौरा करके लोगों की हिम्मत बढ़ाई थी, जिसकी वजह से दुकानें खुलनी शुरू हुई थीं लेकिन दुकानदारों ने जल्द ही दुकानें बंद कर दीं. बहादुरशाह ने 11 जून के फरमान में शहर के कोतवाल को हिदायत दी थी कि वो एलान कर दें कि दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें खोल लें. उनकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए, चौकीदारों के द्वारा दिन-रात अवाम की खबरगीरी की जाए. बहादुरशाह के प्रयास और हुक्म के बावजूद शहर के हालात में कोई बेहतरी नहीं हुई. दुकानदार डरे-सहमे रहे. उन्होंने बादशाह से इसकी शिकायत की. बहादुरशाह ने 9 अगस्त 1857 को फौज के तीनों विभागों के अफसरों के नाम यह जारी करवाया कि अगर यही स्थिति रही तो शहर कैसे खुशहाल रह सकेगा, लोग भी तकलीफ उठाएंगे.

स्वतंत्रता सेनानियों ने अंगरेजों को दिल्ली से बाहर कर दिया था लेकिन वे दिल्ली से दूर भी नहीं थे. उनको यह आशा थी कि आने वाली बकरीद के अवसर पर वह दिल्ली के हिंदू-मुसलमानों के बीच गौकुशी की समस्या पर फूट डालने और शांति भंग कराने में सफल हो जाएंगे. बहादुरशाह ने हालात की नजाकत को समझते हुए जनरल बख्त खां को हुक्म दिया था कि गौकुशी पर पाबंदी का हुक्म जारी करें. बख्त खां ने 28 जुलाई से 31 जुलाई 1857 तक कई एलाननामे और हुक्मनामे जारी किए जिनमें गौकुशी, गाय की खरीदो-फरोख्त और उसके गोश्त को दिल्ली लाने पर पूर्ण पाबंदी के हुक्म थे. हुक्म की खिलाफवर्जी करने वालों को मौत की सजा तजबीज की गई थी. सख्त एहतिहयात और निगरानी के कारण बकरीद का त्योहार ठीक से गुजर गया. लेकिन अंगरेजों का खतरा बना रहा.

उन्होंने दिल्ली के पास पहाड़ी पर अपनी फौजी चौकी कायम कर ली थी. बहादुरशाह जफर ने उस पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए कई हुक्मनामे जारी किए थे. 10 दिसंबर 1857 के हुक्मनामे में फौज के अफसरों को लिखा था, ‘हिंदू को गाय और मुसलमान को सूअर का लिहाज करके और दीन-धर्म को समझकर चलना चाहिए. मेरी मर्जी और जिंदगी तुमको मंजूर हो तो देखते ही देखते पलटनें और तोपखाना तैयार करके ऊपर कश्मीरी दरवाजे पर हाजिर होकर इन बदमाश अंगरेजों पर धावा बोलो. इसमें एक लम्हे का भी तामुल और तगाफुल (लापरवाही, देरी) न करो…. तुम इस तख्त की शर्म रखो और जो दीन और इमान पर आए हो तो इसका लिहाज करो.’

1857 के उर्दू एलाननामों का एक विशेष बिंदु यह भी है कि उनमें हिंदी शब्द लगातार प्रयोग में लाए गए हैं, जैसे शरीर, रीत, रांड, धर्मसती, पवित्र, देश, मानुस, मास, लुका-छिपा धावा और दाता इत्यादि. इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि 1857 तक उर्दू-हिंदी जबान का कोई झगड़ा नहीं था लेकिन 1857 की पहली जंगे-आजादी ने अंगरेजों को चौंका जरूर दिया था. उन्होंने देखा कि किस तरह हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के धर्म की रक्षा के लिए एक हो गए थे और दुनिया की बड़ी शक्ति को अपनी बेमिसाल एकता से करारा जवाब दिया था. अंगरेजी राज के भविष्य की हिफाजत के लिहाज से उनके लिए हिंदू-मुसलिम एकता बहुत खतरनाक थी इसलिए उसे तोड़ने के लिए उन्होंने मिलजुल कर प्रयास शुरू कर दिया.

उर्दू से अनुवाद : इंजहार अहम नदीम

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