Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सत्ता के रोज़गार के लिए भाजपा में अर्ज़ियां लगा रहे हार्दिक कांग्रेस के लिए कितना घातक ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 21, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

सत्ता के रोज़गार के लिए भाजपा में अर्ज़ियां लगा रहे हार्दिक कांग्रेस के लिए कितना घातक ?
सत्ता के रोज़गार के लिए भाजपा में अर्ज़ियां लगा रहे हार्दिक कांग्रेस के लिए कितना घातक ?

श्रवण गर्ग

जिस कांग्रेस के साथ देश और दुनिया का सबसे महान गुजराती, अपनी कोमल छाती पर एक हिंदू राष्ट्रवादी हत्यारे की गोलियां झेलने के बाद भी, अपनी अंतिम सांस तक जुड़े रहे उसे धता बताते हुए अट्ठाईस साल के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने आरोप लगाया है कि यह पार्टी गुजरात और गुजरातियों से नफ़रत करती है ! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात की अपनी जन-सभाओं में कांग्रेस को लेकर ऐसे ही आरोप लगाते हैं.

हार्दिक पटेल ने औपचारिक तौर पर भाजपा के साथ जुड़कर मोदी के नेतृत्व में काम करने का या तो अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है या फिर उसे सार्वजनिक नहीं किया है. यह भी हो सकता है कि हार्दिक की राजनीतिक उपयोगिता के मुक़ाबले 2015 के पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान देशद्रोह सहित अन्य आरोपों को लेकर क़ायम हुए मुक़दमों को वापस लेने के सम्बंध में बातचीत अभी पूरी नहीं हुई हो.

राजनीति इस समय सत्ता की सुनामी की चपेट में है और हार्दिक पटेल जैसे युवा नेता, भाग्य-परिवर्तन के लिए किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करते हुए अपनी महत्वाकांक्षाओं को तबाह होता नहीं देखना चाहते. इस समय समझदार उद्योगपति बीमार उद्योगों को ख़रीदकर उनसे मुनाफ़ा बटोरने में लगे हुए हैं और चतुर राजनीतिज्ञ, कमजोर विपक्षी पार्टियों में सत्ता के लिए बीमार पड़ते नेताओं और कार्यकर्ताओं की तलाश में हैं.

उद्योगपतियों को दुनिया का सबसे धनाढ्य व्यक्ति बनना है और राजनेता को विश्वगुरु. मणि कांचन संयोग है कि राजनीतिज्ञ और उद्योगपति एक ही प्रदेश से हैं. कोई पंद्रह-सत्रह साल पहले के ‘वायब्रंट गुजरात’ के भव्य आयोजन का स्मरण होता है. मोदी तब मुख्यमंत्री थे. मंच पर देश के तमाम उद्योगपतियों का जमावड़ा था. जो उद्योगपति आज शीर्ष पर हैं वे तब एक ही स्वर में स्तुति कर रहे थे कि नरेंद्र भाई, ‘हम आपको प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहते हैं.’

हार्दिक पटेल को हाल ही में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि ’कोई उद्योगपति अगर मेहनत करता है तो हम उस पर ये लांछन नहीं लगा सकते कि सरकार उसको मदद कर रही है. हर मुद्दे पर आप अडानी, अम्बानी को गाली नहीं दे सकते. अगर प्रधानमंत्री गुजरात से हैं तो उसका ग़ुस्सा अडानी, अम्बानी पर क्यों डाल रहे हैं !’

जिस तरह से पहुंचे हुए ‘सिद्ध पुरुष’ हज़ारों श्रोताओं की भीड़ में भी पारिवारिक रूप से असंतुष्ट धनाढ्य भक्तों की पहचान कर लेते हैं, तीसरा नेत्र रखने वाले चतुर राजनेता चुनावों के सिर पर आते ही जान जाते हैं कि किस विपक्षी दल में किस नाराज़ नेता को इस समय नींद नहीं आ रही होगी. हार्दिक पटेल की नींद राहुल गांधी की गुजरात यात्रा के बाद से ही उड़ी हुई थी.

आरोप है कि राहुल गांधी, हार्दिक का दुख-दर्द सुनने-समझने के बजाय चिकन सैंडविच खाने और मोबाइल खंगालने में ही व्यस्त रहे. कांग्रेस को अब डराया जा रहा है कि हार्दिक के चले जाने से राज्य में अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों में पार्टी को ख़ासा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा.

सवाल यह है कि क्या किसी लोकप्रिय नेता के एक दल छोड़कर दूसरे में शामिल हो जाने से, उसे समर्थन देने वाली समूची जनता का भी ऑटोमेटिक तरीक़े से दल बदल हो जाता है या सिर्फ़ दल बदलने वाले नेता को ही ऐसा मुग़ालता रहता है ?

कांग्रेस से इस्तीफ़े के बाद अगर भाजपा से शर्तें भी जम जातीं हैं तो क्या मान लिया जाएगा कि गुजरात की लगभग 7 करोड़ आबादी के कोई एक-डेढ़ करोड़ पाटीदार मतदाता हार्दिक के साथ भाजपा का वोट बैंक बन जाएंगे ? कहा जाता है कि राज्य की 182 सीटों में 70 को पटेल (पाटीदार) मतदाता प्रभावित कर सकते हैं.

पश्चिम बंगाल के प्रतिष्ठापूर्ण विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दर्जनों नेताओं ने रातों-रात भगवा धारण कर ममता को राम-राम कह दिया था. इन दल बदलुओं में सांसदों, विधायकों सहित कई बड़े नेता शामिल थे. गोदी मीडिया द्वारा देश में हवा बना दी गई थी कि दीदी की दुर्गति होने वाली है और भाजपा को 200 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी. तृणमूल विधायकों द्वारा दल बदलते ही मान लिया गया था कि उनके चुनाव क्षेत्रों के सभी ममता-समर्थक वोटरों के दिल भी बदल गए हैं. ऐसा नहीं हुआ.

चुनाव परिणामों में जो प्रकट हुआ उससे भाजपा इतने महीनों के बाद भी उबर नहीं पाई है. बाद के उपचुनावों में तो भाजपा की हालत और भी ख़राब हो गई. तृणमूल छोड़कर जितने भी नेता भाजपा में शामिल हुए थे सभी ब्याज सहित ममता की शरण में वापस आ गए !

पश्चिम बंगाल के पहले मध्य प्रदेश में क्या हुआ था ? साल 2018 में भाजपा को हराकर कमलनाथ के नेतृत्व में क़ाबिज़ हुई सरकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने मंत्री-विधायक समर्थकों की मदद से भरे कोविड काल में कोई डेढ़ साल बाद ही गिरा दिया. बाद में सिंधिया के नेतृत्व में सभी छह पूर्व मंत्रियों सहित बाईस विधायक भाजपा में शामिल हो गए और प्रदेश में शिवराज सिंह की सरकार बन गई.

ऐसा मानकर चला जा रहा था कि पूरे ग्वालियर-चम्बल इलाक़े में सिंधिया का प्रभाव है इसलिए कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले उनके सभी समर्थक उपचुनाव भी भारी मतों से जीत जाएंगे. ऐसा नहीं हुआ. केवल तेरह लोग ही जीत पाए. सिंधिया स्वयं भी 2019 के लोक सभा चुनाव में गुना की सीट से चुनाव हार चुके थे.

नेताओं और जनता के बीच एक मोटा फ़र्क़ है, वह यह कि नेताओं को तो सत्ता के एक्सचेंज में अपनी राजनीतिक वफ़ादारी और वैचारिक प्रतिबद्धता बेचने के लिए तैयार किया जा सकता है, पर जनता बंदूक़ की नोक पर भी ऐसा करने को राज़ी नहीं होती. नागरिक अपनी मर्ज़ी से ही विचार बदलने के लिए तैयार होते हैं. अतः कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों से इस्तीफ़े देकर भाजपा में शामिल होने वालों को जनता के प्रति अपने नज़रिए में सुधार करना पड़ेगा.

कांग्रेस के लिए चिंता का एक बड़ा कारण यह अवश्य हो सकता है कि पार्टी के सारे बुजुर्ग असंतुष्ट तो पूर्ववत क़ायम हैं, पर जिन युवा नेताओं का वह अपनी ताक़त के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है वे एक-एक करके सत्ता के रोज़गार के लिए भाजपा में अर्ज़ियां लगा रहे हैं. गुजरात के बाद राजस्थान से जो समाचार प्राप्त हो रहे हैं वे भी कोई कम निराशाजनक नहीं हैं.

कांग्रेस के लिए क्या यह हार्दिक दुःख की बात नहीं कि पार्टी तो अंदर से टूट रही है और राहुल गांधी भारत को जोड़ने की यात्रा पर निकलना चाहते हैं ?

  • श्रवण गर्ग

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

क्या आप जोम्बी बन चुके हैं ?

Next Post

मेरे जुराबों के नीचे कई छेद हैं

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

मेरे जुराबों के नीचे कई छेद हैं

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

पढ़े-लिखे धार्मिक डरपोक अब पाखंडी लोगों की जमात में बदल रहे हैं

July 30, 2020

पागल मोदी का पुष्पवर्षा और मजदूरों से वसूलता किराया

May 3, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.