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वहशीपन का ग्लैडिएटर वाला खेल भारत में जिन्दा हो गया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 12, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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वहशीपन का ग्लैडिएटर वाला खेल भारत में जिन्दा हो गया

रोमन साम्राज्य में एक खेल खेला जाता था, जिसका नाम था –  ग्लैडिएटर. इस खेल में स्टेडियम के अंदर इंसान की इंसान से या इंसान की जानवरों से खूनी लड़ाई करवाई जाती थी. जैसे-जैसे रक्तपात बढ़ाता जाता था, दर्शक दीर्घा में बैठी जनता का आनंद भी बढ़ता जाता था. तकरीबन हज़ार साल तक चलने के बाद, रोमन साम्राज्य के पतन के साथ ही यह खूनी खेल समाप्त हो गया लेकिन आज 2022 के भारत में यही खेल चारों तरफ खेला जा रहा है.

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आगे बढ़ूं उसके पहले एक छोटा सा सवाल – क्या अंग्रेज़ों ने गांधी का घर गिरवाया था ? नहीं. गांधी तो अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मन थे. नेहरू को अंग्रेजों ने जेल भेजा लेकिन ‘आनंद भवन’ को ज़मीदोज नहीं किया. सुभाष चंद्र बोस का घर, कोलकाता में आज भी है. भगत सिंह का घर भी पंजाब में सही सलामत है. टैगोर, गोखले, तिलक, सावरकर के पुश्तैनी घर आज भी सलामत हैं.

अंग्रेज़ों के या ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नज़रिए से देखा जाए तो इन नेताओं का अपराध उन प्रदर्शनकारियों से हज़ार गुना ज्यादा था जिनके घरों पर बुलडोजर चलवाए जा रहे हैं या जिन्हें पुलिस स्टेशन में बंद कर पीटा जा रहा है. कहना यह चाहता हूं कि अंग्रेज, जिनके हम गुलाम थे वो भी अपने दुश्मनों से डील करते वक्त कुछ कायदे कानूनों का ख्याल रखते थे.

भारत अंग्रज़ों का उपनिवेश था. अंग्रेज़ अगर ऐसी कार्रवाई करते तो भी समझा जा सकता था. मगर आज तो भारत स्वतंत्र है. अपनी ही चुनी हुई सरकार है फिर इस आक्रांताई, मध्यकालीन मानसिकता की जरूरत क्या है ? योगी आदित्यनाथ की सरकार जिस रफ्तार से प्रदर्शनकारियों के घरों पर बुलडोजर चलवा रही है – वह अंग्रेज़ी राज से बुरा है.

शुक्रवार को प्रदर्शन होता है और रविवार को घरों पर बुलडोज़र चलवा दिए जाते हैं. यह किस तरह का न्याय है, किस तरह की व्यवस्था है ? मान लेते हैं कि यही व्यवस्था सही है तो फिर यह सबके लिए लागू होनी चाहिए न ? हर अपराधी के घर गिराए जाने चाहिए, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान. पर मकसद व्यवस्था कायम करना या कानून का राज स्थापित करना नहीं है. यह हम सब जानते हैं. मकसद एक समुदाय में भय और खौफ पैदा करना है. उन्हें जलील करना है.

हैरानी की बात यह है कि इस पागलपन को भीड़ का समर्थन हासिल है. अच्छा खासा शहरों में रहने वाला, ठीक ठाक कमाई करने वाला तबका जिसका सपना अपने बेटे-बेटियों को अमेरिका, ब्रिटेन में सेटल करना है — वह भी दूसरों का घर गिरता देख तालियां बजा रहा. मनुष्य जितना लहूलुहान हो रहा है लोगों को उतना ही मजा आ रहा है. वहशीपन का यह ग्लैडिएटर वाला खेल एक दिन इस साम्राज्य का भी अंत कर देगा.

  • विश्व दीपक 

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