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खतरे में जनतंत्र: नौकरशाहों का विधायिका पर हमला, कितना जनतांत्रिक ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 23, 2018
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जनतंत्र में जनता और विधायिका के बीच नौकरशाही एक महत्वपूर्ण कड़ी होती है, जिसके माध्यम से विधायिका अपने निर्णयों को आम जनता तक लागू करा पाती है. जनतंत्र में विधायिका और नौकरशाही दोनों देश की आम जनता के प्रति जबावदेह होती है, परन्तु वर्तमान भारत में जनतंत्र की परिभाषा बदलती दीख रही है, जहां विधायिका और नौकरशाही दोनों ही देश की आम जनता के प्रति अपनी जबावदेही और जवाबदारी दोनों से मुक्त नजर आ रही है. जनतंत्र में  विधायिका और नौकरशाही की यह बदलती जिम्मेदारी देश में जनतंत्र की नींव को खोखली कर रही है. जनतंत्र के लिए यह खतरनाक संकेत हैं.

विधायिका और नौकरशाही आज केवल जनता के टैक्स के पैसों से जमा धन पर ऐश करने का संस्थान बन गई है. इसके लिए विधायिका और नौकरशाही किसी भी स्तर तक गिर सकती है. विधायिका और नौकरशाही का अब एक ही साझे मकसद, जनता को लूटकर अपनी ऐशगाह को मजबूत करना, के लिए काम कर रही है. यही कारण है देश में सरकारी नीतियों के कारण 11 साल की बच्ची ‘भात-भात’ कहते हुए भूख से मर जाती है, तो वहीं दूसरी ओर अंबानी की पत्नी सुबह के चाय के लिए 2.5 लाख रूपया प्रति प्याला के दर से रूपये खर्च करती है. इतनी बड़ी असमानता यूं ही नहीं बनी है. यह विधायिका और नौकरशाही की जनतंत्र के प्रति बदलती भूमिका का परिचायक है.

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नौकरशाही की बदलती भूमिका और सोच को स्पष्ट करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आईएएस एसोसिएशन के एक बैठक को सम्बोधित करते हुए बताते हैं कि “दिल्ली सरकार में बहुत-बहुत बड़े सिनियर आॅफिसर हैं, सिनियर मोस्ट. उन्होंने फाईल पर एक लंबा नोट लिखा. फाईल पर उन्होंने लिखा कि ‘परमानेंट ब्यूरोक्रेसी इज द गवर्नमेंट, मिनिस्टरर्स आर एडवाईजिरी’ (स्थायी नौकरशाह ही सरकार है, मंत्री वगैरह केवल सलाहकार हैं).”  भाजपा-कांग्रेस ने जनतंत्र में विधायिका और नौकरशाही के बीच के संबंध के समझ को किस हद तक गिरा दिया है, केजरीवाल के इस बयान में देखा जा सकता है और शब्दों से उनकी पीड़ा भी महसूस की जा सकती है.

नौकरशाही ने जनंतत्र की बुनियादी समझ को ही बदल दिया है और नौकरशाही के इस समझ को बनाने में विधायिका का सबसे बड़ा हाथ है. दरअसल जनतंत्र में विधायिका जनता द्वारा चुनी जाती है, और यह सर्वोच्च मानी जाती है. परन्तु कई दशकों से विधायिका में जिस प्रकार बड़े पैमाने पर नकारे, अपराधी और भ्रष्ट लोगों ने अपनी जगह बना ली है, जिसका एक मात्र काम ही जनता को लूटना और उनके टैक्स के पैसों से ऐश करना मात्र है, ने नौकरशाही को भी खुद के जैसा नकारा, अपराधी और भ्रष्ट बना डाला है. अब जब दिल्ली की एक छोटी-सी आधी-अधूरी सत्ता पर एक ईमानदार सरकार जो खुद को जनता के प्रति जवाबदेह मानती है और उसके लिए काम करना चाहती है तब यह नकारे, भ्रष्ट नौकरशाह हैरान-परेशान हो रहे हैं और जनतंत्र की अपनी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं.

दिल्ली सचिवालय पर एक नकारे-भ्रष्ट नौकरशाह अंशु प्रकाश, जो केन्द्र के नकारे, अपराधी और भ्रष्ट विधायिका के पक्षपोषक हैं, ने अपनी जवाबदेही जनता के प्रति किसी भी हालत में करने को तैयार नहीं है. इस कारण केन्द्र की भाजपा सरकार के विधायिका के हाथों राजनीतिक दाव खेलकर दिल्ली सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रही है.

दिल्ली की जनता के हाथों नकारे जा चुके कांग्रेस और भाजपा दिल्ली की आम जनता की समस्याओं को दिल्ली सरकार न कर सके शुरूआत से ही ऐड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए हैं, तो वहीं दिल्ली सहित देश की जनता दिल्ली की आम आदमी की सरकार को बचाये रखने के लिए पूरी ताकत लगा दी है. यही कारण है कि भाजपा-कांग्रेस की भ्रष्ट राजनीतिक के पोषक लोग आम आदमी पार्टी की सरकार को तबाह नही कर सकी है. ऐसे में अब भाजपा-कांग्रेस और इनके टुकड़ों पर पलने वाले शेष नारायण सिंह जैसे टुकरखोर पत्रकार टेलीविजन के कैमरे पर बैठ कर खुलेआम आम आदमी पार्टी के खिलाफ अभद्रता प्रदर्शित करते हैं और मुख्य सचिव अंशु प्रकाश जैसे भ्रष्ट और नकारे अफसरों को दिल्ली सरकार के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं, बेहद शर्मनाक है.

भाजपा-कांग्रेस जैसे नकारे जा चुके भ्रष्ट लोगों के हाथों का खिलौना बन चुके अंशु प्रकाश दिल्ली सरकार पर बेसिर-पैर के आरोप लगे रहे हैं. प्रकाश ने मंगलवार को पुलिस शिकायत में कहा, ‘विधायक अमानातुल्लाह खान और मेरी बाई तरफ खड़ा विधायक/व्यक्ति, जिसकी पहचान मैं कर सकता हूं, ने मेरी तरफ से बिना किसी उकसावे के मुझे पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने मुझे मेरे सिर और कनपटी पर कई बार मारा. इस दौरान मेरा चश्मा जमीन पर गिर गया और मैं पूरी तरह ‘सदमे की स्थिति’ में पहुंच गया. घटना के बाद मैं किसी तरह कमरे से बाहर जाने, अपने आधिकारिक कार में बैठने और मुख्यमंत्री आवास को छोड़ने में सफल हुआ’, झूठ का पुलिंदा मात्र है, जिसकी न तो कोई नैतिक और न ही कोई ठोस आधार है.

एक पिटा हुआ व्यक्ति आराम से चहलकदमी करता हुआ बाहर कतई नहीं जा सकता जबकि सीसीटीवी फूटेज में साफ दीख रहा है कि आराम से टहलते हुए अंशु प्रकाश बाहर आ रहे हैं. वहीं जिस मुद्दे पर उनकी तथाकथित मार-कुटाई हुई उस विषय पर तो उनकी सचमुच पिटाई होनी चाहिए थी. आखिर ये भ्रष्ट-नकारे लोग बचे हुए कैसे हैं, यही आश्चर्य का विषय है. इस देश के आम जनता की सहनशीलता इतनी ज्यादा है कि वह ‘भात-भात’ करते हुए अपने बच्चे की मौत को तो देख सकता है, पर बंदुक उठा कर अपने बच्चों के लिए ‘भात’ छीन कर नहीं ला सकता.

निश्चित तौर झूठे और भ्रष्ट मुख्य सचिव अंशु प्रकाश, जिनकी निष्ठा आम जनता और जनतंत्र के प्रति कतई नहीं है, फौरन नौकरशाही जैसे महत्वपूर्ण जबावदेही से मुक्त कर दिया जाना चाहिए.

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Comments 1

  1. Hridya Nath says:
    8 years ago

    सामयिक विषय पर विशेष रूप से नौकरशाहों के दोहरे चरित्र और चाटूकारिता संस्कृति पर तीखा प्रहार परन्तु लेख को आज़ाद कलम की आज़ाद अभिव्यक्ति नहीं कहा जा सकता।आप AAP के प्रेस प्रवक्ता तो नहीं हैं???वह कब से किस आधार पर दूध के धुले हो गये हैं ?
    सब की रविश एक है क्या पारसा क्या रिंद?
    हमाम में हर कोई उरियां ही दिखाई दे!

    Reply

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