Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

राजेन्‍द्र यादव के साहि‍त्‍य में जाति‍ आधार की लीला

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 29, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
राजेन्‍द्र यादव के साहि‍त्‍य में जाति‍ आधार की लीला
राजेन्‍द्र यादव के साहि‍त्‍य में जाति‍ आधार की लीला
जगदीश्वर चतुर्वेदी

वे अपने (अ)ज्ञान पर गर्वित हैं. उन्‍हें यह भी भ्रम है साहि‍त्‍य का टोकरा उनके सि‍र पर रखा है. वे अपने को साहि‍त्‍य का ठेकेदार भी समझते हैं. उनके खि‍लाफ बोलोगे तो भक्‍तों की टोली टूट पड़ेगी. वे बड़े हैं, महान हैं, आदरणीय हैं, साहि‍त्‍यकार सेनानी का पदक बांटते हैं. वे साहि‍त्‍य के सब कुछ हैं. वे चाहें तो आपको साहि‍त्‍यकार बना सकते हैं, चाहें तो साहि‍त्‍य के मैदान से खदेड़ सकते हैं. वे साहि‍त्‍य लीला करते रहते हैं, वे साहि‍त्‍य के लीला कृष्‍ण हैं. उनके पास साहि‍त्‍य गोपों की टोली है. हिंदी साहि‍त्‍य के सभी मैदान उनके स्‍वामि‍त्‍व में हैं. उनके पास साहि‍त्‍यसेनानि‍यों की लम्‍बी चौडी फौज है. वे सरस हैं, उदार हैं, लेकि‍न दुर्भाग्‍य से इति‍हास मूर्ख हैं. कल ही उन्‍होंने अपने (अ)ज्ञान का फि‍र से पि‍टारा खोला है और उसमें से जो तथ्‍य और वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए हैं, वे हिंदी के लि‍ए चिंता की चीज हैं. ‘देशकाल डाट कॉम’ में उन्‍होंने जो कहा है वह हिंदी की साहि‍त्‍यि‍क पत्रकारि‍ता के संपादक की शोचनीय दशा का जीता जागता प्रमाण है.

राजेन्‍द्र यादव जाति‍ के आधार पर साहि‍त्‍य को देखने का अपना स्‍टैंड नहीं बदला है, भद्रता के नाते सि‍र्फ खेद व्‍यक्‍त कि‍या है. उनका बदला हुआ स्‍टैंड क्‍या है ? यह भी बताने की जहमत उन्‍होंने नहीं की. राजेन्‍द्र यादव इति‍हास और आलोचना की थ्‍योरी अथवा साहि‍त्‍यशास्‍त्र से अनभि‍ज्ञ हैं. वे जानते हैं कि‍ सृजन और का आधार जाति‍, नस्‍ल, रक्‍त, धर्म, जातीयता और राष्‍ट्र नहीं होता. हिंदी में जाति‍वाद सबसे प्रि‍य वि‍षय है और पापुलि‍ज्‍म बनाए रखने के लि‍ए जाति‍वाद, ब्राह्मणवाद आदि‍ का ढोल पीटने से साहि‍त्‍य की दुकानदारी वैसे ही चलती है जैसे मायावती की चलती है.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

उन्‍हें मालूम ही नहीं है कि‍ साहि‍त्‍य के इति‍हास का समूचा ढांचा जाति‍ के आधार को चुनौती देता है. आज तक कभी कि‍सी ने जाति‍ को आधार बनाकर हिंदी साहि‍त्‍य का इति‍हास नहीं लि‍खा. रामचन्‍द्र शुक्‍ल के यहां लेखक के नाम के साथ जाति‍ महज गौण सूचना मात्र है. राजेन्‍द्र यादव ने लि‍खा ‘रामचंद्र शुक्ल को पढ़िए, उन्होंने तो जाति आधारित वर्णन ही किए हैं, ये कान्यकुब्ज़ हैं ये फलां हैं वगैरा वगैरा.’ इसी को कहते हैं शब्‍दों को पकड़कर झूलना.

शुक्‍लजी ने जब जाति‍ का लेखक के नाम के साथ संकेत दि‍या था तो उसका मकसद यह नहीं था कि‍ इति‍हास को जाति‍ के आधार पर देखो, इति‍हास का आधार क्‍या है, वर्गीकरण का आधार क्‍या है, कालवि‍भाजन का आधार क्‍या है, साहि‍त्‍य को कैसे देखें, इनका उन्‍होंने अपने इति‍हास में यथास्‍थान जि‍क्र कि‍या है. उसमें जाति‍ को कहीं पर भी पैमाना नहीं बनाया है. कवि‍ता कैसे बनती है, उसका सामाजि‍क स्रोत क्‍या है, इसके बारे में शुक्‍लजी ने जाति‍, नस्‍ल, धर्म आदि‍ को आधार नहीं बनाया है. मुक्‍ति‍बोध से बडा ब्राह्मणवाद का आलोचक अभी हिंदी में नहीं हुआ. उन्‍होंने भी कवि‍ता के आधार के रूप में जाति‍ को आधार नहीं बनाया है बल्‍कि‍ काव्‍य के तीन क्षणों में आचार्य शुक्‍ल की धारणाओं का ही जि‍क्र भि‍न्‍न तरीके से कि‍या है.

सवाल यह है कि‍ क्‍या हम भारत की वि‍गत दो हजार साल की संस्‍कृति‍, सभ्‍यता, साहि‍त्‍य, कवि‍ता, दर्शन आदि‍ की उपलब्‍धि‍यों को महज इसलि‍ए अस्‍वीकार कर दें क्‍योंकि‍ वे ब्राह्मणों के द्वारा रची गयी हैं ? यदि‍ जाति‍ के आधार पर अस्‍वीकार के भाव में रहेंगे तो हमारे पास देशज सभ्‍यता के नाम पर क्‍या बचेगा ?

व्‍यक्‍ति‍ का जन्‍म कि‍स जाति‍ में होगा यह उसके हाथ में नहीं होता. ब्राह्मणवाद की आलोचना, जाति‍वाद की आलोचना, इन दोनों का समाज से उच्‍छेद जरूरी है, लेकि‍न अतीत को लेकर अवैज्ञानि‍क रवैय्या नहीं अपनाया जाना चाहि‍ए. यदि‍ वेद या कोई भी रचना ब्राह्मणों की है तो वह हमारी थाती है, उसे कूडे के ढेर पर नहीं फेंक सकते. परंपरा में बहि‍ष्‍कार के साथ प्रवेश नहीं कि‍या जा सकता. परंपरा में प्रवेश करने के लि‍ए जाति‍ के तर्क से भी कहीं नहीं पहुंचेंगे.

परंपरा में जाने के लि‍ए नतमस्‍तक होकर जाने की भी जरूरत नहीं है. परंपराओं में रचि‍त रचनाओं को ओढने और कूड़े के ढेर पर भी फेंकने की जरूरत नहीं है. परंपरा को अपनी रक्षा के लि‍ए, वैधता के लि‍ए तर्क अथवा हि‍मायत की भी जरूरत नहीं है. इति‍हास में जो चीजें हैं वे हमारी हि‍मायत और तर्कशास्‍त्र के बावजूद हैं और रहेंगी, वे पढ़ने और आलोचनात्‍मक वि‍श्‍लेषण की मांग करती हैं. इसके कारण ही मूल्‍यांकन और पुनर्मल्‍यांकन की जरूरत पड़ती है. बार बार व्‍याख्‍या की नए सामयि‍क संदर्भ में जरूरत पडती है.

राजेन्‍द्र यादव नहीं जानते रचना का अर्थ रचना के अंदर नहीं उसके बाहर होता है, समाज में होता है, पाठक में होता है. वर्तमान में होता है. रचना का अर्थ यदि‍ पाठ के भीतर होता तो एक ही रचना की वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म की व्‍याख्‍याएं न होतीं. व्‍याख्‍याओं में परि‍वर्तन न आया होता. राजेन्‍द्र यादव जबाव दें रचनाकार कि‍न चीजों पर लि‍खता है, क्‍या वह जि‍न चीजों पर सहमत होता है, उन पर लि‍खता है अथवा जि‍न चीजों को अस्‍वीकार करता है, असहमत होता है, उन पर लि‍खता है ? राजेन्‍द्र यादव जानते हैं कि‍ रचनाकार उन वि‍षयों और वि‍चारों पर लि‍खता है जि‍न्‍हें वह अस्‍वीकार करता है. जि‍न्‍हें वह स्‍वीकार करता है उन पर नहीं लि‍खता. राजेन्‍द्र यादव कि‍सी प्रमुख ब्राह्मण कवि‍ की रचना का उल्‍लेख करें जि‍सने ब्राह्मणवाद की हि‍मायत की हो ?

चरि‍त्र, व्‍यक्‍ति‍त्‍व, व्‍यवस्‍था अपना रूपान्‍तरण कर लेती है. अब सृजन है, सृजन में सेक्‍स, कामोत्‍तेजना, जाति‍, लिंग आदि‍ की पहचान साहि‍त्‍य या कला की पहचान में वि‍लीन हो जाती हैं. लि‍खने के पहले वि‍षय की जो भी अवस्‍था हो लि‍खने के बाद वह पूरी तरह बदल जाता है. लि‍खे हुए का अर्थ पढते समय बदल जाता है क्‍योंकि‍ अर्थ पाठ में नहीं पाठ के बाहर पाठक में होता है. सवाल पुराना है जबाव दो राजेन्‍द्र यादव अर्थ कहां होता है ?

साहि‍त्‍य का राजेन्द्र यादव ने जाति‍वादी आधार बनाया है और खासकर कवि‍ता का ! उनकी बुद्धि‍ की दाद देनी होगी क्‍योंकि‍ उनको मालूम है भक्ति आंदोलन दलि‍तों से भरा है, उत्‍तर ही नहीं दक्षि‍ण के भक्‍त कवि‍यों में दलि‍त हैं, भक्‍ति‍ आंदोलन के दलि‍त कवि‍यों का बाकायदा इति‍हास में सम्‍मानजनक स्‍थान है, साथ ही उन पर जमकर आलोचनाएं भी लि‍खी गयी हैं. कवि‍ता की आधुनि‍क सूची में आपने जि‍न बडे लोगों के नाम लि‍ए हैं वे तो हैं ही,

इसी तरह कथासाहि‍त्‍य के बारे में उनकी समझदारी गड़बड़ है. यशपाल, वृन्‍दावनलाल वर्मा, जगदीश चन्‍द्र, भीष्‍म साहनी, सुभद्रा कुमारी चौहान, होमवती देवी, कमला चौधरी, कृष्‍णा सोबती, मन्‍नूभंडारी आदि‍ अनेक बडे लेखकों के नाम उपलब्‍ध हैं, जो संयोग से ब्राह्मण नहीं हैं. असल में राजेन्‍द्र यादव की दि‍क्‍कत है पटाखा छोड़ने की, वे साहि‍त्‍य में एटमबम छोड़ ही नहीं सकते. संवाददाता की रि‍पोर्ट यदि‍ दुरूस्‍त है तो राजेन्‍द्र यादव ने औरतों के लेखन को अपनी सूची से बाहर कर दि‍या है. क्‍या वे महादेवी वर्मा के अलावा कि‍सी भी लेखि‍का को देख नहीं पा रहे हैं ? इसी को कहते हैं रचनाकार की दृष्‍टि‍ पर हि‍न्‍दी की पुंसवादी आलोचनादृष्‍टि‍ का गहरा असर. औरतों के साथ इति‍हासग्रंथों में यही हुआ है, वही अब राजेन्‍द्र यादव ने कि‍या है.

नोट : 3 सितम्बर 2009 को राजेन्‍द्र यादव ने ‘देशकाल डाट काम’ को दि‍ए साक्षात्‍कार में साहि‍त्‍य के जाति‍ आधार की पुन: वकालत की है. यह टि‍प्‍पणी उसकी प्रति‍क्रि‍या में उसी दिन लि‍खी गई और इंटरनेट पर प्रकाशित हुई थी.

Read Also –

जनकवि शील – कुछ अप्रासंगिक प्रसंग
महाकवि मुक्तिबोध बनाम मुन्नवर राणा
जो गीतांजलि श्री को न जानते हैं, न मानते हैं
रूढ़िबद्धताओं और विचारधारा से भी मुक्त है नामवर सिंह की विश्वदृष्टि
एम. एफ. हुसैन की 10वीं पुण्य तिथि पर
बुद्धिजीवियों का निर्माण – अंतोनियो ग्राम्शी
प्रेमचंद के किसान और कुलक का चरित्र : एक अध्ययन
31 जुलाई : महान कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिन पर हमलावर होते अतियथार्थ के प्रदूषण 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

निजी संपत्ति के ख़ात्मे के बारे में – फ्रे. एंगेल्स

Next Post

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास, 1925-1967

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास (1925-1967)

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास, 1925-1967

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

विश्लेषण : आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, क्यों ?

February 16, 2023

बजट 2020 : न लीपने का और न पोतने का

February 2, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.