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भारत में ब्राह्मणवादी शिक्षा प्रणाली को खत्म कर आधुनिक शिक्षा प्रणाली का नींव रख शूद्रों, अछूतों, महिलाओं को शिक्षा से परिचय कराने वाले लार्ड मैकाले

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 29, 2022
in ब्लॉग
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भारत के इतिहास में पहली बार अंग्रेजों के आगमन के बाद ही ब्राह्मणवादी क्रूर सत्ता को चुनौती पेश की गई थी, जिसकी जयकार आज भी भारत के शुद्रों, अछूतों द्वारा किया जाता है, जो आज भारत की ब्राह्मणवादी सत्ता (आरएसएस-भाजपा) के छाती पर शूल की तरह गड़ा हुआ है, वह है भीमा कोरेगांव में स्थापित विजय स्तम्भ, जो क्रूर पाखंडी ब्राह्मणवादी पेशवाई राज को ध्वस्त कर स्थापित किया गया था, जो यह आरएसएस-भाजपाई गुंडों द्वारा आतंक का पर्याय बना देना चाहता है.

क्रूर पाखंडी ब्राह्मणवादी सत्ता पेशवा को ध्वस्त करने के बाद अंग्रेजों ने दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया था जिसने भारत के शुद्रों, अछूतों, महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया वह था हर किसी को शिक्षा पाने का अधिकार. इस महत्वपूर्ण बदलाव ने पहली बार भारत के शुद्रों, अछूतों, औरतों को शिक्षा से परिचित कराया और उसे अपनी दुर्दशा को समझने, उसे दूर करने के लिए और सबसे महत्वपूर्ण ब्राह्मणवादी आतंक के खिलाफ आवाज उठाने का हौसला दिया.

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अंग्रेजी सत्ता के जिस प्रतिनिधि ने शुद्रों, अछूतों, औरतों, आदिवासियों को शिक्षा से परिचित कराया और उसको ब्राह्मणवादी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित किया, वे थे लार्ड मैकाले, जिन्होंने भारत में छुआछूत से भरा पाखंडी ब्राह्मणवादी शिक्षा प्रणाली का अंत कर आधुनिक शिक्षा प्रणाली को लागू किया और ऐसा करते हुए उन्होंने जो सवाल रखा वह झकझोरने वाला है. लार्ड मैकाले ने ब्राह्मणवादी संस्कृत-साहित्य और उसके शिक्षा प्रणाली पर प्रहार करते हुए लिखा है कि –

क्या हम ऐसे चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन कराएं जिस पर अंग्रेजी पशु-चिकित्सक को भी लज्जा आ जाये ? क्या हम ऐसे ज्योतिष को पढ़ायें जिस पर अंग्रेज बालक-बालिकाएं हंसें ? क्या हम ऐसे भूगोल बालकों को पढ़ाने को दें जिसमें शीरा तथा मक्खन से भरे समुद्रों का वर्णन हो ? लार्ड मैकाले संस्कृत तथा फारसी भाषा पर धन व्यय करना मूर्खता समझते थे.

मैकाले का भारत में एक बहुजन मसीहा के रूप में आविर्भाव हुआ था, जिसने चार हजार वर्ष पुरानी सामन्तशाही व्यवस्था को ध्वस्त करके जाति और धर्म से ऊपर उठकर एक इंसानी समाज बनाने का आधार दिया. लार्ड मैकाले ने वर्णव्यवस्था के साम्राज्यवाद को ध्वस्त किया तथा गैर बराबरी वाले मनुवादी साम्राज्य की काली दीवार को उखाड़ फेंका.

लार्ड मैकाले ने आगे आने वाली पीढ़ी के लिए एक मार्ग प्रशस्त किया, जिसके कारण ज्योतिबा फुले, शाहु जी महाराज, पेरियार रामास्वामी और बाबा साहब आंबेडकर जैसी महान विभूतियों का उदय हुआ जिन्होंने भारत का नया इतिहास लिखा.

लार्ड मैकाले

लार्ड मैकाले का जन्म 25 अक्टूबर 1800 ईस्वी को इंग्लैण्ड के लेस्टरशायर नामक स्थान पर हुआ था. लार्ड मैकाले अंग्रेजी के प्रकाण्ड पंडित, प्रबुद्ध लेखक तथा ओजस्वी वक्ता थे. ब्रिटिश सरकार के चार्टर ऐक्ट 1833 के अनुसार भारत के लिये प्रथम विधि आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष बनकर लॅार्ड मैकाले 10 जून, 1834 को भारत पहुंचे. इसी वर्ष लार्ड मैकाले ने भारत में नई शिक्षा नीति की नींव रखी.

06 अक्टूबर, 1860 को लॅार्ड मैकाले द्वारा लिखी गई भारतीय दण्ड संहिता (इंडियन पेनल कोड) लागू हुई. आईपीसी लागू होने पर कानून के समक्ष ब्राह्मण – शूद्र सभी बराबर हो गए और मनुस्मृति का विधान खत्म हुआ. इसके पहले भारत में मनुस्मृति के काले कानून लागू थे, जिनके अनुसार अगर ब्राह्मण हत्या का आरोपी भी होता था तो उसे मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता था और वेद वाक्य सुन लेने मात्र के अपराध में शूद्रों के कानों में शीशा पिघलाकर डालने का प्रावधान था.

लार्ड मैकाले भारत के बहुजनों के लिए किसी फरिस्ते से कम नहीं थे. वे हजारों साल से शिक्षा के अधिकार से वंचित बहुजन समाज के लिए मुक्ति दूत बनकर भारत आये. उन्होंने शिक्षा पर पुरोहित वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर सभी को समान रूप से शिक्षा पाने का अधिकार प्रदान किया तथा पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों की किस्मत के दरवाजे खोल दिए.

ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिंक द्वारा गठित सार्वजनिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में लार्ड मैकाले ने अपने विचार सुप्रसिद्ध स्मरणपत्र (Macaulay Minute) 02 फरवरी, 1835 में दिए और उनके विचार ब्रिटिश सरकार द्वारा 07 मार्च 1835 को अनुमोदित किए गए. मैकाले ने यहां का सामाजिक भेदभाव, शिक्षण में भेदभाव और दण्ड संहिता में भेदभाव देखकर ही आधुनिक शिक्षा पद्धति की नींव रखी और भारतीय दण्ड संहिता लिखी, जहां आधुनिक शिक्षा पद्धति में सबके लिये शिक्षा के द्वार खुले थे, वहीं भारतीय दण्ड संहिता के कानून ब्राह्मण और अतिशूद्र सबके लिये समान बने.

मनुस्मृति की व्यवस्था से ब्राह्मणों को इतनी महानता प्राप्त होती रही थी कि वे अपने आपको धरती का प्राणी होते हुए भी आसमानी पुरुष अर्थात देवताओं के भी देवता समझा करते थे. लॅार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति से ब्राह्मणों को अपने सारे विषेषाधिकार छिनते नजर आये, इसी कारण से उन्होनें प्राणप्रण से इस नीति का विरोध किया. इनकी नजर में लॅार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति केवल बाबू बनाने की शिक्षा देती है, पर मेरा मानना है कि लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति से बाबू तो बन सकते हैं, प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति से तो वह भी नहीं बन सके. हां, ब्राह्मण सब कुछ बनते थे, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या नहीं, बहुजन के लिये तो सारे रास्ते बन्द ही थे.

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के समर्थक यह बताने का कष्ट करेंगे कि किस काल में किस राजा के यहां कोई अतिशूद्र वर्ग का व्यक्ति मंत्री, पेशकार, महामंत्री या सलाहकार रहा हो ? अतः इन जातियों के लिये तो यह शिक्षा पद्धति कोहनी पर लगा गुड़ ही साबित हुई. ऐसी पद्धति की लाख अच्छाईयां रही होंगी, पर यदि हमें पढ़ाया ही नहीं जाता हो, गुरुकुलों में प्रवेश ही नहीं होता हो, तो हमारे किस काम की ? सरसरी तौर पर इन दोनों शिक्षा पद्धतियों में तुलना करते हैं, फिर आप स्वयं ही निर्णय ले सकते है कि कौन सी शिक्षा पद्धति कैसी है ?

प्राचीन बराहमनी शिक्षा पद्धति

  1. इसका आधार बराहमनी धर्मग्रन्थ रहा.
  2. इसमें शिक्षा मात्र बराहमनों द्वारा बराहमनों को ही दी जाती थी.
  3. इसमें शिक्षा पाने के अधिकारी मात्र बराहमन ही होता.
  4. इसमें धार्मिक पूजापाठ और कर्मकाण्ड का बोलबाला रहता था.
  5. इसमें धर्मिक ग्रन्थ, देवी-देवताओं की कहानियां, चिकित्सा, तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, जादू टोना आदि शामिल रहे हैं.
  6. इसका माध्यम मुख्यतः संस्कृत रहता था.
  7. इसमें ज्ञान-विज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों का अभाव रहता था अथवा अतिश्योक्तिपूर्ण ढंग से बात कही जाती थी. जैसे – राम ने हजारों वर्ष राज किया, भारत जम्बू द्वीप में था, कुंभकर्ण का शरीर कई योजन था, कोटि-कोटि सेना लड़ी, आदि आदि.
  8. इस नीति के तहत कभी ऐसा कोई गुरुकुल या विद्यालय नहीं खोला गया, जिसमें सभी वर्णों और जातियों के बच्चे पढ़ते हों.
  9. इस शिक्षा नीति ने कोई अंदोलन खड़ा नहीं किया, बल्कि लोगों को अंधविश्वासी, धर्मप्राण, अतार्किक और सब कुछ भगवान पर छोड़ देने वाला ही बनाया.
  10. गुरुकुलों में प्रवेश से पूर्व छात्र का यज्ञोपवीत संस्कार अनिवार्य था. चूंकि हिन्दू धर्म शास्त्रों में शूद्रों का यज्ञोपवीत संस्कार वर्जित है, अतः शूद्र तो इसको ग्रहण ही नहीं कर सकते थे, अतः इनके लिये यह किसी काम की नहीं रही.
  11. इसमें तर्क का कोई स्थान नहीं था. धर्म और कर्मकाण्ड पर तर्क करने वाले को नास्तिक करार दिया जाता था. जैसे चार्वाक, तथागत बुद्ध और इसी तरह अन्य.
  12. इस प्रणाली में चतुर्वर्ण समानता का सिद्धांत नहीं रहा.
  13. प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में शूद्र विरोधी भावनाएं प्रबलता से रही हैं, जैसे कि एकलव्य का अंगूठा काटना, शम्बूक की हत्या आदि.
  14. इससे हम विश्व से परिचित नहीं हो पाते थे. मात्र भारत और उसकी महिमा ही गायी जाती थी.
  15. इसमें वर्ण व्यवस्था का वर्चस्व था और इसमें व्रत, पूजा-पाठ, त्योहार, तीर्थ यात्राओं आदि का बहुत महत्त्व रहा.

लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति

  1. इसका आधार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उत्पन्न आवश्यकतायें रहीं.
  2. लॅार्ड मैकाले ने शिक्षक भर्ती की नई व्यवस्था की, जिसमें हर जाति व धर्म का व्यक्ति शिक्षक बन सकता था. तभी तो रामजी सकपाल (बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर के पिताजी) सेना में शिक्षक बन पाये थे.
  3. जो भी शिक्षा को ग्रहण करने की इच्छा और क्षमता रखता है, वह इसे ग्रहण कर सकता है.
  4. इसमें धार्मिक पूजापाठ और कर्मकाण्ड के बजाय तार्किकता को महत्त्व दिया जाता है.
  5. इसमें इतिहास, कला, भूगोल, भाषा-विज्ञान, विज्ञान, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, प्रबन्धन और अनेक आधुनिक विधायें शामिल हैं.
  6. इसका माध्यम प्रारम्भ में अंग्रेजी भाषा और बाद में इसके साथ-साथ सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हो गईं.
  7. इसमें ज्ञान-विज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों की प्रचुरता रहती है और अतिश्योक्तिपूर्ण या अविश्वसनीय बातों का कोई स्थान नहीं होता है.
  8. इस नीति के तहत सर्वप्रथम 1835 से 1853 तक अधिकांश जिलों में स्कूल खोले गये. आज यही कार्य केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही निजी संस्थाएं भी कर रही हैं.
  9. भारत में स्वाधीनता आंदोलन खड़ा हुआ, उसमें लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का बहुत भारी योगदान रहा, क्योंकि जन सामान्य का पढ़ा-लिखा होने से उसे देश-विदेश की जानकारी मिलने लगी, जो इस आंदोलन में सहायक रही.
  10. यह विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लागू होती आई है.
  11. इसको ग्रहण करने में किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं रही, अतः यह जन साधारण के लिये सर्व सुलभ रही. अगर शूद्रों और अतिशूद्रों का भला किसी शिक्षा से हुआ तो वह लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ही हुआ. इसी से पढ़ लिख कर बाबासाहेब अंबेडकर डॉक्टर बन पाये.
  12. इसमें तर्क को पूरा स्थान दिया गया है. धर्म अथवा आस्तिकता-नास्तिकता से इसका कोई वास्ता नहीं है.
  13. यह राजा और रंक सब के लिये सुलभ है.
  14. इसमें सभी वर्ण व सभी धर्म समान हैं. शूद्र और अतिशूद्र भी इसमें शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन जहां-जहां संकीर्ण मानसिकता वाले ब्राह्मणवादियों का वर्चस्व बढ़ा है, वहां वहां इन्होंने उनको शिक्षा से वंचित करने की भरपूर कोशिश की है.
  15. इसी के कारण हम आधुनिक विश्व से सरलता से परिचित हो सके हैं.

इस प्रकार शिक्षा और कानून के क्षेत्र में शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए किये गये कार्यों के लिए लार्ड मैकाले बेजोड़ स्तंभ हैं और हमेशा रहेंगे. भारत में ऐसे विद्धानों की कमी नहीं है जो प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का गुणगान करते नहीं थकते और लॅार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति को पानी पी-पीकर गालियां देते हैं लेकिन वे उन सवालों का जवाब देने से कन्नी काट जाते हैं कि आखिर शुद्रों, अछूतों यहां तक की महिलाओं तक को शिक्षा से दूर रखने वाली शिक्षा पद्धति में क्या गुण था, जिसका गुणगान गाया जाये.

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