Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

बेवकूफ लोग गुरू खोजते हैं क्योंकि भारत में गुरु के नाम पर उगे हैं गुरुघंटाल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 1, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी, हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता

सुनने और पढ़ने में अटपटा लग सकता है लेकिन सच यही है कि गुरू की जरुरत बेवकूफों को होती है और गुरूओं को बेवकूफों की जरुरत होती है. आज के जमाने में गुरू खोजना वैसे ही है जैसे ईश्वर खोजना. आधुनिककाल आने के साथ गुरू की शिक्षक के रुप में परिवर्तित छबि जब सामने आयी तो किसी ने सोचा नहीं था कि भविष्य में गुरू, शिक्षक, समीक्षक आदि मिडिलमैनों का क्या होगा ?

मध्यकाल और प्राचीनकाल में गुरू की महत्ता थी क्योंकि सामाजिक संचार का गुरू प्रमुख चैनल था. लेकिन आधुनिककाल आने के बाद गुरूरूपी मिडिलमैन का क्षय हुआ है. आज गुरू सर्विस सेक्टर का हिस्सा है और अपनी सेवाओं का दाम लेता है. वह अपनी सेवाएं बेचता है. आज कोई भी गुरू बगैर पैसा लिए किसी भी किस्म का ज्ञान नहीं देता.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

मनुष्य ज्यों ज्यों आत्मनिर्भर होता गया उसने मिडिलमैन की सत्ता को अपदस्थ कर दिया. भारत में गुरू के नाम पर गुरूघंटाल वैसे ही पैदा हो गए हैं जैसे जंगल में घास पैदा हो जाती है. विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से लेकर मीडियानिर्मित अरबपति-करोड़पति गुरूओं का सारा तामझाम संड़ाध से भरा है.

आधुनिककाल में मिडिलमैन यानी ज्ञानदाता, आप चाहें तो ज्ञान के दलाल भी कह सकते हैं, जो विश्वविद्यालय-कॉलेज शिक्षक अपने को गुरू कहलाना पसंद करते हैं उनमें ज्ञान की कोई भूख नहीं होती. वे कभी साल भर में बाजार जाकर एक किताब तक नहीं खरीदते.

अधिकांश हिन्दी शिक्षक अपने विद्यार्थियों को चेला और भक्त बनाने में सारी शक्ति खर्च कर देते हैं. अच्छे नागरिक बनाने और अधिकार संपन्न नागरिक बनाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती. मैं अपने निजी तजुर्बे और अपने शिक्षकों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि गुरू समाज की जोंक हैं, ये दीमक की तरह समाज को धीरे -धीरे खा रहे हैं.

प्राचीनकाल-मध्यकाल में गुरू ज्ञान का स्रोत था, आज ऐसा नहीं है. आज गुरू समाज की दीमक हैं. नयी संचार क्रांति का जिस तरह विकास हो रहा है, इससे गुरू नामक जोंक से समाज को कुछ समय के लिए राहत मिलेगी. संचार क्रांति को हम जितनी तेज गति से आगे ले जाएंगे उतनी ही जल्दी हमें गुरू नामक जोंक और दीमकों से मुक्ति मिलेगी.

आप अपने आसपास रहने वाले किसी भी गुरू को जरा गंभीरता के साथ श्रद्धा के आवरण के बाहर आकर देखेंगे तो शायद कभी गुरू के प्रति किसी तरह की इज्जत आपके मन में नहीं बचेगी. जो लोग यह सोचते हैं गुरू सामाजिक परिवर्तन का वाहक है, या रहा है, वे परले दर्जे के बेवकूफ हैं.

समाज में परिवर्तन ज्ञान से नहीं आता, ज्ञानी से नहीं आता, गुरू से भी परिवर्तन नहीं आता, परिवर्तन आता है श्रम के उपकरणों में नए उपकरणों के जन्म से. श्रम के उपकरणों का निर्माण गुरू, ज्ञानी, पंडित, शिक्षक वगैरह नहीं करते बल्कि श्रमिक करते हैं. श्रम के नए उपकरण जब आते हैं तो वे नयी सभ्यता और जीवनशैली को जन्म देते हैं.

गुरूओं ने आज तक नए को जन्म नहीं दिया बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि गुरूओं ने परिवर्तन के फल जरूर खाए हैं लेकिन गुरूओं ने हमें श्रम और श्रमिक से नफरत करना सिखाया है. इसका दुष्परिणाम निकला है कि हमारी समूची शिक्षा व्यवस्था, कला, साहित्य, संस्कृति आदि का श्रम और श्रमिक से अलगाव बढ़ा है. श्रम और श्रमिक से अलगाव का अर्थ है समाज से अलगाव.

ज्ञानी या गुरू हमेशा ज्ञान का परिवर्तन के विपक्ष में इस्तेमाल करते रहे हैं. मूलतः गुरू परिवर्तन विरोधी रहे हैं और आज भी हैं. यदि मेरी बात पर विश्वास न हो तो जरा किसी भी शिक्षक से किसी भी नई संचार तकनीक के बारे में सामान्य-सी बातों के बारे में पूछकर देखें, भयानक निराशा हाथ लगेगी.

गुरू को परिवर्तन नही रूढ़िबद्धता पसंद है, बुनियादी सामाजिक बदलाव नहीं यथास्थिति पसंद है. संचार क्रांति के सभी परिवर्तनों का समाज के निचले हिस्सों तक में इस्तेमाल करने वाले मिल जाएंगे, लेकिन गुरूओं को तो अभी एसएमएस तक खोलना और करना नहीं आता. कायदे इन्हें सबसे पहले आना चाहिए था लेकिन हमारे गुरू अपनी ज्ञान की गठरी को संभालने में ही व्यस्त हैं.

वे नहीं जानते उनके ज्ञान की समाज में कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है. जब गुरू के पास अप्रासंगिक ज्ञान हो, समाज से विच्छिन्न शिक्षा व्यवस्था हो, ऐसे में अक्लमंद गुरू तो सिर्फ जोरासिक पार्क में मिलेंगे.

Read Also –

शिक्षक दिवस के उत्तरार्द्ध पर गुरुओं से जुड़ी खट्टी मीठी यादें
शिक्षक दिवस पर विशेष : शिक्षा, शिक्षक और लोकतंत्र की चुनौतियां

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

मलखान सिंह और उनकी कविताएं

Next Post

आपबीती दास्तान – फैज़ अहमद फ़ैज़

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

आपबीती दास्तान - फैज़ अहमद फ़ैज़

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

सर्वहारा वर्ग के प्रथम सिद्धांतकार और महान नेता कार्ल मार्क्स

May 5, 2020

क्या ओडिशा सरकार ने वेदांता के प्रोजेक्ट विस्तार के लिए जनसुनवाईयों को जल्दबाज़ी में निपटाया ?

October 18, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.