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मिस्र के विद्रोही कवि अहमद फ़ौआद नेग़्म की कुछ कविताएं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 30, 2022
in कविताएं
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मिस्र के विद्रोही कवि अहमद फ़ौआद नेग़्म की कुछ कविताएं
मिस्र के विद्रोही कवि अहमद फ़ौआद नेग़्म की कुछ कविताएं

1

सूर्य ऊपर
वैसे ही चमकता है
जैसे हमारे यहां
धरती परिपूर्ण है सम्पन्नता,
जनता और भद्रता से.
सिर्फ़ अमेरिकी गिरोह
जमे हैं पालथी मारे
गरीब जन की छाती पर,
भेड़िये चले आ रहे हैं
तेज़ गति से जंगली सियारों की तरह
और भंड़ुए चार
जो बन गये हैं इधर बड़े पत्रकार
खड़े हैं करताल लिये,
वे नाचते हैं हर एक शासक की ताल पर.

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2

ज़ुल्म की इन्तिहा है :
अड़ी हैं तलवारें जनसामान्य की गर्दन पर,
गुप्त पुलिस कुदक रही है
ख़ाली जगहों पर टिड्डियों की तरह
कलाकार और कलावंत
रंडीपना कर रहे हैं
सूचना मंत्री के लिये,
शादियों में,
तलाक़ की कचहरियों
और शव यात्राओं में.
हर्षोन्मत्त हैं वे सभी
उनकी हथेलियों पर
चिकनाई लगी ही रहती है
पूरे वर्ष भर.

3.

थोड़े दिनों तक वह रहता है एक ‘मार्क्सवादी’
बाक़ी दिनों में होता है वह एक ‘मुस्लिमवादी’
वह क़ायम कर लेता है मैत्री
तमाम शासकों के साथ
वह धारण करता है एक साथ
सत्रह विचारधाराओं को.

4

हमें न सीरिया की ज़रूरत रहेगी न लीबिया की.
बजाय इसके हमारे पास होगा एक यूरो-अरब संघ
लंदन और वेटिकन सहित.
गरीब जन खाया करेंगे मीठे आलू,
वे चला करेंगे अकड़ कर,
उनके बच्चों को दिये जायेंगे फ्रांसीसी नाम.
अपने बच्चों का नाम ‘शालता‘ रखने के बजाय
गरीब जन पुकारा करेंगे उनको ‘जीन‘ कह कर.

5

क्रान्तिकारी जिप्सी, बकवादी
गिरहकट, झपटमार
मिल कर बैठा करते हैं सभा-सम्मेलनों में
चॉकलेट बार और मिठाइयां
चुभलाते हुए.

6

हमारे श्रम और माथे के पसीनों से
खेतों की बजाय,
तुम बनाते हो आलीशान महल,
शराबख़ाने कारखानों से सटे हुए
और जेल पार्कों के बदले में.
तुम खुला छोड़ देते हो अपने कुत्तों को
गलियों की हवा खाने के लिये
और हमें बंद कर देते हो
कोठरियों-तहख़ानों के सीलन भरे अन्धेरों में.

7

‘ख़वागा’* निकल चुका है आखेट पर
लूटने के लिये अपने आसामियों को
दिन के उजाले में
वह उछाल देता है (पूरब में) एक डॉलर
और बटोर लेता है पूरे 300 मिलियन
बोतलों, वेश्याओं,
च्युइंग गम, कैंडीज़,
बन्दूकों, गोलियों
और काउब्वॉय फ़िल्मों को बेच कर.
वह तेल गटकता है और
उल्टी करता जाता है
विकृतियों के तमाम रंग-रूपों की.

8

हम जानते हैं किसने अपमानित किया है हमें
हमें यह भी मालूम है कि हम कौन हैं

हम इकट्ठा होते हैं
मज़दूरों, किसानों और छात्रों के रूप में,
हमारा समय आ गया है
और हम बढ़ते ही जायेंगे आगे की ओर
उस सड़क पर जहां से वापसी सम्भव नहीं
मुक्ति का सूरज हमारे क़रीब है
हम साफ़-साफ़ देख पा रहे हैं उसे.

*ख़वागा- सैन्य अभियानकर्ता, आर्थिक शोषक

  • अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र

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