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अडानी के गुब्बारे में हिंडेनबर्ग के छेद को सत्ता के आतंक के सहारे भरने की कोशिश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 11, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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अडानी के गुब्बारे में हिंडेनबर्ग का छेद को सत्ता के आतंक का सहारा
अडानी के गुब्बारे में हिंडेनबर्ग का छेद को सत्ता के आतंक का सहारा
Saumitra Rayसौमित्र राय

दुनिया के 9 बड़े बैंकों ने अदाणी से पिछले साल अंबुजा सीमेंट को खरीदने के लिए दिए गए 5.25 बिलियन डॉलर के लोन की वसूली शुरू कर दी है. इनमें बार्कलेस प्रमुख है, जिसने 12–18 महीने के लिए 750 मिलियन डॉलर दिए थे. इसके अलावा स्टैंडर्ड चार्टर्ड, जापान के MUFG, सिटी बैंक और जेपी मॉर्गन ने भी वसूली शुरू की है. अकेले चलने का भरम इंसान को एक झटके में ले डूबता है.

मोर्गन स्टेनले कैपिटल इंटरनेशनल यानी MSCI के इंडिया इंडेक्स में अदानी इंटरप्राइजेज के 430 मिलियन शेयर्स हैं. अगर MSCI ने अदानी के शेयर्स की कीमत 25% भी घटा दी तो भाव सिर्फ 110 मिलियन रह जायेंगे. अगर बाकी की 8 कंपनियों की शेयर वैल्यू भी 25% घटी तो कुछ समय बाद अदानी सेठ खुद को कंगाल घोषित कर देगा. फिर 2019 में मोदीजी को आशीर्वाद देने वाले करीब 30 करोड़ वोटर्स अपनी बहू–बहन–बेटियों, बीवी और मां को भी गिरवी रखकर बैंकों के नुकसान की भरपाई करेंगे. फिर भी पूरा नहीं पड़ा तो गुर्दा, लिवर और खून है न बेचने के लिए !

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अदाणी समूह का कर्ज़ 3.39 लाख करोड़ हो चुका है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का 1.2%. आईएमएफ के मुताबिक अक्टूबर में भारत की अर्थव्यवस्था 273 लाख करोड़ रुपए थी. देश की मूर्ख अवाम को इसका मतलब समझ नहीं आएगा. लेकिन अगर इसे यूं कहें कि अदाणी की 10 कंपनियों की कुल परिसंपत्तियां 4.8 लाख करोड़ है, जबकि उसका लोन 3.39 करोड़ रुपए है तो उनका दिमाग ठनकेगा.

हिन्डेनबर्ग की रिपोर्ट के बाद यह साबित हो गया है कि अदाणी ने पैसा घुमाया, फर्जी कंपनियों से काला धन शेयर बाज़ार में निवेश किया और अपनी कंपनियों का मूल्य 800 गुना दिखाया. अब जबकि रिपोर्ट ने अदाणी को धूल चटा दी है तो क्या अभी भी आप उसकी जायदाद 4.8 लाख करोड़ मानेंगे ? वैसे भी अदाणी के लोन का यह आंकड़ा विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि अदाणी ग्रुप में और भी कई छोटी कंपनियां शामिल हैं. यानी उसका लोन और ज्यादा है. सरकार ने संसद में साफ़ कर दिया कि पीएम के दोस्त पर कोई बात नहीं होगी. तो यह काम आपको ही करना होगा। वरना आपकी जमा पूंजी गई पानी में.

पते की बात तो यह है कि फरवरी 2019 में अदाणी को 6 एयरपोर्ट सौंपे गए. उस दौरान नागरिक उड्डयन मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी रहीं गार्गी कौल (अब रिटायर्ड) आज अदानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स में पूर्णकालिक निदेशक हैं. गार्गी कौल सुप्रीम कोर्ट के जज एसके कौल की साली हैं, जिन्होंने 14 दिसंबर 2018 को राफेल घोटाले से जुड़ी सारी याचिकाएं खारिज़ कर दी थीं. गार्गी मैडम को उसके अगले ही दिन, यानी 15 दिसंबर को सचिव बना दिया गया. फिर 10 दिन बाद वे रक्षा मंत्रालय में वित्तीय सलाहकार बन गईं. ऐसे ढेरों मामले हैं, जिन पर जवाब में पीएम एक शब्द नहीं बोल सकते और न ही उनके भगवा भगत.

बार्कलेज, स्टैंडर्ड चार्टर्ड और ड्यूश बैंक ने अदानी को दिया लोन वापस मांगना शुरू कर दिया है, क्योंकि वे विदेशी बैंक हैं. सेठ जी जल्द ही होल्सिम सीमेंट की खरीद के लिए इन बैंकों से लिए गए 4.5 बिलियन डॉलर में 500 मिलियन डॉलर लौटाने जा रहे हैं. इधर, सरकार की गुलामी में डूबे भारतीय बैंक बादशाह की इजाजत के बिना ऐसा सोच भी नहीं सकते. उन्हें इस देश की जमा पूंजी और समृद्धि से कोई लेना–देना नहीं है. न ही गोदी मीडिया को, जिसकी नज़र देश के सामने मौजूद सवालों के बजाय प्रधानमंत्री की जैकेट पर थी. अदानी का मामला निजी नहीं, बल्कि देश का सबसे बड़ा घोटाला है.

जैसा मैंने पहले लिखा था–हिन्डेनबर्ग शॉर्ट पोजीशन का खिलाड़ी है. शॉर्ट पोज़िशन का सीधा अर्थ होता है बिकवाली का सौदा. यह एक तरह का वायदा कारोबार है, जिसमें जेब में अठन्नी न होने के बावजूद आप अपने सूचना नेटवर्क से करोड़ों कमा सकते हैं. शॉर्ट करने का अर्थ होता है कि बेचनेवाले के पास भी शेयर (या अदाणी के मामले में बॉन्ड) नहीं हैं, लेकिन उसे पूरी उम्मीद है कि आज उनका जो भाव है, जल्दी ही वो वहां से गिरनेवाला है.

इस उम्मीद को पैदा करने में हिन्डेनबर्ग ने दो साल मेहनत की है. उसने अदाणी ग्रुप की ऐसी कमज़ोर नस पकड़ी है कि सेठ जमीन में धंसे जा रहे हैं. अदाणी के शेयर्स जितने गिरेंगे, हिन्डेनबर्ग को नहीं, बल्कि उस खरीदार को फायदा होगा जिससे हिन्डेनबर्ग ने वायदा किया है. शॉर्ट सौदे का एक पुख़्ता तरीक़ा होता है कि वो शेयर या बॉन्ड किसी से उधार लेकर सामनेवाले को सौंप देता है और फिर दाम गिरने पर अपना उधार चुका देता है.

मिसाल के लिए– किसी कंपनी का शेयर आज 200 रुपए प्रति शेयर का मिल रहा है लेकिन मुझे भरोसा है कि यह शेयर जल्दी ही गिरनेवाला है. मैं उसके 100 शेयर इसी भाव पर बेचने का सौदा आपके साथ कर लेता हूं. वायदा है कि अगले हफ़्ते हम यह लेनदेन करेंगे. हफ़्ते भर में कंपनी का भाव गिरकर 150 रुपए हो गया, जो शेयर 20 हज़ार रुपए के थे, वो 15 हज़ार के रह गए.

अब मैं 15 हजार में बाज़ार से ख़रीदकर आपको शेयर थमा दूंगा और 20 हज़ार रुपए ले लूंगा. इसे शॉर्ट इसलिए कहा जाता है कि मेरे पास उतने शेयर कम हैं यानी नहीं हैं, जिनका मैं सौदा कर रहा था. लेकिन शेयर का भाव गिरकर 0 भी हो सकता है. यानी इस सौदे में बेचनेवाला ज़्यादा से ज़्यादा 29 हज़ार रुपए ही कमा सकता है. लेकिन उसका जोखिम असीमित है, क्योंकि शेयर अगर गिरने के बजाय बढ़ने लगा तो फिर वो बढ़कर कहीं भी जा सकता है.

अमेरिका के दूसरे कई शॉर्ट सेलर अभी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि हिंडनबर्ग ने दरअसल क्या सौदा किया है और कैसे किया है ?अमेरिका में अदानी कंपनियों के कुछ 100 करोड़ डॉलर के ही बॉन्ड्स हैं, यानी गिनती इतनी नहीं है कि कोई आसानी से उन्हें उधार ले और शॉर्ट करके बड़ी रकम क़मा ले, इसमें ज्यादा कमाई नहीं है.

कमाई डेरिवेटिव सौदे में है। डेरिवेटिव का अर्थ बाज़ार में ऐसे इंस्ट्रुमेंट या सौदे हैं, जिनमें लेनदेन का फ़ैसला किसी और चीज़ के आधार पर तय होता है. जैसे सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज में भारत के निफ्टी का एक डेरिवेटिव चलता है, जिसका नाम एसजीएक्स निफ्टी है. एसजीएक्स निफ्टी में ख़रीद बिक्री करने के लिए किसी को भारत के नियम–क़ानून मानना ज़रूरी नहीं है लेकिन उसके ऊपर नीचे जाने का फैसला भारत में निफ्टी के ऊपर–नीचे जाने से ही होगा.

ऐसा ही सौदा अदाणी के शेयरों के नाम पर भी हो सकता है कि भारत में किसी कंपनी के शेयर ऊपर जाएंगे या नीचे इस पर अमेरिका में बैठे दो लोग आपस में सौदा कर लें. हिन्डेनबर्ग ने साफ तौर पर यह नहीं बताया है कि उसने किससे शॉर्ट या डेरिवेटिव सौदा किया है. वह एक्टिविस्ट टाइप का शॉर्ट सेलर है.

अमेरिकी क़ानून के तहत इस तरह मंदी के सौदे करने के बाद रिपोर्ट निकालने और मुनाफ़ा कमाने पर कोई रोक नहीं है लेकिन अगर यह साबित हो गया कि हिंडनबर्ग ने गलत या भ्रामक जानकारी देकर मुनाफ़ा कमाने की कोशिश की है तो यह अमेरिका के क़ानून के तहत अपराध बनता है.

अगर अपनी जांच पड़ताल से उसने ऐसी जानकारी निकाली है, जो बाकी जनता को उपलब्ध नहीं थी, तब इस जानकारी को सामने लाए बिना सौदे करने को इनसाइडर ट्रेडिंग माना जा सकता है. ऐसा हुआ तो फिर हिंडनबर्ग मुसीबत में आ जाएगा. मैंने पहले दिन ही लिखा था कि सारा खेल अमेरिका से हो रहा है और निशाने पर मोदी सरकार है. सेबी और भारत सरकार की चुप्पी बताती है कि हमारी ही दाल पूरी काली है. अगर हिन्डेनबर्ग को इस खेल में तगड़ा मुनाफा होता है तो बाकी अमेरिकी शॉर्ट सेलर भी खुदाई शुरू कर सकते हैं. फिर तो हम दावे के साथ यह भी नहीं कह पाएंगे कि मंदिर वहीं बनाएंगे.

लोकतंत्र के ग्राउंड ज़ीरो यानी संसद के उच्च सदन में प्रधानमंत्री ने जो कहा और जो नहीं सुना गया–दोनों को मिलाकर अगर एक वाक्य में कहें तो कहा जा सकता है–न खाता न बही, जो सत्ता कहे वही सही. सत्ता यानी वह एक शख़्स जो देश के पीएम हैं और जो तमाम सवालों, आरोपों और मुद्दों से अकेले लड़ रहे हैं. वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके इर्द–गिर्द बहुमत की सत्ता का जाल बुना जाता है, जीत की इबारत लिखी जाती है और हारी हुई बाज़ी भी जीत ली जाती है.

वे अगर कहें कि न कोई घुसा, न घुसकर बैठा है–तो समूचा सिस्टम उसे सही साबित करेगा, फिर चाहे वह संवैधानिक संस्थाएं हों या खुद सुप्रीम कोर्ट. यानी, समूचा देश सत्ता के आतंक में उस एक व्यक्ति की मुट्ठी में बंधक है, जिसे ना पसंद नहीं. तालियां, मेज़ की थपथपाहट और वाहवाही खूब भाती है. सत्ता का यह नंगा नाच आपने बीते 2 दिन में बखूबी देख लिया होगा. किसी को कोई फ़र्क पड़ा क्या ?

क्या उस एलआईसी को कोई फ़र्क पड़ा, जिसका अदानी में निवेश से घाटा अब इतना बढ़ गया है कि कंपनी के ब्रोकर्स को रोज़ मिलने वाला 16 करोड़ का इंसेंटिव अब 3 करोड़ पर आ गया है ? आप कहते रहिए कि एलआईसी डूब रही है, डूब जायेगी लेकिन सत्ता कहेगी–सब ठीक है. आरबीआई कहेगा – हां, कोई संकट नहीं है. देश के हजारों चैनल भी उसे दोहराएंगे और बेरोजगारी, महंगाई से जूझती अवाम मान लेगी. उसके सिवा चारा ही क्या है !

कॉर्पोरेट्स भी आपके नहीं सत्ता के साथ हैं, क्योंकि सवाल धंधे का है. जो नहीं है, वह ईडी, सीबीआई और आईटी के छापे झेले. विपक्ष ज़मीन पर नहीं है. एकजुट नहीं है. सर्वमान्य नेतृत्व का संकट है. जीतने वाले नेता की जरूरत है. भारत का आर्थिक संकट गहरा चुका है. बैंकों को करीब 7 लाख करोड़ का एनपीए साफ़ करना है. वह पैसा भी आप ही देंगे, जैसे पहले 10 लाख करोड़ चुकाया था.

विदेशी वित्तीय संस्थाओं को भारत में पैसा लगाना अब जोखिम का काम नजर आता है. खासकर तब, जबकि देश की कंपनियां कुछ बना नहीं रही, लेकिन शेयर उछल रहे हैं. साफ तौर पर यह उस भ्रष्टाचार का मामला है, जिसे सिस्टम ने विकास का पर्याय मानकर एडजस्ट कर लिया है. जनता तो कर ही चुकी है. यहां साफ़ कोई नहीं. सवाल सिर्फ़ इतना है कि सबसे बड़ा चोर कौन है ? महज़ दो ही पारियों में जब सत्ता पूरे भारत को तानाशाही के शिकंजे में जकड़ चुकी हो तो इस बेकसी में जीवन का हर राग सूना नज़र आता है – जग सूना–सूना लागे रे…!

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