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Home कविताएं

नाक

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 20, 2023
in कविताएं
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मेरी नाक अमूल्य है.

कांग्रेसी पिता मानते हैं कि
नेहरू की नाक भी राष्ट्रीय बुर्जुआजी के
सेवा-भाव में इसी तरह उठी हुई रहती थी

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मेरी छोटी बहनें इसकी तुलना
जिराफ़ की गर्दन और हाथी की सूंड से करती हैं और
अब भी बच्चों की तरह हंसती नहीं थकतीं

प्रेमिकाओं को तो नाक से उतना ही मतलब रहा
जितना कि इंसान की देह के लिए
उसकी ज़रूरत हो, तो उनकी बात फिर कभी

फिलहाल मैं अपनी नाक की तरफ़ हाथ ले जाता हूं
और अनुभव करता हूं
समय के साथ इसके गुण विकसित भी होते गए
और मैं सूंघ कर बता सकता हूं बहुत आसानी से
इस दुनिया की जनता को कि
किसने उसकी हक़ की रोटी छीनी

घबराइए मत क्योंकि मैं हुनरमंद हूं
मैं राज्य का पेशेवर कुत्ता भी नहीं…
और यह अपनी तरह की ट्रेनिंग
ख़ुद से ख़ुद को दी है

ताकत की गंध मुझे सबसे पहले आती है.
उसके बाद में किसी जीवित शरीर के मृत होने की
जो साफ़ वायु और ज़िन्दगी के लिए
कोई जद्दोजहद नहीं करता

मैं यह आप सबको आसानी से बता सकता हूं
अपना भविष्य याद कर
अभी-अभी किस वर्ग की पैंट गीली हो गई
और वह जुट गया नौकरशाहों के मृत दल में

आप कहेंगे यह तो
‘मुंह मियां मिट्ठू’ वाली बात है भाई
मैं कहूंगा मेरे पास और कोई रास्ता ही नहीं था
मैंने इस अंग का पुनर्नवा
एक भीषण वैश्विक आपदा को जूझने के बाद किया
जब पन्द्रह दिनों के लिए
हम सब की सूंघ सकने की शक्ति चली गई थी…
और मैं जो पहले भी इंसानियत के विषय में
लगभग ठीक ठीक सोचता आया हूं
तो आसान था ऐसे में…
नाक की विरासत को समझ पाना

मेरी सरकारें और उनकी पिट्ठू जो
उस प्राकृतिक दुर्घटना में असफल थीं,
हमें इलाज और अनाज मुहैया कराने में
वह सारा ठीकरा फोड़ती हैं उस देश पर
जिनके लोगों की नाकें बहुत छोटी और सुन्दर हैं

असंख्य मुर्दे इतिहास के आर-पार हैं
और मैं अब
कोई समझौता नहीं कर पाता !

यह अब पाद जैसी नैसर्गिक क्रिया को
पहचान पाने का खेल नहीं
न ही सूंघना मात्र
प्रेमी-प्रेमिका के गुप्तांगों और वसंतों को

सुगंध और दुर्गंध का दायरा बढ़ता जा रहा
धीरे-धीरे…

और मेरी नाक की दुर्लभता भी
जिसे अपने अर्थ से कभी कटने नहीं दूंगा !

  • तनुज
    20.02.2023

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