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‘भारत कैसे बिल गेट्स का गिनी पिग बन गया ?’ – डॉ. नॉर्बर्ट हैरिंग

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 10, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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'भारत कैसे बिल गेट्स का गिनी पिग बन गया ?' - डॉ. नॉर्बर्ट हैरिंग
‘भारत कैसे बिल गेट्स का गिनी पिग बन गया ?’ – डॉ. नॉर्बर्ट हैरिंग

हिंदी में इस शीर्षक का अर्थ है – ‘भारत कैसे बिल गेट्स का गिनी पिग बन गया : मुख्य अभिनेताओं द्वारा वर्णित एक साजिश.’ इससे पहले कि आप इस ब्लॉग के लेखक डॉ. नॉर्बर्ट हैरिंग को कांस्पीरेंसी थ्योरिस्ट घोषित करें, यह जान लीजिए कि डॉ. नॉर्बर्ट हैरिंग जर्मनी के एक जाने माने बिजनेस जर्नलिस्ट और ब्लॉगर हैं. उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी की है.

वे विश्व अर्थशास्त्र संघ के सह-संस्थापक और सह-निदेशक हैं, जो दुनिया भर में अर्थशास्त्रियों का दूसरा सबसे बड़ा संघ है. उन्होंने कई किताबें भी लिखी है. उनकी सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक ‘एबोलिशिंग कैश एंड द रिजल्ट्स’ रही हैं. गिनीपिग चूहों की एक प्रजाति है जिसे वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रयोग करने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

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उनका यह पूरा लेख कृपया वे जरूर पढ़ें, जिन्हें आलोचना के नाम पर दूसरों को कांस्पीरेंसी थ्योरिस्ट घोषित करने में बड़ा मजा आता है. यहां नॉर्बर्ट हेरिंग और मोहम्मद एल्माजी और किम ब्राउन की बातचीत के कुछ हिस्से दिये जा रहे हैं –

प्रश्न: आपने लिखा है कि कैसे भारत को नकदी खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर ‘गिनी पिग’ के रूप में इस्तेमाल किया गया था. क्या आप संक्षेप में बता सकते हैं कि वहां क्या हुआ और इसके पीछे कौन था ?

नॉर्बर्ट हेरिंग: नवंबर 2016 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर घोषणा की कि केवल 4 घंटे के नोटिस के साथ सबसे छोटी मूल्यवर्ग के सभी नोटों को ‘विमुद्रीकृत’ कर दिया गया है. इसका मतलब था कि अब आप उनके साथ भुगतान नहीं कर सकते. आपको उन्हें बैंक में लाना था. इसके कारण एक ऐसे देश में जहां आधी आबादी के पास बैंक खाता भी नहीं है और 90 प्रतिशत भुगतान नकद में किया जाता है, अराजकता के दिनों और महीनों तक नकदी की अत्यधिक कमी हो गई.

बहाना लक्ष्य उन लोगों को चोट पहुंचाना था जिन्होंने (काले बाजार से पैसा) जमा किया था, वह पूरी तरह विफल रहा. हफ्तों के भीतर सरकार ने ‘वित्तीय समावेशन’ और वित्तीय प्रणाली के आधुनिकीकरण के घोषित लक्ष्य पर स्विच किया. उन्होंने मीडिया में ऐसी खबरें गढ़ीं कि यह लगे कि मोदी के इर्द-गिर्द रहने वाले भारतीयों के एक छोटे से समूह ने ऐसा सोचा था.

हालांकि, अपने ब्लॉग और अपनी पुस्तक में, मैंने गेट्स फाउंडेशन, यूएस-सरकार और अन्य यूएस-एंटी-कैश संस्थानों के साथ भारतीय केंद्रीय बैंक के बहुत करीबी ‘वित्तीय समावेशन’ सहयोग की ओर इशारा किया.

प्रश्न: बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन कैशलेस दुनिया के लिए इस अभियान में प्रमुख अभिनेताओं में से एक प्रतीत होता है. क्या हम जानते हैं कि वे इस परियोजना के लिए इतने प्रतिबद्ध क्यों हैं ?

नॉर्बर्ट हेरिंग: यदि आप गेट्स को एक Microsoft व्यक्ति के रूप में सोचते हैं, तो इसमें Microsoft और अन्य यूएस-आईटी-कंपनियों का हित है, जो अधिक व्यवसाय करने और अधिक डेटा प्राप्त करने के लिए सब कुछ डिजिटल करने में शामिल हैं. वित्तीय डेटा सबसे मूल्यवान डेटा में से एक है.

बिल गेट्स कई राष्ट्रीय सुरक्षा समूहों और सभाओं में एक प्रमुख भागीदार भी हैं. वह स्पष्ट रूप से एक देशभक्त हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को अपने दिल के बहुत करीब रखते हैं. और यह समझा जाता है कि शेष विश्व क्या कर रहा है, इस बारे में अधिक डेटा और अधिक नियंत्रण द्वारा इसे आगे बढ़ाया जा सकता है.

प्रश्न: क्या कोविड-19 और ‘द ग्रेट लॉकडाउन’ का इस्तेमाल ‘नकदी पर युद्ध’ को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है ?

नॉर्बर्ट हेरिंग: हां, बेशक, इस संबंध में इसका बहुत अधिक उपयोग किया जाता है. बैंक मेलिंग और इंटरनेट अभियान चला रहे हैं, अपने ग्राहकों को बता रहे हैं कि नकदी गंदी है और कार्ड या मोबाइल भुगतान समाधान नहीं हैं. वे ऐसा किसी भी सबूत की कमी के बावजूद करते हैं कि वायरस को नकदी के माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है. अधिकांश स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि (कैश) एक प्रासंगिक चैनल (वायरस के लिए) नहीं है.

प्रश्न: दुनिया के नकदी से दूर जाने के बारे में आपकी क्या चिंताएं हैं ? क्या यह अधिक सुविधाजनक नहीं है यदि हम सभी अपनी मुद्रा को डिजिटल रूप से धारण कर सकते हैं और उसका उपयोग कर सकते हैं ?

नॉर्बर्ट हेरिंग: ज़रूर, यह सुविधाजनक है. कोई भी किसी को डिजिटल मनी का उपयोग करने से नहीं रोक रहा है. मैं भी इसका इस्तेमाल करता हूं. केवल कुछ व्यवसाय, जो वित्तीय संस्थानों की फीस को बहुत अधिक मानते हैं, डिजिटल धन को स्वीकार नहीं करेंगे. यही एक कारण है, क्यों ये वित्तीय बिचौलिये नकदी से दूर रहना चाहते हैं ताकि वे अपनी कीमतें बढ़ा सकें, जो हमारे हित में नहीं है.

इससे भी महत्वपूर्ण बात: हम जो कुछ भी भुगतान करते हैं (के लिए) डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किया जाता है, देखा जाता है और विभिन्न सेवा प्रदाताओं द्वारा संग्रहीत किया जाता है और हमारे बैंक खाते की जानकारी में समाप्त होता है. यदि अब नकदी का उपयोग करने की कोई संभावना नहीं है, तो हमारे बैंक खाते की जानकारी हमारे जीवन का लगभग पूर्ण लॉग होगी. इसे देखने की शक्ति वाला कोई भी व्यक्ति, जो किसी भी समय हममें रुचि विकसित करता है, देख सकता है कि हम कहां थे और हमने हर दिन और घंटे के लिए क्या किया, दशकों से अतीत तक.

बहुत से लोग सही ढंग से सोचते हैं कि ऐसा करने की शक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति कभी भी उनमें पर्याप्त रुचि विकसित नहीं करेगा. हालांकि, उन्हें यह महसूस करना होगा कि यह उनके लिए भी कुछ मायने रखता है, अगर उन्हें ऐसे समाज में रहना है, जिसमें किसी भी महत्व का प्रत्येक व्यक्ति शक्तिशाली के लिए पूरी तरह से पारदर्शी है और इस प्रकार उनकी इच्छा से ब्लैकमेल या नष्ट किया जा सकता है. यह लोकतंत्र और मुक्त समाज के साथ असंगत है.

प्रश्न: नकदी के उन्मूलन के खिलाफ मुख्य तर्कों में से एक यह है कि डिजिटल लेन-देन एक निशान, एक डिजिटल निशान, एक इलेक्ट्रॉनिक निशान छोड़ देगा, और सरकारों और अन्य संगठनों को हमारी निगरानी करने की अनुमति देगा, हमारे हर आंदोलन पर नज़र रखने के लिए और हर खरीद. अब, कुछ लोग कह सकते हैं कि, ‘मुझे छिपाने की आवश्यकता नहीं है’. या हो सकता है कि सरकार मुझे उतना दिलचस्प न लगे, इसलिए शायद वे मेरी सभी खरीदारी और मेरे सभी वित्तीय लेन-देन पर नज़र नहीं रखेंगे. जो लोग कहते हैं, या जो तर्क देते हैं, उनके प्रति आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?

नॉर्बर्ट हेरिंग: दो बातें कहने की जरूरत है. मेरा मतलब है, सबसे पहले, वे सही हैं. अधिकांश लोग इतने दिलचस्प नहीं होते कि सत्ता में कोई भी उन्हें देख सके, वे बस अपने विज्ञापनों को उनके अनुकूल बना लेते हैं और यह वास्तव में आपको चोट नहीं पहुंचा रहा है, लेकिन लोग आमतौर पर यह नहीं समझते हैं कि ट्रैकिंग इतनी व्यापक है कि आप जो कुछ भी करते हैं, हर चीज में थोड़ा भुगतान शामिल होता है, इसमें शामिल होता है कि आप कहां हैं, अक्सर आप किसके साथ हैं, आप क्या कर रहे हैं, और यह घंटे दर घंटे, दिन ब दिन होता है. और वह सारी जानकारी आपके बैंक खाते में चली जाती है, और वहां दशकों से भंडारण है, बैंकों को इसे बहुत लंबे समय तक संग्रहीत करना पड़ता है. तो, मूल रूप से, आपका बैंक खाता आपके पूरे जीवन का (अश्राव्य 00:07:01) बन जाता है.

और कभी भी किसी को आप में दिलचस्पी हो जाती है, जो कि अब से 10 साल बाद हो सकता है, वे देख सकते हैं और देख सकते हैं कि आपने किसी भी दिन किसी भी समय क्या किया, जिसके बारे में वे जानना चाहते हैं, या उनके पास एक पूर्ण प्रोफ़ाइल है. और हो सकता है कि वे मेरे लिए ऐसा न करें.

लेकिन अगर मैं उन लोगों में से एक हूं जो कहते हैं, ‘मुझे परवाह नहीं है,’ तो मुझे पता होना चाहिए कि अगर ऐसा होता है तो मैं ऐसे समाज में रह रहा हूं जहां हर किसी के पास कोई शक्ति है, या कोई भी महत्व, मूल रूप से, पूरी तरह से पारदर्शी है और इसे देखने की शक्ति रखने वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा ब्लैकमेल किया जा सकता है. और वह बहुत सारे लोग हैं, इसलिए सभी को नष्ट किया जा सकता है, या उस सारे डेटा के साथ ब्लैकमेल किया जा सकता है, जो वहां मौजूद है. और यह लोकतंत्र और मुक्त समाज के अनुकूल नहीं है.

बिल गेट्स का गवर्नर शक्तिकांत दास से मुलाकात

बहुत से लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि बिल गेट्स ने भारत आकर सबसे पहले भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास से मुलाकात की लेकिन मुझे इस बात का बिलकुल भी आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि कुछ साल पहले ही आपको बता चुका हूं कि नरेंद्र मोदी ने 8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी ही बिल गेट्स के इशारों पर की थी.

कल शाम रिजर्व बैंक ने ट्वीट किया, ‘श्री गेट्स आज आरबीआई, मुंबई आए और उन्होंने गवर्नर के साथ विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया.’ दुनिया का इतना बड़ा पूंजीपति आता है और सीधा आरबीआई गवर्नर से मिलता है तो उसके दिमाग में क्या चल रहा है ये समझना बहुत जरूरी है !

बिल गेट्स के भारत के रिजर्व बैंक से संबंध कई साल पुराने हैं. नचिकेत मोर 2016 में भारत में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के भारत में प्रमुख थे, जो 2019 तक उसी पद पर रहते हुए रिजर्व बैंक के डिप्टी डायरेक्टर तक बने रहे. 2015 दिसम्बर में भी बिल गेट्स भारत आए थे. नवभारतटाइम्स.कॉम में एक खबर छपी थी शीर्षक था – ‘डिजिटल फाइनैंशल इन्क्लूजन के मामले में दुनिया को राह दिखाएगा भारत: बिल गेट्स.’

बिल गेट्स की मौजूदगी में वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने उस वक्त अपने एक वक्तव्य में कहा था कि ‘भारत को कैशलेस सोसायटी बनाने का ढांचा तैयार है, लेकिन लोगों की व्यवहार बदलने में थोड़ा वक्त लगेगा.’ जी हां ‘कैशलेस सोसायटी’, यही जुमला आपने नोटबंदी के ठीक बाद नरेंद्र मोदी जी के मुंह से सुना होगा.

दरअसल नकदी, यानी कैश ही व्यक्तिगत स्वायत्तता का आखिरी क्षेत्र बचा है. इसमें ऐसी ताकत है जिसे सरकारें नियंत्रित नहीं कर सकतीं, इसलिए इसका खात्मा जरूरी है. नोटबंदी के जरिए ठीक यही करने की कोशिश की गई.

2012 में विश्व में ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ लांच किया गया, इस एलायंस में 80 देश आते हैं जिसमें भारत भी एक है. भारत ने 1 सितम्बर, 2015 को इस संगठन की सदस्यता ली थीं और जन धन अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर बैंक खाते खोले गए. बेटर दैन कैश एलायंस दरअसल इन्हीं बिल गेट्स का ब्रेन चाइल्ड है. उसके साथ वीजा, मास्टरकार्ड, सिटीग्रुप, ओमिडयार नेटवर्क, फ़ोर्ड फाउंडेशन और अमेरिकी सरकार की संस्था यूएसएआईडी इस एलायंस में हिस्सेदार है.

इसके अंतर्गत यह बताया जाता है कि कई कारणों से नकदी छापना, उसकी निगरानी, भंडारण, चलन को नियंत्रित करना महंगा है और इससे भी बढ़कर कैशलेस सोसायटी सरकारों को जनता पर और अधिक नियंत्रण का मौका देता है. कैशलेश समाज का असली मकसद है सम्पूर्ण नियंत्रण: चौतरफा नियंत्रण …और इसे हमारे सामने ऐसे आसान और कारगर तरीके के रूप में पेश किया जाएगा जो हमें अपराध से मुक्ति दिलाएगा यानि फासीवाद को चाशनी में लपेटकर पेश किया जाएगा.

भारत में कोई डेटा सुरक्षा कानून नहीं है, न ही बनाया जा रहा है, जिससे मुद्रा का डिजिटलीकरण उसकी ट्रेकिंग करना बहुत आसान हो जाता है. बिल गेट्स को भारत की यही बात सबसे अधिक पसंद हैं. आधार कार्ड और कोरोना टीके के जरिए हेल्थ आईडी बनाकर लोगों की डिजीटल पहचान दर्ज की जा चुकी है. ये स्कीम भी बिल गेट्स के निर्देशन में लाई गई थी.

सच यह है कि 2030 तक जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के लागू होना है उसमें नकदी का चलन सबसे बड़ी दिक्कत है. आज भी भारत में नकदी दुनिया के किसी भी और देश से कहीं ज्यादा इस्तेमाल की जाती है और इसी दिक्कत को दूर करने के लिए बिल गेट्स आए हैं. बिल गेट्स आरबीआई गवर्नर से मिले है तो संभव है जल्द ही आपको नोटबंदी सरीखी एक और सर्जिकल स्ट्राइक देखने को मिले !

  • गिरीश मालवीय

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