Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home लघुकथा

इन दिनों ‘कट्टर’ से ‘कट्टा’ हो रहा हूं मैं…!

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 27, 2023
in लघुकथा
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

आजकल मैं बहुत हीन भावना में जी रहा हूं. सामान्य तौर पर मैं सामान्य मनुष्य के जैसा जीवन ही जीना चाहता रहा हूं, मगर अब देख रहा हूं कि ऐसा सोचना भी मेरा असामान्य है. आजकल ऐसे सोचने वालों को कायर कहा जाता है. कायर ही नहीं बहुत कुछ कहा जाता है, जो यहां लिखा नहीं जा सकता.

‘कट्टर’ शब्द को मैं नकारात्मक मानता हूं. मुझे लगता है कोई एक बार कट्टर बन गया तो वह इंसान तो नहीं ही रहता ! अब मुझे लगता है कि मुझे अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. पर मैं कट्टर जैसे भारी, महाप्रचलित और अतिआवश्यक शब्द को सिर्फ धर्म के साथ रखने का कट्टर विरोधी हूं.

You might also like

एन्काउंटर

धिक्कार

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

‘कट्टर’ शब्द को सीमित न रखकर इसको व्यापक करने की जररूत है. जैसे कट्टर ईमानदार, कट्टर खूबसूरत, कट्टर ज्ञान, कट्टर दयालु, कट्टर भावुक, कट्टर मेहनती, कट्टर नेता, कट्टर प्रेमी वगरैह….वह कट्टर गोरे रंग पर मरता है….वह कट्टर बेरोजगार है…ऐसे वाक्य बोले और लिखे जाने चाहिए !

कल बाजार में एक पुराना मित्र मिला. बोला, ‘यार तुम बहुत ढीले हो !’

मैंने उससे पूछा कि ‘फिर मुझे क्या करना चाहिए ?’

वह बोला, ‘थोड़ा कट्टर बनो !’

मैंने उसे शुक्रिया कहा.

‘किस बात के लिए !’ उसने पूछा.

‘आपने थोड़ा कहकर बहुत रियायत दे दी !’

वह मुस्कुराया। बोला,’ शुक्र है तुम जाग गए !’

‘क्या अब जागना भी होगा !’, मैंने पूछा.

वह हंसा और हाथों की उंगलियों को हिलाते हुए बोला, ‘बिना जागे कट्टर नहीं बन सकते…!’

‘यह भी गजब है ! बचपन में मां जगाती थी तो जवानी में घड़ी. सोचा था अब आराम से सोऊंगा तो तुम जैसे चिंतक जगा रहे. ट्रेन में किसी सहयात्री की तरह घड़ी-घड़ी भाईसाहब कौन-सा स्टेशन आया, पूछने वाले की तर्ज पर चैन से न रहने देना !’ मैंने उलाहना दिया.

‘भइया अपने धर्म के हो तो जागना पड़ेगा !’ उसने सर हिलाया.

‘अगर मैं किसी और धर्म का होता तो !’

‘तब तो कोई जरूरत नहीं थी.’

‘क्यों !’

‘वह तो पहले से जागे हैं !’

‘अच्छा ! तुम सारी खबर रखते हो ! वैसे जागने का काम चौकीदार का होता है !’

‘जागते तो चोर भी हैं !’ उसने यह कर अपनी एक आंख दबाई.

‘फिर मुझे कैसे जागना होगा !’ मैंने पूछा.

‘जैसे मैं जागा हूं !’ वह बोला.

अब जाकर मैंने उसे गौर से देखा. भरा हुआ चेहरा. चमकता हुआ. विज्ञापन वाली भाषा में कहूं तो विटामिन ई, एलोविरा से युक्त खिला-खिला चेहरा. एक मैं हूं कि जागने की वजह से मेरे आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ चुके हैं और यह…

‘मैं काफी देर तक जागता हूं मित्र !’

यह सुनकर वह हंसा.

‘नींद सेहत के लिए बहुत जरूरी है.’ उसने सुझाव दिया.

‘फिर जागने की बात क्यों करते हो ?’

‘अरे यार जागने का मतलब वो नहीं है, जो तुम ले रहे हो !’

‘फिर मैं कैसे लूं ?’

‘जागने का मतलब जाग्रत अवस्था. अपनी संकृति से प्रेम. राष्ट्र के प्रति भक्ति…!’

‘मुझे लगता है यह सब मैं करता हूं !’

‘जागने का मतलब देशद्रोहियों पर नजर भी ! खतरा बढ़ता ही जा रहा !’ यह कह कर वह इधर-उधर देखने लगा.

‘ये काम तो सरकार, सेना, पुलिस लोगों का है !’

‘तुम हो बेवकूफ ! अपने आसपास पहचानो !’

‘जल सेना के 11 जवान जासूसी करते हुए पकड़े गए, जब सेना ही नहीं पहचान पा रही तो हमारे जैसा साधारण इंसान क्या पहचानेगा !’

‘कपड़े से पहचानो !’

‘कपड़े से कैसे पहचान होगी ?’

‘सेना के जवान सब वर्दी में ही थे ! मुझे कोई और काम-धंधा नहीं है क्या !’ मैंने उसे झिड़का.

‘तुम्हें काम-धंधे की पड़ी है ! चाहे देश जल जाए ! हैएं !!!’ उसने मुझे घूरा. मैं समझ चुका था यह अपनी टेक नहीं छोड़ेगा.

‘तुमनेे तो मेरी आंखें खोल दी मित्र. देश के लिए अब मैं जागूंगा ! अगली बार जब तुमसे मिलूंगा तो मैं पूरा कट्टर बन कर मिलूंगा.. शायद तुमसे भी ज्यादा ! क्योंकि मैं अपने देश को सच्चा नहीं… नहीं…कट्टर प्यार करता हूं !!”

‘यह हुई न बात !’ उसने जोश में मेरे कंधे पर शाबाशी दी.

तभी उसके मोबाइल पर झम से एक संदेश आया. उसने वह संदेश दिखाया. संदेश कह रहा कि ‘जो कट्टर है, इसे लाइक करें.’ उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया.

‘लो तुम लाइक करो !’ बोला.

‘मैं अभी कट्टर कहां हुआ !’ मैं उससे बताता हूं. उसने उसे झट से लाइक कर दिया. मैं मन मसोस कर उसके उत्साह को देखता रह गया.

‘अब तो अपनी सुरक्षा की व्यवस्था भी खुद ही करनी पड़ेगी !’ जाते-जाते बोला…

मैं देख रहा हूं, जागने पर जोर कौन दे रहा ! विधान सभा-संसद में जो नेता सोता है वो ! मुझको अंधेरे में रखकर बीमा बेचने वाला परम मित्र ये ! जाग जाऊं पर सही रास्ता कौन बताएगा ? मुझे जगा कर आराम से कौन सोएगा ? अगर मैं वाकई जाग गया तो जगाने वालों के चेहरों जैसा मेरा भी चेहरा चमकदार होगा कि नहीं ? पता नहीं इनको जागने पर क्या दीखता है. मुझे तो जागने पर संडास दीखता है…! और सबसे बड़ी बात जागने के बाद रौशनी तो होगी न !

मैं बाजार में घूम रहा हूं. इधर-उधर नजर घुमा रहा हूं. देखिए, फलां कह रहा कि इसमें इतने प्रतिशत एक्स्ट्रा है. अलां कह रहा कि यह बचत नहीं महाबचत है. आज सीधे-साधे से काम नहीं चलता ! अपने बिकने को लेकर ये प्रोडक्ट भी कट्टर हो गए हैं. पर मैं तो मनुष्य हूं. मैं सोचता हूं. मुझे क्या बेचना है, क्या खरीदना है ! मेरे कट्टर होने से क्या भला होना है ! किसका भला होना है ! अगर होना है तो कैसे भला होना है.

हमने वोट देकर जिनको चुना था, आज वही हमसे कट्टर होने को कह रहा. मैं सोचता हूं, कट्टर हो कर मुझे क्या मिलेगा ? हां मगर पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी पार्टी को हमारे घर का वोट उसे जरूर मिलेगा ! अर्थात, कट्टर मतलब पुश्त दर पुश्त वोटर होने की गारंटी…!

घूमते-घूमते मैं केले के ठेले के पास आ गया हूं.

‘कट्टर केले कैसे दिए ?’ उधेड़बुन में मैं उससे पूछता हूं.

‘पचपन रुपये दर्जन !’

‘आएं !!’ दाम तो वाकई कट्टर हैं !’ मैं सोचता हूं और आगे बढ़ लेता हूं.

‘पचास लग जाएंगे !’ वह अपनी कट्टरता कुछ कम करता है. मेरे हिसाब से अभी भी बहुत ज्यादा थी. मैं यह जानता हूं कि दाम की कट्टरता तय करने के पीछे इसका कोई हाथ नहीं. वह भी मेरी ही तरह है ‘कवि कहना चाहता है कि..’ के जैसे हम वहीं रट कर चलने वाले लोग हैं, जिसे हमें रटा दिया जाता है.

‘नहीं नाश्ते में आज गर्व खाऊंगा !’ मैं उससे कहता हूं

‘आज तो खा लेंगे सर ! मगर कल !’ वह हंसता है.

‘आज जो गर्व खाया है. मैं जानता हूं वो पचेगा नहीं. इसको पचाने के लिए मनुष्यता का त्याग करना पड़ता है. इतिहास बदलना होता है. कल उल्टी हो ही जाएगी. नाश्ते की नौबत और तबियत ही नहीं होगी !’

‘मगर परसों सर !’

‘हां मगर परसो क्या !’ मैं सोच में पड़ जाता हूं.

‘परसों तुम्हारा ठेला लूट लूंगा !’ मैं मजाक करता हूं. वह सहम जाता है. मुझे झेंप नहीं गुस्सा आता है. यह मजाक को इतनी गम्भीरता से क्यों ले रहा ! मजाक को सच समझ रहा !

‘मजाक कर रहा हूं !’ मैं स्पष्ट करता हूं. वह इसके बाद एक फीकी मुस्कान देता है. कमबख्त अभी भी सच मान रहा !

कुछ दिन बाद मैं अपने जागे मित्र के घर पहुंचता हूं, जिसे मेजबान आ धमकाना कहते हैं.

काउच पर मेरे लिए सोफ़ा ही है. उस पर बैठते ही मैंने कट्टा निकाल कर उनकी गोद में रख दिया. वह उछल पड़ा, जैसे बचपन में किसी के ऊपर प्लास्टिक का सांप फेंक देते थे.

‘ये क्या है !’ उसने चौंकते हुए पूछा.

‘कट्टा है !’

‘हां वह तो मैं भी देख रहा हूं !’

‘तुमने कहा था कि कट्टर बनो !’

‘तो!’

‘तुमसे ज्यादा कट्टर बन गया हूं, जैसा तुम से कहा था. यह कट्टा तुम्हारे बेटे के लिए लाया हूं !’

‘पागल हो ! कैसे चाचा हो तुम ! कलम की जगह कट्टा दे रहे हो !’ वह गुस्से से बोला. मैं उसके गुस्से को देख रहा था.

‘अपने बेटे को दो, जा के !’ वह फिर बोला.

‘दोस्त, मैं पूरी तरह से जाग चुका हूं. इसलिए उसे पहले ही दे चुका हूं !’

वह एक झटके से उठा. मेरा हाथ पकड़ कर उठाते हुए बोला, ‘तुम्हें आराम की जरूरत है. लगता है तुम कई दिनों से ठीक से सोये नहीं हो ! भरपूर नींद लो जा के !’

मैं जाने लगा तो वह पीछे से टोका, ‘और ये लेते जाओ !’ यह कह कर उसने कट्टा मेरे हाथ में पकड़ा दिया.

सड़क पर आकर मैं हंसा. खूब हंसा.

उसी केले वाले के पास दुबारा पहुंचा. वह मुझे देखकर कुछ घबरा-सा गया.

‘ये क्या है सर !’ वह डरते हुए पूछता है.

‘कट्टा !’ वह जड़ हो गया.

‘अरे, बच्चों का खिलौना है ये !’

इस बात पर वह और डर जाता है. ऐसा क्या गलत बोल दिया मैंने !थोड़ी देर के लिए मैं सोचने लगता हूं.

‘अरे यह प्लास्टिक का खिलौना है ! नकली ! नकली है पूरी तरह !’ मैंने उसे तसल्ली देता हूं.

‘बिल्कुल असली लग रहा था सर !’

‘यही तो दिक्कत है आजकल. लोग नकली को असली समझने लगे हैं !’
वह मुस्कुराता है.

‘केले तो कट्टर है न ?’

‘बहुत ! चखिए तो सर !

‘अभी एक को चखा कर आया हूं !’

‘जी !!!’ वह मुझे गौर से देखता है.

‘कुछ नहीं, तुम नहीं समझोगे !’ मैं हंसता हूं.

‘क्यों नहीं समझेंगे सर ? केले के साथ हमको भी कट्टर समझ रहे हैं क्या ?’

मैं उसे देखता रह जाता हूं. इस बात पर मैं तो आज कट्टर केला खा कर रहूंगा. मैं केला खरीद लेता हूं. मैं केला खाता हूं.’

‘केला कट्टर हो न हो पर मीठा है !’

‘कट्टर मीठा सर…!’ वह बोलता है.

हम दोनों हंस देते हैं…!!

  • अनूप मणि त्रिपाठी

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

लुटेरी व्यवस्था को बदलने का सबसे प्रहारक औज़ार है मार्क्सवाद

Next Post

फिल्में देखकर तुम कितना सबक लेते हो…?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

लघुकथा

एन्काउंटर

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

by ROHIT SHARMA
February 7, 2026
लघुकथा

इतिहास तो आगे ही बढ़ता है…

by ROHIT SHARMA
January 5, 2026
लघुकथा

सवाल

by ROHIT SHARMA
August 16, 2025
Next Post

फिल्में देखकर तुम कितना सबक लेते हो...?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

NRC – CAA : बात हिंदू मुसलमान की है ही नहीं

January 20, 2020

बिहार के चुनाव का ‘कल, आज और कल’

November 18, 2025

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.